सबदकोस – राजस्थानी साहित्य का परिचय

आर्यावर्त के विशाल भू-खंड में राजस्थान का विशिष्ठ ऐतिहासिक महत्त्व है। शताब्दियों से यहाँ के लोगों ने भारतीय संस्कृति, कला और साहित्य को अक्षुण्ण योग-दान दिया है जिसके महत्त्व पर आने वाली पीढ़ियाँ भी गर्व का अनुभव करती रहेंगी। यहाँ का बहुत प्राचीन इतिहास अभी अंधकार में है, पर जहाँ तक हमारे इतिहासकार पहुँचे हैं उनके लिखे इतिहासों को देखने से पता चलता है कि यहाँ के लोगों ने अपनी स्वतंत्रता और संस्कृति की रक्षा के लिए जो निरन्तर संघर्ष, तप और त्याग का जीवन व्यतीत किया है, उसके दर्शन अन्यथा दुर्लभ हैं।

इसी संघर्षमय जीवन में उन्होंने अपने सांस्कृतिक आदर्शों की रक्षा के लिए प्राणोत्सर्ग ही नहीं किया, उस संस्कृति को अपनी कलात्मक रचनाओं के माध्यम से अक्षुण्ण बना देने के लिए भी बहुत कड़ी साधना, मौलिक सूझ-बूझ और अमरता को वरण करने की अमिट लालसा का परिचय दिया है।

राजस्थान का प्राचीन कलात्मक वैभव सर्व-विख्यात है। यहाँ के विशाल एवं सुदृढ़ दुर्ग, जैन व अजैन मंदिर, भव्य राजप्रासाद, सती-स्मारक, समाधि-स्थान आदि वास्तु कला के अद्भुत नमूने हैं। इन राजप्रासादों और दुर्गों की बुलंदी आज भी उस समय के जीवन की बुलंदगी का संदेश दे रही है। इसी तरह यहाँ की मूर्ति कला में उस काल के कलाकारों की सौन्दर्यानुभूति ही सुरक्षित नहीं है, शताब्दियों से चली आ रही धार्मिक निष्ठा को कला के माध्यम से व्यंजित कर भारतीय संस्कृति की एकता और अखंडता का भी परिचय दिया है।

चित्रकला में राजपूत कलम के अगणित चित्र विभिन्न शैलियों में चित्रित किये गए। मुगल शैली से प्रभावित होने पर भी वैष्णव धर्म-भावना को राधा कृष्ण की लीलाओं के रूप में चित्रित कर नैसर्गिकप्रेम भावना को मौलिक अभिव्यक्ति देने में यहाँ के कलाकारों ने कोई कसर नहीं रखी। जीवन के ऐश्वर्य, विलास और प्रणय को चित्रित करने वाले कलाकारों ने विभिन्न रंगों और आकृतियों के माध्यम से जो भावानुभूति की बारीकियों का चित्रण किया है, उसकी विलक्षणता और सौन्दर्यानुभूति को भावोद्रेक से रंजित कर देने वाली क्षमता को कौन अस्वीकार कर सकता है? इन अमूल्य चित्रों के पीछे उन्हें चित्रित करने वाले कलाकारों की प्रेरणा और उनके आश्रयदाताओं की परिष्कृत रुचि हमारे कल्पना लोक को आज भी अभिभूत कर देती है।

संगीत के क्षेत्र में भी यह प्रांत पिछड़ा हुआ नहीं रहा। यहाँ के शासकों ने संगीत को प्रश्रय तो दिया ही परन्तु कई एक ने स्वयं संगीत की साधना कर इस विषय के ग्रंथों का निर्माण भी किया। राणा कुंभा का संगीतराज इसका प्रमाण है। राजस्थान के मध्ययुगीन भक्त कवियों ने विभिन्न राग-रागिनियों में हजारों पदों की रचना कर संगीत के माध्यम से ही उन्हें अपने-अपने इष्ट देवता को अर्पण किया है। मुगल सल्तनत का पतन हो जाने पर तो बहुत से प्रसिद्ध गायकों व नृत्यकारों को राजस्थान के शासकों ने ही प्रश्रय दिया था। यहाँ की मांड रागिनी (?) और अनेकानेक धुनें (तानें) आज भी यहाँ के लोकगीतों में सुरक्षित हैं। संगीत की विरल साधना के प्रतीक स्वरूप राग-रागिनियों के कितने ही सुन्दर व चित्ताकर्षक चित्रों का निर्माण यहाँ हुआ है।

विभिन्न कलाओँ को प्रश्रय देने वाली इस भूमि का प्राचीन साहित्यिक गौरव भी किसी प्रान्तीय भाषा के साहित्यिक गौरव से कम नहीं है। जिस परिमाण में यहाँ साहित्य सृजन हुआ है उसका सतांश भी अभी प्रकाश में नहीं आया। अनगिनत हस्तलिखित ग्रन्थों में वह अमूल्य सामग्री ज्ञात-अज्ञात स्थानों पर बिखरी पड़ी है। काव्य, दर्शन, ज्योतिष, शालिहोत्र, संगीत, वेदांत, दर्शन, वैद्यक, गणित, शकुन आदि से सम्बन्ध रखने वाले मौलिक ग्रन्थों के अतिरिक्त कितने ही संस्कृत, प्राकृत, फारसी आदि के प्राचीन ग्रन्थों के अनुवाद व टीकाओं का निर्माण यहाँ हुआ है।

इतना ही नहीं, यहाँ के शासकों ने प्राचीन संस्कृत साहित्य की रक्षा की ओर भी समय-समय पर ध्यान दिया है। औरंगजेब के समय में जब धार्मिक असहिष्णुता के कारण संस्कृत के धार्मिक ग्रन्थों को क्षति पहुँचाई जाने लगी तो बीकानेर के तत्कालीन महाराजा अनूपसिंहजी ने कितने ही महत्त्वपूर्ण ग्रंथों को सुदूर दक्षिण से मंगवा कर अपने यहाँ सुरक्षित रखा जो आज भी अनूप संस्कृत लाइब्रेरी बीकानेर में विद्यमान है। इसके अतिरिक्त अन्य शासकों ने भी अपने संग्रहालयों में संग्रहीत कर कितने ही ग्रन्थों को कालकवलित होने से बचाया।[1] जैन यतियों ने अपने सतत् प्रयत्नों से बहुत बड़ी साहित्यिक निधि को मंदिरों और उपाश्रयों आदि में सुरक्षित रखा। कितने ही ठाकुरों तथा जागीरदारों ने भी इस दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य किया। ये सभी प्रयत्न यहाँ के लोगों के प्रगाढ़ साहित्य-प्रेम के परिचायक हैं।

जिस सामाजिक ऊहापोह और राजनैतिक तथा साम्प्रदायिक उथल-पुथल के बीच यहाँ साहित्य-सृजन हुआ है, इतिहास इसका साक्षी है। काल-क्रम की पृष्ठ-भूमि के साथ आगे हम उसका उल्लेख यथास्थान करेंगे।

सम्पूर्ण प्राचीन राजस्थानी साहित्य को 4 मुख्य भागों में विभाजित किया जा सकता है। इस दृष्टि से संक्षेप में यहाँ कुछ विचार उनकी विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए किया जा रहा है।

(1) जैन साहित्य        (2) चारण साहित्य[2]

(3) भक्ति साहित्य      (4) लोक साहित्य

[1]सरस्वती भंडार उदयपुर, पोथीखाना जयपुर, अलवर का राजकीय संग्रह, जैसलमेर जैन संग्रहालय, जोधपुर का पुस्तक प्रकाश आदि।
[2]चारण-साहित्य से तात्पर्य यहां चारण शैली में लिखे गए साहित्य से है।

जैन साहित्य अधिकांश में जैन यतियों और उनके अनुगामी श्रावकों द्वारा लिखा गया है। उसमें उनके धार्मिक नियमों और आदर्शों का कई प्रकार से गद्य तथा पद्य में वर्णन है। यह साहित्य बहुत बड़े परिमाण में लिखा गया है और प्रारम्भिक राजस्थानी साहित्य की तो वह बड़ी धरोहर है। जैन साधुओं ने धार्मिक साहित्य का ही निर्माण किया है पर अन्य अच्छे साहित्य के संग्रह और सुरक्षा में संकीर्णता नहीं बरती। इस ओर हम पहले ही संकेत कर आये हैं। अतः उनकी राजस्थानी साहित्य को बहुत बड़ी देन है। पर उनका यह साहित्य जैन धर्म से सम्बन्धित होने के कारण जैन धर्मावलंबियों तक ही सीमित रहा। वह समूचे समाज की वस्तु न बन सका। जो मध्ययुगीन सन्तों की धार्मिक वाणियों तथा तुलसीकृत रामायण आदि का समूचे उत्तरी भारत में प्रचार-प्रसार हुआ और सूर, तुलसी, मीरां, कबीर, दादू आदि के पद जन-जन के कंठहार बन गए वैसी स्थिति जैन साहित्य की नहीं बन सकी। वह साहित्य जन-जन का साहित्य न बन सका और न समाज के बहुत बड़े क्षेत्र को ही उतना प्रभावित कर सका।

चारण शैली में साहित्य का निर्माण चारणों के अतिरिक्त राजपूत, मोतीसर, भोजक ब्राह्मण, ओसवाल आदि अनेक जाति के लोगों ने किया है पर चारणों की इसे विशेष देन है। चारण जाति का शासक वर्ग के साथ विशेष सम्बन्ध रहा है। वे मध्यकालीन राजपूत संस्कृति के प्रेरक स्रोत रहे हैं। संघर्ष के युग में उन्होंने अपने आश्रयदाताओं को कभी अपने कर्त्तव्य से च्युत नहीं होने दिया। उन्होंने तत्कालीन शासकों को ऐश्वर्य और विलासी जीवन से दूर ही नहीं रखा अपितु निरन्तर संघर्ष कर देश और धर्म की रक्षा करने के लिए प्राणोत्सर्ग कर देने की प्रेरणा देना ही अपने जीवन का ध्येय माना है। मौका पड़ने पर वे स्वयं रण भूमि में उपस्थित होकर वीरों को उत्साहित करने तथा स्वयं युद्ध करने में पीछे नहीं रहे हैं। आज उनके द्वारा किए गए युद्ध-वर्णन भले ही अतिशयोक्तिपूर्ण लगें पर यवनों द्वारा आतंकित समाज की सुरक्षा के लिए उन कवियों ने अपने योद्धाओं के समक्ष शत्रुओं की सेना रूपी कुंवरी (कुमारी) कन्या को वरण करने की मधुर कल्पना रख कर मौत के विकराल स्वरूप को जो तुच्छ रूप दिया है वह तत्कालीन परिस्थितियों के अनुसार अत्यन्त आवश्यक था। मनुष्य सभी कुछ आदर्श जीवन के लिए करता है और उस आदर्श की रक्षा के लिए सहज ही मृत्यु का आलिंगन करने वाले व्यक्ति के यशोगान में कौनसी उपमा अतिशयोक्तिपूर्ण हो सकती है? इसका अनुभव सहानुभूतिपूर्वक इस साहित्य का अध्ययन करने पर ही हो सकता है। कहने का तात्पर्य यह है कि उनका साहित्य अत्यन्त प्राणवान और जीवन्त साहित्य है। उसमें जीवन की जो ऊर्जस्विता दृष्टिगोचर होती है वह अन्यथा दुर्लभ है। इस प्रकार के साहित्य की रचना करने वाले कवियों की शासक वर्ग और समाज में बड़ी प्रतिष्ठा थी। शासक उन्हें जागीर देकर सम्मानित करते थे। राज दरबार में उन्हें उचित आसन मिलता था और समाज उन्हें आदर की दृष्टि से देखता था। शासकों पर कई बार जब कि आपत्ति आ जाती तो वे उनकी पूरी सहायता करते थे।[3] उन्हें दी गई जागीर “सांसण” के नाम से पुकारी जाती थी। क्योंकि उस जागीर पर पूरा अधिकार चारण का ही होता था। यहाँ तक कि राज्यद्रोह करने वाला व्यक्ति भी “सांसण” में शरण चला जाता तो उसे कोई दखल नहीं देता था। चारणों को इतना सम्मान मिलता था, इसके उपरांत भी वे शासकों को खरी-खरी सुनाने में भी कभी नहीं चूकते थे। युद्ध में वीर गति प्राप्त करने वाले की जहां वे प्रशंसा करते थे वहां युद्ध से भाग जाने वाले की निंदा करने में भी कसर नहीं रखते। सच तो यह है कि वे वीरता के उपासक थे और किसी भी वीर के वीरतापूर्वक कार्य की प्रशंसा किए बिना उनका मन नहीं मानता था, चाहे वह व्यक्ति उनका परिचित हो अथवा नहीं। यही कारण है कि उनके द्वारा रचा गया अधिकांश साहित्य वीररसात्मक है और उस समय में उस साहित्य का बड़ा ही सामाजिक महत्त्व रहा है।

राजस्थान में भक्ति साहित्य भी बहुत बड़े परिमाण में लिखा गया है। संत कवियों की वाणियां आज भी समाज में प्रचलित हैं। उत्तरी भारत की संत परम्परा से प्रभावित होने पर भी यहां की संत परम्परा में तथा भक्ति साहित्य में एक विशेषता यह है कि उनका झुकाव अधिकतया निर्गुण भक्ति की ओर रहा है। यहां के कवियों ने यहां की भाषा में नवीन उपमाओं और उत्प्रेक्षाओं आदि के माध्यम से अपने भावों की अभिव्यक्ति को एक नवीन रूप दिया है जो बड़ा ही प्रभावोत्पादक और सरस है।

किसी भी देश या प्रान्त का लोक साहित्य वहां के जनजीवन से निःसृत स्वाभाविक भावोद्रेक को व्यक्त करता है। राजस्थान की वीर प्रसविनी भूमि में जहाँ हजारों कवियों ने अपनी काव्य-कला के माध्यम से राजस्थानी साहित्य की सेवा की है वहां कितने ही अज्ञात जन कवियों ने अपनी सरल और सरस वाणी में अपने लौकिक अनुभवों को जन साधारण की निधि बना दिया है। लोक-गीत, पवाड़े, लोक कथायें, कहावतें, मुहावरे आदि राजस्थानी लोक साहित्य के अमूल्य रत्न हैं। लोक साहित्य जितने बड़े परिमाण में यहां सुरक्षित है उतना शायद भारत की किसी अन्य भाषा में उपलब्ध नहीं होगा। राजस्थानी लोक गीतों की विविधता और सरसता तो सर्वविख्यात है। राजस्थान की संस्कृति को समझने के लिए भी उनसे बढ़ कर अन्य कोई उपयोगी साधन शायद ही सुलभ होगा। क्योंकि यहाँ के जन-जीवन की सर्वांगीण निश्छल अभिव्यक्ति इसी साहित्य में सुरक्षित मिलती है। युगों-युगों से यह साहित्य जनता का मनोरंजन ही नहीं करता रहा है परन्तु इसने उन्हें व्यावहारिक जीवन दर्शन भी दिया है। राजस्थानी साहित्य को प्राणवान बनाने का और भाषा को नवीन रूप प्रदान करने का बहुमूल्य कार्य भी अज्ञात रूप से इसी साहित्य ने किया है।

इतने विशाल और विविधतापूर्ण राजस्थानी साहित्य की महानता को विद्वान सही रूप में तभी समझ पायेंगे जब वह सम्पूर्ण साहित्य सुलभ हो जायेगा। कोश-निर्माण के दौरान में मुझे इस साहित्य की कितनी ही हस्तलिखित प्रतियाँ देखने का और उनकी खूबियों पर विचार करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। अतः इस साहित्य के महत्त्व पर विचार करते समय कई बार प्रसिद्ध अंग्रेजी आलोचक मेथ्यू अरनॉल्ड की पंक्तियां याद आ जाती हैं जिनमें वह इंगलैण्ड की महानता उसके बहुत बड़े साम्राज्यवाद अथवा सैनिक शक्ति और असाधारण राजनीतिज्ञों की वजह से नहीं पर अंग्रेजी साहित्य की महानता की वजह से मानता है।[4] क्या राजस्थानी का इतना महान् साहित्य हमारे देश की महानता का प्रतीक नहीं है? सभी भारतीय भाषाओं का साहित्य अपने-अपने ढंग का निराला है पर राजस्थानी साहित्य की कुछ अपनी ऐसी विशेषतायें हैं जो अन्य बाषाओं के साहित्य में देखने में नहीं आतीं। विश्व कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भी मुक्त हृदय से इस विशेषता को स्वीकार किया है–“भक्ति रस का काव्य तो भारतवर्ष के प्रत्येक साहित्य में किसी न किसी कोटि का पाया जाता है। राधाकृष्ण को लेकर हर एक प्रांत ने मंद व उच्च कोटि का साहित्य पैदा किया है, लेकिन राजस्थान ने अपने रक्त से जो साहित्य निर्माण किया है उसकी जोड़ का साहित्य नहीं मिलता।”[5] राजस्थानी साहित्य के महत्त्व के सम्बन्ध में इससे अधिक और क्या कहा जाय?

[3] राव चूंडा अपने पिता वीरम की मृत्यु के उपरांत बचपन में आल्हा बारहठ के घर पर ही बड़ा हुआ था।
[4] And by nothing is England so glorious as by her poetry. Mathew Arnold. Preface to the ‘Poems of Wordsworth’.
[5] डिं. वी. , हि. सा. स. प्रयाग, संवत् 2003, पृ. 68

राजस्थान का यह प्राचीन साहित्य डिंगल तथा पिंगल दो भाषाओं में प्राप्त होता है। कई विद्वानों ने पिंगल को डिंगल की ही एक शैली मान लेने की भूल की है। पर वास्तव में पिंगल डिंगल से भिन्न भाषा है जो ब्रज का ही एक स्वरूप है। कविराजा बांकीदास[6] एवं सूर्यमल्ल मीसण ने भी इन दोनों भाषाओं का अस्तित्व स्वीकार किया है। इस सम्बन्ध में डॉ. एल. पी. तैस्सितोरी ने एक स्थान पर लिखा है–

‘It is well known that there are two languages used by the bards of Rajputana in their poetical compositions and they are called ‘Dingala’ and ‘Pingala’. These are not mere ‘styles’ of poetry as held by Mahamahopadhyaya Har Prasad Shastri, but two distinct languages, the former being the local Bhasha of Rajputana and the letter Braja Bhasha, more or less vitiated under the influence of the former. ‘[7]

इसके अतिरिक्त सर जार्ज ग्रियर्सन ने भी इस सम्बन्ध में अपना निश्चित मत प्रस्तुत किया है–

‘Marwari has an old literature about which hardly anything is known. The writers some times composed in Marwari and some times in Brij Bhasa. In the former case, the language was called ‘Dingala’ and in the latter ‘Pingala’.[8]

डॉ. सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या ने उदयपुर में दिए गए अपने एक भाषण में कहा था कि “गुजरात और मारवाड़ के जैन आचार्य और पंडितों के द्वारा सौराष्ट्र अपभ्रंश से उद्भूत पुरानी पश्चिमी राजस्थानी में साहित्य का सृजन होने लगा पर साथ ही साथ शौरसेनी अपभ्रंश साहित्यिक भाषा, पूर्व से बदलती गई, इसका एक नवीनतम या अर्वाचीन रूप “पिंगल” नाम से राजस्थान और मालवा के कवियों में पूर्णतया गृहीत हुआ। पिंगल का एक साहित्य बन गया। पिंगल को शौरसेनी अपभ्रंश साहित्यिक भाषा और मध्यकालीन ब्रज भाषा, इन दोनों के बीच की भाषा कहा जा सकता है। ब्रज भाषा प्रतिष्ठित हो जाने के बाद पिंगल के साथ-साथ ब्रज भाषा ने भी राजस्थानी भाषाओं में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान बना लिया। समग्र राजस्थान ब्रज भाषा के लिए अपना क्षेत्र हो गया। ब्रज भाषा के कुछ श्रेष्ठ कवि राजस्थानी भाषी ही थे। फिर राजपूताने के भाट और चारणों ने “पिंगल” की अनुकारी एक नई कवि भाषा मारवाड़ी के आधार पर बनाई जो “डींगल” या “डिंगल” नाम से अब परिचित है।[9]

डॉ. चाटुर्ज्या ने जहां पिंगल के अनुकरण पर डिंगल नाम का प्रादुर्भाव होना माना है वहाँ डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने डिंगल के अनुकरण पर पिंगल नामकरण का अनुमान किया है।[10] वास्तव में पिंगल और डिंगल दो भिन्न भाषायें हैं।[11] पिंगल का विकास शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है[12] और डिंगल का गुर्जरी अपभ्रंश से।[13] देखा जाय तो डिंगल काव्य पिंगल की अपेक्षा अधिक प्राचीन है। जब ब्रज भाषा की उत्पत्ति हुई तो उसका तत्कालीन प्रभाव राजस्थान के पूर्वी प्रदेश पर भी पड़ा। शुद्ध डिंगल तथा ब्रज भाषा से प्रभावित डिंगल में अंतर स्पष्ट करने के लिए संभवतः दोनों का नामकरण हुआ हो। यह तो सर्वविदित है कि ब्रज भाषा के पहले से ही राजस्थानी में काव्य-रचना होती थी। अतः यह कहना उचित नहीं होगा कि पिंगल के आधार पर ही डिंगल का नामकरण-संस्कार किया गया। इस सम्बन्ध में डॉ. रामकुमार वर्मा का यह मत उचित मालूम देता है कि–“उचित तो यह ज्ञात होता है कि “डिंगल” के आधार पर ही “पिंगल” शब्द का उपयोग किया होगा। इस कथन की सार्थकता इससे भी ज्ञात होती है कि पिंगल का तात्पर्य छंदशास्त्र से है। ब्रज भाषा न तो छंदशास्त्र ही है और न उसमें रचित काव्य छंदशास्त्र के नियमों के निरुपण के लिए ही है। अतएव “पिंगल” शब्द ब्रज भाषा काव्य के लिए एक प्रकार से उपयुक्त ही माना जाना चाहिए। हां यह अवश्य है कि ब्रज भाषा काव्य में छंदशास्त्र पर अपेक्षाकृत अधिक ध्यान दिया गया है और सम्भवतः यही कारण है कि उसका नाम पिंगल रखा गया है।[14]

[6] डिंगलियां मिलियां करै, पिंगल तणौ प्रकास। संसक्रति व्है कपट सज, पिंगळ पढ़ियां पास। –बां. दा. ग्रं. भाग 2

[7] Journal of the Asiatic Society of Bengal, Vol. X No. 10 PP. 375

[8] Linguistic Survey of India, Vol. IX, Part II, Page 19.

[9] राजस्थानी भाषा : डॉ. सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या, पृष्ठ 65

[10] हिन्दी साहित्य : डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृष्ठ 67

[11] राजस्थानी भाषा और साहित्य : डॉ. हीरालाल माहेश्वरी, पृष्ठ 7

[12] (क) Linguistic Survey of India, Grierson, Pt. I, Page 126
(ख) राजस्थानी भाषा : डॉ. सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या, पृ. 64

[13] (क) अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन के 33 वें अधिवेशन का विवरण–कन्हैयालाल माणिकलाल मुन्शी, पृष्ठ 9.
(ख) राजस्थान का पिंगल साहित्य तथा राजस्थानी भाषा और साहित्य–श्री मोतीलाल मेनारिया।

[14] हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास, भाग 1, डॉ. रामकुमार वर्मा, पृ. 139-140

यहां हम प्राचीन राजस्थानी को डिंगल के नाम से अभिहित कर रहे हैं। कुछ विद्वानों का यह भी भ्रम है कि शायद राजस्थान में पिंगल साहित्य का निर्माण परिमाण में डिंगल से भी अधिक हुआ है, पर यह मान्यता भी निराधार है, जैसे कि हम पहिले कह आये हैं कि डिंगल का अधिकांश साहित्य अभी प्रकाश में नहीं आया है और बहुत-सा लिपिबद्ध भी नहीं हुआ है, इसीलिए शायद ऐसी भ्रामक धारणा बन गई है।

राजस्थानी साहित्य के इस विवेचन के पश्चात् अब हम उसके विकास-क्रम पर विचार करते हैं। राजस्थानी भाषा विवेचन के प्रकरण में हम यह स्पष्ट कर आये हैं कि राजस्थानी का निकास अपभ्रंश भाषा से हुआ है। अतः अपभ्रंश की अन्तिम अवस्था ही राजस्थानी का आदिकाल अथवा प्रारम्भिक काल माना जाता है। राजस्थानी का प्राचीन नाम मरु भाषा है। सर्व प्रथम मरु भाषा का नाम हमें मारवाड़ राज्य के जालोर ग्राम में रचे गए जैन मुनि उद्योतन सूरि के प्रसिद्ध ग्रन्थ “कुवलय माला” में मिलता है। इस ग्रन्थ की रचना विक्रम संवत् 835 में हुई थी। इसमें तत्कालीन 18 भाषाओं का उल्लेख है जिसमें मरु भाषा का नाम भी है। यथा–

“अप्पा-तुप्पा”, भणिरे अह पेच्छइ मारुऐ तत्तो
“न उरे भल्लउं” भणिरे अह पेच्छइ गुज्जरे अवरे
“अम्हं काउं तुम्हं” भणि रे अह पेच्छइ लाडे
“भाइ य इ भइणी तुब्भे” भणि रे अह मालवे दिट्ठे। (कुवलयमाला)

इससे यह प्रकट हो ही जाता है कि राजस्थानी साहित्य का निर्माण लगभग नवीं शताब्दी में होने लग गया था। इस समय की मुख्य भाषा अपभ्रंश थी और अधिकांश साहित्य की रचना इसी भाषा में हो रही थी, अतः ऐसे समय में नव विकसित भाषा में निर्मित होने वाला साहित्य इसके प्रभाव से अछूता कैसे रह सकता था। यही कारण है कि यद्यपि राजस्थानी साहित्य का निर्माण नवीं शताब्दी के प्रारम्भ से ही आरम्भ हो गया था, फिर भी 11 वीं शताब्दी तक हमें बहुत ही कम साहित्य उपलब्ध होता है। यह सब कुछ होते हुए भी यह तो निश्चित है कि राजस्थानी अपने प्रारम्भिक काल में राजस्थान की ही नहीं वरन् उसके आसपास के बहुत बड़े भूखंड की भाषा रही है। गुजराती भाषा के मर्मज्ञ एवं विद्वान स्वर्गीय झवेरचंद मेघाणी ने भी अपने शब्दों में इसे स्वीकार किया है।

…क्रमशः


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