सबदकोस – राजस्थानी साहित्य का परिचय (भाग-१)

आर्यावर्त के विशाल भू-खंड में राजस्थान का विशिष्ठ ऐतिहासिक महत्त्व है। शताब्दियों से यहाँ के लोगों ने भारतीय संस्कृति, कला और साहित्य को अक्षुण्ण योग-दान दिया है जिसके महत्त्व पर आने वाली पीढ़ियाँ भी गर्व का अनुभव करती रहेंगी। यहाँ का बहुत प्राचीन इतिहास अभी अंधकार में है, पर जहाँ तक हमारे इतिहासकार पहुँचे हैं उनके लिखे इतिहासों को देखने से पता चलता है कि यहाँ के लोगों ने अपनी स्वतंत्रता और संस्कृति की रक्षा के लिए जो निरन्तर संघर्ष, तप और त्याग का जीवन व्यतीत किया है, उसके दर्शन अन्यथा दुर्लभ हैं।

इसी संघर्षमय जीवन में उन्होंने अपने सांस्कृतिक आदर्शों की रक्षा के लिए प्राणोत्सर्ग ही नहीं किया, उस संस्कृति को अपनी कलात्मक रचनाओं के माध्यम से अक्षुण्ण बना देने के लिए भी बहुत कड़ी साधना, मौलिक सूझ-बूझ और अमरता को वरण करने की अमिट लालसा का परिचय दिया है।

राजस्थान का प्राचीन कलात्मक वैभव सर्व-विख्यात है। यहाँ के विशाल एवं सुदृढ़ दुर्ग, जैन व अजैन मंदिर, भव्य राजप्रासाद, सती-स्मारक, समाधि-स्थान आदि वास्तु कला के अद्भुत नमूने हैं। इन राजप्रासादों और दुर्गों की बुलंदी आज भी उस समय के जीवन की बुलंदगी का संदेश दे रही है। इसी तरह यहाँ की मूर्ति कला में उस काल के कलाकारों की सौन्दर्यानुभूति ही सुरक्षित नहीं है, शताब्दियों से चली आ रही धार्मिक निष्ठा को कला के माध्यम से व्यंजित कर भारतीय संस्कृति की एकता और अखंडता का भी परिचय दिया है।

चित्रकला में राजपूत कलम के अगणित चित्र विभिन्न शैलियों में चित्रित किये गए। मुगल शैली से प्रभावित होने पर भी वैष्णव धर्म-भावना को राधा कृष्ण की लीलाओं के रूप में चित्रित कर नैसर्गिकप्रेम भावना को मौलिक अभिव्यक्ति देने में यहाँ के कलाकारों ने कोई कसर नहीं रखी। जीवन के ऐश्वर्य, विलास और प्रणय को चित्रित करने वाले कलाकारों ने विभिन्न रंगों और आकृतियों के माध्यम से जो भावानुभूति की बारीकियों का चित्रण किया है, उसकी विलक्षणता और सौन्दर्यानुभूति को भावोद्रेक से रंजित कर देने वाली क्षमता को कौन अस्वीकार कर सकता है? इन अमूल्य चित्रों के पीछे उन्हें चित्रित करने वाले कलाकारों की प्रेरणा और उनके आश्रयदाताओं की परिष्कृत रुचि हमारे कल्पना लोक को आज भी अभिभूत कर देती है।

संगीत के क्षेत्र में भी यह प्रांत पिछड़ा हुआ नहीं रहा। यहाँ के शासकों ने संगीत को प्रश्रय तो दिया ही परन्तु कई एक ने स्वयं संगीत की साधना कर इस विषय के ग्रंथों का निर्माण भी किया। राणा कुंभा का संगीतराज इसका प्रमाण है। राजस्थान के मध्ययुगीन भक्त कवियों ने विभिन्न राग-रागिनियों में हजारों पदों की रचना कर संगीत के माध्यम से ही उन्हें अपने-अपने इष्ट देवता को अर्पण किया है। मुगल सल्तनत का पतन हो जाने पर तो बहुत से प्रसिद्ध गायकों व नृत्यकारों को राजस्थान के शासकों ने ही प्रश्रय दिया था। यहाँ की मांड रागिनी (?) और अनेकानेक धुनें (तानें) आज भी यहाँ के लोकगीतों में सुरक्षित हैं। संगीत की विरल साधना के प्रतीक स्वरूप राग-रागिनियों के कितने ही सुन्दर व चित्ताकर्षक चित्रों का निर्माण यहाँ हुआ है।

विभिन्न कलाओँ को प्रश्रय देने वाली इस भूमि का प्राचीन साहित्यिक गौरव भी किसी प्रान्तीय भाषा के साहित्यिक गौरव से कम नहीं है। जिस परिमाण में यहाँ साहित्य सृजन हुआ है उसका सतांश भी अभी प्रकाश में नहीं आया। अनगिनत हस्तलिखित ग्रन्थों में वह अमूल्य सामग्री ज्ञात-अज्ञात स्थानों पर बिखरी पड़ी है। काव्य, दर्शन, ज्योतिष, शालिहोत्र, संगीत, वेदांत, दर्शन, वैद्यक, गणित, शकुन आदि से सम्बन्ध रखने वाले मौलिक ग्रन्थों के अतिरिक्त कितने ही संस्कृत, प्राकृत, फारसी आदि के प्राचीन ग्रन्थों के अनुवाद व टीकाओं का निर्माण यहाँ हुआ है।

इतना ही नहीं, यहाँ के शासकों ने प्राचीन संस्कृत साहित्य की रक्षा की ओर भी समय-समय पर ध्यान दिया है। औरंगजेब के समय में जब धार्मिक असहिष्णुता के कारण संस्कृत के धार्मिक ग्रन्थों को क्षति पहुँचाई जाने लगी तो बीकानेर के तत्कालीन महाराजा अनूपसिंहजी ने कितने ही महत्त्वपूर्ण ग्रंथों को सुदूर दक्षिण से मंगवा कर अपने यहाँ सुरक्षित रखा जो आज भी अनूप संस्कृत लाइब्रेरी बीकानेर में विद्यमान है। इसके अतिरिक्त अन्य शासकों ने भी अपने संग्रहालयों में संग्रहीत कर कितने ही ग्रन्थों को कालकवलित होने से बचाया।[1] जैन यतियों ने अपने सतत् प्रयत्नों से बहुत बड़ी साहित्यिक निधि को मंदिरों और उपाश्रयों आदि में सुरक्षित रखा। कितने ही ठाकुरों तथा जागीरदारों ने भी इस दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य किया। ये सभी प्रयत्न यहाँ के लोगों के प्रगाढ़ साहित्य-प्रेम के परिचायक हैं।

जिस सामाजिक ऊहापोह और राजनैतिक तथा साम्प्रदायिक उथल-पुथल के बीच यहाँ साहित्य-सृजन हुआ है, इतिहास इसका साक्षी है। काल-क्रम की पृष्ठ-भूमि के साथ आगे हम उसका उल्लेख यथास्थान करेंगे।

सम्पूर्ण प्राचीन राजस्थानी साहित्य को 4 मुख्य भागों में विभाजित किया जा सकता है। इस दृष्टि से संक्षेप में यहाँ कुछ विचार उनकी विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए किया जा रहा है।

(1) जैन साहित्य        (2) चारण साहित्य[2]

(3) भक्ति साहित्य      (4) लोक साहित्य

[1]सरस्वती भंडार उदयपुर, पोथीखाना जयपुर, अलवर का राजकीय संग्रह, जैसलमेर जैन संग्रहालय, जोधपुर का पुस्तक प्रकाश आदि।
[2]चारण-साहित्य से तात्पर्य यहां चारण शैली में लिखे गए साहित्य से है।

जैन साहित्य अधिकांश में जैन यतियों और उनके अनुगामी श्रावकों द्वारा लिखा गया है। उसमें उनके धार्मिक नियमों और आदर्शों का कई प्रकार से गद्य तथा पद्य में वर्णन है। यह साहित्य बहुत बड़े परिमाण में लिखा गया है और प्रारम्भिक राजस्थानी साहित्य की तो वह बड़ी धरोहर है। जैन साधुओं ने धार्मिक साहित्य का ही निर्माण किया है पर अन्य अच्छे साहित्य के संग्रह और सुरक्षा में संकीर्णता नहीं बरती। इस ओर हम पहले ही संकेत कर आये हैं। अतः उनकी राजस्थानी साहित्य को बहुत बड़ी देन है। पर उनका यह साहित्य जैन धर्म से सम्बन्धित होने के कारण जैन धर्मावलंबियों तक ही सीमित रहा। वह समूचे समाज की वस्तु न बन सका। जो मध्ययुगीन सन्तों की धार्मिक वाणियों तथा तुलसीकृत रामायण आदि का समूचे उत्तरी भारत में प्रचार-प्रसार हुआ और सूर, तुलसी, मीरां, कबीर, दादू आदि के पद जन-जन के कंठहार बन गए वैसी स्थिति जैन साहित्य की नहीं बन सकी। वह साहित्य जन-जन का साहित्य न बन सका और न समाज के बहुत बड़े क्षेत्र को ही उतना प्रभावित कर सका।

चारण शैली में साहित्य का निर्माण चारणों के अतिरिक्त राजपूत, मोतीसर, भोजक ब्राह्मण, ओसवाल आदि अनेक जाति के लोगों ने किया है पर चारणों की इसे विशेष देन है। चारण जाति का शासक वर्ग के साथ विशेष सम्बन्ध रहा है। वे मध्यकालीन राजपूत संस्कृति के प्रेरक स्रोत रहे हैं। संघर्ष के युग में उन्होंने अपने आश्रयदाताओं को कभी अपने कर्त्तव्य से च्युत नहीं होने दिया। उन्होंने तत्कालीन शासकों को ऐश्वर्य और विलासी जीवन से दूर ही नहीं रखा अपितु निरन्तर संघर्ष कर देश और धर्म की रक्षा करने के लिए प्राणोत्सर्ग कर देने की प्रेरणा देना ही अपने जीवन का ध्येय माना है। मौका पड़ने पर वे स्वयं रण भूमि में उपस्थित होकर वीरों को उत्साहित करने तथा स्वयं युद्ध करने में पीछे नहीं रहे हैं। आज उनके द्वारा किए गए युद्ध-वर्णन भले ही अतिशयोक्तिपूर्ण लगें पर यवनों द्वारा आतंकित समाज की सुरक्षा के लिए उन कवियों ने अपने योद्धाओं के समक्ष शत्रुओं की सेना रूपी कुंवरी (कुमारी) कन्या को वरण करने की मधुर कल्पना रख कर मौत के विकराल स्वरूप को जो तुच्छ रूप दिया है वह तत्कालीन परिस्थितियों के अनुसार अत्यन्त आवश्यक था। मनुष्य सभी कुछ आदर्श जीवन के लिए करता है और उस आदर्श की रक्षा के लिए सहज ही मृत्यु का आलिंगन करने वाले व्यक्ति के यशोगान में कौनसी उपमा अतिशयोक्तिपूर्ण हो सकती है? इसका अनुभव सहानुभूतिपूर्वक इस साहित्य का अध्ययन करने पर ही हो सकता है। कहने का तात्पर्य यह है कि उनका साहित्य अत्यन्त प्राणवान और जीवन्त साहित्य है। उसमें जीवन की जो ऊर्जस्विता दृष्टिगोचर होती है वह अन्यथा दुर्लभ है। इस प्रकार के साहित्य की रचना करने वाले कवियों की शासक वर्ग और समाज में बड़ी प्रतिष्ठा थी। शासक उन्हें जागीर देकर सम्मानित करते थे। राज दरबार में उन्हें उचित आसन मिलता था और समाज उन्हें आदर की दृष्टि से देखता था। शासकों पर कई बार जब कि आपत्ति आ जाती तो वे उनकी पूरी सहायता करते थे।[3] उन्हें दी गई जागीर “सांसण” के नाम से पुकारी जाती थी। क्योंकि उस जागीर पर पूरा अधिकार चारण का ही होता था। यहाँ तक कि राज्यद्रोह करने वाला व्यक्ति भी “सांसण” में शरण चला जाता तो उसे कोई दखल नहीं देता था। चारणों को इतना सम्मान मिलता था, इसके उपरांत भी वे शासकों को खरी-खरी सुनाने में भी कभी नहीं चूकते थे। युद्ध में वीर गति प्राप्त करने वाले की जहां वे प्रशंसा करते थे वहां युद्ध से भाग जाने वाले की निंदा करने में भी कसर नहीं रखते। सच तो यह है कि वे वीरता के उपासक थे और किसी भी वीर के वीरतापूर्वक कार्य की प्रशंसा किए बिना उनका मन नहीं मानता था, चाहे वह व्यक्ति उनका परिचित हो अथवा नहीं। यही कारण है कि उनके द्वारा रचा गया अधिकांश साहित्य वीररसात्मक है और उस समय में उस साहित्य का बड़ा ही सामाजिक महत्त्व रहा है।

राजस्थान में भक्ति साहित्य भी बहुत बड़े परिमाण में लिखा गया है। संत कवियों की वाणियां आज भी समाज में प्रचलित हैं। उत्तरी भारत की संत परम्परा से प्रभावित होने पर भी यहां की संत परम्परा में तथा भक्ति साहित्य में एक विशेषता यह है कि उनका झुकाव अधिकतया निर्गुण भक्ति की ओर रहा है। यहां के कवियों ने यहां की भाषा में नवीन उपमाओं और उत्प्रेक्षाओं आदि के माध्यम से अपने भावों की अभिव्यक्ति को एक नवीन रूप दिया है जो बड़ा ही प्रभावोत्पादक और सरस है।

किसी भी देश या प्रान्त का लोक साहित्य वहां के जनजीवन से निःसृत स्वाभाविक भावोद्रेक को व्यक्त करता है। राजस्थान की वीर प्रसविनी भूमि में जहाँ हजारों कवियों ने अपनी काव्य-कला के माध्यम से राजस्थानी साहित्य की सेवा की है वहां कितने ही अज्ञात जन कवियों ने अपनी सरल और सरस वाणी में अपने लौकिक अनुभवों को जन साधारण की निधि बना दिया है। लोक-गीत, पवाड़े, लोक कथायें, कहावतें, मुहावरे आदि राजस्थानी लोक साहित्य के अमूल्य रत्न हैं। लोक साहित्य जितने बड़े परिमाण में यहां सुरक्षित है उतना शायद भारत की किसी अन्य भाषा में उपलब्ध नहीं होगा। राजस्थानी लोक गीतों की विविधता और सरसता तो सर्वविख्यात है। राजस्थान की संस्कृति को समझने के लिए भी उनसे बढ़ कर अन्य कोई उपयोगी साधन शायद ही सुलभ होगा। क्योंकि यहाँ के जन-जीवन की सर्वांगीण निश्छल अभिव्यक्ति इसी साहित्य में सुरक्षित मिलती है। युगों-युगों से यह साहित्य जनता का मनोरंजन ही नहीं करता रहा है परन्तु इसने उन्हें व्यावहारिक जीवन दर्शन भी दिया है। राजस्थानी साहित्य को प्राणवान बनाने का और भाषा को नवीन रूप प्रदान करने का बहुमूल्य कार्य भी अज्ञात रूप से इसी साहित्य ने किया है।

इतने विशाल और विविधतापूर्ण राजस्थानी साहित्य की महानता को विद्वान सही रूप में तभी समझ पायेंगे जब वह सम्पूर्ण साहित्य सुलभ हो जायेगा। कोश-निर्माण के दौरान में मुझे इस साहित्य की कितनी ही हस्तलिखित प्रतियाँ देखने का और उनकी खूबियों पर विचार करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। अतः इस साहित्य के महत्त्व पर विचार करते समय कई बार प्रसिद्ध अंग्रेजी आलोचक मेथ्यू अरनॉल्ड की पंक्तियां याद आ जाती हैं जिनमें वह इंगलैण्ड की महानता उसके बहुत बड़े साम्राज्यवाद अथवा सैनिक शक्ति और असाधारण राजनीतिज्ञों की वजह से नहीं पर अंग्रेजी साहित्य की महानता की वजह से मानता है।[4] क्या राजस्थानी का इतना महान् साहित्य हमारे देश की महानता का प्रतीक नहीं है? सभी भारतीय भाषाओं का साहित्य अपने-अपने ढंग का निराला है पर राजस्थानी साहित्य की कुछ अपनी ऐसी विशेषतायें हैं जो अन्य बाषाओं के साहित्य में देखने में नहीं आतीं। विश्व कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भी मुक्त हृदय से इस विशेषता को स्वीकार किया है–“भक्ति रस का काव्य तो भारतवर्ष के प्रत्येक साहित्य में किसी न किसी कोटि का पाया जाता है। राधाकृष्ण को लेकर हर एक प्रांत ने मंद व उच्च कोटि का साहित्य पैदा किया है, लेकिन राजस्थान ने अपने रक्त से जो साहित्य निर्माण किया है उसकी जोड़ का साहित्य नहीं मिलता।”[5] राजस्थानी साहित्य के महत्त्व के सम्बन्ध में इससे अधिक और क्या कहा जाय?

[3] राव चूंडा अपने पिता वीरम की मृत्यु के उपरांत बचपन में आल्हा बारहठ के घर पर ही बड़ा हुआ था।
[4] And by nothing is England so glorious as by her poetry. Mathew Arnold. Preface to the 'Poems of Wordsworth'.
[5] डिं. वी. , हि. सा. स. प्रयाग, संवत् 2003, पृ. 68

राजस्थान का यह प्राचीन साहित्य डिंगल तथा पिंगल दो भाषाओं में प्राप्त होता है। कई विद्वानों ने पिंगल को डिंगल की ही एक शैली मान लेने की भूल की है। पर वास्तव में पिंगल डिंगल से भिन्न भाषा है जो ब्रज का ही एक स्वरूप है। कविराजा बांकीदास[1] एवं सूर्यमल्ल मीसण ने भी इन दोनों भाषाओं का अस्तित्व स्वीकार किया है। इस सम्बन्ध में डॉ. एल. पी. तैस्सितोरी ने एक स्थान पर लिखा है–

‘It is well known that there are two languages used by the bards of Rajputana in their poetical compositions and they are called ‘Dingala’ and ‘Pingala’. These are not mere ‘styles’ of poetry as held by Mahamahopadhyaya Har Prasad Shastri, but two distinct languages, the former being the local Bhasha of Rajputana and the letter Braja Bhasha, more or less vitiated under the influence of the former. ‘[2]

इसके अतिरिक्त सर जार्ज ग्रियर्सन ने भी इस सम्बन्ध में अपना निश्चित मत प्रस्तुत किया है–

‘Marwari has an old literature about which hardly anything is known. The writers some times composed in Marwari and some times in Brij Bhasa. In the former case, the language was called ‘Dingala’ and in the latter ‘Pingala’.[3]

डॉ. सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या ने उदयपुर में दिए गए अपने एक भाषण में कहा था कि “गुजरात और मारवाड़ के जैन आचार्य और पंडितों के द्वारा सौराष्ट्र अपभ्रंश से उद्भूत पुरानी पश्चिमी राजस्थानी में साहित्य का सृजन होने लगा पर साथ ही साथ शौरसेनी अपभ्रंश साहित्यिक भाषा, पूर्व से बदलती गई, इसका एक नवीनतम या अर्वाचीन रूप “पिंगल” नाम से राजस्थान और मालवा के कवियों में पूर्णतया गृहीत हुआ। पिंगल का एक साहित्य बन गया। पिंगल को शौरसेनी अपभ्रंश साहित्यिक भाषा और मध्यकालीन ब्रज भाषा, इन दोनों के बीच की भाषा कहा जा सकता है। ब्रज भाषा प्रतिष्ठित हो जाने के बाद पिंगल के साथ-साथ ब्रज भाषा ने भी राजस्थानी भाषाओं में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान बना लिया। समग्र राजस्थान ब्रज भाषा के लिए अपना क्षेत्र हो गया। ब्रज भाषा के कुछ श्रेष्ठ कवि राजस्थानी भाषी ही थे। फिर राजपूताने के भाट और चारणों ने “पिंगल” की अनुकारी एक नई कवि भाषा मारवाड़ी के आधार पर बनाई जो “डींगल” या “डिंगल” नाम से अब परिचित है।[4]

डॉ. चाटुर्ज्या ने जहां पिंगल के अनुकरण पर डिंगल नाम का प्रादुर्भाव होना माना है वहाँ डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने डिंगल के अनुकरण पर पिंगल नामकरण का अनुमान किया है।[5] वास्तव में पिंगल और डिंगल दो भिन्न भाषायें हैं।[6] पिंगल का विकास शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है[7] और डिंगल का गुर्जरी अपभ्रंश से।[8] देखा जाय तो डिंगल काव्य पिंगल की अपेक्षा अधिक प्राचीन है। जब ब्रज भाषा की उत्पत्ति हुई तो उसका तत्कालीन प्रभाव राजस्थान के पूर्वी प्रदेश पर भी पड़ा। शुद्ध डिंगल तथा ब्रज भाषा से प्रभावित डिंगल में अंतर स्पष्ट करने के लिए संभवतः दोनों का नामकरण हुआ हो। यह तो सर्वविदित है कि ब्रज भाषा के पहले से ही राजस्थानी में काव्य-रचना होती थी। अतः यह कहना उचित नहीं होगा कि पिंगल के आधार पर ही डिंगल का नामकरण-संस्कार किया गया। इस सम्बन्ध में डॉ. रामकुमार वर्मा का यह मत उचित मालूम देता है कि–“उचित तो यह ज्ञात होता है कि “डिंगल” के आधार पर ही “पिंगल” शब्द का उपयोग किया होगा। इस कथन की सार्थकता इससे भी ज्ञात होती है कि पिंगल का तात्पर्य छंदशास्त्र से है। ब्रज भाषा न तो छंदशास्त्र ही है और न उसमें रचित काव्य छंदशास्त्र के नियमों के निरुपण के लिए ही है। अतएव “पिंगल” शब्द ब्रज भाषा काव्य के लिए एक प्रकार से उपयुक्त ही माना जाना चाहिए। हां यह अवश्य है कि ब्रज भाषा काव्य में छंदशास्त्र पर अपेक्षाकृत अधिक ध्यान दिया गया है और सम्भवतः यही कारण है कि उसका नाम पिंगल रखा गया है।[9]

[1] डिंगलियां मिलियां करै, पिंगल तणौ प्रकास। संसक्रति व्है कपट सज, पिंगळ पढ़ियां पास। --बां. दा. ग्रं. भाग 2
[2] Journal of the Asiatic Society of Bengal, Vol. X No. 10 PP. 375
[3] Linguistic Survey of India, Vol. IX, Part II, Page 19.
[4] राजस्थानी भाषा : डॉ. सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या, पृष्ठ 65
[5] हिन्दी साहित्य : डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृष्ठ 67
[6] राजस्थानी भाषा और साहित्य : डॉ. हीरालाल माहेश्वरी, पृष्ठ 7
[7] (क) Linguistic Survey of India, Grierson, Pt. I, Page 126
   (ख) राजस्थानी भाषा : डॉ. सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या, पृ. 64
[8] (क) अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन के 33 वें अधिवेशन का विवरण--कन्हैयालाल माणिकलाल मुन्शी, पृष्ठ 9.
   (ख) राजस्थान का पिंगल साहित्य तथा राजस्थानी भाषा और साहित्य--श्री मोतीलाल मेनारिया।
[9] हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास, भाग 1, डॉ. रामकुमार वर्मा, पृ. 139-140

यहां हम प्राचीन राजस्थानी को डिंगल के नाम से अभिहित कर रहे हैं। कुछ विद्वानों का यह भी भ्रम है कि शायद राजस्थान में पिंगल साहित्य का निर्माण परिमाण में डिंगल से भी अधिक हुआ है, पर यह मान्यता भी निराधार है, जैसे कि हम पहिले कह आये हैं कि डिंगल का अधिकांश साहित्य अभी प्रकाश में नहीं आया है और बहुत-सा लिपिबद्ध भी नहीं हुआ है, इसीलिए शायद ऐसी भ्रामक धारणा बन गई है।

राजस्थानी साहित्य के इस विवेचन के पश्चात् अब हम उसके विकास-क्रम पर विचार करते हैं। राजस्थानी भाषा विवेचन के प्रकरण में हम यह स्पष्ट कर आये हैं कि राजस्थानी का निकास अपभ्रंश भाषा से हुआ है। अतः अपभ्रंश की अन्तिम अवस्था ही राजस्थानी का आदिकाल अथवा प्रारम्भिक काल माना जाता है। राजस्थानी का प्राचीन नाम मरु भाषा है। सर्व प्रथम मरु भाषा का नाम हमें मारवाड़ राज्य के जालोर ग्राम में रचे गए जैन मुनि उद्योतन सूरि के प्रसिद्ध ग्रन्थ “कुवलय माला” में मिलता है। इस ग्रन्थ की रचना विक्रम संवत् 835 में हुई थी। इसमें तत्कालीन 18 भाषाओं का उल्लेख है जिसमें मरु भाषा का नाम भी है। यथा–

“अप्पा-तुप्पा”, भणिरे अह पेच्छइ मारुऐ तत्तो
“न उरे भल्लउं” भणिरे अह पेच्छइ गुज्जरे अवरे
“अम्हं काउं तुम्हं” भणि रे अह पेच्छइ लाडे
“भाइ य इ भइणी तुब्भे” भणि रे अह मालवे दिट्ठे। (कुवलयमाला)

इससे यह प्रकट हो ही जाता है कि राजस्थानी साहित्य का निर्माण लगभग नवीं शताब्दी में होने लग गया था। इस समय की मुख्य भाषा अपभ्रंश थी और अधिकांश साहित्य की रचना इसी भाषा में हो रही थी, अतः ऐसे समय में नव विकसित भाषा में निर्मित होने वाला साहित्य इसके प्रभाव से अछूता कैसे रह सकता था। यही कारण है कि यद्यपि राजस्थानी साहित्य का निर्माण नवीं शताब्दी के प्रारम्भ से ही आरम्भ हो गया था, फिर भी 11 वीं शताब्दी तक हमें बहुत ही कम साहित्य उपलब्ध होता है। यह सब कुछ होते हुए भी यह तो निश्चित है कि राजस्थानी अपने प्रारम्भिक काल में राजस्थान की ही नहीं वरन् उसके आसपास के बहुत बड़े भूखंड की भाषा रही है। गुजराती भाषा के मर्मज्ञ एवं विद्वान स्वर्गीय झवेरचंद मेघाणी ने भी अपने शब्दों में इसे स्वीकार किया है।

“अपनी मातृ भाषा का नाम था–राजस्थानी! मेड़ता की मीरां इसी में पदों की रचना करती और गाया करती थी। इन पदों को सौराष्ट्र की सीमा तक के मनुष्य गाते तथा अपना कर के मानते थे। चारण का दूहा राजस्थान की किसी सीमा में से राजस्थानी भाषा में अवतरित होता तथा कुछ वेश बदल कर काठियावाड़ में भी घर-घराऊ बन जाता। नरसी मेहता गिरनार की तलहटी में प्रभु पदों की रचना करता और ये पद यात्रियों के कण्ठों पर सवार होकर जोधपुर, उदयपुर पहुँच जाया करते थे। इस जमाने का पर्दा उठा कर यदि आप आगे बढ़ेंगे तो आपको कच्छ, काठियावाड़ से लेकर प्रयाग पर्यन्त के भूखंड पर फैली हुई एक भाषा दृष्टिगोचर होगी..। इस व्यापक बोलचाल की भाषा का नाम–राजस्थानी। इसी की पुत्रियाँ फिर ब्रजभाषा, गुजराती और आधुनिक राजस्थानी का नाम धारण कर स्वतंत्र भाषायें बनीं।” अतः राजस्थानी भाषा में रचित साहित्य एक विस्तृत भू-भाग का साहित्य था।

किसी भी साहित्य के क्रमिक विकास का अध्ययन सुविधापूर्वक एवं समुचित रूप से तभी हो सकता है जब कि वह वैज्ञानिक रूप से उचित कालों में विभाजित हो। इसी दृष्टिकोण से अनेक विद्वान साहित्यकारों ने अपने- अपने मतानुसार राजस्थानी साहित्य को भी भिन्न-भिन्न कालों में विभाजित किया है। उनमें से अनेक विद्वानों का काल-विभाजन पूर्ण वैज्ञानिक एवं तर्कयुक्त है।

जैसा कि हम प्रारम्भ में लिख चुके हैं कि राजस्थानी की नींव नवीं शताब्दी में स्थापित हो चुकी थी इसलिए राजस्थानी साहित्य के प्राचीन काल का आरम्भ हम नवीं शताब्दी के आरम्भ से ही मानते हैं। डॉ. एल. पी. तैस्सितोरी ने प्राचीन पश्चिमी राजस्थानी का अपभ्रंश से अंतिम रूप से सम्बन्ध-विच्छेद कर लेने का समय तेरहवीं शताब्दी के आसपास निश्चित किया है। स्पष्ट तो यह है कि पन्द्रहवीं शताब्दी के आरम्भ तक डिंगल भाषा अपभ्रंश के प्रभाव से पूर्ण रूप से मुक्त न हो पाई थी। अतः पन्द्रहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक के साहित्य को प्रारंभिक काल के अंतर्गत रखना अधिक वैज्ञानिक है। लगभग इस काल के पश्चात् डिंगल एक स्वतंत्र एवं सुगठित भाषा के रूप में विकसित हुई। इसके पश्चात् का काल मध्यकाल माना जा सकता है। इस काल में रचित प्रचुर एवं विशिष्ट साहित्य ने ही राजस्थानी को पूर्ण विकसित रूप प्रदान किया और इसे उन्नति के शिकर पर बैठाने वाले अधिकांश कवि भी इसी काल में हुए। इस काल में पाई जाने वाली साहित्यिक विशेषतायें निरन्तर रूप से महा कवि सूर्यमल्ल मीसण की रचनाओं के पूर्व के समय तक मिलती रही है। अतः महाकवि सूर्यमल्ल के समय से ही राजस्थानी का आधुनिक युग माना जा सकता है। इस सम्पूर्ण विवेचन के अनुसार हम अपने दृष्टिकोण से राजस्थानी साहित्य को निम्न प्रकार से कालबद्ध कर सकते हैं–

1. आदिकाल वि. सं. 800 से सं. 1460
2. मध्यकाल वि. सं. 1460 से सं. 1900
3. आधुनिक काल वि. सं. 1900 से वर्तमान काल तक

वस्तुतः काल-विभाजन किसी काल विशेष की समाप्ति और दूसरे काल के आरम्भ होने के समय के मध्य कोई निश्चित सीमा रेखा नहीं है। अतः हमें यह नहीं मान लेना चाहिए कि काल की समाप्ति के पश्चात् उस काल की शैली व परम्परा में आगे कोई रचना नहीं होती। आरंभिक काल की भी कुछ विशेषतायें ऐसी हैं जो मध्यकाल की रचनाओं में भी पाई जाती हैं. इसके अतिरिक्त आधुनिक काल के भी अनेकानेक कवि मध्यकालीन ऐतिहासिक परंपरा का अनुसरण करते आ रहे हैं। अतः उपरोक्त सीमा रेखायें परिवर्तन के आरंभ की ही सूचक मानी जा सकती हैं। अब हम ऊपर दर्शाये हुए तीनों कालों को पृथक्-पृथक् लेकर उनमें रचे जाने वाले साहित्य पर प्रकाश डालेंगे।

पाठकों की सुविधा के लिए यहाँ काल-विभाजन के साथ केवल पद्यात्मक रचनाओं का ही वर्णन किया जा रहा है। गद्य साहित्य एवं लोक साहित्य का पृथक्-पृथक् शीर्षकों के अंतर्गत अलग से विवेचन प्रस्तुत करेंगे।

आदिकाल– विक्रम संवत् 800 से 1460

नवीं शताब्दी से पूर्व प्राचीन राजस्थानी के प्रारंभिक साहित्य की क्या दशा रही होगी इसकी कल्पना करने के लिए इतिहास में कोई सामग्री नहीं मिलती। यद्यपि यह तो माना जाता है कि अपभ्रंश से अन्य भाषाओं के उद्गम के समय अपभ्रंश के साथ-साथ उनमें भी साहित्यिक रचनायें अवश्य हुई हैं परन्तु प्रामाणिक सामग्री के अभाव में बहुत प्राचीन साहित्य के विषय में निश्चयपूर्वक कुछ भी नहीं कहा जा सकता। पूर्व वर्णित मुनि उद्योतन सूरि रचित “कुवलय माला” जिसका, काल सं. 835 है, से हमें राजस्थानी का परिचय मरु भाषा के नाम से मिलता है। यद्यपि यह ग्रन्थ राजस्थानी की रचना तो नहीं फिर भी इसमें राजस्थानी में वर्णित चर्चरी द्वारा हमें तत्कालीन राजस्थानी के स्वरूप की झलक अवश्य मिलती है। उदाहरण के लिए उक्त ग्रंथ का एक पद यहाँ उद्धृत किया जाता है–

उ.– कसिण-कमळ-दळ लोयण-चल रे, हंत ओ।
पीण-पिहुल-थण-कडियल भार किलंत ओ।।
ताण-चलिर वळियावळि-कळयळ-सद्द ओ।
रास यम्मि जइ लब्भइ जुबइ-सत्थ ओ।।

इससे यह तो पता चलता है कि राजस्थानी साहित्य का निर्माण नवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध से ही आरम्भ हो चुका था परन्तु इसके बाद 10 वीं शताब्दी के अन्त तक कोई प्रामाणिक लिपिनिष्ठ रचना प्राप्त नहीं होती। इसके अनेक कारण हैं। ऐसा माना जाता है कि राजस्थानी का अति प्राचीन तथा प्रारंभिक साहित्य अधिकांश में श्रुतिनिष्ठ साहित्य ही था। श्री किशोरसिंह बारहठ ने आरंभिक काल के साहित्य के सम्बन्ध में लिखा है कि चारण जाति के मरु देश में आने के पूर्व अर्थात् विक्रम की नवीं शताब्दी के आसपास उसके क्षेत्र में केवल एक नायक जाति ही ऐसी जाति थी जो अपने प्रारंभिक साहित्य को परम्परा से कंठस्थ करती हुई सुरक्षित रखे हुए थी। नायक लोग अपने पूर्वजों से सुन-सुन कर जो पंवाड़्या, गीत आदि कंठस्थ किया करते थे या नए रचा करते थे उन्हीं को गांवों में जाकर रात्रि के समय चौपाल, या गांव के मध्य के खुले स्थान में एकत्रित जन-समूह के बीच रावणहत्थे (एक प्रकार का तन्त्री वाद्य विशेष) पर गाते और उनका अर्थ श्रोताओं को समझाया करते। इसी समय उन्होंने एक और जाति का भी अस्तित्व स्वीकार किया है, वह है जोगी या नाथ जाति जिसने प्राचीन श्रुतिनिष्ठ साहित्य की सुरक्षा में अपना योगदान दिया है।[1]

[1]सौरभ पत्रिका, भाग 1, संख्या 1, पृ. 57, डिंगल भाषा और उसका साहित्य।--किशोरसिंह बारहठ

पंवाड़्यों तथा गीतों का साहित्य भी अधिक प्राचीन तथा श्रुतिनिष्ठ होने के कारण उनके रचयिताओं की पिछली संतान उसे ठीक रूप में याद न रख सकी। अनेक प्रक्षिप्त अंशों का समावेश होने के साथ-साथ कुछ चरितनायकों की जीवन-कथाओं के साथ अप्रासंगिक व चमत्कारिक बातें भी जोड़ दी गईं। अपनी प्राचीन थाती को इस प्रकार लुप्त होते देख कर संभव है उस समय के लोगों में इस साहित्य की रक्षा की इच्छा अवश्य उत्पन्न हुई होगी। इसी के फलस्वरूप चित्रलिपि का प्रयोग किया गया। अपने चरितनायकों का पूर्णजीवन-चरित चित्रों के रूप में अंकित किया जाने लगा। इन चित्रों का उन घटनाओं तथा कथाओं के साथ सम्बन्ध रहता था जो नायक आदि जाति के लोगों द्वारा रावणहत्थे पर मौखिक रूप से गाई जाती थी। इस चित्रलिपि के कारण चरित-नायकों के जीवन में अप्रासंगिक एवं चमत्कारिक घटनाओं का प्रवेश तो रुक गया किन्तु गाई जाने वाली भाषा में परिवर्तन तब भी होता गया। चित्र चित्रित होने के कारण स्थिर रहे परन्तु गीत गेय रूप में ही आने वाली पीढ़ियों को हस्तांतरित होने से उनकी मूल रचना में कितना अंश प्रामाणिक है और कितना प्रक्षिप्त, इसका पता लगाना अत्यन्त कठिन हो गया। राजस्थानी में इन चित्रों के आधार पर गाये जाने वाले गीतों को “फड़ें” कहते हैं जो पट का अपभ्रंश है। आज भी राजस्थान के सुदूर गांवों में यदाकदा इन पंवाड़्यों एवं फड़ों का आनन्द लिया जाता है।

लगभग नवीं शताब्दी के अन्तिम काल में एक ऐसी घटना हुई जिससे राजस्थानी साहित्य में एक नए युग का सूत्रपात हुआ। जिस समय राजस्थान में राजस्थानी की उपरोक्त दशा थी, ठीक उसी समय सिन्ध में वहां की तत्कालीन भाषा को वहां के चारण नवजीवन प्रदान कर रहे थे। सिन्ध के प्राचीन वीरों का यशोगान एवं वीरों का चरित्र-वर्णन उनकी कविताओं में स्पष्टतः लक्षित होता था। उस समय के सूमरा क्षत्रियों के अत्याचारों से वहां की जनता व्याकुल हो उठी. इसी समय सिन्ध में आवड़देवी का पिता मामड़ सकुटुम्ब आकर बस गया। ये कुल सात बहिनें थीं। सिंध के तत्कालीन राजा ने इनके सौन्दर्य-वर्णन पर लुभायमान होकर इन सातों बहिनों को अपने अधिकार में करने का प्रयत्न किया। ऐसी अवस्था में आवड़ देवी ने अपने अनुयायी समस्त चारणों को सिन्ध देश छोड़ कर राजस्थान की ओर जाने का निर्देश दिया और साथ में स्वयं भी सिन्ध छोड़ कर राजस्थान में आ बसी। आये हुए चारण कवियों ने यहां की लोक भाषाओं का प्रयोग धीरे-धीरे अपने साहित्य में किया। इस घटना से राजस्थानी साहित्य को एक नया मोड़ प्राप्त हुआ।

जिस समय राजस्थानी साहित्य में यह नवीन प्रवाह आया उस समय यहां की राजनैतिक परिस्थिति भी पूर्ण विचित्र थी जिसका प्रभाव तत्कालीन साहित्य पर स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। सोलंकी, पंवार, कछवाह, परिहार, तोमर, गहलोत, चौहान और यादव (भाटी) उस समय यहां शासन कर रहे थे। शासक वर्ग में परस्पर घोर संघर्ष चल रहा था। शासकीय स्थिति पूर्ण अनिश्चित थी। ऐसी स्थिति के मध्य प्रथम तो विशिष्ट साहित्य का सृजन होना संदिग्ध ही है, फिर भी यदि कुछ हो पाया तो वह आश्रयदाताओं को रणभूमि में उत्साहित करने के निमित्त फुटकर रचनायें ही थीं अथवा उनके मनोरंजनार्थ कोई प्रेम काव्य आदि। यही कारण है कि इस काल के प्राप्त ग्रंथों में जैन साहित्य को छोड़ कर, जो कि अधिकांश में अपने धर्म से ही सम्बन्धित है, अन्य सभी ग्रंथ प्रेम काव्य ही हैं। राज्याश्रय के कारण उनकी कुल रचनाओं के लिखित एवं प्रामाणिक रूप राज्य के संग्रहालयों में सुरक्षित रहे। किन्तु ये इतने थोड़े हैं कि तत्कालीन राजस्थानी साहित्य के सम्बन्ध में पूर्ण एवं स्पष्ट दृष्टिकोण उपस्थित नहीं करते। इसके अतिरिक्त जनसाधारण के मन में अपने वीर चरितनायकों के प्रति अपार श्रद्धा थी। इसका मुख्य कारण यह था कि ये ही वीर लोग संकट के समय जन साधारण के जीवन धन की रक्षा करते। जन जीवन की रक्षार्थ वे अपने प्राणों की आहुति देने के लिए सदैव तत्पर रहते। अतः ऐसे वीरों की प्रशंसा में बनाई गई कवितायें शीघ्र ही प्रचलित हो जाया करतीं और श्रुतिनिष्ठ साहित्य के रूप में पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती रहती थीं। उस काल में साहित्य को पूर्ण रूप से सुरक्षित रखने की प्रवृत्ति बहुत कम थी। यही कारण है कि आदि काल का लिपिनिष्ठ साहित्य बहुत ही कम मात्रा में प्राप्त होता है।

प्राचीन राजस्थानी साहित्य में जो कुछ भी लिखित एवं प्रामाणिक साहित्य प्राप्त हुआ है उसमें जैनाचार्यों का साहित्य भी अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। जैन-साहित्य की रचना संस्कृत काल से होती आयी है और यही कारण है कि प्राकृत और अपभ्रंश में भी जैन-साहित्य हमें प्रचुर मात्रा में प्राप्त होता है। इसका मुख्य कारण यही रहा है कि जैन मुनि तथा उनके श्रावकगण सदैव से ही अपने इस धार्मिक साहित्य की सुरक्षा के प्रति सचेष्ट एवं जागरूक रहते आये हैं। राजस्थानी में भी जो कुछ आदिकालीन जैन एवं जैनेतर साहित्य हमें मिलता है वह भी इनकी साहित्य सुरक्षा के प्रति इस प्रवृत्ति का ही परिणाम है। जिनालयों, जैन-भण्डारों, उपाश्रयों आदि में प्राप्त राजस्थानी साहित्य की प्राचीनतम प्रतियां इसका सही प्रमाण हैं। राजस्थानी के प्रारम्भिक काल में रचित जैन मुनियों की अनेक धार्मिक रचनायें प्राप्त होती हैं परन्तु यह काल अनेक देशी भाषाओं का जन्म-काल होने के कारण उन भाषाओं के विद्वानों ने तत्कालीन रचनाओं को अपनी भाषा की प्रारम्भिक रचनायें मान लिया है। फिर भी उस समय राजस्थान में रहने वाले जैन मुनियों तथा अन्य सिद्धों व नाथों द्वारा जो भी रचनाएँ हुईं वे प्रामाणिक रूप से राजस्थानी रचनायें ही मानी जा सकती हैं। इस प्रारंभिक काल की अनेक रचनायें उपलब्ध हैं परंतु कहीं पर वे अपने रचनाकारों के सम्बन्ध में मौन साधे हुए हैं तो कहीं अपना रचनाकाल प्रकट करने में पूर्ण असमर्थ। साहित्य की प्रामाणिकता के सम्बन्ध में शोध-कार्य अनेक वर्षों से हो रहा है और इसी के फलस्वरूप अन्धकार के गर्त में डूबे हुए अतुल साहित्य में से उसका कुछ भाग प्रकाश में आया है। अब हम इस काल के प्राप्त महत्त्वपूर्ण साहित्य को क्रमशः उनके संवतोल्लेख के अनुसार प्रस्तुत करेंगे।

खुम्माणरासौ

राजस्थानी साहित्य में प्रारम्भ से ही प्रथम काव्य-ग्रन्थ के रूप में “खुमाणरासौ” का उल्लेख किया जाता रहा है।[1] आज इसकी प्राप्त प्रतियों के आधार पर इसके रचनाकाल में अनेक विद्वानों को पूर्ण सन्देह है। इस काव्य-ग्रंथ में चित्तौड़ के महाराणा प्रतापसिंह तक का वर्णन दिया गया है। इससे यह प्रकट होता है कि यह ग्रन्थ समय-समय पर नई सामग्री प्राप्त करने के कारण अपने वास्तविक रूप से सर्वथा भिन्न हो गया है। एक स्थान पर इसके रचयिता का नाम दलपतविजय लिखा गया है। कुछ लोगों के मतानुसार ये जैन साधु थे।[2] कर्नल टॉड ने अपने इतिहास में चित्तौड़ के रावळ खुम्माण का उल्लेख किया है। उन्होंने अपने इतिहास में लिखा है कि काल भोज (बप्पा) के पश्चात् खुम्माण गद्दी पर बैठा। इतिहास में इस खुम्माण का नाम बहुत प्रसिद्ध है। इसके शासनकाल में ही बगदाद के खलीफा अलमांसू ने चित्तौड़ पर चढ़ाई की। कर्नल टॉड द्वारा यह वर्णन खुम्माणरासौ के आधार पर ही किया गया प्रतीत होता है। सम्भवतः कर्नल टॉड को इस विषय में भ्रान्ति हो गई। काल भोज (बप्पा) से लेकर तीसरे खुम्माण तक वंशावली इस प्रकार मानी गई है।[3]

कालभोज (बप्पा) > खुम्माण > मत्रट, भर्त्तृभट्ट > सिंह, खुम्माण (द्वितीय) महायक, खुम्माण (तृतीय)

इस प्रकार स्पष्ट है कि खुम्माण तीन हुए हैं। कर्नल टॉड ने इन तीनों को एक ही मान लिया है। लेकिन इन तीनों का शासनकाल इतिहासकार इस प्रकार मानते हैं।

  • खुम्माण (प्रथम) वि. सं. 810 से 835.
  • खुम्माण (द्वितीय) वि. सं. 870 से 900 तक।
  • खुम्माण (तृतीय) वि. सं. 965 से 990 तक।

अब्बासिया वंश के अलमामूं का समय भी वि. सं. 870 से 890 तक माना जाता है। इसी समय वह खलीफा रहा। यदि कोई लड़ाई अलमामूं के साथ खुम्माण की हुई होगी तो वह दूसरे खुम्माण के समय में ही हुई होगी। अतः यह अनुमान किया जा सकता है कि “खुम्माणरासौ” की रचना भी इसी काल में हुई।[4]

यह सब कुछ होते हुए भी मूल रचना के वास्तविक स्वरूप के अभाव में उसके रचनाकाल के सम्बन्ध में निश्चयपूर्वक कुछ भी नहीं कहा जा सकता। इस रचना में महाराणा प्रताप तक का वर्णन होने के कारण कई विद्वान इसे 17वीं शताब्दी ही की रचना मानते हैं। इसके साथ यह भी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि दलपति विजय इसका वास्तविक रचयिता था अथवा इसके प्रक्षिप्त अंश का।[5] इस प्रकार खुम्माणरासौ को प्रामाणिक रूप से प्रथम काव्य-ग्रन्थ स्वीकार नहीं किया जा सकता।

[1] हिन्दी साहित्य का इतिहास--लेखक रामचन्द्र शुक्ल, सातवां संस्करण, संवत् 2008, पृष्ठ 33.
[2] "ये (दलपत) तपागच्छीय जैन साधु शान्तिविजयजी के शिष्य थे। इनका असली नाम दलपत था किन्तु दीक्षा के बाद बदल कर दौलतविजय रख लिया गया था। विद्वानों ने इनका मेवाड़ के रावळ खुंमाण द्वितीय (सं. 870) का समकालीन होना अनुमानित किया है, जो गलत है। वास्तव में इनका रचनाकाल सं. 1730 और सं. 1760 के मध्य में है। राजस्थानी भाषा और साहित्य--लेखक मोतीलाल मेनारिया, पृष्ठ 82. 
[3] वीर विनोद, प्रथम भाग, कविराजा श्यामलदास, पृष्ठ 267 से 272 तक। 
[4] हिन्दी साहित्य का इतिहास--ले. रामचन्द्र शुक्ल, सातवां संस्करण, संवत् 2008, पृ. 33 के आधार पर।
[5] हिन्दी साहित्य का वृहत् इतिहास--सं. राजबली पांडेय, प्रथम भाग, पृष्ठ सं. 376.
ढोला मारू रा दूहा“–सं. 1000

राजस्थानी के श्रेष्ठ प्रणय-काव्य “ढोला मारू रा दूहा” का रचनाकाल श्री मोतीलाल मेनारिया ने वि.सं. 1000 के आसपास का अनुमान किया है।[1] ढोला मारू एक लोक-काव्य के रूप में प्रसिद्धि पा चुका है। ऐसे जन- प्रिय लोक-काव्यों की जो अवस्था होती है, उसकी विवेचना हम पहले कर चुके हैं। संभव है सर्वप्रथम इसकी रचना किसी सुयोग्य कवि ने की हो तथापि वर्तमान रूप में जो ढोला मारू की प्रतियाँ उपलब्ध हैं वे कालान्तर में अन्य लोगों द्वारा जोड़े गये प्रक्षिप्त अंश सहित ही मिलती हैं। काव्य की कथा ऐतिहासिक है तदपि पूर्ण ऐतिहासिक शोध के अभाव में यह निश्चित करना अत्यन्त कठिन है कि उसमें ऐतिहासिकता का अंश कितना है। कछवाह राजपूतों की ख्यातों के अनुसार यह कहा जा सकता है कि नल और ढोला ऐतिहासिक व्यक्ति हैं। काव्य में ढोला को नरवर के चौहान राजा नल का पुत्र बताया गया है किन्तु इतिहास के आधार पर यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि नरवर में चौहानों का राज्य कभी नहीं रहा। ओझाजी ने लिखा है[2] कि कछवाह वंश की ख्यातों में नल और ढोला का जो स्पष्ट वृत्तान्त मिलता है तथा ढोला को मारवणी का पति कहा है वह वस्तुतः सत्य है। अतः यह तो निसंदेह कहा जा सकता है कि ढोला कछवाह वंश का क्षत्रिय था। कछवाह वंश की ख्यातों में इसका समय संवत् 1000 के आसपास दिया गया है। अगर ढोला के शासनकाल में ही “ढोला मारू” की रचना की गई हो तो इसका रचनाकाल संवत् 1000 के आसपास माना जा सकता है।

श्री हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इन दोहों का सबसे पुराना रूप ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी का माना है।[3] डॉ. भोलाशंकर व्यास ने इसका रचनाकाल विक्रम की 13वीं-14वीं शती माना है।[4] 12वीं या 13वीं शती को इसका रचनाकाल मानने वाले इसकी रचना ढोला के तीन सौ वर्ष बाद हुई मानते हैं। सिद्ध हेमचन्द्र ने अपनी अपभ्रंश व्याकरण में दो तीन बार “ढोल्ला” शब्द का प्रयोग किया है।[5] वहाँ यह तीनों बार नायक के अर्थ में आया है। हेमचंद्र का जन्म संवत् 1145 और मृत्यु संवत् 1229 में मानी गई है।[6] श्री मोहनलाल दलीचंद देसाई ने भी इसका समर्थन किया है।[7] इससे यह तो स्पष्ट है कि उस समय ढोला के सम्बन्ध में जनसाधारण में काफी जानकारी प्रचलित होगी। जिस प्रकार राधा-कृष्ण ऐतिहासिक एवं वास्तविक व्यक्ति होते हुए भी कालान्तर में काव्य में समस्त कविता के नायक-नायिका के रूप में रूढ हो गये, ठीक उसी प्रकार ढोले का नाम भी तत्कालीन कविताओं में नायक के रूप में प्रयुक्त किया जाने लगा हो। आधुनिक राजस्थानी के लोक-गीतों में “ढोला” का प्रयोग नायक, पति, वीर आदि के लिये प्रचुरता के साथ पाया जाता है।[8] इससे यह सहज में ही अनुमान किया जा सकता है कि हेमचंद्र के समय तक ढोला के सम्बन्ध में दोहे जनसाधारण में इतने प्रचलित हो गये होंगे कि उस समय के कवियों ने उसके नाम का नायक के रूप में किसी भी कविता में प्रयोग करना आरम्भ कर दिया हो। जनसाधारण में दोहों के ऐसे प्रचलन के लिये सौ-डेढ़ सौ वर्ष का समय कुछ अधिक नहीं। अगर हेमचंद्र का समय संवत् 1145-1229 माना गया है तो ढोला मारू के इन दोहों का निर्माणकाल संवत् 1000 सहज ही माना जा सकता है। इस प्रकार के उदाहरणों में भाषा-विज्ञान के अनुसार अर्थ-विस्तार प्रायः हो जाया करता है। राजस्थानी भाषा की विवेचना करते समय ऐसे उदाहरण हम प्रस्तुत कर चुके हैं।

भाषा की दृष्टि से वर्तमान समय में प्रचलित ढोला मारू के दोहे इतने प्राचीन नहीं मालूम होते। वस्तुतः लोक-काव्य और अन्य साहित्यिक रचनाओं में काफी अंतर होता है। किसी साहित्यिक ग्रन्थ के निर्माण में कुछ न कुछ साहित्यिक कला का होना अत्यन्त आवश्यक समझा जाता है। लोक-गीतों की रचना-व्यवस्था इसके ठीक विपरीत होती है। लोक-गीतों का निर्माता यदि कोई हो सकता है तो देश विशेष की प्राचीनकालीन परिस्थिति और साधारण जनता की सामूहिक रागात्मक अभिरुचि ही हो सकती है। गेय गीतों को मौखिक रूप में आने वाली पीढ़ियों में हस्तान्तरित करने की परंपरा बहुत ही प्राचीन समय से प्रचलित रही है। अतः यह तत्कालीन जनता की साधारण अभिरुचि से प्रेरणा पाती रहती है। नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित ढोला मारू की भूमिका में इस सम्बन्ध में एक स्थान पर लिखा है[9] , यह काव्य मौखिक परंपरा के प्राचीन काव्य-युग की एक विशेष कृति है और संभव है कि तत्कालीन जनता की साधारण अभिरुचि को ध्यान में रख कर उससे प्रेरित होकर किसी प्रतिभासंपन्न कवि ने जनता के प्रीत्यर्थ उसी के मनोभावों को वर्तमान काव्य-रूप में बद्ध कर उसके समक्ष उपस्थित कर दिया हो और जनता ने बड़ी प्रसन्नता से इसे अपनी ही सामूहिक कृति मान कर कंठस्थ किया हो. ऐसी दशा में व्यक्ति विशेष कवि होने पर भी उसके व्यक्तित्व का सामूहिक अभिरुचि के प्रबल प्रवाह में लुप्त प्राय हो जाना संभव है। अतएव हमारा अनुमान है कि व्यक्ति विशेष का इसके बनाने में कुशल हाथ स्पष्टतः दृष्टिगोचर होते हुए भी सामूहिक मनोभावों की एकता और सहानुभूति एकत्रित होने के कारण कवि का व्यक्तित्व समूह में लुप्त हो गया है। और अंत में मौखिक परम्परा से चला आता हुआ यह काव्य हमको किसी व्यक्ति विशेष कवि की कृति के रूप में नहीं मिला बल्कि जनता के काव्य के रूप में उपलब्ध हुआ है।”

कुछ विद्वानों ने “कल्लोल” नामक एक कवि को ही इसका रचयिता माना है।[10] जोधपुर के सिवाना नामक ग्राम में एक जैन यति के पास से प्राप्त प्रति में इसके रचयिता का नाम लूणकरण खिड़िया लिखा है। खेद की बात है कि संवत् 1500 के पहले की लिखी कोई प्रति अभी तक उपलब्ध नहीं हुई है। वैसे तो “ढोला मारू रा दूहा” की बहुत- सी हस्तलिखित प्रतियाँ राजस्थान के पुस्तक भंडारों में मिलती हैं किन्तु वे अधिक पुरानी नहीं हैं। असली काव्य तो संभवतया सब का सब दूहों में ही लिखा गया होगा, परन्तु कालान्तर में दूहों की यह श्रृंखला छिन्न-भिन्न हो गई। संवत् 1618 के लगभग जैसलमेर के एक जन यति कुशललाभ ने तत्कालीन महाराव के आदेशानुसार “ढोला मारू” के विभिन्न दोहों को इकट्ठा किया और इस छिन्न-भिन्न कथा-सूत्र को मिलाने के लिए कुछ चौपाइयाँ बनाईं। इन चौपाइयों को दूहों के बीच में रख कर कुशललाभ ने पूरे कथा-सूत्र को ठीक कर दिया। अभी तक उपलब्ध प्रतियों में यही प्रति सबसे पुरानी मानी गई है। श्री गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने इन दोहों का निर्माण-काल संवत् 1500 वि. के लगभग माना है।[11]

[1] राजस्थानी साहित्य की रूपरेखा--ले. मोतीलाल मेनारिया, परिशिष्ट--पृष्ठ 219.
[2] टॉड राजस्थान--संपादक, गौरीशंकर हीराचंद ओझा, पृष्ठ 371, टिप्पणी संख्या 59.
[3] हिन्दी साहित्य का आदिकाल--डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृष्ठ 9.
[4] हिन्दी साहित्य का वृहत् इतिहास--प्रथम भाग, खंड 2, अध्याय 4, पृष्ठ 404.
[5] ढोल्ला सामला धण चम्पा-वण्णी।
    णाइ सुवण्णरेह कस-वट्ठइ दिण्णी।।8।4।330।1
    ढोल्ला मइँ तुहुँ वारिया मा कुरु दीहा माणु।
    निद्दए गमिही रत्तड़ी दडवड होइ विहाणु।।8।4।330।2
    ढोल्ला एॅह परिहासडी अइ भण-भण कवणहिं देसि।
    हउँ झिज्जउँ तउ केहिं पिअ तुहुँ पुणु अन्नहि रेसि।।8।4।425।1 --अपभ्रंश व्याकरण--आचार्य हेमचंद्र
[6] कुमारपालचरित : Introduction, Page XXIII-XXV, (1936)
[7] जैन गुर्जर कविओ प्रथम भाग, "जूनी गुजराती भाषानों संक्षिप्त इतिहास" : श्री मोहनलाल दलीचंद देसाई, पृष्ठ 113.
[8] (i) गोरी छाई छै जी रूप, ढोला, धीरां-धीरां आव।
   (ii) सावण खेती, भँवरजी, थे करी जी, हाँजी ढोला, भादूड़े कर्यो छो निनांण। सीट्टाँ रो रुत छाया, भँवरजी, परदेश में जी, ओ जी म्हांरा घण कमाऊ उमराव, थांरी प्यारी ने पलक न आवड़े जी।
   (iii) गोरी तो भीजै, ढोला, गोखड़े, आलीजो भीजै जी फौजाँ माँय। अब घर आयजा, आसा थारी लग रही हो जी।
   (iv) दूधां ने सींचावौ ढोलाजी रौ नीबूंड़ौ ओ राज। --ढोला मारू रा दूहा, सं. रामसिंह तथा नरोत्तमदास, पृष्ठ संख्या 398.
[9] "ढोला मारू रा दूहा"--भूमिका, पृष्ठ 36.
[10](क) राजस्थानी भाषा और साहित्य : डॉ. हीरालाल माहेश्वरी, पृष्ठ 201. 
   (ख) राजस्थानी भाषा और साहित्य : श्री मोतीलाल मेनारिया, पृष्ठ 101. 
   (ग) हिन्दी काव्य-धारा में प्रेम-प्रवाह : श्री परशुराम चतुर्वेदी, पृष्ठ 26. 
   (घ) प्राचीन राजस्थानी साहित्य, भाग 6, सं. गोवर्धन शर्मा, पृष्ठ 83-85. 
[11] "ढोला मारू रा दूहा"--प्रकाशक, नागरी प्रचारिणी सभा, काशी, डॉ. ओझा द्वारा लिखित प्रवचन, पृष्ठ 7.
जेठवे रा सोरठा1100

राजस्थानी साहित्य की रूपरेखा के परिशिष्ट में श्री मेनारिया ने “जेठवे रा सोरठा” का निर्माणकाल सं. 1100 के लगभग दिया है।[1] इनके साहित्यिक महत्त्व को छोड़ कर पहले इन पर ऐतिहासिक दृष्टिकोण से विचार कर लेना आवश्यक है। श्री मेनारियाजी के अतिरिक्त अन्य किसी व्यक्ति ने इन दोहों की रचना इतनी प्राचीन नहीं मानी है। प्रायः प्रत्येक सोरठे के अंत में जेठवा या मेहउत शब्द आया है। स्वर्गीय श्री झवेरचंद मेघाणी ने जेठवे के गुजराती सोरठों का संकलन किया था। इसी प्रसंग में एक स्थान पर उन्होंने लिखा है–“यह कथा श्री जगजीवन पाठक ने सन् 1915 में “गुजराती” के दीपावली अंक में लिखी थी तथा “मकरध्वजवंशी महीपमाला” पुस्तक में भी लिखी है। इसमें सम्पादक ताळाजा के “एलमवाला” का प्रसंग (सात हुकाळी, मंत्रेभहरण आदि : देखो रसधार, 1 : पृष्ठ 188) मेहजी के साथ जोड़ते हैं। इसके पश्चात् यह प्रसंग बरड़ा पर्वत पर नहीं परन्तु दूर ठांगा पर्वत पर घटित मानते हैं। मेहजी को श्री पाठक 144 वीं पीढ़ी में रखते हैं परन्तु उनका वर्ष व संवत् नहीं बताते। उनके द्वारा बाद के 147 वें राजा को 12 वीं शताब्दी में रखने के अंदाज से मेहजी का समय दूसरी या तीसरी शताब्दी के भीतर किया जा सकता है। परन्तु वे स्वयं दूसरे एक मेहजी को (152) संवत् 1235 के अन्तर्गत लेते हैं। ऊजळी वाले मेहजी यह तो नहीं हो सकते। कथा के दोहे 1000-1500 वर्ष प्राचीन तो प्रतीत नहीं होते। घटना होने के पश्चात् 100-200 वर्षों में इसका काव्य-साहित्य रचा गया होगा। यदि इस प्रकार गणना करें तो मेह-उजळी के दोहे संवत् 1400-1500 तक प्राचीन होने की कल्पना अनुकूल प्रतीत होती है। तो फिर इस कथा के नायक का 152वां मेहजी होने की संभावना अधिक स्वीकार करने योग्य प्रतीत होती है।” इसके अतिरिक्त इन सोरठों की भाषा भी नवीन है। कालान्तर में जेठवे के नाम पर विभिन्न कवियों द्वारा रचे गये सोरठे भी इसमें सम्मिलित होते गये। उदाहरण के लिए निम्नलिखित दो सोरठे मथानिया-निवासी श्री जैतदान बारहठ द्वारा संवत् 1974-75 में लिखे गये थे, किन्तु बाद में वे “जेठवे के सोरठे” के नाम से प्रसिद्ध हो गये–

डहक्यौ डंफर देख, वादळ थोथौ नीर विन,
हाथ न आई हेक, जळ री बूंद न जेठवा।
दरसण हुआ न देव, भेव बिहूणा भटकिया,
सूना मिंदर सेव, जलम गमायौ जेठवा।

उपरोक्त दोहे जेठवे के नाम से परम्परा के “जेठवे रा सोरठा” नामक अंक में प्रकाशित हो चुके हैं। अतः इन दोहों का ठीक रचनाकाल निश्चित् करना अत्यन्त कठिन है। जो सोरठे पुराने कहे जाते हैं वे भी साहित्यिक दृष्टि से पन्द्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी के प्रतीत होते हैं–चाहे इनका ऐतिहासिक आधार कितना ही पुराना क्यों न हो।

“ढोला मारू रा दूहा” तथा “जेठवे रा सोरठा” इन दोनों लौकिक प्रेम-काव्यों में ऐतिहासिक तथ्य गौण ही है। डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ठीक ही कहा है[2] कि “वस्तुतः इस देश में इतिहास को ठीक आधुनिक अर्थ में कभी नहीं लिया गया। बराबर ही ऐतिहासिक व्यक्ति को पौराणिक या काल्पनिक कथानायक बनाने की प्रवृत्ति रही है। ….. कर्मफल की अनिवार्यता में, दुर्भाग्य और सौभाग्य की अद्भुत शक्ति में और मनुष्य के अपूर्व शक्तिभंडार होने में दृढ़ विश्वास ने इस देश के ऐतिहासिक तथ्यों को सदा काल्पनिक रंग में रंगा है। यही कारण है कि जब ऐतिहासिक व्यक्तियों का भी चरित्र लिखा जाने लगा तब भी इतिहास का कार्य नहीं हुआ। अन्त तक ये रचनायें काव्य ही बन सकीं, इतिहास नहीं।”

बीसलदेव रासौ[3]

प्राचीनता की दृष्टि से बीसलदेव रासौ का अत्यधिक महत्त्व है। साहित्यिक दृष्टि से इसका मूल्य कितना ही नगण्य क्यों न हो किन्तु प्राचीनता उसकी एक ऐसी विशेषता है जिसके कारण इसके अध्ययन-अध्यापन की ओर कई विद्वानों का ध्यान गया है। अगर देखा जाय तो यही ग्रन्थ राजस्थानी का प्राचीनतम प्रामाणिक ग्रन्थ है। किसी भी प्राचीन ग्रन्थ का अपने शुद्ध रूप में मिलना संभव नहीं है और फिर एक ऐसे ग्रन्थ का जो सैकड़ों वर्षों तक गाया जाता रहा हो, शुद्ध प्राचीन रूप में मिलना सर्वथा असंभव है। अतः इसी को आधार मान कर कुछ विद्वानों ने समस्त प्राचीन ग्रंथों को आधुनिक सिद्ध करने में ही अपनी अधिकांश शक्ति खर्च कर दी है। “बीसलदेव रासौ”के बारे में डॉ. उदयनारायण तिवारी लिखते हैं[4] –“वास्तव में नरपति न तो इतिहासज्ञ था और न कोई बड़ा कवि ही। किसी सुनेसुनाये आख्यान के आधार पर लोगों को प्रसन्न करने के लिए उसने कुछ बेतुकी तुकबंदी कर के काव्य का एक ढांचा–येन-केन-प्रकारेण खड़ा कर दिया, जिस पर उसके पश्चात् के कवियों ने भी नमक-मिर्च लगाया। इस प्रकार एक साधारण कवि के मिथ्या-बहुल-काव्य को लेकर जिसका असली रूप भी इस समय सुरक्षित नहीं, इतनी ऐतिहासिक ऊहापोह करनी ही व्यर्थ है।” श्री मेनारिया ने इस संबंध में एक नई कल्पना की है। उन्होंने “नरपति नाल्ह” का सम्बन्ध “नरपति” नामक एक गुजराती कवि से जोड़ दिया है।[5] इन दोनों को वे एक ही कवि मानते हैं एवं इनका रचनाकाल संवत् 1545-1560 के आसपास माना है। डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने भी श्री मेनारिया के मत का समर्थन किया है।[6]

“बीसलदेव रासौ” को प्राचीनतम मानने के लिये इसके निर्माणकाल की विवेचना अत्यन्त आवश्यक है। नरपति नाल्ह ने अपनी पुस्तक की रचना-तिथि निम्नलिखित प्रकार से दी है।

[1] राजस्थानी साहित्य की रूपरेखा : पं. मोतीलाल मेनारिया, पृष्ठ 219.
[2] हिन्दी साहित्य का आदिकाल--डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृष्ठ 71.
[3] इसका विशुद्ध राजस्थानी रूप "व़ीसलदे रासौ" है।
[4] "वीर काव्य"--ले. डॉ. उदयनारायण तिवारी, पृष्ठ 208.
[5] राजस्थानी भाषा और साहित्य--ले. पं. मोतीलाल मेनारिया, पृष्ठ 88-89.
[6] हिन्दी साहित्य : डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृष्ठ 52.

बारह सै बहोत्तरां हां मंझारि।
जेठ वदी नवमी बुधवारि।।
“नाल्ह” रसायण आरंभई।
सारदा तूठि ब्रह्म कुमारी।।[1]

इसी के आधार पर बीसलदेव रासौ की रचना-तिथि मिश्र बंधुओं ने[2] संवत् 1354, लाला सीताराम ने 1272 तथा सत्यजीवन वर्मा ने[3] 1212 माना है। श्री रामचंद्र शुक्ल ने भी वर्माजी के मत का अनुमोदन किया है।[4] मिश्र बंधुओं ने अपनी “विनोद” में लिखा है–“चंद और जल्हण के पीछे संवत् 1354 में नरपति नाल्ह कवि ने बीसलदेव रासौ नामक ग्रंथ बनाया। इसमें चार खंड हैं और उनमें बीसलदेव का वर्णन है। नरपति नाल्ह ने इसका समय 1220 लिखा है, पर जो तिथि उन्होंने बुधवार को ग्रंथ-निर्माण की लिखी है वह 1220 संवत् में बुधवार को नहीं पड़ती परन्तु 1220 शाके बुधवार को पड़ती है। इससे सिद्ध होता है कि यह रासौ 1220 शाके में बना।” विक्रम संवत् और शक संवत् में लगभग 134 वर्ष का अंतर है अतः उन्होंने ग्रंथ का रचनाकाल संवत् 1354 मान लिया। मिश्र बंधुओं की इस विवेचना का आधार बाबू श्यामसुंदरदास की एक रिपोर्ट[5] है जिसमें उन्होंने लिखा था कि– ‘The author of this chronicle is Narpati Natha and he gives the date of the composition of the book as samvat 1220. This is not vikram samvat.’ किन्तु गौरीशंकर हीराचंद ओझा की मान्यता के अनुसार राजपूताने में पहले शक संवत् प्रचलित नहीं था।[6] यहाँ के लोग विक्रम संवत् का ही प्रयोग करते थे, अतः शक संवत् की कल्पना उचित प्रतीत नहीं होती। इसके अतिरिक्त “बहोत्तरां” का अर्थ “बीस” मान कर इसका रचनाकाल 1220 मानना भी ठीक नहीं है। “मिश्र बंधु विनोद” में एक दामों नामक कवि का विवरण आता है। उसने “लक्ष्मणसेन-पद्मावती” की कहानी लिखी थी। उसने अपने ग्रंथ में कहानी का रचनाकाल इस प्रकार दिया है–

संवत् पदरइ सोलोत्तरां मझार, ज्येष्ठ वदी नौमी बुधवार।
सप्त तारिका नक्षत्र दृढ़ जान, वीर कथा रस करू बखान।।

मिश्र बंधुओं ने इस सोलोत्तराँ का अर्थ सं. 1516 लिखा है। तत्पश्चात् एक “हरराज” नामक अन्य कवि का वर्णन है, जिसने राजस्थानी में “ढोला मारू बानी” चौपइयों में लिखी थी। उसमें भी कहानी का रचनाकाल “संवत् सोलह सै सत्तोतरइ” दिया है। मिश्र बंधुओं ने यहाँ भी इसका अर्थ 1607 किया है, 1677 नहीं। आश्चर्य तो यह है कि वे “पंदरइ सोलोत्तराँ” को तो 1516 और “सोलह सै सत्तोतरइ” को 1607 मान लेते हैं किन्तु “बारह सै बहोत्तराँ” को 1212 न मान कर 1220 मानते हैं। वस्तुतः “बहोत्तर” “द्वादशोत्तर” का रूपान्तर मात्र है। डॉ. माताप्रसाद गुप्त “बीसलदेव रासौ” को संवत् 1400 में रचा हुआ मानते हैं।[7] इस सम्बन्ध में उनका तर्क यह है कि जिन स्थानों के नाम “बीसलदेव रासौ” में आते हैं, उनमें से कोई भी सं. 1400 के बाद का नहीं प्रमाणित हुआ है।”

श्री सत्यजीवन वर्मा एवं श्री रामचंद्र शुक्ल ने “बीसलदेव रासौ” का रचनाकाल संवत् 1212 माना है।[8] इसका कुछ ऐतिहासिक आधार भी है। “बीसलदेव रासौ” में सर्वत्र क्रिया का प्रयोग वर्तमान काल में किया गया है। इससे प्रतीत होता है कि कवि बीसलदेव का समकालीन था। दिल्ली की प्रसिद्ध फिरोजशाह की लाट पर संवत् 1220 (विक्रमी), वैशाख शुक्ला 15 का खुदा हुआ एक लेख मिलता है।[9] उसके द्वारा यह पता चलता है कि बीसलदेव संवत् 1210-1220 तक अजमेर का शासक था।

“बड़ा उपाश्रय” बीकानेर में “बीसलदेव रासौ” की एक और प्रति कुछ दिन पहले मिली थी।[10] इसमें “बारह सै बहोत्तरां मंझारि” के स्थान पर ग्रंथ का रचनाकाल इस प्रकार लिखा है–

संवत सहस तिहतरइ जाणि,
नाल्ह कवीसर सरसीय वाणि।

इसके अनुसार “बीसलदेर रासौ” का रचनाकाल संवत् 1073 ठहरता है। डॉ. रामकुमार वर्मा ने भी इसी मत की पुष्टि करते हुए संवत् 1073 को ही उचित ठहराया है।[11] उन्होंने अपने इतिहास में लिखा है[12] –गौरीशंकर हीराचंदजी ओझा के अनुसार बीसलदेव का समय संवत् 1030 से 1056 माना गया है।[13] …..यदि गौरीशंकर हीराचंद ओझा के अनुसार बीसलदेव का काल संवत् 1030 से 1056 मान लिया जाय तो बीसलदेव रासौ की रचना 156 वर्ष बाद होती है। ऐसी स्थिति में लेखक का वर्तमान काल में लिखना समीचीन नहीं जान पड़ता। अतएव या तो बीसलदेव काल जो वीसेंट स्मिथ और गौरीशंकर हीराचंद ओझा द्वारा निर्धारित किया गया है, उसे अशुद्ध मानना चाहिये, अथवा बीसलदेव रासौ में वर्णित इस “बारह सै बहोत्तरां हां मंझारि” वाली तिथि को।” इस प्रकार ग्रंथ के रचनाकाल की तिथि संवत् 1212 को गलत ठहराते हुए उन्होंने संवत् 1073 को ही ठीक माना है।

वीसेन्ट ए. स्मिथ ने अपने इतिहास में लिखा है–

‘Jaipal, who was again defeated in November 1001, by Sultan Mahmud, committed suicide and, was succeeded by his son Anandpal, who like his father joined a confederacy of the Hindu powers under the supreme command of Vishal Dev, the Chauhan Rajah of Ajmer.’

इस प्रकार डॉ. वर्मा द्वारा यह लिखा जाना कि या तो बीसलदेव काल जो वीसेंट स्मिथ और गौरीशंकर हीराचंद ओझा द्वारा निर्धारित किया गया है, उसे अशुद्ध मानना चाहिये अथवा रासौ में वर्णित इस “बारह सै बहोत्तरां मंझारि” वाली तिथि को, ठीक नहीं जान पड़ता। सांभर एवं अजमेर की चौहान परंपरा में चार बीसलदेव हुए हैं। बीसलदेव विग्रहराज द्वितीय का समय संवत् 1030 से 1056 तक माना जाता है। बीसलदेव विग्रहराज तृतीय का काल 1112-1116 के आसपास तथा बीसलदेव विग्रहराज चतुर्थ का राज्यकाल संवत् 1210- 1220 के आसपास होना अनुमानित किया गया है। संवत् 1073 में ग्रंथ-रचना के विचार के समर्थक इस ग्रंथ के नायक बीसलदेव को विग्रहराज द्वितीय मानते हैं एवं संवत् 1212 के समर्थक विग्रहराज चतुर्थ।

बीसलदेव रासौ में उल्लिखित ऐतिहासिक घटनाओं के आधार पर इन तिथियों का विवेचन करना अत्यन्त आवश्यक है। यह पहला ग्रंथ है जिसका रचना-काल शोध द्वारा ठीक निर्धारित किया जा सकता है।

संवत् 1073 के पक्ष में कई तर्क दिये जाते हैं। बीसलदेव का विवाह भोज की कन्या राजमती के साथ होना लिखा है। राजा भोज के समय के सम्बन्ध में वीसेंट ए. स्मिथ लिखते हैं[14]

“Munja’s nephew, the famous Bhoja ascended the throne of Dhar in those days the capital of Malwa, about 1018 A.D. and reigned gloriously for more than forty years.”

[1] बीसलदेव रासौ : सं. सत्यजीवन वर्मा--कासी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित, प्रथम सर्ग, 4.
[2] मिश्रबंधु विनोद।
[3] नागरी प्रचारिणी सभा, काशी द्वारा प्रकाशित "बीसलदेव रासौ" की भूमिका, पृष्ठ 5.
[4] हिन्दी साहित्य का इतिहास--रामचंद्र शुक्ल (सातवां संस्करण), पृष्ठ 34.
[5] हिन्दी हस्तलिखित पुस्तकों की रिपोर्ट, सन् 1900.
[6] काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित बीसलदेव रासो की भूमिका, पृष्ठ 6 में दिये गये डॉ. ओझा के पत्र का उल्लेख।
[7] "बीसलदेव रास"--सं. डॉ. माताप्रसाद गुप्त एवं श्री अगरचन्द नाहटा, हिन्दी परिषद्, विश्वविद्यालय प्रयाग द्वारा प्रकाशित, भूमिका 58.
[8] "बीसलदेव रासो" सं. सत्यजीवन वर्मा, काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित, भूमिका, पृष्ठ 6.
[9] आविन्ध्यादाहिमाद्रे विरचितविजयस्तीर्थयात्रा प्रसंगादुद्ग्रीवेषु प्रहर्पा न्नृपतिषु विनमत्कन्धरेषु प्रयत्नः। आर्यावर्तं यथार्थं पुनरपि कृतवान्म्लेच्छविच्छेद नाभिद्रेंवः शाकंभरीन्द्रों जगति विजयते वीसलः क्षोणिपालः। ब्रूते सम्प्रति चाहुबाणतिलकः शाकंभरी भूपतिश्रीमान विग्रहराज एष विजयी सन्तानजानात्मनः। अस्माभिः करंदब्याधापि हिमवद्विन्ध्यान्तरालंभुवः शेष स्वीकरणीयमस्तु भवतामुद्वेगशून्य -मनः।।
[10] नागरी प्रचारिणी पत्रिका, भाग 14, अंक 1, पृष्ठ 99
[11] हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास, प्रथम खंड, डॉ. रामकुमार वर्मा, पृष्ठ 147.
[12] वही, पृष्ठ 147.
[13] हिन्दी टॉड राजस्थान, प्रथम खंड, पृष्ठ 358.
[14] "Early History of India."-V. A. Smith, page 393.

इस दृष्टि से राजा भोज बीसलदेव विग्रहराज द्वितीय का समकालीन ही सिद्ध होता है। ऐसी स्थिति में बीसलदेव का राजा भोज की पुत्री से विवाह होना संभव है। अगर संवत् 1212 को रचना-काल माना जाय तो यह निश्चित है कि “बीसलदेव रासौ” घटना-काल के काफी बाद में लिखा गया होगा, किन्तु जैसा कि हम लिख चुके हैं, रासौ की भाषा में वर्तमान-काल का इस ढंग से प्रयोग किया गया है कि कवि को नायक का समकालीन मानना ही होगा। अतः अगर “बीसलदेव रासौ” के नायक को विग्रहराज चतुर्थ मान लिया जाय तो एक प्रश्न यह उपस्थित होता है कि राजा भोज की पुत्री के साथ विवाह किस प्रकार संभव है। धार में उस समय कोई भोज नामक राजा नहीं था। बीसलदेव के एक परमारवंशीय रानी तो अवश्य थी, क्योंकि उसका वर्णन पृथ्वीराज रासौ में भी आता है।[1] हो सकता है राजा भोज के पश्चात् उस वंश ने यह उपाधि प्राप्त करली हो जिससे आगे होने वाले परमारवंशी सरदार व राजा का भोज उपाधिसूचक नाम रहा हो। नरपति नाल्ह ने अपने रासौ में असली नाम न देकर केवल उपाधिसूचक नाम ही दे दिया हो। किन्तु परमार वंशी कन्या के लिए जो शब्द प्रयुक्त हुए हैं, उनके द्वारा यह भ्रम हो जाता है कि राजा भोज का नाम कहीं पीछे से मिलाया हुआ न हो, जैसे–“जन्मी गौरी तू जैसलमेर” “गोरड़ी जैसलमेर की”। धार के परमार इधर राजपूताने में भी फैले हुए थे अतः राजमती का उनमें से किसी सरदार की कन्या होना भी संभव है।

इस सम्बन्ध में एक और मत का उल्लेख आवश्यक है। डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने लिखा है[2] — “बीसलदेव रासौ नामक हिन्दी काव्य में मालवे के राजा भोज की पुत्री राजमती का विवाह चौहान राजा बीसलदेव (विग्रहराज तीसरे) के साथ होना लिखा है और अजमेर के चौहान राजा सोमेश्वरके समय के (वि.सं. 1226) बीजोल्यां (मेवाड़) के चट्टान पर खुदे हुये इस बड़े शिलालेख में बीसल की रानी का नाम राजदेवी मिलता है। राजमती और राजदेवी एक ही राजपुत्री के नाम होने चाहिये, परन्तु भोज ने सांभर के चौहान राजा वीर्यराम को मारा था। ऐसी दशा में भोज की पुत्री राजमती का विवाह बीसलदेव के साथ होना सम्भव नहीं। उदयादित्य ने चौहानों से मेल कर लिया था अतएव सम्भव है कि यदि बीसलदेव रासौ के उक्त कथन में सत्यता हो तो राजमती उदयादित्य की पुत्री या बहिन हो सकती है।” अवंती के राजा भोज ने सांभर के चौहान राजा वीर्यराम को मारा था, ऐसा उल्लेख पृथ्वीराजविजय में भी है।[3] वीर्यराम विग्रहराज तृतीय का ताऊ था अतः बीसलदेव विग्रहराज तृतीय और परमारवंशी राजा भोज में परस्पर वैमनस्य पैदा हो गया था। ऐसी दशा में राजा भोज का बीसलदेव तृतीय के साथ अपनी पुत्री का विवाह करना सम्भव नहीं जान पड़ता। किन्तु श्री रामबहोरी शुक्ल और भगीरथ मिश्र ने इसका समाधान इस प्रकार प्रस्तुत किया है कि[4] “यह तो निश्चित ही है कि भोज-वीर्यराम युद्ध के बाद मालवा और शाकंभरी के राजाओं में सुलह हो गई थी। क्या यह सम्भव नहीं कि वीर्यराम के भतीजे बीसलदेव तीसरे की वीरता से मुग्ध होकर भोज ने अपनी लड़की उसे ब्याह दी हो और इसी सम्बन्ध के कारण बीसलदेव ने उदयादित्य को सहायता दी हो। तब यह कहना होगा कि नरपति ने बीसलदेव चौथे के राज्य-काल में सं. 1212 वि. (1155 ई.) में बीसलदेव रासौ की रचना की परन्तु उसमें जो कहानी दी वह बीसलदेव तीसरे की थी।”
बीसलदेव रासौ में बीसलदेव की यात्रा का वर्णन इतने स्पष्ट शब्दों में किया गया है कि धार के राजा के सिवाय अन्य किसी के साथ सम्बन्ध की कल्पना करना ही उचित नहीं जंचता। बीसलदेव अजमेर से रवाना होता हुआ चित्तौड़ होकर धार पहुँचता है। यात्रा के स्थानों का वर्णन भी स्पष्ट है। अतः यह आवश्यक है कि बीसलदेव राजा भोज का समकालीन हो। सं. 1073 वि. मानने से ऐसा संभव है।

रासौ में लिखा है कि शादी के पश्चात् बीसलदेव तीर्थयात्रा के प्रसंग में उड़ीसा गया था तथा उड़ीसा जाने के पहले भी सात वर्ष बाहर रहा था। मुहणौत नैणसी की ख्यात का अनुवाद व सम्पादन करते हुए श्री रामनारायण दूगड़ ने एक टिप्पणी में लिखा है[5] कि “बीसलदेव दूसरे ने नरबदा तक देश विजय किया, गुजरात के प्रथम सोलंकी राजा मूलराज को कंथाकोट में भगाया, अणहिलवाड़े के पास बीसलपुर का नगर बसाया और भड़ौंच में आसापूरा देवी का मन्दिर बनवाया। सोलंकी राजा मूलराज के साथ युद्ध करने के कारण बीसलदेव साल-डेढ़ साल बाहर रहा था, तथा बीसलपुर नामक नगर बसाया था।” श्री ओझाजी भी इसका समर्थन करते हुए लिखते हैं[6] –“मूलराज को इस प्रकार उत्तर में आगे बढ़ता देख कर सांभर के राजा विग्रहराज (बीसलदेव दूसरे) ने उस पर चढ़ाई कर दी जिससे मूलराज अपनी राजधानी छोड़ कर कंथादुर्ग (कंथाकोट का किला : कच्छ राज्य) में भाग गया। विग्रहराज साल भर तक गुजरात में रहा और उसको जर्जर करके लौटा।”

सम्भव है कवि ने साल-डेढ़ साल को सात वर्ष की अवधि में परिणत कर दिया हो तथा नरबदा व पूर्व के देश जीतने के लिये कुछ वर्ष उसे बाहर बिताने पड़े हों और नरपति नाल्ह ने उस अवधि को बारह वर्ष लिख डाला हो।

उपरोक्त सब दृष्टियों से संवत् 1073 की तिथि ही अधिक प्रमाणित मालूम देती है। किन्तु इस सम्बन्ध में एक शंका और होती है। विग्रहराज द्वितीय सांभर का शासक था, जैसा कि स्व. गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने भी अपने इतिहास में स्पष्ट किया है।[7] प्रस्तुत रासौ का नायक अजमेर का शासक था–

‘गढ़ अजमेरां को चाल्यौ राव।’

‘गढ़ अजमेरां गम करऊ।’

‘गढ़ अजमेरां पहुतां जाई।’

अजमेर नगर अर्णोराज के पिता अजयदेव (अजयराज) द्वारा बसाया गया था। श्री ओझाजी ने भी पृथ्वीराज प्रथम (सं. 1162 वि.) के पुत्र अजयदेव को अजमेर बसाने वाला कहा है। श्री रामनारायण दूगड़ भी इसका समर्थन करते हैं।[8] अजयदेव का समय सं. 1170 वि. के आसपास का माना जाता है। इस दृष्टि से बीसलदेव विग्रहराज द्वितीय (जो लगभग एक सौ वर्ष पहिले हो चुका था) का अजमेर का शासक होना संभव नहीं है।

अपने विवाह के पश्चात जब बीसलदेव धार से अजमेर लौटता है तो उसे आनासागर मार्ग में मिलता है।

दीठउ आनासागर समंद तणी बहार।
हंस गवणी म्रग लोचणी नारि।।
एक भरइ बीजी कलिख करइ।
तीजी धरी पावजे ठंडा नीर।।
चौथी घनसागर जूं घूलई।
ईसी हो समंद अजमेर को वीर।।[9]

आनासागर झील को बनाने वाले अर्णोराज बीसलदेव विग्रहराज चतुर्थ के पिता थे। ओझाजी ने बी इसी मत की पुष्टि[10] की है। बाबू श्यामसुंदरदास इसे अनार्पण देवी के नाम पर बना हुआ मानते हैं।[11] बाबू साहब बीसलदेव रासौ में

[1] देखो भूमिका H. Search Report, 1900
[2] राजपूताने का इतिहास, Vol. I- गौरीशंकर हीराचंद ओझा (दूसरा परिवर्द्धित संस्करण), पृष्ठ 216.
[3] वीर्यरामसुतस्तस्य वीर्येण स्यात्स्मरोपमः।
   यदि प्रसन्नया दृष्ट्या न दृश्यते पिनाकिना।।65
   अगम्यो यो नरेन्द्राणां सुधादीधितिसुन्दर।
   जघ्ने यशश्चयो यश्च भोजेना वन्ति भूभुजा।।67 --पृथ्वीराजविजय, सर्ग 5.
[4] हिन्दी साहित्य का उद्भव और विकास, लेखक--रामबहोरी शुक्ल और भगीरथ मिश्र, पृष्ठ 93.
[5] मुहणौत नैणसी की ख्यात (प्रथम भाग), (हिन्दी अनुवाद), सं. रामनारायण दूगड़, पृष्ठ 199 की फुट-नोट में दी गई टिप्पणी।
[6] राजपूताने का इतिहास, Vol. I., ले. गौरीशंकर हीराचंद ओझा, पृष्ठ 240. 
[7] वही, पृष्ठ 240.
[8] मुहणौत नैणसी की ख्यात (प्रथम भाग), हिन्दी अनुवाद--सं. रामनारायण दूगड़, पृष्ठ 199 की फुटनोट में दी गई टिप्पणी।
[9] बीसलदेव रासौ--सं. सत्यजीवन वर्मा, ना. प्र. स., प्रथम सर्ग, पृष्ठ 27, छंद 75.
[10] "अजयदेव के पुत्र अर्णोराज (आना) के समय मुसलमानों की सेना फिर इधर आई, पुष्कर को नष्ट कर अजमेर की तरफ बड़ी और पुष्कर की घाटी उल्लंघन कर आनासागर के स्थान तक आ पहुँची, जहाँ अर्णोराज ने उसका संहार कर विजय प्राप्त की। यहाँ मुसलमानों का रक्त गिरा था अतएव इस भूमि को अपवित्र जान जल से इसकी शुद्धि करने के लिये उसने यहाँ आनासागर तालाब बनवाया। --राजपूताने का इतिहास, Vol. I., पृष्ठ 305. 
[11] नागरी प्रचारिणी पत्रिका, भाग 5, पृष्ठ 141.

वर्णित आनासागर और अर्णोराज द्वारा बनाये गये आनासागर में भेद करते हैं, किन्तु वह एक ही है जो अजमेर से कुछ दूरी पर है। विग्रहराज चतुर्थ बीसलदेव जब विवाह कर के लौटा होगा तो इस सागर की शोभा नवीन रही होगी तथा उसके पिता की कीर्ति-स्मरण के लिये कवि ने इसका वर्णन किया हो। ऐसी अवस्था में विग्रहराज द्वितीय व तृतीय को (जो अर्णोराज से डेढ़ सौ वर्ष पहले हो चुके थे) शादी के पश्चात् आनासागर मिलना असंभव-सा हो जाता है।

उपरोक्त दो विरोधाभासी ऐतिहासिक तथ्यों के कारण बीसलदेव रासौ का रचनाकाल निश्चित् रूप से तय किया जाना कुछ कठिन-सा है। इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता कि यह सैकड़ों वर्षों तक गाया जाता रहा। गेय रूप में होने के कारण किसी गायक ने उस समय परिस्थितियों के अनुसार अगर उसमें थोड़ा बहुत परिवर्तन कर लिया हो तो आश्चर्य नहीं। जो विरोधाभासी ऐतिहासिक तथ्य मिलते हैं, उनका यही कारण जान पड़ता है। वास्तव में संवत् 1073 की तिथि ही निश्चित् रूप से जान पड़ती है। बीसलदेव तथा धार का राजा भोज पँवार दोनों ग्यारहवीं शताब्दी में सं. 1000 और 1073 के बीच में थे। राजा भोज का राज्यासीन होने का समय संवत् 1055 माना जाता है। किन्तु जिस समय राजा भोज गद्दी पर बैठा उस समय उसकी आयु केवल नौ वर्ष की थी। अतः राजमती का भोज की पुत्री न होकर बहिन होना ही अधिक उचित मालूम पड़ता है। रासौ के अनुसार कवि बीसलदेव का समकालीन ही मालूम देता है। अगर बीसलदेव विग्रहराज द्वितीय का स्वर्गवास सं. 1056 में मान लिया जाय तो बीसलदेव रासौ का रचनाकाल उसके सत्रह वर्ष बाद होता है। 17 वर्ष का समय इतना लंबा नहीं जो बीसलदेव और भोज जैसे प्रसिद्ध राजाओं की स्मृति को भुला दे और उनके सम्बन्ध में कवि को कल्पना का आश्रय लेना पड़े। अजमेर एवं आनासागर सम्बन्धी वर्णन गायकों ने बीसलदेव विग्रहराज चतुर्थ के समय तथा उसके भी बाद संभवतया सम्मिलित कर लिये हों।

बीसलदेव रासौ की भाषा भी आरंभिक राजस्थानी का उदाहरण है। कई सौ वर्षों तक मौखिक रूप में रहने पर कई स्थल वस्तुतः बदल गये हैं किन्तु अंतस्थल में अभी वही प्राचीनता का ढांचा वर्तमान है। इसमें कुछ फारसी शब्द भी प्रयुक्त हुए हैं जैसे–महल, इनाम, नेजा, चाबुक आदि। ये शब्द बाद में मिलाये गये प्रतीत होते हैं। किन्तु यह भी संभव है कि नरपति नाल्ह ने स्वयं भी इनका प्रयोग किया हो, क्योंकि उस समय मुसलमानों का भारत में प्रवेश हो गया था। बीसलदेव के सरदारों में एक मुसलमान सरदार भी था जैसा कि नरपति नाल्ह ने रासौ में लिखा है–

चढ़ि चाल्यौ छै मीर कबीर।
खुद कार तुह्म टुकेटुक धीर।।1-43

महल पलांण्यो ताज दीन।
खुरसांणी चढ़ी चाल्यो गोड।।1-41

मुसलमानों के सम्पर्क में आकर अगर नरपति नाल्ह ने कुछ फारसी शब्दों को ग्रहण कर लिया हो तो कोई आश्चर्य नहीं। प्राकृत एवं अपभ्रंश की छाप इस काव्य में पूरी तरह स्पष्ट है। यह ग्रंथ उस समय रचा गया जब कि साहित्यिक विद्वानों की भाषा प्राकृत व अपभ्रंश थी। उस समय बोलचाल की भाषा में नरपति नाल्ह ने काव्य- रचना कर वास्तव में बड़े साहस का कार्य किया। कहीं-कहीं मेलन, चितह, रणि, आपिजइ, इणीविधि, ईसउ, नायर, पसाऊ, पयोहर आदि प्राकृत शब्द भी आ गए जिनका प्रयोग अपभ्रंश काल के पीछे तक भी होता रहा।

बीसलदेव रासौ में कारक दो प्रकार से व्यक्त हुए हैं। कुछ में तो विभक्तियों का प्रयोग है, कुछ में कारक चिह्न लगे हैं। इस प्रकार भाषा में संयोगात्मक और वियोगात्मक दोनों अवस्थायें प्राप्त हैं। वर्तमान काल भी इसमें दो प्रकार से व्यक्त हुए हैं। एक तो “छइ” वा “हइ” मूल क्रिया में लगा कर तथा दूसरे मूल क्रिया में परिवर्तन कर के। भाषा यद्यपि काफी नवीन रूप में हो गई है किन्तु प्राचीन रूप भी पूर्णतया नष्ट नहीं हुआ। प्रायः संज्ञायें, कारक आदि प्राचीन रूप में मिलते हैं। विसनपुरी, म्हारउ, मिलिअ, पणमिअ, अछइ, वे, राखइ, जेणि इत्यादि अपभ्रंश के ठीक पश्चात् की लोक-भाषा के प्रयोग हैं। ऐसे प्रयोगों की संख्या काफी अधिक है। कई ऐसे प्रयोग भी मिलते हैं जो सोलहवीं शताब्दी की भाषा के रूप कहे जा सकते हैं। जैसे–“बेटी राजा भोज की” में “की” और “उलिगाणा गुण वरणिता” में “वरणिता” का प्रयोग। किन्तु ऐसे शब्द बहुत कम हैं। इस तनिक से शब्द-साम्य पर इसे सत्रहवीं शताब्दी का रचित जाली ग्रंथ कह देना उचित नहीं। भाषा की परीक्षा उसके शब्दों से न होकर व्याकरण से होती है। “बीसलदेव रासौ” की भाषा को व्याकरण की कसौटी पर कसने से पता चलता है कि उसमें अपभ्रंश के नियमों का विशेष पालन हुआ है। इस सम्बन्ध में दो उदाहरणों से यह बात अधिक स्पष्ट हो जायेगी–

कसमीरां पाटणह मंझारि। सारदा तुठि ब्रह्मकुमारि।।
“नाल्ह रसायण नर भणइ। हियडइ हरषि गायण कइ भाइ।।
खेला मेल्ह्या मांडली। बहस सभा मांहि मोहेउ छइ राइ।।
–खंड 1, छंद 6.

नाल्ह बषाणइ छइ नगरी जू धार।
जिहां बसइ राजा भोज पंवार।
असीय सइहस सजे करि मैमत्ता।
पंच क्षोहण जे कर मिलइ निरिंदा।।
कर जोड़े “नरपति” कहइ।
विसनपुरी जाणे वसइही गोव्यंद।।
–खंड 1, छंद 12

ग्रंथ के रचयिता के विषय में भी नाम के अतिरिक्त अन्य जानकारी बहुत ही कम है। इतना अवश्य कहा जा सकता है कि सोलहवीं शताब्दी के गुजरात के “नरपति” और “बीसलदेव रासौ” के रचयिता नरपति नाल्ह एक व्यक्ति नहीं हैं। श्री मोतीलाल मेनारिया की एक होने की धारणा[1] का खंडन करते हुए श्री माताप्रसाद गुप्त ने लिखा है[2] –“गुजरात के “नरपति” ने अपने को कहीं “नाल्ह” नहीं कहा जबकि “बीसलदेव रासौ” का रचयिता अपने को “नाल्ह” कहता है। फिर जो पंक्तियाँ तुलना के लिए दोनों कवियों से दी गई हैं, उनमें चार तो इस संस्करण में प्रक्षिप्त माने गए छंदों की हैं, और शेष तीन पंक्तियों में जो साम्य है वह साधारण है। उस प्रकार का साम्य देखा जावे तो मध्य युग के किन्हीं भी दो कवियों की रचनाओं में मिल सकता है। फिर “बीसलदेव रासौ” में न जैन नमस्क्रिया है और न कोई अन्य बात मिलती है जिससे इसका लेखक जैन प्रमाणित होता हो। केवल आंशिक नाम-साम्य के आधार पर इस रचना को सोलहवीं-सत्रहवीं शती के किसी जैन लेखक की कृति मानना तटस्थ बुद्धि से सम्भव नहीं ज्ञात होता है।”

कवि की जाति भी विवादास्पद है। आचार्य शुक्ल ने इसे भाट माना है।[3] श्री अगरचन्द नाहटा इसे ब्राह्मण (सेवग) मानते हैं।[4]

[1] राजस्थानी भाषा और साहित्य, ले. पं. मोतीलाल मेनारिया, पृष्ठ 88-89.
[2] "बीसलदेव रास", सं. डॉ. माताप्रसाद गुप्त तथा श्री अगरचन्द नाहटा, प्रकाशक : हिन्दी परिषद्, विश्वविद्यालय प्रयाग, भूमिका, पृष्ठ 60.
[3] हिन्दी साहित्य का इतिहास--रामचन्द्र शुक्ल, सातवां संस्करण, पृष्ठ 37.
[4] राजस्थानी, भाग 3, अंक 3 में प्रकाशित नाहटाजी का एक लेख।

बीसलदेव रासौ की रचना के बाद से ही राजस्थानी भाषा शनैः शनैः अपभ्रंश से दूर होकर अपना स्वतन्त्र रूप ग्रहण करने लगी। 11वीं शताब्दी से लेकर आदि काल के अन्तिम समय, अर्थात् लगभग पन्द्रहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक प्राचीन राजस्थानी के जैन कवियों के अनेक प्रामाणिक ग्रंथ हमें प्राप्त हैं परन्तु इस अवधि की जैनेतर स्वतन्त्र रचनायें प्रायः अनुपलब्ध ही हैं। ढोला मारू रा दूहा, जेठवा रा दूहा और बीसलदेव रासौ जो 11वीं शताब्दी की ही रचनायें मानी गई हैं, को छोड़ कर 15वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक कोई अन्य जैनेतर स्वतन्त्र ग्रंथ प्राप्त नहीं होता। इसका अभिप्राय यह नहीं कि इस काल में कोई जैनेतर रचना हुई ही नहीं। साहित्य की सुरक्षा के प्रति शिथिलता एवं उदासीनता के कारण ही तत्कालीन रचनायें अपना स्थायित्व नहीं रख सकीं। उस समय की रचनाओं के अनेक फुटकर पद इन्हीं शताब्दियों में जैन मुनियों द्वारा रचित प्रभावकचरित्र, प्रबन्धकोश, प्रबन्ध चिन्तामणि, उपदेशतरंगिणी, पंचशती कोश आदि ग्रंथों में उद्धृत मिलते हैं। यहां हम तेरहवीं शताब्दी तक की जैनेतर रचनाओं के प्राप्त फुटकर पदों को उदाहरणस्वरूप प्रस्तुत कर आगे प्रामाणिक जैन साहित्य का शताब्दी अनुसार उल्लेख करेंगे। जैनेतर फुटकर पद जो भी प्रबन्धादि ग्रंथों में उद्धृत मिलते हैं प्रायः चारणों, भाटों तथा ब्राह्मणों आदि की ही रचनायें हैं।

1. उदाहरण–प्रभावकचरित्र–

1. अणु हुल्लीय फुल्ल म तोडहु मन आरामा म मोडहु।
मण कुसुमहिं अच्चि निरञ्जणु, हिण्डह काइं वणेण वणु।

2. नवि मारिअइ नवि चोरिअइ, पर-दारह अत्थु निवारिअइ।
थोवाह विथोवं दाइअइ, तउ सग्गि टुगुट्टुगु जाइयइ।
(वृद्धवादि सूरिचरितम् में संग्रहीत)

2. ढूमण चारण–

जीव वधन्तां नग्ग गइ, अवधन्तां गइ सग्गि।
हुं जाणुं दुइ वट्टड़ी, जिणि भावै तिणि लग्गि।
(उपदेशतरंगिणि)

3. रामचन्द्र चारण–

काहूं मती विभंतड़ी, अजीय मणिअड़ा गुणेह।
अखय निरंजण परम पथा, अजय जय न लहेह।।

अम्हे थोड़ा रिपु घणा, इम कायर चिंतंति।
मुद्ध निहालउ गयणयलु, के उज्जोउ करंति।।
(पुरातनाचार्यप्रबन्ध)

4. बागण कवि–

कुमरउ! कुमर विहार, एता कांइं कराविया।
ताहं कु करिसइ सार, सीप न आवइं सयं घणी।।
(पुरातनाचार्यप्रबन्ध)

5. आमभट्ट–

रे रक्खइ लहु जीव वड विरणि मयगळ मारइ,
न पीइ अणगल नीर हेलिरायह संहारइ।

अवरन बंधइ कोइ सघर रयणायर बंधइ,
पर नारी परिहरइ लच्छि पररायह रूंधइ।

ए कुमार पाल! कोपिं चडिउ फोडइ सत्त कडाहि जिम,
जे जिणधम्म न मन्निसिइं तींहवी चाडिसु तेम तिम।
(उपदेशतरंगिणी)

6. उदयसिंह चारण–

सुन्दर सर असुराह दलि, जल पीधउं वयणेहिं।
उदयनरिंदहिं कड्ढ़ीउं, तीहं नारीनयणेहिं।।
(प्रबन्धचिन्तामणि)

7. मुंजराजप्रबन्ध–

देव अम्हारी सीख, कीजइ अवगणिअइ नहीं।
तूं चालंती भीख, इणि मंत्रिहिं हुस्यइ सही।।

सामी मुहतउ वीनवइ, ए छेहलउ जुहार।
अम्ह आइसु हिव सीसि तुह, पडतउं देखूं छारु।।

जा मति पच्छइ सम्पज्जइ, सा मति पहिली होइ।
मुंज भणइ मुणालवइ, विघन न वेढ़इ कोइ।।
(प्रबन्धचिन्तामणि)

8. संवत् 1199 के आसपास श्री विजयसिंह ने सांचोर के दहियों का राज्य छीन लिया था। उस समय के जिस पद का उल्लेख मुहणौत नैणसी ने अपनी ख्यात में किया है वह निम्न है–

धरा धूंण धकचाळ कीध दरिया दल्लव है।
सवदी सवळां साल प्राण मेवास पहै।।

आल्हणसुत विजयसी वंस आसराव प्रागवड़।
खाग त्याग सत्रवाट सरण विजय पंजर सोहड़।।

चहुआंण राव चौरंग अचल नरांनाह अणभंग नर।
धूमेर सेन ज्यां लग अचळ तांम राज सांचोरधर।।

जिनवल्लभ सूरि

11वीं शताब्दी तक राजस्थान में रचित अपभ्रंश काव्य के प्रकाश में आगे चल कर तेरहवीं शताब्दी में अनेक जैन मुनियों ने राजस्थानी में भी रचना की है। उन्हीं की रचनाओं के आधार पर इस शताब्दी तक राजस्थानी को गुजराती तथा अपभ्रंश से मुक्त होना माना जाता है। जैन साहित्य में प्रथम ग्रंथ हमें जैनाचार्य जिनवल्लभ सूरि रचित “व्रद्ध नवकार” प्राप्त होता है। सूरिजी का देहान्त संवत् 1167 में माना जाता है। अतः यह निश्चित है कि “व्रद्ध नवकार” की रचना भी संवत् 1167 के पहिले ही की गई होगी। 1 इस ग्रंथ की भाषा के उदाहरण के लिए एक पद प्रस्तुत किया जाता है–

उ.– चित्रा वेली काज किसै देसांतर लंघउ।
रयण रासि कारण किसै सायर उल्लंघउ।।
चवदह पूरव सार युगे एक नवकार।
सयल काज महि पल सरै दुत्तर तरै संसार।।

वज्रसेन सूरि

इसके बाद प्राप्त होने वाली रचनाओं में वज्रसेन सूरि रचित “भरतेश्वर-बाहुबलिघोर” रचनाकाल वि.सं. 1225 और शालिभद्र सूरि रचित “भरतेश्वर बाहुबलि रास” वि.सं. 1241 प्राचीन राजस्थानी की प्राचीनतम रचनायें हैं। इन ग्रंथों की भाषा के उदाहरण-स्वरूप दो पद यहाँ उद्धृत हैं–

धर डोलइ खलभलइ सेनु, दिणियरु छाइजइ।
भरहेसरु चालियउ कटकि, कसु ऊपमु दीजइ।।
तंति सुणे विणु बाहू बलिण, सीवह गय गुड़िया।
रिण रहसिंहि चउरंग दलिहि, बेऊ पासा जुडिया।।
(बाहुबलि घोर)

कंधग्गल केकाण, कवी करडइं कडियाला
रण णइं रवि रण वखर सखर घण घाघरीयाला,
सींचाण वरि सरइं, फिरइं सेलइं फोकारइं
ऊडइं आडइं अंगि रंगि, असवार विचारइं।
(बाहुबलि रास)

इनके अतिरिक्त तेरहवीं शताब्दी की अन्य अनेक उल्लेखनीय जैन रचनायें हैं। स्थानाभाव के कारण प्रत्येक ग्रंथ का पूर्ण परिचय एवं उसकी भाषा का उदाहरण देने में असमर्थ से हैं। फिर भी पाठकों की सुविधा के लिए प्राप्त प्रामाणिक ग्रंथों के नाम, उनके रचनाकार एवं रचनाकाल यहां प्रस्तुत कर रहे हैं–

  • मुनि शालिभद्र सूरि कृत–बुद्धिरास, वि.सं. 1241.
  • कवि आसिगु कृत–जीवदयारास, चन्दनबाला, वि.सं. 1257.
  • धर्म (धम्म) मुनि कृत–जम्बूस्वामी, वि.सं. 1266.
  • मुनि जिनपति सूरि कृत–जिनपतिसूरि बधावण गीत, वि.सं. 1232.
  • विजयसेन सूरि कृत–रेंवतगिरि रास, वि.सं. 1287.
  • पल्हण कवि कृत–आबूरास, नेमिनाथ बारहमासा, वि.सं. 1289.
  • जिनभद्र सूरि रचित–वस्तुपाल तेजपाल प्रबन्धावली, वि.सं. 1290.
  • सुमतिगणि रचित–नेमिरास तथा गजधर सार्धशतक वृहद्वृत्ति, वि.सं. 1295.
  • अभयदेव सूरि रचित–जयंतविजय, वि.सं. 1285.

इनके अतिरिक्त शान्तिनाथ रास, महावीरजन्माभिषेक, श्री वासुपूज्य बोलिका चाचरी, शान्तिनाथ बोली, रसविलास, गयसुकुमाल रास आदि भी इसी शताब्दी की रचनायें मानी जाती हैं। इस काल की भाषा के उदाहरण के लिए मुख्य ग्रंथों के कुछ पद यहां उद्धृत किये जाते हैं–

1.
के नर सालि दालि भुंजंता, धिय धलहलु मज्झे विलहंता।

के नर भूखा दूखियइं, दीसहिं परघरि कम्मु करंता।
जीवता विमुया गणिय, अच्छहिं बाहिरि भूमि रुलंता।
~~जीवदयारास सं. 1257

2.
अगुण अंजण अंबिलीय अंबाडय अंकुल्लु।

उंबरु अंबरु आमलीय, अगरु असोय अहल्लु।।
वेयलु वंजलु बडल वडो, वेडस वरण विडंग।
वासंती वीरिणि विरह, वंसियाली वण वंग।।
सींसमि सिंबलि सिरसमि, सिंधुवारि सिरखंड।
सरलसार साहार सय, सागु सिगु सिणदंड।।
~~रेंवतगिरि रास वि.सं. 1287

3.
विसय सुक्खु कहिं नरय दुवारु, कहि अनंत सुहु संजम भारु।

भलउ बुरउ जाणत विचारइ, कग्गिणि कारणि कोडि कुहारइ।।
~~नेमिरास वि.सं. 1295

4.
कासमीर मुख मंडण देवी वाएसरि पाल्हणु पणमेवी।

पदमावतिय चक्केसरि नमिउं, अंबिक देवी हउ वीनवउं।।
चरिउ पयासउ नेमि जिण केरउं, कपीतु गुण धम्म निवासो।
जिम राइमइ वीओगु भओ, “बारहमास” पयासउ रासौ।।
~~नेमिनाथ बारहमासा वि.सं. 1289

तेरहवीं शताब्दी की साहित्यिक परम्परा चौदहवीं शताब्दी के ग्रंथों में भी परिलक्षित है। इस शताब्दी की प्राप्त स्वतंत्र रचनाओं में अधिकांश जैन मुनियों के ही ग्रंथ प्राप्त हैं। प्राप्त ग्रंथों का उल्लेख कर हम नीचे इस काल की भाषा के उदाहरणस्वरूप विख्यात ग्रंथों के पद उद्धृत करेंगे।

चौदहवीं शताब्दी की रचनायें–

  • अभयतिलक गणि कृत–महावीर रास, वि.सं. 1307.
  • लक्ष्मीतिलक उपाध्याय कृत–बुद्धचरित्र, श्रावकधर्म प्रकरण वृहतवृत्ति, वि.सं. 1311.

आणंद सूरि एवं प्रेम सूरि रचित–

  • द्वादश भाषा (ढ़ाल) निबद्ध तीर्थ माला स्तवन, वि.सं. 1323.
  • मुनि राजतिलक रचित शालीभद्र रास, वि.सं. 1332.
  • कवि सोममूर्ति कृत–1. जिनेश्वर सूरि दीक्षा विवाह वर्णन रास, सं. 1331.
  • कवि सोममूर्ति कृत–2. जिनप्रबोध सूरि चर्चरी, वि.सं. 1332.
  • कवि हेमभूषण मणि कृत जिनचंद्रसूरि चर्चरी, वि.सं. 1341.
  • मुनि मेरुतुंगाचार्य कृत प्रबन्ध चिन्तामणि संग्रह, सं. 1361.
  • श्रावक कवि वस्तिम रचित वीस विरह मान रास, सं. 1362.
  • गुणाकार सूरि रचित श्रावक विधि रास, सं. 1371.
  • अंबदेव सूरि कृत समरा रास, सं. 1371.
  • मुनि धर्मकलश कृत जिनकुशल सूरि पट्टाभिषेक रास, सं. 1377.
  • जिनप्रभ सूरि रचित पद्मावती चौपई, वि.सं. 1385.

इनके अतिरिक्त कवि छल्हु कृत क्षेत्रपाल, द्विपदिका, कवि सारमूर्ति कृत “पद्मसूरि पट्टाभिषेक रास”, जिनपद्म सूरि रचित स्थूलिभद्र फाग, पउम रचित शालीभद्र काव्य, सोलणु कृत चर्चरिका आदि भी इसी शताब्दी की रचनायें हैं।

चौदहवीं शताब्दी के ग्रंथों में प्रयुक्त राजस्थानी भाषा–

तसु उवरि भवणु उत्तंग वर तोरणं, मंडलिय राय आएसि अइ सोहणं।
सुहाणा भुवण पालेण करावियं, जगधरह साहु कुलिकलस चडावियं।
हेम धय दंड कलसो तहिं कारिउ, पहु जिणेसर सुगुरु पासि पयठाविउ।
विक्कमे वरिस तेरहइ सत्तरुत्तरे, सेय वयसाह दसमीई सुहवासरे।
~~महावीर रास

“संत जिणेसर” वर भुयणि, मांडिउ नंदि सुवेह।
वरिसहिं भविय दाणजलि, जिम गयणंगणि मेह।
ताहि अगयारिय नीपजइ, झाणनलि पजलंति।।
तउ संवेगहि निम्मियउ, हथलेवउ सुमहुत्ति।
~~जिनेश्वर सूरि दीक्षाविवाहवर्णन रास

वाजिय संख असंख नादि काहिल दुडुदुड़िया,
घोड़े चडइ सल्लार सार, राउत सींगडिया।
तउ देवालउ जोत्रि वेगि, घाघरिखु झमकइ,
सम विसम नवि गणइ कोइ नवि वारिउ थक्कइ।।
सिजवाळा धर धड़हड़इ वहिणि बहुवेंगि।
धरणि धड़क्कइ रजु ऊडए, नवि सूझइ मागो।
हय हींसइ आरसइ करह वेगि वहइ वइल्ल,
साद किया थाहरइ अवरु नवि देई बुल्ल।
~~समरा रास

बंझ नारि तुह पय झापंति, सुरकुमरोवम पुत्त लहंति।
निंदू नंदण जणइ चिराउ, दूहव पावइ वल्लह राउ।।
चिंतियफल चिंतामणि मंति तुज्झ पसायिं फलइ नियंतु।
अणुग्गह नर पिक्खेवि, सिज्झइ सोलह विज्जाएवि।।
~~पद्मावती चौपई

सीमळ कोमल सुरहि वाय जिम जिम वायंते।
माणमडफ्फर माणणिय तिम तिम नाचंते।।
जिम जिम जलभर भरिय मेह गयणंगणि मिलिया।
तिम-तिम कामी तणा नयण नीरिहि झलहलिया।।
भास मेहारव भर उलटिय, जिम जिम नाचइ मोर।
तिम-तिम माणिणि खळभळइ, साहीता जिम चोर।।
~~स्थूलीभद्र फाग

चौदहवीं शताब्दी के पश्चात् पन्द्रहवीं शताब्दी के मध्य तक की उल्लेखनीय रचनायें निम्नलिखित हैं। ग्रन्थों की नामावली के पश्चात् भाषा के उदाहरणस्वरूप कुछ पद उद्धृत किए जा रहे हैं।-

  • राजेश्वर सूरि कृत प्रबन्ध कोश, नेमिनाथ फागु, वि.सं. 1405.
  • कवि हलराज कृत स्थूलिभद्र फाग, वि.सं. 1409.
  • मुनि शालिभद्र सूरि कृत पांच पांडव रास, वि.सं. 1410.
  • मुनि विनयप्रभसूरि कृत गौतमस्वामी रास, वि.सं. 1412.
  • जैन मुनि ज्ञानकलश रचित जिनोदय सूरि पट्टाभिषेक रास, वि.सं. 1415.
  • श्रावक विद्धणु रचित ज्ञानपंचमी चौपई, वि.सं. 1423.
  • मेरुनंदण गणि कृत जिनोदयसूरि गच्छनायक विवाहलु, वि.सं. 1432.
  • देवप्रभ गणि कृत कुमारपाल रास। कवि चंपा कृत देवसुन्दर रास, वि.सं. 1445.
  • साधु हंस कृत शालिभद्र रास, वि.सं. 1455.

1.
वंकुडियालीय भुंहडियहं, भरि भुवणु भमाडइ।
लाडी लोयण लह कुडलइ सुर सग्गह पाडइ।।

किरि सिसि बिंब कपोल, कन्नहिंडोल फुरंता।
नासा वंसा गरुड चंचु दाड़िम फल दंता।।

अहर पवाल तिरेह कंठुराजलसर रूडउ।
जाणु वीणु रणरणइं, जाणु कोइल टहकडलउ।।

~~नेमिनाथ फागु

2.
जिम सहकारिहिं कोयल टहकउ,
जिम कुसुमह वनि परिमल बहकउ,

जिन चंदनि सोगंध विधि,
जिम गंगाजलु लहरिहिं लहकइ,

जिम कणयाचलु तेजिहिं झलकइ,
तिम गोयम सोभाग निधि।।

~~गौतम स्वामी रास

3.
इक्कु जगि जुग पवरु अवरु निय दिक्ख गुरु
थुणिसुं हउं तेण निय मइ बलेण।

सुरभि किरि कंचणं दुद्धु सक्कर घणं
संखु किरि भरीउ गंगा जलेण।।

अत्थि गूजरधरा” सुंदरी सुंदरे,
उरवरे रयण हारोवमाणं।

लच्छि केलिहरं नयरु “पल्हणपुरं”,
सुरपुरं जेम सिद्धामिहांण।।

~~जिनोदय सूरी गच्छनायक वीवाहलु

आदि काल की इस अंतिम अवधि में जैन ग्रंथों के साथ-साथ कुछ उल्लेखनीय जैनेतर रचनाओं का भी निर्माण हुआ है। प्रामाणिक रचनाओं के रूप में प्राप्त होने के कारण आदिकाल के साहित्य में इन जैनेतर रचनाओं का अपना विशेष महत्त्व है। इन रचनाओं में सर्वप्रथम “बारूजी सौदा” के फुटकर गीतों का उल्लेख मिलता है। ये उदयपुर के महाराणा हम्मीर के समकालीन थे। इस दृष्टि से इनका रचनाकाल संवत् 1408 से 1421 के बीच माना जा सकता है। वैसे इनका लिखा हुआ कोई ग्रंथ स्वतंत्र रूप में तो नहीं मिलता लेकिन कुछ फुटकर गीत यत्र-तत्र मिल जाते हैं जो उस काल की साहित्यिक विधाओं को समझने में सहायक होते हैं। उदाहरणस्वरूप उनका लिखा एक गीत यहां उद्धृत किया जाता है–

ऐळा चितौड़ा सहै घर आसी, हूँ थारा दोखियां हरूं।
जणणी इसौ कहूँ नह जायौ, कहवै देवी धीज करूं।।1

रावळ बापा जसौ रायगुर, रीझ खीझ सुरपंत री रूंस।
दस सहंसां जेहो नह दूजौ, सकती करैं गळा रा सूंस।।2

मन साचै भाखै महमाया, रसणा सहती बात रसाळ।
सरज्यौ लै अड़सी सुत सरखो, पकड़े लाऊं नाग पयाळ।।3

आलम कलम नवै खंड एळा, कैलपुरारि मींढ किसौ।
देवी कहै सुण्यौ नह दूजौ, अवर ठिकांणै भूप इसौ।।4

प्राचीन राजस्थानी साहित्य, भाग 6[1] में असाइत नामक एक कवि का और उल्लेख किया गया है। इन्होंने वि. संवत् 1427 में “हंसाउली” काव्य की रचना की। “हंसाउली” मुख्यतः एक प्रेम-काव्य है जो चार खण्डों में विभक्त है तथा 440 कड़ियों में लिखा हुआ है। सम्पूर्ण काव्य चौपाइयों में रचा गया है किन्तु बीच-बीच में दोहों का भी प्रयोग किया गया है। इस ग्रन्थ के निर्माण के पूर्व ही एक जैन कवि विनयभद्र “हंसवच्छ” काव्य चौपाइयों में लिख चुका था। उसमें भी इसी प्रेम-कथा का वर्णन है। कवि असाइत ने उसी प्रेम-गाथा को अपने “हंसाउली” में नवीन रूप में प्रस्तुत किया। इनकी कविता पर जैन कवियों की शैली व परम्परा की पूर्ण छाप दृष्टिगोचर होती है। “हंसाउली” की भाषा निम्न उद्धरण से देखी जा सकती है–

विवध फूल फल निव नैवेद्य, वीणा वस गाइ गुण भेद।
सोइ जि परवरी पंचसि नारि, दीठी कुंयरि मंत्रि मढि बारि।।
यथु देवी तब बुद्धि निधांन, हाकि मुनि केसर प्रधांन।
नरहत्या ति किधी धणी मुझ मढ़ि मर हेसि पापिणी।।
हंसाउली सबद जव सुणी, जांण्यु देवि कुपी मुझ भणी।
कर जोडीनि ऊभी रहि गत, पूरब भव वीतक कहि।।

श्रीधर व्यास द्वारा रचित “रणमल छन्द” नामक रचना भी इस काल की एक प्रामाणिक रचना मानी जा चुकी है। उक्त कवि के सम्बन्ध में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है, फिर भी इनकी रचना ऐतिहासिक दृष्टि से पूर्ण प्रामाणिक है। “रणमल छंद” सत्तर छंद का एक वीर काव्य है जिसमें पाटण के तत्कालीन सूबेदार मुजफ्फरशाह और ईडर के वीर राठौड़ नरेश रणमल्ल के युद्ध का सजीव चित्रण है। इस युद्ध का समय अनेक विद्वानों ने ई. सन् 1397 माना है। इसके सम्बन्ध में इतिहासज्ञों का भिन्न-भिन्न मत है, फिर भी गुजरात के प्रसिद्ध विद्वान के. ह. ध्रुव ने सन् 1397 को ही स्वीकार किया है।[2] इस दृष्टि से इस ग्रन्थ का रचनाकाल वि.सं. 1454 के आसपास ही ठहरता है। इसकी भाषा के उदाहरण हेतु एक पद नीचे प्रस्तुत किया जाता है–

गोरी दल गाहवि दिट्ठ दहुद्दिसि गढ़ि मढ़ि गिरिगह्वरि गडियं।
हणहणि हवकन्तउ हुं हुं हय हय हुंकारवि हयमरि चडियं।।
धडहडतउ धडि कमधज्ज धरातळि धसि धगडायण धूंसधरइ।
ईडरवइ पंडर वेस सरिसु रणि रांमायण रणमल्ल करइ।।

इसी समय कवि जाखौ मणिहार भी हो चुके हैं जिन्होंने लगभग 1453 में बोलचाल की राजस्थानी में “हरिचंद पुराण” नामक धार्मिक ग्रन्थ की रचना की। उपर्युक्त सम्पूर्ण विवेचन के आधार पर यह स्पष्ट है कि आदिकालीन राजस्थानी साहित्य हमारे समक्ष मुख्यतः दो रूप में आता है–जैनेतर साहित्य एवं जैन साहित्य। इस काल की प्राप्त सभी रचनाओं में जैनेतर साहित्य की अपेक्षा जैन साहित्य अधिक मात्रा में उपलब्ध है और वह पूर्ण प्रामाणिक भी है। इस प्रारंभिक साहित्य के कई ग्रन्थों की प्रामाणिकता को लेकर भिन्न-भिन्न साहित्य-विशेषज्ञों तथा इतिहासकारों ने यद्यपि अपनी मतभिन्नता प्रकट की है, फिर भी इन रचनाओं को उन्होंने प्रामाणिक रूप से आदिकालीन रचनायें ही स्वीकार किया है। दोनों ही प्रकार की रचनाओं के उल्लेख के समान यथास्थान पर दिये गए पदों के उदाहरण तत्कालीन राजस्थानी भाषा पर प्रकाश ही नहीं डालते परन्तु भाषा के निजी अस्तित्व का प्रमाण भी प्रस्तुत करते हैं। निष्पक्ष दृष्टिकोण से यह तो मानना ही होगा कि इस काल की रचनाएं हमारी अमूल्य निधि रही हैं। हिन्दी व राजस्थानी इसी विधि के द्वारा ही अपनी मां अपभ्रंश से सम्बन्ध स्थापित करती हैं। इन रचनाओं में वास्तव में हम प्राचीनता के दर्शन करते हैं, चाहे वे पूर्ण न होकर आंशिक ही हों। ये रचनाएं उस मिली-जुली अवस्था की प्रतिनिधि हैं जब राजस्थानी अपभ्रंश से पृथक् स्वतंत्र सत्ता ग्रहण करने का प्रयत्न कर रही थी। इस दृष्टि से इन रचनाओं का महत्त्व और भी अधिक बढ़ जाता है।

आदिकालीन राजस्थानी साहित्य के वर्णन के समय अनेक विद्वानों का प्रायः यही मत उल्लिखित मिलता है कि यह साहित्य वीररस-प्रधान है। हिन्दी साहित्य के इतिहास के लेखकों ने तो राजस्थानी की इन्हीं प्रारम्भिक रचनाओं के नाम उल्लेख कर उसे वीरगाथा-काल नाम भी दे दिया है, जब कि राजस्थानी साहित्य में पन्द्रहवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक वीररस का कोई ग्रंथ उपलब्ध भी नहीं होता। परन्तु वास्तव में ऐसी बात नहीं है। विद्वानों का यह मत पूर्ण भ्रमात्मक ही प्रतीत होता है। इस काल की उल्लेखित रचनाओं में एक भी स्वतंत्र रचना ऐसी नहीं है जिसे हम वीररस-प्रधान कह सकते हैं। प्राप्त रचनायें मुख्यतः प्रेम-काव्य होने के कारण श्रृंगारिक हैं। अन्य या तो धार्मिक ग्रन्थ होने के कारण उपदेशात्मक हैं या फिर वस्तु-वर्णन-प्रधान। यह सत्य तो अवश्य है कि इस काल में राजनैतिक स्थिति संघर्षपूर्ण थी। राजपूत शासक युद्ध के लिए सदैव ही तत्पर रहते थे। अनेक राजपूत वीरों ने युद्ध के मैदान में अपने अद्भुत शौर्य का परिचय भी दिया परन्तु उनकी वीर-प्रशंसा तथा युद्ध-वर्णन का तत्कालीन कोई ग्रन्थ नहीं मिलता। अतः इस सम्बन्ध में तत्कालीन लिपिनिष्ठ रचनाओं के अभाव में इस समय के साहित्य को वीररस-प्रधान बताना असंगत ही है। हो सकता है, उस समय वीर-चरित-नायकों की वीर-प्रशंसा में श्रुतिनिष्ठ साहित्य प्रचलित हो।

डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अपने “हिन्दी साहित्य का आदिकाल” में आचार्य शुक्ल के हिन्दी के आदिकाल को वीरगाथा काल बताने के मत का खण्डन करते हुए बताया कि शुक्लजी द्वारा जिन 12 ग्रंथों के आधार पर इस काल को वीर गाथा काल नाम दिया गया है उनमें से कई रचनायें तो बाद की निकलती हैं और कुछेक के सम्बन्ध में यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि उनका मूल रूप क्या था।[3] खुमाण रासौ बहुत पीछे की रचना निकलती है तो पृथ्वीराज रासौ के मूल रूप का पता नहीं चलता, बीसलदे रासौ कोई वीर रस-प्रधान रचना नहीं है। अतः उन्होंने भी मिश्रबंधुओं द्वारा दिये गये नाम–आदिकाल के ही पक्ष में अपना मत दिया है।

[1] उदयपुर साहित्य संस्थान।
[2] प्राचीन गुर्जर काव्य--के. ह. ध्रुव, प्रस्तावना, पृष्ठ 3.
[3] हिन्दी साहित्य का आदिकाल--डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी, प्रथम व्याख्यान, पृ. 11

साहित्य-विशेषज्ञ एवं विद्वद्जन आदिकालीन रचनाओं के सम्बन्ध में निरन्तर रूप से अनुसन्धान एवं साहित्य शोध-कार्य करते आ रहे हैं। इसी के परिणामस्वरूप राजस्थानी के प्राचीनतम साहित्य का दिग्दर्शन सम्भव हो सका है। प्राचीन राजस्थानी की अनेक रचनायें आज भी अज्ञानता के अंधकार में लुप्त हैं। जन- साधारण की अशिक्षा के कारण और प्राचीन साहित्य के महत्त्व की अनभिज्ञता के कारण कई प्राचीन मौलिक ग्रन्थ व ग्रन्थों की प्रतियां सुदूर गांवों में विनाश को प्राप्त हो रही हैं। इसके अतिरिक्त प्राप्त रचनाओं में से भी कुछेक काल-प्रमाण के अभाव में विवादग्रस्त पड़ी हुई हैं। ऐसी स्थिति में अप्राप्त रचनाओं की खोज एवं प्राप्त साहित्य के सम्बन्ध में शोधकार्य अत्यन्त आवश्यक रूप से अपेक्षित है। इस प्रकार का कार्य न केवल साहित्य की अभिवृद्धि ही करेगा अपितु उसकी प्रामाणिकता को और अधिक पुष्टि प्रदान करता हुआ हमारी अपनी प्राचीन संस्कृति की सुरक्षा करने में भी सहयोगी सिद्ध होगा।

मध्यकाल–वि.सं. 1460 से 1900 तक

आदिकालीन राजस्थानी साहित्य की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में हम यह बता आए हैं कि लगभग विक्रम की तेरहवीं शताब्दी तक राजपूताने के प्रत्येक विभाग पर राजपूती राज्य की स्थापना हो चुकी थी। देश में होने वाले बाह्य आक्रमणों एवं राजपूत राजाओं के पारस्परिक युद्धों के कारण तत्कालीन राजनैतिक स्थिति पूर्ण अनिश्चित थी। आगे चल कर मध्ययुग में विदेशी सत्ताधारियों के राज्य-विस्तार के लोभ एवं राजपूतों के पारस्परिक वैमनस्य तथा फूट के कारण यह स्थिति अधिकाधिक संघर्षपूर्ण बनती गई। उत्तर-पश्चिम से आने वाले मुसलमान आक्रमणकारियों ने देश की कमजोरी से लाभ उठा कर उत्तरी भारत में अपनी सत्ता कायम कर दी। जब दिल्ली की बादशाहत से उन्हें सन्तोष नहीं हुआ तो वे राजपूताने के राज्यों को भी अपने अधिकार में करने के लिए प्रयत्न करने लगे। इसके लिए उन्हें अनेक युद्ध करने पड़े। वीर राजपूत लोग, विदेशी सत्ता तो दूर रही, उस समय अपने पड़ौसी राजपूत राजा की अधीनता भी स्वीकार करने के लिए कभी तैयार नहीं थे। अतः उन आक्रमणों का कोई परिणाम नहीं निकला। तुगलक वंश की कमजोरी के समय राजपूत राजाओं ने उन सभी राज्यों को पुनः प्राप्त कर लिया जिन्हें मुसलमानों ने हस्तगत कर लिया था।

मध्य युग में यद्यपि दिल्ली में मुस्लिम सल्तनत कायम हो चुकी थी, फिर भी बाह्य आक्रमणों का अंत नहीं हुआ था। वि. सं. 1455 (ई. सन् 1398) में अमीर तैमूर ने हिन्दुस्तान पर चढ़ाई कर दिल्ली को फतह किया, उसे लूटा और वहाँ मारकाट की। इन बाह्य आक्रमणों एवं आंतरिक युद्धों के कारण तुगलक शासक बिल्कुल कमजोर हो गए और सैयदों ने उनसे राज्य छीन लिया। ये कुछ ही वर्ष रह पाये थे कि लोदी पठानों ने इनसे बादशाहत छीन ली। इस वंश के बादशाहों ने भी राजपूत राजाओं पर अनेक आक्रमण किये परन्तु यहां के शासकों ने सभी आक्रमणों का सदैव ही वीरता के साथ प्रतिरोध किया। जिसके फलस्वरूप दिल्ली में कोई स्थायी सल्तनत कायम न हो सकी और निरन्तर आक्रमणों के कारण इन मुस्लिम शासकों की शक्ति क्षीण हो गई और अवसर का लाभ उठा कर अनेक क्षेत्रीय शासकों ने अपनी स्वाधीन रियासतें कायम कर दीं। इन रियासतों में भी एकता का परम अभाव था। इनमें पारस्परिक द्वेष एवं फूट की वृद्धि होती गई जिसके कारण इसकी शक्ति का भी ह्रास हो गया।

ऐसी स्थिति में मुगल सरदार बाबर ने हिन्दुस्तान में आकर अपनी सल्तनत कायम करने का प्रयत्न किया। यद्यपि स्वतंत्रता-प्रेमी मेवाड़ राज्य के वीर शासक राणा सांगा ने खानवा के युद्ध (वि.सं. 1584) में बाबर से लड़ते समय अद्भुत वीरता एवं अदम्य साहस का परिचय दिया तथापि दुर्भाग्यवश विजय बाबर के ही हाथ रही। इस पराजय के कुछ ही दिनों बाद राणा सांगा की मृत्यु हो गई जिसके कारण समूचे भारतवर्ष की स्वाधीनता ही अंधकार में विलीन हो गई। इस समय देश में कोई ऐसी एक दृढ़ सत्ता न रह गई थी जो विदेशी सत्ता को देश से निकाल बाहर करती। इसके फलस्वरूप मुगल सल्तनत की नींव ही भारत में अधिक गहरी जमती गई। हुमायू की मृत्यु तक तो कुछ उथल-पुथल अवश्य होती रही और उसमें कई विघ्न उत्पन्न हुए, परन्तु हुमायू की मृत्यु के बाद अकबर जब गद्दी पर बैठा तो उसने अपने शासन को दृढ़ करने के लिए हिन्दुओं को प्रसन्न रखने व राजपूत राजाओं के साथ मेल-जोल बढ़ाने की नीति को अपनाया। वह राजपूतों की वीरता से परिचित हो चुका था। इस समय राजपूताने में कुल 11 राज्य थे[1], जिनमें मेवाड़ (उदयपुर) और जोधपुर राज्य मुख्य थे। अकबर ने सर्व प्रथम आंबेर के राजा भारमल कछवाहा को कुछ प्रलोभन देकर अपनी ओर मिला लिया। परन्तु इसके साथ ही वह राजपूताने की मुख्य शक्ति मेवाड़ को भी अपने अधीन करने के लिए पूर्ण उत्सुक था। इसी उद्देश्य से उसने वि.सं. 1624 में महाराणा उदयसिंह पर चढ़ाई की। महाराणा इस युद्ध में हार अवश्य गए परन्तु उन्होंने अधीनता स्वीकार नहीं की। चित्तौड़ का किला छोड़ने के उपरान्त भी वे युद्ध करते ही रहे। महाराणा उदयसिंह के देहांत के बाद महाराणा प्रताप ने स्वतंत्रता के व्रत को कायम रखा। उन्होंने यवनों के विरुद्ध जिस वीरता का परिचय दिया वह विश्व-विदित है। इसी प्रकार मुगल सल्तनत के अन्तिम काल तक स्वाधीनता-प्रेमी राजपूत समय-समय पर अपनी मर्यादा एवं हिन्दुत्व की रक्षा के लिए निरन्तर युद्ध करते हुए अपनी वीरता का परिचय देते रहे। औरंगजेब ने जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह की मृत्यु के बाद जोधपुर को खालसे कर लिया और मेवाड़ के राणा से अप्रसन्न होने के कारण उस पर चढ़ाई कर दी। उसके बाद बहादुरशाह ने महाराजा जयसिंह से आमेर छीन लिया था परन्तु मुगल सल्तनत का पतन होते देख जोधपुर के महाराजा अजीतसिंह व आमेर के राजा जयसिंह ने महाराणा अमरसिंह द्वितीय की सहायता से अपने-अपने राज्यों पर पुनः अधिकार कर लिया। इस अवसर पर महाराजा अजीतसिंह को राज्याधिकार प्राप्त कराने में उनके सामंत वीर राठौड़ दुर्गादास ने पूर्ण सहयोग देकर सच्ची स्वामी-भक्ति का परिचय दिया।

मुगल सल्तनत के पतन के समय जब मरहठों की शक्ति बढ़ती जा रही थी तब यहां के शासकों को तो उनका भी प्रतिरोध करना पड़ा। इसके परिणामस्वरूप मरहठों तथा राजपूतों में भी निरन्तर संघर्ष चलता ही रहा।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि यह काल भयंकर युद्ध एवं संघर्ष का युग रहा। इस संघर्ष में विशेषतः राजपूताने के वीरों ने जो अतुल शौर्य का परिचय दिया वह कहीं अन्यत्र दृष्टिगोचर नहीं होता। अपनी मर्यादा और मातृभूमि की रक्षा के लिए युद्ध भूमि में हँसते-हँसते प्राणों की आहुति दे देना ही इनके जीवन की विशेषता थी। यही कारण है कि इस संघर्ष काल में वीरता, साहस और बलिदान का परिचय देने वाले योद्धाओं की अनेक गाथाओं से राजस्थानी साहित्य का भंडार भरा हुआ है। ऐसे शूरवीर नायकों की कीर्ति गाथायें इस समय के साहित्य की मुख्य धरोहर हैं।

इस अमर साहित्य का सृजन करने वाले कवि प्रायः राज्याश्रित होने पर उनका उद्देश्य राजा की प्रशंसा करना ही नहीं होता था। वे जहाँ भी वीरता और मानवीय गुणों का परिचय पाते, अपनी काव्य-प्रतिभा के माध्यम से उन गुणों को जन साधारण तक पहुँचाते, चाहे वर्णन साधारण योद्धा के सम्बन्ध में हो, चाहे किसी बड़े शासक के सम्बन्ध में। कविवर दुरसा आढ़ा ने जनता एवं स्थानीय शासक के मध्य भी सम्मान प्राप्त किया और प्रताप की प्रशंसा में “विरुद छिहतरी” लिख कर बादशाह अकबर के दरबार तक में अधिक ख्याति पाई।

दूसरा उदाहरण कविराजा बांकीदासजी का भी है। ये जोधपुर के महाराजा मानसिंह के राजकवि थे पर जब खांडप के एक साधारण व्यक्ति लाधा सोलंकी ने भीषण दुष्काल के समय अपने क्षेत्र की प्रजा की यथाशक्ति सहायता की और आने-जाने वाले यात्रियों की सुविधा के लिए बहुत से प्रयत्न किए तब कवि ने उसके सुकृत्यों की प्रशंसा में भी गीत कह कर उसे अमर कर दिया।[2] इस काल के कवियों की अपनी निजी विशेषता थी। ये केवल सरस्वती के उपासक ही नहीं होते थे पर रणचण्डी का आह्वान भी समय पड़ने पर स्वीकारते थे। रणस्थल में उपस्थित हो अपनी ओजस्वी वाणी द्वारा वीरों में जोश की उमंगें भरते तथा आप स्वयं भी हाथ में तलवार ले अपने नायक का साथ देते। वीरों की प्रशंसा में कर्नल टॉड ने जहां अपने ये विचार व्यक्त किए हैं कि….. ‘There is not a petty State in Rajasthan that has not had its Thermopylae and scarcely a city that has not produced its Leonidas’ वहां इस प्रसंग में प्रो. नरोत्तमदास स्वामी ने उचित ही लिखा है कि “कर्नल टॉड यह लिखते समय इतना और लिखना भूल गए थे कि थर्मापोली से रणक्षेत्र तैयार करने वाले वीर सैनिक कवियों से भी राजस्थान का साधारण से साधारण गांव भी खाली नहीं रहा है।” -राजपूत लोग अपने धर्म एवं स्वतंत्रता की रक्षा के लिए रणोन्मत्त होकर सहर्ष मृत्यु को गले लगाते और उनकी स्त्रियां और बच्चे मर्यादा की रक्षा के लिए अपने आपको अग्नि देवी की गोद में समर्पित करते। कवि लोग प्रत्येक परिस्थिति में साथ रहते। इसलिए प्रत्यक्ष दृश्यानुभूति होने के कारण उनकी लेखनी ऐसे वीरों के उज्ज्वल चरित्र की अभिव्यक्ति के लिए बरबस ही फूट पड़ती।

[1] उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़, जोधपुर, बीकानेर, आंबेर, बूंदी, सिरोही, करौली और जैसलमेर।
[2] झरहरियौ आभ न कूमांडे झड़, विखमां जग परहरियौ बाव।
   जो उगणतरौ थरहरियौ जग में, चाळक न परहरियौ चाव।।1
   अंन बिन लोक चहूं चक ओड़ै, गया माळवे छोडे गेह।
   दोवां नाडकां छेह दिखायौ, "आसावत" दरियाव अछेह।।2
   मानव बिकै पाव अंन माट, दुरभिख जग में ताव दियौ।
   अंन रांधै कोरे नह ऊतर, लाधे हद सो भाग लियौ।।3
   भेटे कोय गयौ नंह भूखौ, परजाची कीधी प्रतिपाळ।
   खोटे समय उणंतरे खांडप, सोलंकी दरसियौ सुकाळ।।4 
      --बांकीदास ग्रन्थावली, भाग 3, भूमिका

इन कवियों की रचना में आज लोगों को भले ही अतिशयोक्ति लगे परन्तु जिन वीरों की अद्भुत वीरता एवं बलिदान ने शत्रुओं को भी मुक्त कंठ से प्रशंसा करने के लिए बाध्य कर दिया और वे ऐसे वीरों की प्रशंसा करते अघाये नहीं,वे सच्चे देश भक्त वास्तव में ही प्रातःस्मरणीय हैं। चित्तौड़ दुर्ग की रक्षा के लिए अकबर की विशाल सेना के विरुद्ध युद्ध करते हुए वीरशिरोमणि जयमल मेड़तिया और वीरवर पत्ता सीसोदिया ने जिस अद्भुत वीरता, प्रगाढ़ देशप्रेम और सच्ची स्वामी-भक्ति के दर्शन कराये उसकी अकबर जैसा समृद्धिशाली बादशाह भी अपने सच्चे हृदय से सराहना किये बिना न रह सका। वीरों ने अपने चमत्कारों द्वारा अपनी प्रतिष्ठा उसके हृदय पर अमिट रूप से अंकित कर दी। बादशाह ने इन वीरों की केवल अपने मुख से ही प्रशंसा नहीं की अपितु युग्म वीर जयमल और पत्ता की वीरता को चिरस्थायी एवं चिरस्मरणीय करने के लिए दोनों वीरों की पाषाण की गजारूढ़ दीर्घ प्रतिमायें बनवा कर आगरे में अपने शाही किले के प्रधान द्वार पर बड़ी प्रतिष्ठा के साथ स्थापित करा दी।[1]

मूर्ति-स्थापन के साथ यह भी प्रसिद्ध है कि बादशाह अकबर ने इन दोनों मूर्तियों पर उन वीरों की प्रशंसा की याद में निम्नलिखित दोहा भी खुदवा दिया था–

जयमल बढ़तां जीवणे, पत्तौ बायें पास।
हिन्दू चढ़िया हाथियां, अडियौ जस आकास।।

जहां प्रतिपक्षी द्वारा वीरों की कीर्ति एवं यश की रक्षा के लिए इतनी चेष्टा की जाय वहाँ लेखनी द्वारा ऐसे वीरों के लिए जो कुछ भी लिखा जाय वह बहुत थोड़ा है।

वीरों की कीर्ति-रक्षार्थ यशगान करने वाले कवि स्वयं भी वीर होते और उन्हें वीरता का सच्चा अनुभव भी होता था। इसीलिए उनके द्वारा रचित साहित्य में हमें वीरत्व की जीवन्त झांकी के दर्शन होते हैं। इस कथन की पुष्टि में अनेक उदाहरण प्रस्तुत किए जा सकते हैं।

खानवा के युद्ध में महाराजा संग्रामसिंह जब घायल हो गए तो उनके सैनिक लोग उन्हें उठा कर ले आये। मूर्च्छा खुलने पर राणा उदासीन हुए और अपने आपको अंग भंग देख राणा के पद के लिए अनुपयुक्त घोषित कर दिया। उसी समय कवि जमणाजी अपने एक ही गीत द्वारा उनमें उत्साह की उमंग भर देते हैं और इस गीत से प्रभावित होकर सांगा ने राणा पद को पुनः स्वीकार कर लिया।

।।गीत।।
सतबार जरासंघ आगळ स्री रंग, बिमहा टीकम दीध बग।
मेलि घात मारे मधुसूदन, असुर घात नांखे अळग।।1

पारथ हेकरसां हथणापुर, हटियौ त्रिया पडंतां हाथ।
देख जका दुरजोधण कीधी, पछै तका कीधी कांइ पाथ।।2

इकरां रांमतणी तिय रांवण, मंद हरेगौ दहकमळ।
टीकम सोहि ज पथर तारिया, जगनायक ऊपरा जळ।।3

एक राड भव मांह अवत्थी, ओरस आणै केम उर।
माल” तणा केवा कज मांगा, सांगा तू सालै असुर।।4

राजपूताने के वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की वीरता, त्याग एवं बलिदान से कौन परिचित नहीं है। अकबर जैसे सम्राट ने भी महाराणा प्रताप की वीरता का लोहा माना और प्रमुख शत्रु होते हुए भी उसकी सदैव प्रशंसा की। राणा ने अपना समस्त जीवन युद्ध में ही व्यतीत किया। राणा के प्रति तत्कालीन कवि सूरायच टापरिया का कहा हुआ गीत कायर के हृदय में भी उत्साह की लहर उत्पन्न कर देता है–

।।गीत।।
वरियाम विडंग न लहै वेसांमी, खग सावरत रण पैसै खाप।
अकबर साह न छाडै आरंभ, पांण न छाडै रांण प्रताप।।1

बे म्रतलोकि नरींद बराबर, पेखे पदम हाथ लहै परै।
मेले जोगणिपुरौ महादळ, केळपुरौ उखेळ करै।।2

प्रभणै किरण पेखि कीळापति, देखै मीढ़ण तणौ दुह राव।
नंद-हमाऊं रीस न नामै, सीस न नामै “सिंघ” सुजाव।।3

सूरज-चंद तांम समासै, खरै आव वाजियौ खरौ।
हेकां सिर खीटै बाबर हर, हेकां अमट “संग्राम” हरौ।।4

मध्यकालीन राजपूत राजा लोग जहाँ अपनी शूरवीरता के लिए प्रसिद्ध हो चुके हैं वहाँ दानशीलता एवं त्याग में भी वे अपना प्रतिद्वन्द्वी नहीं रखते। वीरों के प्रभावशाली व्यक्तित्व एवं वीरता के अद्भुत कार्य-कलापों की प्रेरणा से जिस प्रकार वीर-काव्यों की रचना हुई है, उसी प्रकार दानवीरों की दानवीरता भी इन कवियों की कविता में उद्भूत हुई है। अपने आश्रित कवियों को उनकी सुन्दर रचनाओं पर करोड़ पसाव और लाख पसाव देने की परम्परा सर्वविदित है। इस प्रकार के दान और पुरस्कार में भी परस्पर प्रतिस्पर्धा की भावना रहती और दान देने में अपना नाम उच्च रखने के लिए एक दूसरे से बढ़ कर दान दे दिया करते। कवि शंकर बारहठ की कविता पर प्रसन्न होकर बीकानेर महाराजा रायसिंह ने उसे सवाकोड़ का पुरस्कार प्रदान किया। इसकी सूचना जब जयपुर के महाराजा मानसिंह को उसकी रानी, जो महाराज रायसिंह की लड़की थी, द्वारा मिली तो उन्होंने प्रातः ही 6 श्रेष्ठ कवियों को बुला कर 6 करोड़ पसाव का पुरस्कार दे दिया।[2] इस प्रकार की पुरस्कार व्यवस्ता से राजा लोग अपने आश्रित कवियों को सम्मानित कर साहित्य-सृजन के लिए प्रोत्साहित करते तथा साहित्य के प्रति अपना अटूट प्रेम भी प्रगट करते। मध्यकालीन कवियों को निरन्तर रूप से साहित्य रचना के लिए इस प्रकार का प्रोत्साहन मिलने के कारण भी इस काल में राजस्थानी का अतुल भंडार उपलब्ध होता है।

[1] बर्नियर्स ट्रेवल्स इन दी मुगल एम्पायर, कान्स्टेबल और स्मिथ कृत, पृष्ठ 256-57.
[2] पोळ पात हरपाळ1 , प्रथम प्रभता कर थप्पे।
   दळ में दासो2 नरू3 सहोड़ घण हेत समप्पे।
   ईसर4 किसनो5 अरघ, बड़ी प्रभता बाधाई
   भाई डूंगर6 भणे, क्रीत लख मुखां कहाई।
   अई अई "मांन" उनमान पहो, हात धनो-धन धन हियौ।
   सुरज घड़ीक चढ़ता समौ, दे छ कोड़ दातण कियौ।।
      --वीरविनोद, भाग 2, कविराजा श्यामलदास, पृ. 1285

विक्रम की सत्रहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध अर्थात् अकबर के शासन-काल के आरम्भ होेने तक भारत में मुगल राज्य की नींव सुदृढ़ हो चुकी थी और निरन्तर युद्ध एवं मुगलों के प्रभुत्व ने राजपूत राजाओं की शक्ति को जर्जर कर दिया था। ऐसी स्थिति में भी वीरता के उपासक राजपूत अब भी अपने धर्म एवं हिन्दुत्व की रक्षार्थ अवसर पड़ने पर प्राणों की बाजी लगाने से चूकते नहीं थे। इस्लाम का आतंक देशव्यापी हो गया था। राजस्थान के सुदूर गांवों में भी हिन्दू जाति की साधारण जनता को धर्म के नाम पर बहुत बुरी तरह से कष्ट दिया जा रहा था। गायों को लूट कर ले जाना, मन्दिरों को नष्ट करना, लूट-मार करना आदि दिन प्रति दिन की घटनायें थीं। ऐसे संकट काल में उस जनता के वीर नायक प्रायः ये ही वीर राजपूत उनकी रक्षार्थ सामने आते और आततायियों के अन्याय का अन्तिम श्वास तक प्रतिरोध करते। ऐसे धर्मवीरों के चरित्र-वर्णन एवं उनके बलिदान की प्रशंसा के लिए तत्कालीन कवियों की लेखनी मौन कैसे रह सकती थी। इसीलिये धर्मवीरों के बलिदान की अनेक गाथायें मध्ययुगीन राजस्थानी साहित्य में हमें उपलब्ध होती हैं। गायों की रक्षा करते समय मर मिटने वाले के प्रति रचा हुआ कवि का निम्न गीत कितना हृदयस्पर्शी है।

।।गीत।।
मिळ भायां मतौ कियौ मा जायां दळ बळ सज आयां दुरत।
गायां गीयां जीवीयां कुण गत गायां वांसै मुआं गत।।1

सजीयां खाग “प्रीयाग” समोभ्रम, साची कहै बंधतां सार।
वित जावै ऊभा वाहरुआं, लांणत वा वाहरुआं लार।।2

“बदरै” “अने” करी वातां बे मुख सुरां दैणौ मरण…..।
धन धारियां लाज की धणियां, धणीयां ऊभौ जाय धण।।3

अरजा देव प्रथी परमाणै….. ओजो मांटीपणौ अई।
भारत कट पड़ीयां बे भायां, गायां घट खूंदती गई।।4

इसी प्रकार धर्म रक्षा में रत अनेक बहादुरों ने स्थान-स्थान पर मंदिरों, देवरों की रक्षा में अपने प्राणों की आहुति दी है। एक वीर राठौड़ मेड़ता के मंदिर की रक्षा करते करते काम आ गया, जिसके सम्बन्ध में कहा हुआ गीत बरबस ही हमारी भावनाओं को झकझोर देता है।

झिरमिर झिरमिर मेवा बरसै, मोरां छती छाई।
कुळ में छै तौ आव “सुजांणा”, फौज देवरै आई।।

।।गीत।।
आया दळ असुर देवरां ऊपर कूरम कमधज एम कहै।
ढहियां सीस देवळ ढहसी, ढह्यां देवाळौ सीस ढहै।।1

“माल” हरौ “गोपाल” हरौ मंढ़ अडिया दुहूँ खागां अणअंग।
उतगंग साथ उतरसी अंडौ अंडा साथ पड़ै उतमंग।।2

“स्यांम” सुतन “पातळ” सुत सझिया, निज भगतां बांध्यौ हर नेह।
देही साथ समायां देवळ, देवळ साथ समायां देह।।3

कुरम खंडेले कमंध मेड़ते, मरण तणौ बांध्यौ सिर मोड़।
“सूजा” जिसौ नहीं कोइ सेखौ, “राजड़” जिसौ नहीं राठौड़।।4

जहां राजपूत वीरों ने अपनी वीरता, बलिदान और दानशीलता आदि का अपूर्व परिचय देकर साहित्य-सृजन के लिए तत्कालीन कवियों को प्रेरित किया, वहां इनकी वीर स्त्रियों ने भी किसी प्रकार की कसर न रखी। जैसे वीर राजपूत पुरुष वैसी ही उनकी वीर नारियां। पुरुषों की भांति इन्हें भी प्राणों का मोह लेश मात्र भी नहीं था। जिस प्रकार कायर कहलाने की अपेक्षा वीर राजपूत मर जाना अधिक पसंद करते थे, उसी प्रकार राजपूत वीरांगनायें किसी कायर की मां, बहन या पत्नी कहलाना अपने लिए महान् लज्जा की बात समझती थीं। युद्ध के समय मातायें अपने वीर पुत्रों, पत्नियां सुभट पतियों तथा बहिनें बहादुर भाइयों को सहर्ष अपने हाथ से तिलक कर लड़ने के लिए विदा देने में अपना अहोभाग्य समझती थीं। विदाई के अवसर पर उनके द्वारा प्रकट किये जाने वाले हृदयोद्गार वस्तुतः उनके वीर हृदय का परिचय देते हैं। युद्ध में जाने वाले वीर से माता यही कहती कि पुत्र! तूने मेरे स्तन का पान किया है अतः युद्ध में मेरे दूध को कलंकित न करना। बहिन यह कह कर विदा देती कि, मेरे वीर (भ्राता) यह चुनड़ी तूने अपने हाथ से मुझ पर ओढ़ाई है अतः इस चुनड़ी को अपने नाम से लज्जित न करना, और पत्नी यह कह कर शकुन मनाती कि आर्य पुत्र! यह अहिवात (चूड़ौ) मैं तुम्हारे नाम का धारण किए हुए हूं अतः इसे तुम किसी तरह से कलंकित न होने देना। अवसर पड़ने पर वे नारियां स्वयं भी रणचण्डी का रूप धारण कर शत्रुओं का संहार करने के लिए युद्ध-भूमि में आ उतरतीं और आवश्यकता होने पर अपनी मर्यादा की रक्षा के लिए हँसते-हँसते जौहर की ज्वाला को भी वरण करतीं। राजस्थानी साहित्य इसके अनेक उदाहरण प्रस्तुत करता है।

राजस्थानी साहित्यकारों ने इन वीरांगनाओं के उज्ज्वल चरित्र को बड़े ही आदर और श्रद्धा के साथ अपने साहित्य में अभिव्यक्त किया है। नारी के जिन विभिन्न रूपों का उन्होंने दर्शन किया, उसका अपने साहित्य में दिग्दर्शन कराया है। शक्ति रूप में उसकी पूजा की है, माँ के रूप में उसकी वंदना की है, वीरांगना के रूप में उसका सम्मान किया है। जयसिंह कछवाहा की पुत्री किसनावती अपने पुत्रों की रक्षा हेतु शक्ति रूप धारण कर युद्ध में शत्रुओं का संहार करती है; उसका वर्णन तत्कालीन कवि गोरधन बोगसे ने किया है जिसमें नारी की वीरता पर देवता तक न्यौछावर हुए हैं।

।।गीत।।
भारथ मझि मिळै दूसरौ भारथ, रथ ठांमियौ जोवण ग्रहराज।
उमया ईस उभै आहुड़िया, किसनावती तणै सिर काज।।

क्रत सूरति पेखे कछवाही, हुवौ पदम हथ विमुह हथ।
आदमियां उतवंग लै आदम, संकति रूप कहियौ सकत।।

अमुख-अमुख चर नारद औसर, त्रिपति पांच मिळि पांचतत।
हूँ सर तिरपति सुज जांण हरि, त्रिसगति त्रिहूँ रति तिरपत।।

रुद्र-घरणी जंपै, सांभळि रुद्र, आज लगै तैं लिया अनेक।
जैसिंघ-धूय तणौ धू जोतां, अंबर भर मो जुड़ियौ एक।।

हरि-दरगाह न्याय गा हाले, ब्रह्म वांटियौ करे विचार।
सतरमौ सिंणगार सिवा सिव सिर आधै पूरौ सिणगार।।
~~(राजस्थानी) वीर गीत, गीत 117

इसी प्रकार वीर पत्नी का स्वरूप हमें कवि ईसरदास कृत “हालां झालां रा कुंडलिया” में हाला जसवंतसिंहजी (जसा जी) की पत्नी द्वारा पति को कहे हुए शब्दों में मिलता है। हलवद नरेश झाला रायसिंह, हाला जसवन्तसिंह पर चढ़ाई कर उसके नगर ध्रोल में आ पहुँचे तब हाला ठाकुर की पत्नी उन्हें युद्ध के लिए तत्पर करती है–

उठि ऊढ़ंगा बोलणा, कांमणि आखै कंत।
अै हल्ला तो ऊपरां, हूंकळ कळळ हुवंत।।
हूंकळै सींधवौ वीर कळ हळ हुवै।
वरण कजि अपछरां सूरिमां वह बुवै।।
त्रिजड़-हथ मयंद जुध गयंद घड़ तोड़णा।
उठि हर धवळ सुत अढ़ंगा बोलणा।।
~~हालां झालां रा कुंडळिया, पृ. 6

मध्य युग में स्त्री समाज में सती प्रथा का विशेष महत्त्व था। प्राचीन काल से चली आ रही इस प्रथा को इस युग में बड़े सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। प्रारम्भ में पति की मृत्यु के पश्चात् अनुसरण या सहगमन करना ही स्त्रियों का जीवनादर्श था। पति के साथ चितारोहण करती हुई नारी को यह दृढ़ विश्वास होता था कि उसके सती होने के बाद उसे अमर लोक में अमर सौभाग्य मिलेगा। आगे चल कर प्रचलित होेने वाली जौहर प्रथा भी इसी का विकसित रूप है। मध्यकाल में युद्धों की अधिकता थी। युद्ध में वीर राजाओं, सामंतों तथा सैनिकों का काम आ जाना ही जब निश्चित-सा प्रतीत होता तो उसके पूर्व ही उनकी वीर स्त्रियां महलों आदि में चिता की तैयारी कर उसमें अपने प्राणों की बलि दे देतीं। उनका यह तेजोमय आदर्श बहुत ऊंचा था। इसकी झलक मध्यकाल की रचनाओं में स्थान-स्थान पर मिलती है। किशनगढ़ के महाराजा बहादुरसिंह ने अखां नामक वीरांगना के सती होने पर जो गीत कहा उसे उदाहरणार्थ यहां प्रस्तुत किया जाता है–

।।गीत।।
लगी लाय प्रत रोम धकतीरथी धोम लख,
बोम अंतरीक बहती बताई।
जळ पाखां चाढ़ती सकळ जग जोव ज्यो,
अनळ झळ पड़णवा “अखां” आई।।1

बर सबद रांम रांमेत मुख बोलती,
तोलती देह सत बरत तावै।
दुनी कौतक कहै भ्रमी वा देख ज्यो,
उक्रमी गयण मग क्रमी आवै।।2

आरखत बदन “अजबेस” बाली उमंग,
मछर छळ छोड उर अकाळी मीच।
कीच कुळ उकासण कंथ आसण करै,
बैठगी विखम झळ हुतासण बीच।।3

रूप दाहे दवन अंगारा……… मन
भवन अगन जस हूंत मंडगी।
कुळ उतंग डोर आवागवन भंग कर,
चंग पवन संग जिम सुरंग चडगी।।4

इसी प्रकार जोधपुर के महाराजा मालदेव की रानी उमा भटियाणी अपने मान के कारण आजीवन महाराजा से रूठी रही और अपने ननिहाल में रह कर ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया, परन्तु अन्त में महाराजा की मृत्यु के समाचार सुनते ही वहाँ से आकर उनके साथ सती हो गई। इसी का वर्णन तत्कालीन कवि आसा बारहठ ने बड़े ही प्रभावोत्पादक ढंग से किया है–

।।कवित्त।।
हंस गमण राव रमण, निरम्मळ सारंग नेणी।
इम्रत बैण स्रब जांण, बदन चन्दा अह बेणी।
पतबरता पदमणी, सील सुन्दर सतवन्ती।
लछण महा लच्छिमी, जिसी गंगा पारबत्ती।
बड सती माल चाढ़त बड़म, जीव अंग करती जुवा।
झेलती झाळ आठूं दिसा, हार कण्ठ जू जू हुआ।।[1]

निस्सन्देह मध्ययुग में राजपूताने के वीर राजाओं ने अपूर्व देश-प्रेम और अद्भुत वीरता का परिचय दिया। राजाओं के आश्रित कवियों ने अपनी ओजस्विनी एवं शक्तिशालिनी वाणी में उनकी वीरता का यशोगान किया है और उनकी प्रशंसा में ग्रंथों की रचना की है। उन्होंने इनके इस उज्ज्वल पक्ष का चित्रण करने में अतिशयोक्ति का भी सहारा लिया है परन्तु यह भी सत्य है कि उनके अन्य जीवन पक्षों पर भी वे मौन नहीं रहे। जहाँ कहीं कवियों ने वीरों तथा अपने आश्रयदाताओं की कायरता देखी है, उनमें झूठा गर्व पाया है, वहीं अपनी उसी प्रभावशाली वाणी में तीक्ष्ण फटकार के साथ उनकी भर्त्सना की है। इनके साहित्य में कायरों की हीनता और राजाओं के मिथ्याभिमान का चित्रण भी स्पष्ट रूप से मिलता है। हल्दी घाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप को पराजित कर जयपुर नरेश मानसिंह उदयपुर पहुँचे और वहाँ पिछोले के तालाब में अपने घोड़े को पानी पिलाने लगे। घोड़ा पानी पी रहा था, उसी समय वे गर्व से बोले, “बेटा नीला! तुम तृप्त होकर पानी पिओ। या तो इस पिछोले में मंडोवर के राव जोधा राठौड़ ने ही राणा के बल को चूर्ण कर अपने घोड़े को पानी पिलाया या आज मैं महाराणा प्रताप के गर्व को खण्डित कर तुझे इस पिछोले में पानी पिला रहा हूँ।” इसी समय जयपुर निवासी जगावत शाखा का बारहठ “किसना” भी जो मानसिंह का आश्रित कवि होने के कारण उस युद्ध में शामिल था, मानसिंह के घोड़े के साथ-साथ अपने घोड़े को भी पानी पिला रहा था। वह मानसिंह के थोथे गर्व के शब्दों को सहन नहीं कर सका और तत्काल ही मानसिंह को निम्नलिखित उपालम्भसूचक दोहा कह सुनाया।

“मांना” मन अंजसो मती, अकबर बळ आयाह।
“जोधै” जंगम आपणा पांणां बळ पायाह।।[2]

एक समय बीकानेर के महाराजा दलपतसिंह ने जहांगीर बादशाह की फौज के साथ युद्ध किया, तब उसी के राठौड़ साथियों ने उसे धोखा देकर बादशाह की फौज से मिल कर उसे कैद करा दिया। महाराजा को कैद कराने के बाद जब सभी राठौड़ अपने राज्य की ओर पुनः लौटे तब कवि इसे सहन न कर सका और उसने अपनी ओजस्वी वाणी में उन्हें स्पष्ट कह सुनाया–

फिट बीकां फिट कांधळां फिट जंगळ धर लेडां।
“दळपत” हुड ज्यूं बांधियौ, भाज गई भेड़ां।।[3]

[1] राजस्थान के ऐतिहासिक प्रवाद, पृ. 110-111
[2] चारण अखबार, सम्पादक : किशोरसिंह बारहठ, पृ. 254
[3] विविध संग्रह, संकलनकर्ता : ठाकुर भूरसिंह, मलसीसर, पृ. 152.

मारवाड़ के महाराजा जसवंतसिंह प्रथम ने बादशाह शाहजहाँ की शाही सेना को लेकर औरंगजेब के विरुद्ध धरमत (उज्जैन) में युद्ध किया। युद्ध में विपरीत परिस्थितियों के कारण हार निश्चित समझ महाराजा के मंत्रियों ने उन्हें युद्ध से लौट कर मारवाड़ पहुँच जाने के लिए बाध्य कर दिया। युद्ध में सेना का भार रतलाम के राजा रतनसिंह ने संभाल लिया और महाराजा जसवंतसिंह मारवाड़ चले आये। उनके युद्ध से लौटने पर उनकी रानी ने तो किले के द्वार बंद करवाये ही पर कवियों ने भी उन्हें कायर राजपूत होने के अनेक उपालम्भ दिए। बारहठ नरहरदास कवि का ऐसा ही गीत हम उदाहरण के लिए यहाँ प्रस्तुत करते हैं जो निस्सन्देह कायर की रगों में भी वीरता की भावना भरने में पूर्ण समर्थ है।

।।गीत।।
महा मंडियौ जाग उज्जैण खागां मधै रुदन बिलखावती रही रोती।

हेळवी “अमर” री हीय करती हरख “जसा” अपछर रही बाट जोती।।

किया काचा “अमर” “सूरहर” कळौधर डरत गत न पीधौ फूल दारू।
बडा री भोळवी हूर आवी वरण मेलती गई नीसास मारू।।

पाटवी हेळवी बेगमै पैलकै तै समै अैलकै लीध टाळा।
पागती “दलौ” ने “रतन” परणीजतै बाट जोती रही “गजन” वाळा।।

ज तौ वीवाह री बाट जोती जगत रूक बळ त्रासियौ गियौ राजा।
मराड़ी जांन घर आवियौ मांडवै तेल चढ़ती रही अछर ताजा।।

इसी प्रकार एक बार उदयपुर का महाराणा राजसिंह औरंगजेब से मिलने के विचार से दिल्ली की ओर रवाना हुआ। मेवाड़ की परम्परा में यह बात अपमानजनक थी। अतः तभी जीलिया चारणवास का कवि कमाजी (कम्मा) जो पंगु था, उस मार्ग में एक टीबे पर बैठ गया। महाराणा की सवारी जब उसके सामने होकर निकल रही थी तब उसने अपना निम्न छप्पय 10-15 बार पढ़ कर सुना दिया। छप्पय को सुनते ही महाराणा को मेवाड़ के गौरव का भान हुआ और उन्होंने अपनी सवारी वहीं से उदयपुर की ओर मोड़ ली। उन्होंने समझ लिया कि दिल्ली जाकर बादशाह से मिलना मेवाड़ को नीचा दिखाना है। कवि का छप्पय वस्तुतः एक सारगर्भित व्यंगोक्ति है।

।।छप्पय।।
अजे सूर झळहळै, अजे प्राजळै हुतासण।

अजे गंग खळहळै, अजे साबत इंद्रासण।
अजे धरणि ब्रहमंड, अजे फल फूल धरत्ती।
अजे नाथ गोरक्ख, अजे अह मात सकत्ती।
आजू हीलोहल धू अटळ, बेद धरम बांणारसी।
पतसाह हूंत चीतोड़पत, रांण मिळै किम “राजसी”।।

यद्यपि इस प्रकार की उपालम्भोक्तियों तथा व्यंगोक्तियों का दुष्परिणाम इन आश्रित कवियों को भुगतना पड़ता था, फिर भी जहां सच्चे वीर की मुक्त-कंठ से प्रशंसा करने में उद्यत रहते वहां कायरता एवं हीनता का चित्रण करने में भी वे नहीं चूकते। इन कवियों की रचना चाहे वीर राजपूत में देश और धर्म की रक्षा के लिए मर मिटने वाली ओजस्विनी शक्ति प्रदान करने तथा कर्त्तव्यों के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने के लिए हो अथवा कायर एवं मिथ्याभिमानी को लज्जित कर व्यंग तथा उपालम्भ के प्रभाव से उसकी रगों में सच्चा राजपूती जोश उत्पन्न करने के लिए हो, सदैव ही सद्भावना से उद्भूत होती। इतना ही नहीं, इस काल के कवियों की कविता में देश-प्रेम की सच्ची भावना स्पष्ट रूप से लक्षित होती है। अनेक प्रसिद्ध ऐतिहासिक घटनायें इसका प्रमाण हैं।

माधोजी सिंधिया ने राजपूतों का दमन करने की भावना से जोधपुर राज्य को अपने अधीन करने के लिए फ्रांसीसी डी. बोइने की अध्यक्षता में वि.सं. 1847 में अपनी एक सेना भेजी। जोधपुर के महाराजा विजयसिंह के पास भी अनेक वीर सरदार थे जिन पर उनको विश्वास ही नहीं, पूर्ण गर्व भी था। इस अवसर पर महाराजा ने अपने वीर सरदार महेशदास के प्रति जो कुछ भावना प्रकट की वह उसकी वीरता का अच्छा प्रमाण है।[1] परन्तु यही वीर जब कि राठौड़ों की सेना मराठों से मेड़ता के पास मुकाबला कर रही थी तब महाराजा को लेकर कुछ अन्य सरदारों के साथ लौट कर आ गए, तब कवि तो मौन कैसे रह सकता था। उसने युद्ध से लौट आने वाले वीर सरदारों को देश-रक्षा हित चेतावनी देने के लिए तीक्ष्ण व्यंगोक्ति सुना ही दी–

आप भलांई आविया, सुवस वसावौ देस।
जंबक ए क्यूं जीविया, “आसौ”, “किसनौ”, “महेस”।

यह व्यंगोक्ति महेशदास के हृदय पर तीर सी लगी। वह उलटे पैर रण-स्थल में लौट गया और वहीं राज्य-रक्षा हित बहादुरी के साथ लड़ते हुए अपने प्राणों की बलि दे दी। कवि उसकी अद्भुत वीरता की सराहना किए बिना नहीं रह सका।

आसांणौं अंजस करै, अंजसै मुरधर देस।
दल दिखणी रै ऊपरै, बणियौ बींद महेस।।

म्हैस कहै सुण मेड़ता, सांची साख भरेस।
कुण भिड़सी कुण भागसी, देखै जसी कहेस।।

पग जड़िया पाताळ सूं, अड़िया भुज अमरेस।
तन झड़िया तरवारियां, मुड़िया नहीं माहेस।।

केवल सराहना तक ही उनकी कविता सीमित नहीं रही, अवसर आने पर सत्यता प्रकट करने के लिए स्पष्टोक्ति का भी प्रयोग किया। महेशदास के मरने पर उसका परिवार रक्षा हेतु देशनोक पहुंच गया। इधर आसोप ठिकाना सूना देख गच्छीपुरे के ठाकुर जगरामसिंह ने महाराजा के साथ सांठ-गांठ कर उसका पट्टा अपने नाम करा लिया। कवि को ज्ञात होने पर उसने दरबार में ही यह कह सुनाया–

मरज्यौ मती महेस ज्यूं, राड़ बिचै पग रोप।
झगड़ा में भाग्यौ जगौ, उण पायी आसोप।।

इस पर जोधपुर के महाराजा ने महेशदास के पुत्र को बुला कर पुनः आसोप का ठिकाणा उसके नाम कर दिया।[2]

[1] दिखणी आयौ सज दळां, पृथी भरावण पेस। 
   कूंपा तो बिन कुण करै, म्हारी मदत महेस।।
   सुख महलां नह सोवणौ, भार न झल्ले सेस। 
   तो ऊभां दळपत तणां, मुरधर जाय महेस।।
[2] जोधपुर राज्य का इतिहास, भाग 2, गौरीशंकर हीराचंद ओझा, पृष्ठ 753 का फुट नोट।

ऐतिहासिक घटनाओं के आधार पर यह बात प्रसिद्ध है कि राजपूताने के वीर राजपूत अपनी मर्यादा की रक्षा के लिए शत्रुओं से लोहा लेने में पूर्ण प्रबल थे। परन्तु इसके साथ ही उनमें एक बहुत बड़ी कमजोरी भी थी, और वह थी उनकी पारस्परिक प्रतिद्वन्द्विता की दृढ़ भावना। इसी भावना ने उनकी अदम्य शक्ति का ह्रास कर दिया जिससे वे अत्यन्त बलशाली एवं वीर होते हुए भी अपनी स्वतंत्रता कायम रखने में सफल न हो सके। छोटा से छोटा शासक भी अपनी निजी स्वतंत्रता चाहता था। कोई भी राजा किसी अन्य राजा की अधीनता स्वीकार करना नहीं चाहता था। इसके साथ ही अपने बाहुबल के प्रभाव से अपने राज्य का विस्तार तथा अपनी वीरता की मान्यता भी चाहता था। इसी कारण इन राज्यों में भी परस्पर अनेक युद्ध हुए। जोधपुर और बीकानेर के राजा यद्यपि परस्पर भाई थे, फिर भी इन्होंने अनेक युद्ध किए। इसी प्रकार जयपुर जोधपुर व जयपुर बीकानेर के बीच भी युद्ध होते रहे। इस द्वेष की भावना के कारण कई बार वेराष्ट्रीय हितों को भी तिलांजली दे दिया करते थे, यद्यपि इसके अपवाद भी अनेक थे, तथापि कुछेक राजपूतों में इस पारस्परिक प्रतिद्वंद्विता की अति हो चुकी थी।

इस सम्पूर्ण राजनैतिक विवेचना के आधार पर यह मानना ही होगा कि मध्यकाल में राजस्थान विषम परिस्थितियों का अनुभव कर रहा था। ऐसी परिस्थितियों में अंकुरित, पोषित एवं संवर्धित होने के कारण इस काल का राजस्थानी साहित्य प्रधानतया वीररसात्मक ही रहा है। आगे यथास्थान इस काल के वीर साहित्य का संवत् अनुसार उल्लेख करेंगे।

जिस समय राजस्थान में सच्ची वीरता के दर्शन हो रहे थे और यहाँ के कविजन अपनी ओजस्विनी वाणी द्वारा वीरों में देश-प्रेम की भावना का उद्घोष कर अपनी लेखनी द्वारा उज्ज्वल चरित्रों का निर्माण कर रहे थे, उसी समय भारतीय जन-जीवन एक नवीन लहर का प्रभाव अनुभव कर रहा था। दक्षिण में प्रस्फुटित एवं विकसित होने वाली भक्ति-भावना जो बहुत पहिले से धीरे-धीरे उत्तरी भारत में आ रही थी, राजनैतिक परिवर्तनों एवं अनुकूल वातावरण के कारण व्यापक रूप से प्रसारित होने लगी। लगभग पन्द्रहवीं शताब्दी तक आते-आते उसका रूप काफी व्यापक हो चुका था। भक्ति की इस धारा ने उत्तरी भारत को, जो इस समय तक बाह्य आक्रमणों एवं अनेक युद्धों की विभीषिका से पूर्ण आतंकित हो चुका था, धर्म के क्षेत्र में भक्ति की ओर आकृष्ट किया। भारत में इस भक्ति-भावना के आविर्भाव के सम्बन्ध में डॉ. रामकुमार वर्मा ने लिखा है कि “यह एक ऐतिहासिक सत्य है कि भक्ति का जन-व्यापी प्रभाव दक्षिण के अलवार[1] गायकों से ही ईसा की छठवीं शताब्दी में आरम्भ हो चुका था।”[2] प्रारम्भ में इसका प्रभाव दक्षिण में रहा परन्तु इस अविरल स्रोत का प्रवाह सीमित कैसे रह सकता था। अतः धीरे- धीरे परिस्थिति अनुकूल परिवर्तनों के साथ विस्तृत क्षेत्र में व्यापक होता ही गया। प्रारम्भिक स्थिति में गीतों की लोकप्रियता के कारण भक्ति का रागात्मक रूप ही अधिक प्रिय रहा, परन्तु आठवीं शताब्दी में शंकराचार्य ने “अहं ब्रह्मास्मि” कह कर अद्वैतवाद का सिद्धान्त प्रतिपादित किया। इसके प्रभाव से वैष्णव भक्ति में कुछ काल के लिए अवरोध अवश्य आ गया परन्तु इसके बाद ही श्री रामानुजाचार्य, श्री माध्वाचार्य, श्री निम्बार्काचार्य तथा श्री वल्लभाचार्य ने अपने-अपने संशोधन के साथ क्रमानुसार विशिष्टाद्वैत, द्वैताद्वैत, द्वैत और शुद्धाद्वैत सिद्धान्तों का प्रतिपादन कर वैष्णवों के चार संप्रदायों की स्थापना की। रामानन्द ने रामानुजाचार्य के भक्ति सिद्धान्तों का उत्तर भारत में अधिकाधिक प्रचार किया। इस भक्ति धारा के उचित प्रभाव के फलस्वरूप ही विदेशी धर्मों के विरुद्ध भारतीय हिन्दू धर्म स्थिर रह सका।

स्वामी रामानन्द, भक्त नामदेव तथा संत ज्ञानेश्वर आदि के पर्यटन एवं धार्मिक प्रचारों से दक्षिण की भक्ति लहर लगभग पन्द्रहवीं शताब्दी तक उत्तरी भारत में व्यापक रूप से प्रवाहित हो चुकी थी। ऐसे समय में राजस्थान भी इसके प्रभाव से अछूता कैसे रह सकता था। दक्षिण का प्रारंभिक संत सम्प्रदाय जो तेरहवीं शताब्दी में महाराष्ट्र में विट्ठल सम्प्रदाय के रूप में रहा, वह धीरे-धीरे उत्तर भारत में आता हुआ पन्द्रहवीं शताब्दी में निगुर्ण सम्प्रदाय के रूप में प्रचारित हुआ। इस निर्गुण सम्प्रदाय ही का प्रभाव राजस्थानी संतों पर पड़ा। यह लहर यहाँ स्वामी रामानन्द की शिष्य परम्परा के साथ प्रविष्ट हुई। इसके पूर्व यहां भारत के अन्य क्षेत्रों की भांति नाथ अथवा सिद्ध सम्प्रदाय का ही प्राधान्य रहा। इस सम्प्रदाय के प्रवर्तक मत्स्येंद्रनाथ माने जाते हैं, जिनके शिष्य गोरखनाथ हुए हैं। गोरखनाथ के सम्बन्ध में आज भी राजस्थान में बहुत से चमत्कारपूर्ण किस्से-कहानियां प्रचलित हैं। राजस्थान में नाथ जोगी संप्रदाय का प्रभाव काफी समय तक बना रहा। मारवाड़ राज्य में तो महाराजा मानसिंह के समय में राजकीय कागज-पत्रों, आज्ञाओं आदि के शिरो भाग पर जालंधरनाथजी का नाम भी लिखा जाने लगा। इसके अलावा अनेक स्थानों पर नाथों के मठ स्थापित हो चुके थे।

नाथ जोगी संप्रदाय के अन्तर्गत संत कवियों ने “वांणियों” तथा “सब्दी” का निर्माण किया। इनमें से जिसने भी किसी पद का निर्माण किया, उस पद को उसने अपने गुरु के नाम से ही प्रचारित किया। अधिकतर पद नाथ संप्रदाय के चमत्कारिक सिद्धों के नाम से ही बनाये गए हैं अतः यह पता लगाना अत्यंत कठिन है कि उनमें से कितने पद वास्तव में उनके गुरुओं द्वारा निर्मित हैं और कितने शिष्यों द्वारा। इसी संदिग्धता एवं उलझन के कारण इन नाथ संतों के साहित्यिक कृत्यों का ठीक ऐतिहासिक स्थान निर्धारित करना अत्यन्त कठिन है। इस सम्बन्ध में डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी लिखते हैं–“गोरखनाथ के नाम पर जो पद मिले हैं वे कितने पुराने हैं, यह कहना कठिन है। इन पदों में से कई दादूदयाल के नाम पर, कई कबीर के नाम पर और कई नानकदेव के नाम पर पाये गए हैं। कुछ पद लोकोक्ति का रूप धारण कर गए हैं, कुछ ने जोगीड़ों का रूप लिया है और कुछ लोक में अनुभवसिद्ध ज्ञान के रूप में चल पड़े हैं। इन पदों में यद्यपि योगियों के लिए ही उपदेश हैं, अतएव उनमें भी उसी प्रकार की साधनामूलक बातें पाई जाती हैं जो इस प्रकार की रचनाओं का मुख्य प्रतिपादन है।[3]

[1] हिन्दी साहित्य कोश में "आलवार" जाति बताया गया है।
[2] हिन्दी साहित्य, द्वितीय खण्ड, धीरेन्द्र वर्मा तथा व्रजेश्वर वर्मा, पृ. 190.
[3] नाथ सम्प्रदाय, डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृष्ठ 182

इस प्रकार की संदिग्धताओं के कारण ही इन नाथ-जोगी सम्प्रदाय के अधिकतर संतों की रचनाओं का राजस्थानी के ऐतिहासिक काल-निर्धारण में उचित स्थान देना संभव नहीं है। नाथ साहित्य के उदाहरण के लिए “चरपट” नामक नाथ संत की रचना दी जा सकती है। इनका पूर्व का नाम श्री चरकानंद नाथ था। ये कहीं गोरखनाथ के और कहीं बालानाथ के शिष्य कहे गए हैं। इनकी कविताओं का एक उदाहरण डॉ. मोहनसिंह ने उद्धृत किया है, वह इस प्रकार है–

सुधु फटकि मनु गिआनि रता। चरपट प्रणिवै सिध मता।
बाहिरि उलटि भवन नहिं जाऊ, काहे कारनि कांननि का चीरा खाउ।
विभूति न लगाओ जिउतरि उतरि जाइ, खर जिउ धूड़ि लेटे मेरी बलाई।
सेली न बांधौ लेवौ ना म्रिगानी, ओढउं ना खिंथा जो होइ पुरानी।
पत्र न पूजौ उड़ा न उठावौ, कुते की निआई मांगने न जावौ।
बासी करि के भुगति न खाऔ, सिंधिआ देखि सिंगी न बजाऔ।
दुआरि दुआरे धूआ न पाऔ, भेखि का जोगी न कहावौ।
आतिमा का जोगी चरपट नाउ[1]

श्री रामकुमार वर्मा ने “चरपट” के नाम से कविता का उदाहरण जो प्रस्तुत किया है वह निम्न है–

इक लाल पटा इक सेत पटा, इक तिलक जनेऊ लमक लटा।
जब लहीं अलटी प्राण घटा, तब चरपट भूले पेट नटा।
जब आवैगी काल घटा, तब छोड़ि जाइगे लटा पटा।
सुणि सिखवंती सुणि पतवंती, इस जग महि कैसे रहणां।
अंखी देखन कंणी सुनण, मुख सों कछू न कहणां।
बकते आगे स्रोता होइ रहु, धौक आगे मस कीना।
गुरु आने चेला होइबौ, एहा बात परबीना।।
मन महि रहना भेद न कहना बोलिबौ अम्रत बानी।
अगला अगन होइबा औधू, आप होइबा पांनी।।[2]

मेरे अपने संग्रह में “चरपट” के नाम से एक “सब्दी” संगृहीत है, उसकी भाषा का उदाहरण इस प्रकार है–

घिस घिस गई नाक की डांडी, अहार की कोथली नरग की कूंडी।
मन का वासा अजब तमासा, चस चस का हारत गुंजा।
गंधबी गंधजार विजारा, चरपट चाला मांत जुहारी।।1

चांम की कोथली, चांम का सूथा, ताकी सरीत करी जग मूया।
देवैगे धूप मांनी मांन जाता, कोई गुरु मुख एक ही चेत्या।
“चरपट” कहै सुनौ हो अंदौ, कांमण संग न कीजै।।2

उपरोक्त तीन उदाहरणों से यह स्पष्ट है कि चरपट के नाम से जिन कविताओं का उल्लेख किया जाता है उनकी भाषा में कितना अंतर है। तब यह सहज ही अनुमान किया जा सकता है कि इन नाथ जोगी सम्प्रदाय के संतों के नाम जो “सब्दियां” मिलती हैं वे उनके नाम से बाद में उनके शिष्यों द्वारा लिखी गई हों। प्रामाणिकता के अभाव में उनका महत्त्व न्यून रह जाता है। अतः इस प्रकार के उदाहरणों की विवेचना इस निबन्ध में उपयोगी सिद्ध नहीं होगी।

नाथ सम्प्रदाय अपने काल का एक मुख्य सम्प्रदाय था और इसके नाथों तथा सिद्धोंकी हठ तथा योग- क्रियाओं का अपना विशेष महत्त्व था। परन्तु इनकी यह योग मार्ग की साधना इनके शिष्यों तक ही सीमित रह गई। धार्मिक दृष्टि से गोपनीय एवं कष्टसाध्य होने के कारण जन-साधारण को अपनी ओर आकृष्ट न कर सकी। यह साधना किसी भी प्रकार से लोक-जीवन की आद्यात्मिक निष्ठा तथा भक्ति-भावना से उत्प्रेरित करने में समर्थ न हो सकी। समय की गति के साथ इसका भी विकास होता रहा और कालान्तर में जो संत सम्प्रदाय हमारे समक्ष आया वह इसी का विकसित रूप था। यद्यपि संत सम्प्रदाय इसके विकास की एक स्वतंत्र कड़ी थी और योग का अभ्यास इसकी साधना का अंग बना, तथापि इस युग में उत्तर भारत में व्यापक रूप से प्रवाहित होने वाली भक्ति-धारा भी इस संप्रदाय की साधना का अंग बन गई।[3]

राजस्थान में भक्ति धारा के व्यापक प्रवाह का श्रेय संत सम्प्रदाय को ही है। उत्तर भारत में स्वामी रामानन्द द्वारा प्रतिपादित एवं प्रचारित धार्मिक सिद्धान्तों का प्रभाव यहां के संतों पर भी पड़ा और इसी के परिणामस्वरूप उनकी शिष्य परम्परा यहां आरम्भ हो गई। संतों ने अवश्य ही अपनी निर्गुण वाणी द्वारा जन-साधारण में भक्ति- धारा बहाई परन्तु इस क्षेत्र में यहां के सिद्ध पुरुषों का जो हाथ रहा वह भुलाया नहीं जा सकता। आलोच्य काल के पूर्व इन सिद्ध पुरुषों ने ही अपने आत्मबल के प्रभाव से राजस्थान के लोक जीवन में भक्ति-भावना एवं आध्यात्मिक निष्ठा की प्रथम किरण जागृत की। इन सिद्ध पुरुषों में यहां के पांच पीर के नाम से प्रसिद्ध पांच वीर पुरुष हो चुके हैं जिनके नाम–(1) पाबूजी राठौड़ (2) रामदेवजी तंवर (3) हड़बूजी सांखला (4) मेहाजी मांगलिया और गोगाजी चौहान। ये सिद्ध पुरुष नाथों की भांति योगमार्गी नहीं थे, अपितु दृढ़ हिन्दू वीर थे। सम्भवतः मुसलमानों के प्रभाव से इनके साथ पीर शब्द जुड़ गया है। इनकी प्रसिद्धि में यह दोहा प्रचलित है–

पाबू हड़भू रांमदे, मांगलिया मेहा।
पांचूं पीर पधारज्यौ, गोगा दे जेहा।।

इन वीरों ने जन-साधारण के कष्टों को समझा और उनसे छुटकारा दिलाने के लिए पूर्ण प्रयत्न किया। यही नहीं, उनकी जीवन-रक्षा एवं धर्म-रक्षा के लिए समय आने पर उन्होंने अपने प्राणों की बलि भी दे दी। इसीलिए समाज में इनके प्रति अटूट श्रद्धा जागृत हो चुकी थी। ऐसे ही सिद्ध पुरुषों में मारवाड़ के राठौड़ राव सलखाजी के पुत्र मल्लीनाथजी तथा उनकी पत्नी रूपांदे का भी नाम लिया जा सकता है। इसी श्रेणी में जाखड़ जाट वीर तेजा को भी नहीं भुलाया जा सकता। इनकी मानयता धीरे-धीरे राजस्थान के बाहर भी होने लगी। इनके नाम पर लोग “जम्मे” लगाने लगे। जनता में इनके प्रति श्रद्धा इतनी बढ़ गई कि स्थान-स्थान पर इनके “देवरे” बन गए। यही वह समय था जब कि स्वामी रामानन्द की भक्ति संबन्धी विचारधारा यहां पनप रही थी। स्वामी कृष्णदास पयहारी के राजस्थान में आने के पश्चात् काफी संत उनकी शिष्य परम्परा में आ गए और भक्ति-धारा को प्रबल बनाने लगे।

राजस्थान में संतों ने निर्गुण पक्ष को लेकर ही अपनी वाणियों की रचना की है। यद्यपि जन-साधारण में सगुणोपासना प्रचलित थी और लोग मन्दिरों आदि में देव-दर्शन और पूजा आदि करने में विश्वास रखते थे, तथापि भक्ति-सम्बन्धी जो भी रचनायें हुईं निर्गुणोपासना की ही हुईं। इस युग में केवल मीरां को छोड़ सगुण भक्ति सम्बन्धी किसी अन्य भक्त कवि की रचनायें प्राप्त नहीं होतीं। संत लोग मुख्यतः स्वानुभूति की अभिव्यक्ति एवं आत्म-ज्ञान की प्रेरणा हेतु वाणियों की रचना करते और उन्हें सत्संग में गाते। इन्होंने सदैव जीवन के जटिल प्रश्नों पर व्यावहारिक रूप से विचार किया है और वाणियों के सहारे अपनी भावाभिव्यक्ति द्वारा जन-जीवन में आत्मज्ञान का प्रतिबोध कराया है। संत लोग सत्संग-प्रेमी होने के कारण पर्यटन भी अधिक करते थे, इसी कारण उनकी रचनाओं में समीपवर्ती बोलियों तथा भाषाओं का प्रभाव पाया जाना स्वाभाविक ही है। इस युग के संतों की वाणियां ग्रंथों के रूप में उपलब्ध हैं। हम संवत्क्रम से यथास्थान इनका उल्लेख करेंगे।

संतों के अतिरिक्त इस काल के अन्य राजस्थानी कवियों ने भी भक्ति साहित्य की रचना कर साहित्य-वृद्धि में योगदान देकर अपनी भक्ति का परिचय दिया है। इन कवियों में प्रमुखतया चारण एवं जैन कवि ही हैं। अनेक साहित्यकार यह कह कर राजस्थानी भक्ति साहित्य की महत्ता कम कर देते हैं कि इस युग में वातावरण की अनुकूलता के अभाव में डिंगल काव्य-निर्माता भक्ति साहित्य का निर्माण नहीं कर सके। डॉ. जगदीशप्रसाद श्रीवास्तव का उनके शोध प्रबन्ध “डिंगल साहित्य”[4] में यह मत कि मध्य युग में राजनैतिक अव्यवस्था एवं संघर्षमय वातावरण में कवियों का भक्ति रस की कविता सुनाना बेवक्त की शहनाई होता, उचित प्रतीत नहीं होता। साहित्य राजाओं का न होकर जनसाधारण का होता है। तत्कालीन अनेक आश्रित कवियों की भक्ति सम्बन्धी रचनायें स्वतः इनके मत के विरोध में अपना प्रमाण प्रस्तुत करती हैं। इन कवियों ने डिंगल के वीर काव्यों की रचना के साथ-साथ ही भक्ति सम्बन्धी रचनायें की हैं। उदाहरण के लिए प्रसिद्ध कवि ईसरदार को ही लें। ये कई राजाओं के पास रहे और इन्होंने “हालां झालां रा कुंडळिया” नामक वीर ग्रंथ की रचना की। इसके अतिरिक्त इनके अनेक वीर गीत भी प्राप्त होते हैं। वीर रस की रचना के साथ इनके भक्ति रस के भी ग्रंथ उपलब्ध हैं जिनके नाम–1. हरिरस, 2. छोटा हरिरस, 3. बाल लीला, 4. गुण भागवत हंस, 5. गरुड़पुराण, 6. गुणआगम, 7. निंदास्तुति, 8. रसकैलास, 9. वैराट, 10. देवियांण आदि हैं। हरिरस की प्रसिद्धि में कवि केसोदास गाडण का कहा हुआ दोहा यहाँ देना पर्याप्त होगा।

जग प्राजळतौ जांण, अघ दावानळ ऊपरां।
रचियौ “रोहड़” रांण, समंद “हरी रस” सूरवत।।

[1] पंजाब विश्वविद्यालय पुस्तकालय की 374 संख्या की हस्तलिखित प्रति से उद्धृत।
[2] हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास, प्रथम खण्ड, पृष्ठ 119.
[3] हिन्दी साहित्य, द्वितीय खण्ड, धीरेन्द्र वर्मा, व्रजेश्वर वर्मा; संत काव्य, डॉ. रामकुमार वर्मा, पृ. 207.
[4] देखो--पृष्ठ 187

कवि जग्गा खिड़िया अपनी वीर रस की रचना “रतन महेशदासोत री वचनिका” के लिए प्रसिद्ध है ही, परन्तु इन्होंने शान्त रस की भी रचना की है, जिसके लगभग 140 छप्पय कवित्त हमें प्राप्त हुए हैं। उदाहरण के लिए उनका एक छप्पय कवित्त यहां प्रस्तुत है–

जिके जपै हरि जाप, जिके वैकुंठ सिधावै।
जिके जपै हरि जाप, उदर फिर कदे न आवै।।

जिके जपै हरि जाप, जियां मन सांसौ भग्गै।
जिके जपै हरि जाप, जियां जम लत्त न लग्गै।।

क्रमबंध पाप जावै कटे, उर परम्म धरतां अगा।
एतौ प्रताप हरि जाप रौ, जाप ज जनि भूलै जगा।।

प्रसिद्ध अल्लूजी कविया को ही लीजिये। ये भी चारण कवि थे जो इस काल में शांत रस की रचना के लिए प्रसिद्ध हो चुके हैं। इन्होंने रामावतार एवं कृष्णावतार सम्बन्धी रचनायें की हैं। इनकी भक्ति-भावना निम्न उदाहरण से स्पष्ट हो जाती है। इनके रचे हुए 160 भक्ति सम्बन्धी छप्पय कवित्त मिलते हैं।

।।कवित्त।।
जेथ नदी जळ बहळ, तेथ थळ विमळ उलट्टै।
तिमिर घोर अंधार, तेथ रिवकरण प्रकट्टै।।

राव करीजे रंक, रंक ले सिर छत्र धरीजै।
“अलू” तास विसवास आस कीजै सुमरीजै।।

चख लिए अंध पंगु चलण मुनि सिद्धायत वयण।
तो करत कहा न हुवै नारायण पंकज नयण।।

भक्ति रस की रचना के साथ-साथ इन्होंने भी वीर रस में कई गीत कहे हैं।[1] इनके अतिरिक्त भी अनेक चारण कवि हुए हैं जिन्होंने इस काल में शान्त रस की रचना कर भक्ति साहित्य की महिमा बढ़ाई है।[2] संवत् क्रम से जहां इस युग के कवियों का उल्लेख किया जायगा वहाँ अन्य कवियों तथा उनके ग्रंथों का भी उल्लेख करेंगे।

[1] गीत सूरजमल हाडा रौ--
   अळआंणे पगे अंगि उघाड़ै, विणि हथियारां वस्त्र विणि,
   जेसाहरौ दिअंबर जाणै, जातौ दीठौ घणे जणि
   वटुऔ तेग कटारी वीटी, खाटी रई उपरै खाद।
   मुड़तौ आखड़तौ सूरजमल, विण पैठौ छांडै खित्रवाट।।
   मछरीकै आये सूरिजमल्ल, भुजि उड़े न कियौ भाराथ।
   हाके न मिळियौ हाथुकै, ह लियौ डंड लगाड़े हाथ।।
[2] चौमुख 1 चौरा 2 चंड 3 जगत ईस्वर 4 गुन जानें।
   करमानंद 5 ओर कोल्ह 6 अलू 7 अक्षर परवानें।
   माधौ 8 मथुरा 9 मध्य साधु जीवानंद 10 सीबा 11 ।
   ऊदा 12 नारायनदास 13 नाम मांडन 14 तन ग्रीवा।
   चौरासी रूपक चतुर चवत बांनी जूजुवा।
   चरन सरन चारन भगत हरि गायक एता हुवा।
      ~~नाभादास

इस प्रकार हम देखते हैं कि इस मध्यकाल में कवियों की ओजस्विनी वाणी में वीर रस का स्रोत बहा है वहां संतों एवं भक्त कवियों द्वारा भक्ति रस की भी धारा प्रवाहित हुई है। इन दोनों धाराओं के साथ आदिकालीन श्रृंगारिक धारा भी नियमित रूप से बहती चली आई है। उसमें किसी प्रकार का विक्षेप नहीं आया। मध्ययुग में वीर, भक्ति और श्रृंगार की निरन्तर प्रवाहित होने वाली इस त्रिवेणी के प्रभाव से ही श्रेष्ठ एवं प्रचुर साहित्य उपलब्ध हुआ है।

आदिकाल की भांति मध्यकाल में भी साहित्य-रचना में जैन विद्वानों का प्रचुर मात्रा में सहयोग रहा है। श्री अगरचन्द नाहटा ने अपने एक लेख में लिखा है कि “राजस्थानी साहित्य का निर्माण सबसे अधिक चारणों ने किया है, यह माना जाता है। पर, वास्तव में जैन विद्वानों ने गद्य और पद्य में जितने बड़े साहित्य का निर्माण किया है उसकी तुलना में चारण कवियों की रचनायें परिमाण में आधी भी नहीं होंगीं। मेरे ख्याल से 10 लाख से भी अधिक श्लोक परिमाण वाला राजस्थानी साहित्य केवल जैन विद्वानों द्वारा रचित ही है। तीन-चार कवि तो ऐसे हो गये हैं जिनमें से एक-एक व्यक्ति ने लाख श्लोक से भी अधिक परिमाण की रचना की है।” वास्तव में राजस्थानी साहित्य बहुत अंशों में जैन विद्वानों का ऋणी है। इस काल की भी इनकी अनेक रचनायें उपलब्ध हैं। इन विद्वानों ने साहित्य-रचना के साथ-साथ पूर्व रचित साहित्य को सुरक्षित रखने की भी व्यवस्था की। अपनी तथा अन्य कवियों की रचनाओं की प्रतिलिपियां भी उन्होंने खूब कीं। उनके सद्प्रयत्नों के परिणामस्वरूप ही आज जैन भंडारों में राजस्थानी साहित्य के अनेक अमूल्य ग्रंथ उपलब्ध हैं। जैन विद्वानों ने धार्मिक रचनाओं के अतिरिक्त अन्य जीवनोपयोगी विषयों पर भी अपनी लेखनी चलाई है। उनके धार्मिक ग्रंथों का भी साहित्यिक दृष्टि से मूल्यांकन करना आवश्यक है। कोरे धार्मिक ग्रंथ कह कर उनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। जैन विद्वानों की प्रवृत्ति संकीर्ण कभी नहीं रही। अतः उनकी धार्मिक रचनाओं को साहित्य में विवेच्य योग्य न मानने की भावना उचित प्रतीत नहीं होती। इस काल की महत्त्वपूर्ण रचनाओं का उल्लेख संवत् क्रम में यथास्थान किया जायेगा।

कालक्रम से समस्त साहित्य की विवेचना के पूर्व इस युग में साहित्य की बहुलता के कारण पद्य एवंगद्य में जो विविध रूपता प्रकट हुई उसकी व्याख्या को स्थान देना कुछ सीमा तक उचित ही होगा। आदिकाल की विवेचना में जैसा कि हम बता आये हैं कि राजस्थानी साहित्य का प्रारम्भिक रूप श्रुतिनिष्ठ साहित्य के रूप में ही था। प्रारम्भिक काल में इसी का उपयोग अधिक था। दसवीं ग्यारहवीं शताब्दी में इसके साथ-साथ लिपिबद्ध साहित्य भी प्राप्त होने लगा। मध्यकाल में लिपिबद्ध साहित्य का विकास अधिकाधिक हुआ। लिपिनिष्ठ साहित्य की प्रचुरता एवं विविधता के कारण ही मध्यकाल राजस्थानी साहित्य का स्वर्ण युग कहलाता है। श्रुतिनिष्ठ साहित्य भी यथाविधि अपने क्षेत्र में चलता रहा। दोनों ही प्रकार के साहित्य के विभिन्न अंगों को, जो इस काल में प्रचलित हो चुके थे, सूची के रूप में यहां प्रस्तुत करते हैं–

(1) श्रुतिनिष्ठ साहित्य–

1. पंवाड़्या
2. पड़ें (फड़ैं)–यथा पाबूजी री पड़, बगड़ावतां री पड़ आदि।
3. कहानियां
4. वातें
5. लोक गीत
6. चरजा
7. भजन (हरजस)

(2) लिपिनिष्ठ या लिखित साहित्य–

1. गीत (फुटकर)[1]

(3) ऐतिहासिक काव्य–

(i) पद्य–

1. चरितनायकों के नाम पर–

(क) रास–रायमल रासौ, रतन रासौ, रांणा रासौ आदि।
(ख) प्रकास–राजप्रकास, सूरजप्रकास, भीमप्रकास आदि।
(ग) विलास–राजविलास, जगविलास, रतनविलास आदि।
(घ) रूपक–रघुनाथरूपक, राजरूपक, रतनरूपक, महाराज गजसिंहजी रौ रूपक आदि।
(ड़) वचनिका–अचळदास खीची री वचनिका,राठौड़ रतनसिंह महेसदासोत री वचनिका आदि।
(च) वेल (वेलि)–राजकुमार अनोपसिंहजी री वेल, राजा रायसिंहजी री वेल, रूपांदे री वेल आदि।

2. छंदों के आधार पर–

(क) नीसांणी–नीसांणी वीरमांण री, गोगैजी चहुवांण री नीसांणी, आंबेर रा महाराज प्रतापसिंघजी री नीसांणी आदि।
(ख) झूलणा–सोढ़ां रा गुण झूलणा, राजा गजसिंघ रा झूलणा, अमरसिंहजी रा झूलणा आदि।
(ग) झमाल–बीदावत करमसेण हिमतसिंघोत री झमाल, आदि।
(घ) गीत–सीधलां रा गीत, पंवारां रा गीत, जाड़ेचां रा गीत आदि।
(ड़) कुंडळिया–हालां झालां रा कुंडळिया, सगरांमदास रा कुंडळिया आदि।
(च) कवित्त (छप्पय)–महाराज अभैसिंहजी रा कवित्त,पंवार अखैराज रा कवित्त, राठौड़ रतनसी रा कवित्त, महाराज गजसिंहजी रा निरवांण रा कवित्त।
(छ) दूहा (सोरठा)–पाबूजी रा दूहा, राव अमरसिंहजी रा दूहा, लाखै फूलांणी रा दूहा आदि।

(ii) गद्य–

(क) ख्यात–सीसोदियां री ख्यात, राठौड़ां री ख्यात, कछवाहां री ख्यात, मुहणोत नैणसी री ख्यात आदि।
(ख) वात–रांणै उदैसिंह री वात, हाडै सूरजमल री वात, राव बीकैजी री वात, जैसलमेर री वात आदि।
(ग) विगत–गैहलोतां री चौबीस साखां री विगत, कछवाहां सेखावतां री विगत, जोधपुर-बीकानेर टीकायतां री विगत आदि आदि।
(घ) पीढ़ी–ईडर रा धणी राठौड़ां री पीढ़ियां, हमीरोत भाटियां री पीढ़ियां।
(ड़) वंसावळी–राठौड़ां री वंसावळी,राजपूतां री वंसावळी, जैसलमेर भाटी महारावळ री वंसावळी आदि।

(iii) प्रकीर्ण काव्य–

(क) देश-भक्ति, देशों का नैसर्गिक वर्णन।
(ख) अश्व-प्रशंसा।
(ग) उष्ट्र-प्रशंसा।
(घ) शस्त्र-प्रशंसा।
(ड़) श्रृंगार रस की प्रकीर्ण कवितायें
(च) सिलोका (ब्राह्मणीय)

(iv) अनुवाद-टीकाएँ, रूपान्तर आदि–

(क) धार्मिक ग्रंथों का–भागवत का अनुवाद, गीता का अनुवाद आदि।

(ख) अन्य ग्रन्थों का अनुवाद–नीति मंजरी आदि।

(v) शास्त्रीय साहित्य–

(क) धर्म शास्त्र

(ख) ज्योतिष शास्त्र

(ग) शकुन शास्त्र

(घ) शालिहोत्र

(ड़) वृष्टि विज्ञान

(च) तत्वज्ञान

(छ) नीति शास्त्र

(ज) आयुर्वेद शास्त्र

(झ) कोक सार

[1] "गीत" डिंगल साहित्य की विशिष्ट देन है, जिसका जोड़ अन्य भारतीय आर्य भाषाओं, हिन्दी, पंजाबी, गुजराती, सिंधी आदि में नहीं मिलता। गीत एक प्रकार की छोटी सी कविता है जिसमें प्रायः चार दोहले होते हैं। ये गीत गाने की चीज नहीं है। एक लय विशेष से, ऊंचे स्वर में इनका पाठ किया जाता है। ध्यान रखने की बात है कि पिंगल के पद-साहित्य और डिंगल के गीत-साहित्य में समानता नहीं है। गीतों में इतिहास की अलभ्य और अक्षय सामग्री भरी पड़ी है। ऐसा कोई भी वीर, जुझार या त्यागी पुरुष नहीं हुआ होगा जिस पर एक-आध गीत न बने हों। जिन पुरुषों और घटनाओं को इतिहास ने भुला दिया है, उनकी स्मृति को गीतों ने ही सुरक्षित रखा है।" 
   ~~राजस्थानी भाषा और साहित्य--डॉ. हीरालाल माहेश्वरी, पृष्ठ 72

राजस्थानी साहित्य के सम्बन्ध में उपरोक्त वर्गीकरण अपने में पूर्ण नहीं है, फिर भी इससे राजस्थानी साहित्य की एक दृष्टि में झलक तो अवश्य ही मिल जाती है। उपर्युक्त समस्त विवेचन के पश्चात् अब हम मध्यकालीन पद्य साहित्य का संवत्-क्रम से शताब्दी अनुसार वर्णन करेंगे।

मध्यकाल के आरम्भ में वीररसात्मक काव्यों में शुद्ध डिंगल का प्रयोग होने लगा था। इसके साथ-साथ भाषा का संगठन भी कुछ अधिक उच्च स्तर प्राप्त करता जा रहा था। किन्तु जैन साहित्य में उस समय भी प्राकृत एवं संस्कृत का प्रभाव कुछ-कुछ दृष्टिगोचर हो रहा था।

जयशेखर सूरि– सर्व प्रथम संवत् 1462 में जयशेखरसूरि कृत त्रिभुवनदीपकप्रबन्ध, नेमिनाथ फागु तथा अर्बुदाचलवीनती रचनायें प्राप्त होती हैं।

हीरानंद सूरि– संवत् 1485 में पींपलगच्छ के हीरानंद सूरि ने “वस्तुपाल तेजपाल” नामक ग्रन्थ की रचना की। इसी समय के उनके लिखे हुए “विद्याविलास पवाड़ा” के उदाहरण से उस समय की भाषा का ज्ञान हो सकता है–

तिणि पुरि निवसइं सेठि धनावह धम्मी नइ धनवंत।
पदम सिरी तस घरणी भणीइ सहि जिइं अति गुणवंत।।
तस घरि नंदन च्यारि निरूपम पहिलउ धुरि घनसार।
बीजउ बंधव बहु गुण बोलइ बुद्धिवंत गुण लार।।
त्रीजु मूरति वंत (गुण) सागर, सागर जेस गंभीर।
चउथउ बंधव सुणि धन सागर समर ससाहस धीर।।

उपरोक्त कविता में संस्कृत और प्राकृत के तत्सम और तद्भव शब्दों को लेने की प्रवृत्ति स्पष्टतः लक्षित होती है।

यह परिपाटी चारण साहित्य में, जो इस काल में प्रचुर मात्रा में प्राप्त है, नजर नहीं आती। उनके द्वारा सुसंगठित डिंगल भाषा के प्रयोग के कारण ही इस समय से काल-विभाजन किया गया है।

सिवदास गाडण– संवत् 1485 में ही चारण कवि सिवदास रचित वीर काव्य “अचळदास खीची री वचनिका” प्राप्त होती है। चारण कवियों की रचना में प्रथम ग्रन्थ होने तथा मध्यकाल का प्रथम वीररसात्मक ग्रन्थ होने के कारण इसका महत्त्व बहुत अधिक है। मालवा के बादशाहों की तवारिख में लिखा है कि सन् 1423 ई. (संवत् 1480) में हुशंग गोरी ने चढ़ाई कर के गागरौण को फतह किया था। डॉ. तैस्सितोरी ने इस ग्रन्थ की रचना को इस युद्ध की समकालीन रचना बतलाया है।[1] ग्रन्थ की भाषा सुगठित स्वतंत्र राजस्थानी का उदाहरण है।

सातलसोम हमीर कन्ह, जिम जौहर जालिय।
चढ़िय खेति चहवांण, आदि कुळवट्ट उजाळिय।।
मुगत चिहुर सिरि मंडि, वपि कंठि तुळसी वासी।
भोजाउति भुजबळहिं, करिहि करिमर कळासी।।
गढ़ि खंडि पड़ंति गागुरणि, दिढ़ राखे सुरितांण दळ।
संसारि नांव आतम सरिग, अचळि बेवि कीधा अचळ।।

बादर ढाढ़ी– इसी शताब्दी में ढाढ़ी जाति के कवियों का भी अच्छा सहयोग रहा। डॉ. रामकुमार वर्मा ने ढाढ़ियों की कविता को चारणों की कविता से भी पुराना माना है।[2] ढाढ़ियों की फुटकर कवितायें तो बहुत मिलती हैं परन्तु पूर्ण ग्रन्थ के रूप में 15 वीं शताब्दी का बादर ढाढ़ी द्वारा रचित “वीरमायण” नामक ग्रन्थ मिलता है। इसमें राव वीरमजी राठौड़ का शौर्य-वर्णन है। राजा वीरमजी का शासन काल संवत् 1435 का माना जाता है।[3] बादर ढाढ़ी राव वीरमजी के आश्रय में ही था। श्री ओझाजी के अनुसार वीरमदेव की मृत्यु संवत् 1440 में हुई थी।[4] इसके रचनाकाल में काफी मतभेद है। स्वयं श्री मेनारिया ने भी परस्पर विरोधी विचार प्रकट किए हैं। एक स्थान पर उन्होंने इसका रचना काल संवत् 1440 लिखा है[5] तथा दूसरे स्थान पर लिखते हैं–“परन्तु जैसा कि कुछ लोग मान बैठे हैं, यह वीरमजी की समकालीन रचना नहीं है। कोई अठारहवीं शताब्दी के मध्य में यह रची गई है।”[6] ग्रंथ का आधार ऐतिहासिक है जिसकी पुष्टि ऐतिहासिक ग्रंथों से हो जाती है। इसमें राव वीरम के द्वितीय पुत्र चूंडा के विवाह तथा दहेज में मंडोर-प्राप्ति का उल्लेख है।[7] ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार मंडोर पर चूंडा का अधिकार संवत् 1451 में हुआ था।[8] ग्रन्थ में राव वीरम के पुत्र गोगे का जोइयों के साथ किए गए युद्ध का वर्णन भी है।[9] श्री विश्वेश्वरनाथ रेऊ के अनुसार गोगा का जन्म संवत् 1435 तथा स्वर्गवास संवत् 1459-60 में हुआ था।[10] अतः ग्रन्थ की रचना संवत् 1460 के पश्चात् ही किसी समय हुई होगी। ग्रंथ में स्वयं कवि ने अपनी ओर से कहीं पर भी रचना काल नहीं लिखा है। यह ग्रंथ पन्द्रहवीं शताब्दी की रचना अवश्य है परन्तु यह श्रुतिनिष्ठ साहित्य के रूप में ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होता रहा, अतः भाषा में परिवर्तन होना स्वाभाविक ही है। प्रतिलिपियाँ जो भी प्राप्त हैं वे बहुत समय पश्चात् की हैं अतः उनकी भाषा के आधार पर इस रचना का काल निर्धारित नहीं किया जा सकता। डॉ. माहेश्वरी ने इसका रचना-काल संवत् 1500 के लगभग माना हैं।[11] कुछ लोगों ने भ्रमवश वीरमायण के रचयिता का नाम रामचंद्र लिख दिया है[12] जो ठीक नहीं है, क्योंकि स्वयं कवि ने ग्रंथ में अपना नाम बादर ढाढ़ी ही बताया है–

सामां वीरम सारका विण ऊभा कीला।
बादर ढाढ़ी बोलीयौ, नीसांणी गला।।[13]

इसकी प्राचीनता के सम्बन्ध में एक बात और उल्लेखनीय है कि इसी काल में लिखी जाने वाली राठौड़ों की ख्यातों में “वीरमायण” के अनेक दोहों तथा उक्तियों का प्रयोग हुआ है। जिन्होंने आगे चल कर कहावतों का रूप ले लिया[14] इन ख्यातों की रचना के सम्बन्ध में अनेक इतिहासकारों ने यह मान लिया है कि ख्यातों का लिखा जाना लगभग अकबर के शासन-काल में प्रारम्भ हो चुका था। पूर्वकाल से मौखिक रूप में हस्तांतरित होने के कारण ही यह प्रयोग सम्भव हो सका है।

ग्रंथ की भाषा ओज-गुण-सम्पन्न बोलचाल की राजस्थानी है–

दिल्ली सूं चढ़ीया दुजल, गोरी सुरतांणा।
बाज छतीसूं ई बाजतां, नांबत नीसांणा।
मांडळ सूं महमंद चढ़ै, खांमंद खुरसांणा।
सातूं लोपी सायरां, जळ पाजा जांणा।
इण विध महमंद आवियौ, कीधा घमसांणा।
हजरत बे भेळा हुआ, पूरब पिछमांणा।
घर बेहूँ मोटा बहत, छोटा रहमांणा।
खोज गमाड़ण खूनीयों, जोड़े जमरांणा।
रीस करै ज्यों रोळवे, बोले महरांणा।

[1] A descriptive catalouge of Bardic and Historical mss. Pt. I, Bikaner State, Fasc. I, Page 41.
[2] हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास, प्रथम-खण्ड, पृष्ठ 173
[3] 'It is an anonymous Dhadi composition of the 15th Century. It deals with the Chivalry of Rao Biramji Rathore, who reigned C.V.S. 1435 (A.D. 1378) The Rao was the patron of the poet.' A Descriptive Catalogue, Pt. 1, एशियाटिक सोसायटी, कलकत्ता, पृष्ठ 3.
[4] जोधपुर राज्य का इतिहास, भाग 1, "राव वीरम" शीर्षक के अंतर्गत।
[5] (क) राजस्थानी साहित्य की रूपरेखा--डॉ. मोतीलाल मेनारिया, प्रथम संस्करण, परिशिष्ट के अंतर्गत, पृष्ठ 221. 
   (ख) डिंगल में वीर-रस--डॉ. मोतीलाल मेनारिया, भूमिका, पृष्ठ 36.
[6] राजस्थानी भाषा और साहित्य--डॉ. मोतीलाल मेनारिया, पृष्ठ 170
[7] देखो "वीरमायण", नीसांणी 99.
[8] "मारवाड़ का इतिहास" श्री विश्वेश्वरनाथ रेऊ--प्रथम भाग, पृष्ठ 61 पर फुटनोट में दी गई टिप्पणी।
[9] देखो "वीरमायण", नीसांणी 101.
[10] "मारवाड़ का इतिहास" श्री विश्वेश्वर नाथ रेऊ--प्रथम भाग, पृष्ठ 56-57 पर फुटनोट में दी गई टिप्पणी।
[11] राजस्थानी भाषा और साहित्य--डॉ. हीरालाल माहेश्वरी, पृष्ठ 76.
[12] मारवाड़ का मूल इतिहास--ले. पं. श्री रामकरण आसोपा, पृष्ठ 87.
[13] देखो--"वीरमायण", नीसांणी 80.
[14] क. हमारे संग्रह में "राठौड़ों की ख्यात"। उ.-- तेरे तूंगा भांजिया माले सलखांणी।
   ख. मारवाड़ का संक्षिप्त इतिहास, पं. श्री रामकरण आसोपा, पृष्ठ 83.

चानण खिड़ियौ– चानण खिड़ियौ राव रणमल का समकालीन कवि था। संवत् 1495 का इनका गीत उपलब्ध है। कवि ने जिस भाषा का प्रयोग किया है उसके उदाहरण के लिए एक गीत यहाँ दिया जाता है–

अपूरब वात सांभळी अेही, रिम चूके म्रित दिन रयण।
सूतैं तैंहिज काढ़ी सुजड़ी, जागत काढ़ै घणा जण।।
चूक हुवे केइक चीतारै, वाहै केइ वहंतै वाढ़ि।
पोढ़िया रयण जेम प्रतमाळी, कद ही कोइ न सकियौ काढ़ि।।
अंत परजाई चूक अहाड़ा, अम हळि हुवै हुवौ ऊखेळ।
रिणमल जेथ कियौ रायांगुर, मेळ जूज अर जमदढ़ मेळ।
अे अखियात, सळखहर ओपम, अगै न सूझी सुर असुर।
कर सूतै मेलियौ कटारी, अणी सु काढ़ी प्रिसण-उर।

मध्यकाल के इस आरम्भिक समय में ऊपर वर्णित कवियों के अतिरिक्त अन्य कवियों की रचनायें भी प्राप्त हैं। स्थानाभाव के कारण केवल उनका नामोल्लेख ही कर पा रहे हैं।

(कवि भीम–सदयवत्सचरित, सं. 1466, गुणवन्त–वसन्त विलास, मांडण, सिद्धचक्र श्रीपाल रास, संवत् 1498, मेहाकवि–रणकपुर स्तवन, तीर्थमाला स्तवन, संवत् 1499, सोमसुन्दर सूरि–नेमिनाथ नवरस फाग, संवत् 1499, बारहठ दूदो, मेहौ बारहठ, आल्हौ बारहठ, धरमौ कवियौ, खिड़ियौ लूणकरण आदि)

पसाइत– सोलहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में लिखी हुई गाडण पसाइत की ये दोनों रचनायें ग्रंथ के रूप में उपलब्ध हैं। दोनों रचनायें अनूप संस्कृत लाइब्रेरी, बीकानेर की हस्तलिखित प्रति में प्राप्त है।[1] “राव रिणमल रौ रूपक” में मारवाड़ के राव रणमल की कीर्ति और राणा कुम्भा द्वारा उनकी मृत्यु का वर्णन है। राव रणमल के सम्बन्ध में इनकी अन्य फुटकर रचनायें भी प्राप्त हैं जिनमें रणमल द्वारा जैसलमेर के भाटियों से अपने पिता राव चूंडा की मृत्यु का बदला लेने का वर्णन है। “गुण जोधायण” में जोधाजी के राज्य-प्रसार तथा बहलोलखाँ के साथ युद्ध करने का वर्णन है। इन घटनाओं के आधार पर ही डॉ. माहेश्वरी ने पसाइत का रचनाकाल संवत् 1480 से 1531 माना है।[2] कवि पसाइत ने जिस भाषा का प्रयोग किया है वह गुण जोधायण के प्रस्तुत उदाहरण में देखिये–

वळौ प्रबत लंघीयौ चडे पाखरीये घोड़े,
जाए दीन्हा घाव, कोट चीत्रोड़ किमाड़े,
बोल ढोल बोलियौ, त्यार स्रमणो उत सुणीया,
कूंभनेर नारियां ग्रभ पेटां हूँ छणीया,
चीतोड़ तणे चूंडाहरा किमाड़े परजाळीये,
जोहार जाय “जोधै” कियौ, राव रिणमल पालीय।

इनकी फुटकर रचनाओं में (1) “कवित्त राव रिणमल चूंडै रै वैर में भाटियाँ नै मारिया तैं समै रा”, (2) “कवित्त राव रिणमल नागौर रै धणी पेरोज नै मारिया तैं समै रा” तथा (3) “कवित्त रांणै मोकल मुआं री खबर आयां रा” प्रसिद्ध है। इन फुटकर रचनाओं में भी राजस्थानी का स्वतंत्र रूप से प्रयोग हुआ है। राणा मोकल की मृत्यु का बदला लेने की रणमल की भावना इस उदाहरण में देखते ही बनती है–

जेय चडै आकास तांम आयास उतारूं,
जे पसै पाताळ काढ़ पायाळा मारूं,
जेथ जाय तेथ जाय खित खेलूं खत्र साचौ,
जऐ किम जीवतौ अति ओगारी चाचौ,
बावन वीर वीरमहर कोय जु जुध मंडे कया,
मालवै वीर मोकळ तणा रिणमल लई प्रतंग्या।।

[1] प्रति नं. 136.
[2] राजस्थानी साहित्य--डॉ. हीरालाल माहेश्वरी, पृष्ठ 88.

जयसागर– इसी प्रकार पन्द्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी के संधिकाल में महोपाध्याय जयसागर जैन कवि हो चुके हैं जिन्होंने राजस्थानी में अनेक रचनायें रच कर साहित्य की अभिवृद्धि की है। इनकी “जिनकुशलसूरि सप्ततिका” राजस्थानी की विशिष्ट रचना है। इसके अतिरिक्त इनके द्वारा रचित लगभग 30 ग्रंथ उपलब्ध हैं। ग्रंथों के आधार पर ही उनका रचना काल संवत् 1480 से 1515 माना जाता है। सर्वसाधारण में प्रिय “वीरप्रभु वीनती” का एक उदाहरण देखिए–

नयण नाभि सलूणिय रूयडी, तपइ भाल प्रभाजळ कूयड़ी।
सुघट होठ हियउं तिम मोकळउं, जिण तणउं अथवा सहुयइ भलउं।
तिसउ कंठ तिसा कर जांणिवा, तिसिया रख तिसा नख पल्लवा।
पग तिसाहु तिसि पुणि आंगुळी, सलहियइ प्रभु बिंब किसउंवळी।

देपाळ– इसी समय के प्रसिद्ध कवि देपाल भी हैं जो नरसी मेहता के समकालीन माने जाते हैं। इनके द्वारा रचित छोटी-मोटी 14 रचनायें प्राप्त हैं जिनका रचना काल सं. 1501 से 1534 है। इनकी “जंबू स्वामी” पंचभव वर्णन चौपई का एक उदाहरण देखिये–

घन घन जे गुरु लहइ सुसाध
आराधी भव टाळइ व्याध
वचन सुणी तस सेवा करइ
भव सायर ते दुत्तर तरइ।
मरण मइगळ जीव नर, जन्म कूपि निविडंति।
च्यारिक खाय भुयंगमंह, अज गिरि नर गहवंति।।

पद्मनाभ– उत्तरकालीन अपभ्रंश से विकसित होती हुई पुरानी पश्चिमी राजस्थानी डिंगल के मध्यकालीन ग्रंथों में पूर्ण स्वतंत्र राजस्थानी के रूप में प्रयुक्त होने लग गई थी। इसका प्रमाण हमें पन्द्रहवीं शताब्दी के अन्तिम काल में लिखी जाने वाली रचनाओं से ही मिल जाता है। इसकी भाषा का सुन्दर उदाहरण हमें इस शताब्दी की रचना “कान्हड़दे प्रबन्ध” में मिलता है। इस ग्रन्थ की रचना जालोर के चौहान अखैराज के आश्रित वीसनगरा नागर ब्राह्मण “पद्मनाभ” ने संवत् 1512 में की थी, जिसमें जालोर के अधिपति सोनगरा शाखा के चौहान कान्हड़दे के साथ अलाउद्दीन खिलजी के हुए युद्धों का वर्णन है। कहा जाता है कि जब अल्लाउद्दीन खिलजी सोमनाथ पर आक्रमण कर महादेव की मूर्ति उठा लाया तो कान्हड़दे ने उसे हटा कर धर्म की मर्यादा की रक्षा की और शिवलिंग को मकराने गांव में मन्दिर बनवा कर स्थापित किया। मुहणौत नैणसी की ख्यात में भी इस घटना का उल्लेख है।[1] कान्हड़दे का तेजस्वी रूप इस ग्रंथ में स्थल-स्थल पर झलकता है। इतिहास की दृष्टि से यह एक श्रेष्ठ रचना है। ऐतिहासिक घटनाओं का विवरण जो हमें इसमें मिलता है वह भी सही है।

साहित्यिक दृष्टि से अवलोकन करने पर प्रतीत होता है कि यह श्रेष्ठ रचना प्राचीन होते हुए भी प्रसादगुणयुक्त प्रवाहपूर्ण शैली में लिखी गई है। कवि की यह ओजपूर्ण एवं वीररसात्मक रचना है। सहायक के रूप में श्रृंगार और करुण रस भी यथा स्थान मिलते हैं। ग्रंथ में दो पात्रों–कान्हड़दे तथा अल्लाउद्दीन की पुत्री फिरोजा का विशिष्ट चित्रण हुआ है। भाषा की दृष्टि से भी इस काव्य का विशिष्ट महत्त्व है। डॉ. तैस्सितोरी ने इसे इस दृष्टि से समुचित महत्त्व दिया है। गुजराती विद्वान श्री के. बी. व्यास ने अपनी भूमिका में इसके महत्त्व को निम्न प्रकार प्रकट किया है[2]

‘The Kanhadade Prabandha’ is perhaps the most valuable treasure in old Gujrati or old Western Rajasthani as it is called by Dr. Tessitory. It is an epic of a glorious age and there is nothing to compare with it either in old or modern Gujrati. It can easily stand in comparison with the celebrated ‘Prithviraja Raso’ in old Hindi. There are various reasons why the Kanhadade Prabandha has attained this unique position. In the first place it is a text of supreme importance for a study of the development of the Gujrati language. Composed as early as V.S. 1512; it represents an important landmark in the evolution of the Gujrati language. It embodies a stage when Gujrati and Rajasthani were just beginning to evolve their distinctive characteristics from the common source the post Apabhransa. While the morphology and the general character of the language are unmistakably Gujrati, its phonology reveals several Rajasthani traits.’

डॉ. माताप्रसाद ने लिखा है[3] –“राजस्थानी ही नहीं हिन्दी के भी प्रारंभिक युग के ग्रंथों में कदाचित् ही कोई ग्रंथ ऐसा माना जा सकता है जिसकी रचना-तिथि इतनी निश्चित हो। रचना के महत्त्व के अनुसार ही ग्रन्थ का पाठ भी अपने मूल रूप में प्रायः सुरक्षित है और अपने युग की भाषा के अध्ययन के लिए एक दृढ़ आधार प्रस्तुत करता है। इसकी भाषा निम्न उदाहरण में देखिये–

उ.– रणि राउत वावरइ कटारी, लोह कटांकडि ऊडइ।
तुरक तणा पाखरीया तेजी, ते तरूआरे गूडइ।।
माल तणी परि बाथे आवइ, प्रांणइ विलगइ झूंटइ।
गुडदा पाटू दोट वजावइ, भिडइ प्रहारे मोटइ।।
ऊपरिथा पूंतार विछूटइ, भूतलि भाजइ पाउ।
वाढ़ी सूंढ़ि ढोलीइ ढांचा, धरणि वलइ नीहाउ।।
भाजइ कंध पडइ रिण माथां, धगड तणां धडधाइ।
माहो-मांहि मारेवा लागा, विगति किसी न कहाइ।।

ऋषिवर्द्धन सूरि– जैन कवि ऋषिवर्द्धन सूरि द्वारा चित्तौड़ में रचित नलदमयंती रास के सोलहवीं शताब्दी के आरम्भ का एक प्रसिद्ध राजस्थानी ग्रंथ है। इसका रचना काल सं. 1512 है। इसी समय की कवि की अन्य “जिनेन्द्रातिशय पंचाशिका” भी है। जिस सरल राजस्थानी का कवि ने अपने ग्रंथ में प्रयोग किया है उसे नलदवदंती के निम्न उदाहरण में देखा जा सकता है–

मणिमय कुंडळ राखड़ी सखि मांणिक मोतीहर।
तिलक निगोदर खीटुली सखि कांठलु मेखळा सार।
कंचण कंकण मूंदड़ी सखि चूड़ी चूनड़ी चारु।
तीयली नेत्र पटलडी सखि नेउर रुणझुणकार।

दामो[4] कवि दामो कृत “लखमसेन पदमावती चौपई” एक प्रेम-काव्य है जो अभी तक अप्रकाशित है।[5] ग्रंथ में स्वयं ग्रंथकार द्वारा वर्णित तिथि के अनुसार इसका रचना काल संवत् 1516 जेठ वदि नवमी है।

संवत् पनरइ सोळोत्तर तर, मझारि जेठ बदी नवमी बुधवार।

इस ग्रंथ में गढ़ सामौर के राजा हंसराय की पुत्री पदमावती तथा लखनौती के राजा लखमसेन के परस्पर प्रणय तथा विवाह का वर्णन विशुद्ध राजस्थानी में बड़े ही रोचक ढंग से किया गया है। कवि का भाव पक्ष प्रबल होने के कारण रचना में सजीवता आ गई है। इसके साथ ही प्रसादगुणयुक्त प्रवाहमयी सरल एवं सरस भाषा ने इसके महत्त्व को द्विगुणित कर दिया है। भाषा का प्रवाह निम्न उदाहरण में देखिये–

पर दुखइं ते दुखीयां, पर सुख हरख करंत।
पर कजइ सुदा सुहड़, ते विरळा नर हुंत।।
पर दुखइं सुख उपजइ, पर सुख दुख करंत।
पर कजइ कायर पुरस, घरि घरि वार फिरंत।।
सीह सीचाणौ सापुरिस, पडि पडि उठंति।
गय गडर कुच कापुरिस, पड़ै न वलि उठंति।।

[1] मुहणौत नैणसी की ख्यात--प्रथम भाग, सं.: पं. रामकरण आसोपा, पृ. 261.
[2] "कान्हड़दे प्रबन्ध"--सं. : प्रो. कांतिलाल बलदेवराम व्यास, राजस्थान पुरातत्त्व मंदिर से प्रकाशित, प्रस्तावना 1.
[3] आलोचना, भाग 14, पृष्ठ 64.
[4] डॉ. हीरालाल माहेश्वरी के शोध प्रबन्ध राजस्थानी साहित्य से साभार।
[5] ग्रंथ की संवत् 1669 की लिखी हुई हस्तलिखित प्रति श्री अभय जैन ग्रंथालय, बीकानेर में है।

कवि भांडउ– व्यास जाति के कवि भांडउ ने ग्रंथ “हमीरायण” की रचना वि.सं. 1538 में की। इस ग्रंथ का नाम “राय हमीर देव चौपाई” भी मिलता है। इस ग्रंथ में रणथंभोर के प्रसिद्ध वीर चौहान हम्मीरदेव की शरणागत रक्षा और उनके पराक्रम का सुन्दर वर्णन है। रचना पर जैन शैली का प्रभाव स्पष्ट लक्षित है। ग्रंथ की भाषा के उदाहरण हेतु कुछ अंश यहाँ उद्धृत हैं–

न परणाऊं डीकरी, न आपौ देऊं मीर।
हाथी गढ़ आपउ नहीं, इसउ कहई हमीर।।
तूं सरीखा सुरतांण सूं, करई विग्रह निसी-दीस।
हमीर देव कथउ इसउ, तब इव नांमे सीस।।

जांभोजी– जैसा कि हम पहिले कह आये हैं कि इस काल के आरम्भ के साथ ही राजस्थान में भक्ति-भावना की लहर प्रवाहित हो चुकी थी और उसके प्रभाव से संत लोग भक्ति-सम्बन्धी रचनायें भी करने लग गये थे। अतः इस प्रकार की रचना में जांभोजी द्वारा रचित “जम्भसार” ग्रंथ प्राप्त होता है। ये पंवार राजपूत थे और इनका जन्म संवत् 1508 में नागौर परगने के पीपासर गांव में हुआ था। इन्होंने विशनोई सम्प्रदाय की स्थापना की और संवत् 1542 में उपदेश देना आरम्भ किया। जम्भसार का रचना काल भी यही माना जाता है। जांभोजी ने “वांणियों” तथा “सबदों” द्वारा भिन्न-भिन्न विषयों पर जन-समुदाय को उपदेश दिये। उनके एक “सबद” का उदाहरण यहां देखिये–

कांयरें मुरखा तैं जनम गमायो, भूंय भारी ले भारूं।
जा दिन तेरे होम न जाप न तपः न किया।
गरू न चीन्हों पंथ न पायौ, अहल गई जमबारूं।
ताती बेळा ताव न जाग्यौ, ठाढ़ी बेळा ठारूं।
बिंबै वेळा विस्णु न जंप्यौ, तातैं बहुत भई कसवारूं।।
खरी न खाटी देह बिणाठी, थिर न पावणा पारूं।।
अह निस आव घटकती जावै, तेरा स्वास सभी कसवारूं।।
जा जन मंत्र विस्णु नहिं जंप्यौ, ते नर कुबरण काळू।।

सिद्ध जसनाथ– ये जांभोजी के ही समकालीन थे जिन्होंने अपने प्रभाव से जसनाथी सम्प्रदाय की स्थापना की। ये कातरियासर (बीकानेर) के हमीरजी जांणी जाट और उनकी पत्नी रूपांदे के पोष्य पुत्र थे। इनके विषय में यह प्रसिद्ध है कि हमीरजी को ये एक तालाब के पास पड़े मिले। संवत् 1551 आश्विन शुक्ला सप्तमी को इन्हें ज्ञान प्राप्ति हुई। इसके पश्चात् इन्होंने अपनी “वाणी” द्वारा ज्ञानोपदेश देना आरम्भ किया। इनकी “वाणी” के विषय प्राणी मात्र पर दया, पशु-हिंसा का विरोध, जीव ब्रह्म की एकता, संसार की नश्वरता आदि हैं। इन्होंने अपने जीवन में चमत्कारी प्रमाण देकर जन साधारण को जीव, दया तथा ज्ञान मार्ग के प्रति आकर्षित किया। इनके द्वारा चलाया हुआ जसनाथी सम्प्रदाय का सीधा सम्बन्ध नाथ सम्प्रदाय से है, परन्तु वैष्णवी भक्ति-धारा को भी इन्होंने अपनी साधना का अंग माना है। जसनाथजी ने अपनी “वांणी” में जन-साधारण में प्रचलित बोलचाल की राजस्थानी का ही प्रयोग किया है, जो निम्न उदाहरण में देखा जा सकता है।

कांईं रै पिरांणी खोज नै खोजै, खाख हुवै भुस खेहा।
काची काया गळ गळ जासी कूं कूं बरणी देहा।
हाडां ऊपर पून ढुळैली, घणहर बरसै मेहा।
माटी में माटी मिळ जासी, भसम उडै हुय खेहा।
हुय भूतळा खाख उड़ावै, करणी रा फळ ऐहा।
घड़ी घड़ी बाइन्दा बाजैं, रच्या न रहसी छेहा।
गावां गाडर सै’रां सूअर, खाड खिणै हुय सेहा।
कियै किरत नै जोय पिरांणी, दोस न दीज्यौ देवा।

धर्मसमुद्र गणि– जैन कवियों की परम्परा में सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में खरतरगच्छीय धर्मसमुद्र गणि का नाम भी प्रसिद्ध है। इनकी रचनाओं के अनुसार इनका रचना काल संवत् 1567 से 1590 है। इनके ग्रंथों में “सुमित्रकुमार रास” “कुलध्वजकुमार रास”, “रात्रिभोजन रास” और “शकुन्तला रास” आदि प्रसिद्ध हैं। “शकुन्तला रास” छोटी रचना है परन्तु राजस्थानी में शकुन्तला पर प्रथम पद्य-बद्ध रचना[1] होने के कारण इसका अपना महत्त्व है। विषय पौराणिक होते हुए भी जैन कवि की रचना होने के कारण यह जैन धर्म से प्रभावित है। कवि की भाषा के उदाहरण हेतु “शकुंतला रास” का पद यहां प्रस्तुत किया जाता है।

राय अन्याय तणउ रखवाल
पाल पृथ्वी तणउ सहू कहइ ए।
ए निरधार ऊपरि हथियार
भार सोभा केही लह इए।

गणपति– कायस्थ नरसा के पुत्र कवि गणपति ने माधवानल कामकन्दला प्रबन्ध की रचना संवत् 1574 में की।[2] राजस्थान में माधवानल कामकन्दला की प्रेम-कथा बहुत प्रचलित है। इसी प्रणय-कथा के आधार पर यह श्रृंगारिक रचना हुई है। महा-काव्य की शैली में लगभग 2500 दोहों (दोग्धक) में यह कथा कही गई है। इसी आधार पर डॉ. रामकुमार वर्मा ने इसी ग्रंथ का नाम “माधवानल प्रबन्ध दोग्धक” दिया है।[3] इस रचना में विप्रलंभ तथा संयोग दोनों ही प्रकार के श्रृंगार का पूर्ण परिपाक हुआ है। इसके अतिरिक्त बारहमासा वर्णन विशेष आकर्षित करने वाले विषय हैं। कवि ने राजस्थानी और गुजराती घरों में प्रत्येक ऋतु में जो-जो सुख-सामग्रियाँ उपलब्ध होती हैं उनका अच्छा चित्रण किया है। ग्रंथ की भाषा भी सरल एवं प्रसादगुणयुक्त है। उदाहरण के लिए फाल्गुन मास का वर्णन देखिये–

फागुण-केरां फणगरां, फिरि फिरि गाई फाग।
चंग वजावइ चंग परि, आलवइ पंचम राग।।
केलि कुसुंभा केरड़ां, केसर सुर-तरु सोय।
माधव कीजइ छांटणां, अमर आश्चर्यइं जोइ।।
पीली कीधी पाघड़ी, झूलडीए रंग रोळ।
अन्यौ अन्यिं छांटणा, चटकु लागु चोळ।।

गोरा– कवि गोरा बीकानेर के राव जैतसी के समकालीन थे। इनके लिखे कुछ कवित्त प्रसिद्ध हैं। “राव लूणकरण रा कवित्त” में राव लूणकरण के युद्ध और उनकी मृत्यु का ओजपूर्ण वर्णन है। यह युद्ध संवत् 1583 में नारनौल के समीप मुसलमानों के साथ हुआ था। इसी प्रकार “राव जैतसी रा कवित्त” में जैतसी की हुमायूं के भाई कामरान पर विजय का वर्णन है। यह युद्ध सं. 1591 में हुआ था। इन कवित्तों की रचना कवि ने उसी समय की थी। भाषा का स्वरूप इस उदाहरण में देखिये–

अहि मिसि फनु फुंकरइ पवन मिसि सत्रु संघारइ
सिंह जेम उट्ठवै हाकि हनुमत जिम मारइ
वयरी सउं बळ ग्रहइ गहवि गढ़ कोट उपाडइ
जे अन्याव अंगवै तिनिहि सपतं ग्रहि तडइं
कमज राइ लूंण क्रंन्नत न महि मंडालि जसु संभळ्यौ।
जयतसी राव “गोरउ” भणंइ मुगळ तणउं दळ निर्द्दळ्यौ।

बीठू सूजो– संवत् 1591 से 1598 के बीच बीठू शाखा के सूजा नामक चारण ने “राउ जैतसी रौ छंद” नामक एक ग्रंथ की रचना की थी। इस ग्रंथ में बीकानेर नरेश राव जैतसी का बाबर के द्वितीय पुत्र कामरान के साथ हुए युद्ध का सुन्दर वर्णन है। प्रारम्भ में जैतसी की वंशावली देते हुए कवि ने इसके पूर्वजों की प्रशंसा भी की है। ऐतिहासिक दृष्टि से ग्रंथ का बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है। उस समय का इतिहास अधिकतर मुसलमानों ने लिखा है और जैतसी एवं कामरान के बीच होने वाले युद्ध के विषय में वे मौन साध गये हैं। संभव है कामरान की पराजय के कारण ही उन्होंने ऐसा किया हो। सूजाजी ने इस युद्ध का विस्तारपूर्वक वर्णन कर राजस्थान ही नहीं अपितु भारत के इतिहास की कड़ी को कायम रक्खा है। डॉ. तैस्सितोरी ने इस सम्बन्ध में लिखा है[4]

‘The fact that the Mohammadan historians do not even mention this unfortunate adventure of the son of babar, only enhances the value of the poem, which may thus claim the credit of filling a small gap in the history of India.’

[1] राजस्थानी भाषा और साहित्य--डॉ. हीरालाल माहेश्वरी, पृष्ठ 253
[2] गायकवाड़ ओरियन्टल सिरीज, Vol. XCIII , संपादक--मजूमदार।
[3] हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास--डॉ. रामकुमार वर्मा, पृष्ठ 179.
[4] छंद राउ जइतसी रउ, वीठू सूजइ रउ कहियउ--सं. डॉ. तैस्सितोरी, Introduction, Page 1.

इसका परिणाम यह हुआ है कि रचना के मूल कथानक में युद्ध के वातावरण का प्राधान्य हो गया है। चारणों की जिस परम्परा का पहले उल्लेख किया गया है उसी परम्परा के अन्तर्गत यह ग्रंथ रचा गया है। भाषा के उदाहरण से यह बात पूर्ण रूप से स्पष्ट हो जायगी–

राठउड़ां पाखइ अउर राइ, लोक किय मूगुले पाइ लाइ।
छात पति हेक अम्मली छत्त, गिर मेर प्रमाणइ तास गत्त।
खुरसांणी खाफर खेड़ खत्ति, पारंभ कियउ उतराध पत्ति।
लाहउरि सेन सम्मिळइ लक्ख, पाखरिजइ तेजी सूध पक्ख।
सम्मिळइ साहि आलम समांन, खिड़ि संतरि बहत्तरी मिळइ खांन।
काळवा कुही करड़ा कियाह, हांसला हरे वीनइ हलाह।
रोझड़ा महूड़ा पीत रंग, तोरकी केवि ताजौ तुरंग।
डूंगरी मसक्की वेसि दीय, अइराक ततारी आरबीय।
खुरसांणी मकुरांणी खहंग, पतिसाह तणा छूटइ पवंग।

इस उदाहरण से मालूम होता है कि दीर्घकाल से मुसलमानों के साथ सम्पर्क होने के कारण उनकी बोली तथा भाषा का प्रभाव राजस्थानी पर पड़ा। इसी कारण अरबी फारसी तक के तद्भव शब्दों का प्रयोग राजस्थानी में खुले रूप से होने लगा। देशी शब्दों का विस्तृत प्रयोग इसमें बराबर होता रहा है जो वीर-रस की कविताओं में प्रायः अनिवार्य रूप से पाये जाते रहे हैं। इसके साथ-साथ धीरे-धीरे ध्वन्यात्मक तथा वर्णनात्मक विशेषताओं का भी प्रवेश इसमें होता गया। अनुप्रास एवं उपमा की ओर भी कवियों का ध्यान आकर्षित हुआ।

मीरां बाई– इसी शताब्दी के अन्तिम चरण में वैष्णव भक्ति धारा से प्रभावित कृष्ण-भक्ति में लगी हुई मीरां बाई ने अपने हृदय के भावों की अभिव्यक्ति के लिए जिन पदों को गाया है वे ही इस साहित्य की अमूल्य निधि बन गये हैं। भक्ति रस के अनेकानेक पदों की रचना के कारण ही राजस्थानी साहित्य के विकास की कहानी में मीरां बाई का प्रमुख स्थान है। मीरां बाई का जन्म संवत् 1555 के लगभग जोधपुर राज्य में मेड़ता परगने के कुड़की ग्राम में मेड़ते के राठौड़ राव दूदाजी के चतुर्थ पुत्र रत्नसिंह के यहां हुआ था।[1] इनकी माता का बाल्यावस्था में देहान्त होने के कारण ये अपने दादा राव दूदाजी के पास ही रहती थीं। उन्नीस वर्ष की अवस्था में इनका विवाह मेवाड़ के महाराणा संग्रामसिंह (सं. 1565-84) के ज्येष्ठ पुत्र भोजराज के साथ हुआ था। दुर्भाग्यवश विवाह के तीन वर्ष बाद ही मीरां बाई विधवा हो गईं। ऐसी अवस्था में भी उनके हृदय पर एक सच्ची राजपूत रमणी के साहस एवं निष्ठा की गहरी छाप प्रकट हो रही थी। बाल्यकाल से ही कृष्ण के प्रति पूर्ण अनुरक्त होने के कारण इस समय उनकी निष्ठा और भी अधिक दृढ़ हो गई। पतिदेव का वियोग होते ही अपने सारे लौकिक सम्बन्धों के बन्धन से मुक्त होकर वे अपने इष्टदेव की आराधना में लवलीन हो गईं। थोड़े ही समय बाद पिता एवं श्वसुर की मृत्यु के कारण विरक्ति की भावना और तीव्र हुई और वे लोक-लज्जा का परित्याग कर साधु-संतों के सत्संग में आने लगीं। भगवद्दर्शन हेतु मन्दिरों में पहुंचती और वहाँ प्रेमावेश में आकर कृष्ण की मूर्ति के समक्ष नाचने तथा गाने लगतीं।

मीरां बाई की भक्ति का आदर्श ऊंचा था। उनके “परमभाव” का निर्वाह किसी साधारण भक्त के वश की बात नहीं। जो कुछ भी उन्होंने कहा, वह उनकी आंतरिक अनुभूति की तीव्रता के कारण रागमय होकर गीत के रूप में ही प्रकट हुआ। समय-समय पर दी जाने वाली यातनाओं के कारण उपस्थित होने वाली बाधाओं एवं कठिनाइयों ने उन्हें निरुत्साही करने के बजाय और भी अधिक शक्ति प्रदान की। मीरां बाई को उनके समय की राजनैतिक तथा धार्मिक स्थिति ने अपने मार्ग पर अग्रसर होने के लिए पूर्ण साथ दिया। एक तरफ जोगी और नाथ सम्प्रदाय अपनी अलख को लोकजीवन में मिश्रित कर रहा था तो दूसरी ओर कबीर की निर्गुण वाणी राजस्थानी क्षेत्र में प्रवेश कर चुकी थी। इस सब के साथ-साथ सगुण भक्ति की धारा व्यापक रूप से प्रवाहित हो रही थी। ऐसे ही समय में यहाँ ईसरदास, जांभोजी, सिद्ध जसनाथ, केसोदास गाडण आदि महात्माओं ने सगुण-निर्गुण की बहती हुई धाराओं में अपना महान् योग दिया। मीरां का प्रादुर्भाव भी इसी वातावरण में हुआ था। युद्ध की रण-भेरी के बीच उन्होंने निर्गुण वाणी को सुना और जोगियों को अलख जगाते देखा और दूसरी ओर कृष्ण के रूप-सागर की असीम छबि को निहार कर भाव-विभोर हो गईं। उन्होंने दोनों मार्गों का अनुकरण किया और अनुभूति को शान्त-रस में प्रवाहित किया। उन्होंने स्वानुभूति की अभिव्यक्ति के लिए अनेकानेक पद विभिन्न राग-रागनियों में गाये।

मीरां बाई के पदों की संख्या कई हजार बताई जाती है, किन्तु उनके सभी पद आज उपलब्ध नहीं हैं. हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग ने “मीरां बाई की पदावली” के नाम से लगभग 200 पदों का संग्रह प्रकाशित कराया था। जयपुर के स्व. पुरोहित श्री हरिनारायणजी ने लगभग एक हजार पदों का संग्रह किया था। उन पदों को अब राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान प्रकाशित करवा रहा है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि मीरां बाई के पदों की भाषा एक ही प्रकार की नहीं है। बहुत से ऐसे पद हैं जो ठेठ राजस्थानी कहे जा सकते हैं किन्तु कुछ पर गुजराती एवं ब्रज-भाषा का भी पूर्ण प्रभाव है। कहीं-कहीं पंजाबी, खड़ी बोली एवं पूरबी तक का न्यूनाधिक सम्मिश्रण है। मीरां बाई के बहुत से पदों के विषय में यह कहा जा सकना अत्यन्त कठिन है कि जिस रूप में वे पाये जाते हैं, ठीक उसी रूप में रचे भी गये होंगे। इन्होंने मेड़ता, मेवाड़, द्वारिका, वृन्दावन आदि अनेक स्थानों पर निवास किया था, अतः उन स्थानों की बोलियां तथा भाषाओं का प्रभाव इनके पदों पर पड़ना स्वाभाविक था। इसके अतिरिक्त पदों की भाषा सीधी-सादी, सरल एवं जनसाधारण की चलती भाषा होने के कारण सर्वसाधारण ने उन्हें अपना लिया। लोकप्रिय एवं गेय होने के कारण ही वे अधिकाधिक प्रचलित होते गये और स्थान तथा समयानुसार उन पर भिन्न-भिन्न भाषाओं का प्रभाव स्वभावतः पड़ता गया।

मीरां के पदों में जो रस है, प्रेमानुभूति की जो करुणामयी कसक है वह किसी अन्य भक्त कवि में नहीं आ पाई है। गहरे भावों की उत्तम अभिव्यंजना के कारण ही इनकी कविता जन-जन के गले का हार बन सकी है। उदाहरणस्वरूप इनका एक प्रसिद्ध पद यहाँ उद्धृत करते हैं।

स्यांम मिळण रौ घणौ उमावौ, नित उठ जोऊं बाटड़ियाँ।
दरस बिना मोहि कछु न सुहावै, जक न पड़त है अँखड़ियाँ।
तळफत-तळफत बहु दिन बीता, पड़ी बिरह की पासड़ियाँ।
अब तौ बेगि दया करि साहिब, मैं तौ तुमरी दासड़ियाँ।
नैण दुखी दरसण कूं तरसै, नाभिन बैठे सांसड़ियाँ।
राति दिवस यह आरति मेरे, कब हरि राखे पासड़ियाँ।
लागी लगनि छूटण की नाहीं, अब क्यूं कीजै आंटड़ियाँ।
मीराँ के प्रभु कब रे मिलोगे, पूरौ मन की आसड़ियाँ।

[1] मीरां की जन्मतिथि के सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद है पर हमें उपरोक्त संवत् कई कारणों से उचित प्रतीत होता है। स्थानाभाव के कारण उन सभी मतभेदों पर हम अपना मंतव्य यहां प्रकट नहीं कर रहे हैं। --सं.

सोलहवीं शताब्दी के कुछ और भी कवि हैं जिन्होंने फुटकर गीतों, दोहों तथा अन्य रचनाओं द्वारा साहित्य में अपना योगदान दिया है। कुछ प्रसिद्ध कवियों के नाम उनके रचनाकाल के साथ दिये जा रहे हैं–

बीठू सूरो सं. 1515-1525, मुनि मतिशेखर सं. 1514-37। लालूजी महड़ू सं. 1561-83, सहजसमुद्रर सं. 1570-1600। कवि जमणाजी सं. 1580-90, विनयसुन्दर सं. 1583-1614, राजशील सं. 1563-1594, हरिराम केसरिया (रचनाकाल अनिश्चित) आदि आदि।

राजस्थानी साहित्य के ऐतिहासिक कालक्रम में सत्रहवीं शताब्दी का विशिष्ट महत्त्व है। यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं कि समस्त राजस्थानी साहित्य में से सत्रहवीं शताब्दी का साहित्य पृथक् कर दिया जाय तो पीछे के साहित्य का महत्त्व साधारण रह जाता है। इस शताब्दी में प्रचुर मात्रा में ही रचना नहीं हुई, अपितु विशिष्ट एवं विषद ग्रंथों का निर्माण भी इसी शताब्दी में हुआ। साहित्य के सभी अंगों से परिपूर्ण इस शताब्दी की उत्कृष्ट साहित्यिक रचनाओं ने ही इस काल को राजस्थानी साहित्य का स्वर्णयुग कहलाने का अवसर प्रदान किया है। इस शताब्दी के प्रमुख कवियों की संवत्क्रम से हम यहाँ चर्चा कर रहे हैं।

आसौ बारहठ– कवि आसाजी बारहठ जोधपुर राज्य के भाद्रेस गाँव के रहने वाले थे। इनके पिता का नाम गीधा था। ये राव मालदेव के कृपा-पात्र होने के कारण इन्हीं के पास रहते थे। इनके विषय में यह बात बहुत प्रसिद्ध है कि जब मालदेवजी ने अपनी रूठी रानी भटियाणी उमादे को मनाने के लिए इनके भतीजे ईसरदास को अजमेर भेजा था तब आसाजी भी उनके साथ गये। ईसरदास अनेक कठिनाइयों के बाद रानी को मना कर ला रहे थे कि मार्ग में कोसाना गाँव के पास (जो जोधपुर से लगभग 30 मील ही दूर रह जाता है) आसाजी ने रानी को यह दोहा कह सुनाया–

मांण रखै तौ पीव तज, पीव रखै तज मांण।
दो-दो गयंद न बंध ही, हेकै खंभू ठांण।।

इसका भावार्थ समझ कर रानी वहीं से जैसलमेर लौट गई और मालदेव के जीवनपर्यन्त जोधपुर नहीं आई। आसाजी भी कुछ समय पश्चात् जैसलमेर चले गये और वहाँ से चल कर कोटड़ा के सरदार बाघा के पास रहने लगे। यह भी कहा जाता है कि जैसलमेर के रावल ने भारमली नामक दासी को, जो बाघा के पास रहती थी, अपने यहाँ लाने के लिए कोटड़ा भेजा था। कोटड़ा में बाघा और भारमली के प्रेमपूर्ण व्यवहार से प्रसन्न होकर वे वहीं रहने लग गये। एक बार आमोद-प्रमोद के समय इनके मुंह से यह दोहा निकल गया–

जहां तरवर तहां मोरिया, जहां सायर तहां हंस।
जहां “बाघा” तहां भारमली, जहां दारू तहां मंस।

इस पर बाघा ने आसाजी को भारमली कभी नहीं मांगने के लिए वचन-वद्ध कर दिया। यहाँ रहते हुए बाघा के प्रति इनका प्रेम प्रगाढ़ होता गया। उसकी मृत्यु पर इन्होंने बड़े मार्मिक दोहे कहे हैं। ये दोहे आज भी हृदय को छुए बिना नहीं रहते–

बाघा हाले बेग, दुःख साले “दूदा” हरा,
आठूं पहर उदेग, जातौ देगौ जैतवत।
हाठां पड़ी हड़ताळ, हमें मद सूंगा हुआ,
कूके घणा कलाळ, बिकरौ भागौ बाघजी।

अपने जीवन के शेष क्षणों में वे बाघा को कभी भूल नहीं पाये। पिछले समय में ये अमरकोट के तत्कालीन राणा के पास भी रहे। उन्होंने बाघा को भुलाने के लिए बहुत प्रयत्न किए परन्तु विफल रहे। राणा ने एक बार आठ पहर तक बाघा का नाम न लेने के लिए आसाजी से कहा और भांति-भांति के आमोद-प्रमोद में मग्न रखा परन्तु भोर होने के पूर्व ही जब मुर्गे ने बांग दी तो अनायास ही इनके मुख से निकल पड़ा–

कूकड़ क्यूं कुरळावियौ, ढळती मांझल जोग।
कै थनै मिनड़ी झांपियौ, कै वाघा तणौ विजोग।।

सुबह होते-होते राणाजी आसाजी को तालाब पर स्नान के लिए ले गये। नहाने के बाद तालाब से बाहर निकलने पर कवि भूल से राणाजी के कपड़े पहिनने लगे तो राणा ने कहा ये तो मेरे कपड़े हैं। इस पर उन्हें पुनः बाघा की स्मृति हो आई और उन्होंने यह दोहा राणा को कह सुनाया–

की कह की कह की कहूं, की कह करूं बखांण।
थारौ म्हारौ न कियौ, अे बाघा अहनांण।।

इन्होंने फुटकर रचनाओं के साथ कुछ ग्रंथों की भी रचना की है जिनमें प्राप्त ग्रंथों में “राउ चन्द्रसेण रा रूपक”, “रावळ माला सलखावत रौ गुण”, “गुण निरंजन प्रांण” प्रसिद्ध हैं। फुटकर रचनाओं में “बाघजी रा दूहा”, “उमादे भटियांणी रा कवित्त” आदि प्रचलित हैं। इनकी भाषा का उदाहरण उमादे के सती होने पर कहे हुए इस कवित्त में देखा जा सकता है–

भंवर ब्रूह परजाळ जंघा रंभातर।
कनक पयोधर कुम्भ, राख कीया चढ़ि जमहर।
चंपकळी निरमळी, भखै झाळा दावानळ।
बांहां नाळ मुणाळ, कंठ होमे सानूजळ।
बिधु बदन केस कोमळ तवां, दहवे जेम सहस्स फण।
बाळिया सती “ऊमा” बिनै, अधर बिंब दाड़म दसण।।

कुशललाभ– ये खरतरगच्छीय वाचक अभयधर्म के शिष्य थे। इन्होंने अपनी समस्त रचनायें राजस्थानी भाषा में ही की हैं। अपने समय के श्रेष्ठ कवियों में इनकी गणना थी। इनकी प्रौढ़ कृतियाँ ही इसका प्रमाण हैं। इनके द्वारा रचे गये ग्रंथों के अनुसार इनका रचनाकाल इस शताब्दी का प्रथम चरण ही है। संवत् 1616 में इन्होंने लोक- कथानक पर “माधवानल चौपाई” काव्य की सुन्दर रचना की। राजस्थानी साहित्य की महत्त्वपूर्ण कृति “ढोला मारू” जो एक सरस प्रेम-काव्य है, के बिखरे हुए दोहों को एकत्र कर कवि ने अपनी ओर से कथासूत्र को जोड़ने के लिए चौपाइयाँ मिला कर उसे पूर्ण किया। इसके अतिरिक्त इन्होंने “तेजसार रास” (सं. 1624), “अगड़दत्त रास” (सं. 1625), “दुर्गा सप्तसी”, “जिनपालित जिनरक्षित संधि”, “भवानी छंद” आदि कई ग्रन्थों की रचना की। “ढोला- मारवण री चोपई” में इनकी भाषा का स्वरूप निम्न उदाहरण में देखा जा सकता है–

गोधूळिक वेळा जब हूई, जोवा जांन पधारी जूई।
तब पिंगळ तेड़ी सुभ वार, परिणाव्यउ करि मंगळच्यारि।
निरखयउ नयणे पिंगळराय, राजाइ तसु आय्यउँ दाय।
रूपवंत नइँ सुंदर देह, सोढी-मनि निरखतां सनेह।
सोळह वरसे परण्यउँ राउ, अति सुकमाळ असंभय काय।
बारह वरस-तणी देवड़ी, लोक कहइ ए जोड़ी जुड़ी।
एक कहइ तूठउ करतार, पांम्यउ तिणि पिंगळ भरतार।

मालदेव– ये राजस्थान में भटनेर (हनुमानगढ़) के रहने वाले थे। इनकी रचनाओं में इनका संक्षिप्त नाम “माल” ही मिलता है। इनकी कृतियों के आधार पर इनका रचनाकाल सं. 1612-1620 के आसपास ही प्रतीत होता है। अपनी रचनाओं की लोकप्रियता एवं परवर्ती कवियों के उल्लेखों के आधार पर यह स्पष्ट है कि अपने समय में ये एक प्रसिद्ध कवि थे। इन्होंने लगभग 25 ग्रंथों की रचना की जिनमें से “मनभमरा गीत”, “महावीर पारणा”, “माल शिक्षा चौपाई”, “शील बावनी” आदि तो अपनी निजी विशेषताओं के कारण श्रद्धालु भक्तों के हृदय की हार बनी हुई हैं। इनके अतिरिक्त भी “पुरंदर चौपाई”, “पद्मावती पद्मश्री रास”, “राजुल नेमिनाथ धमाल”, “भोजप्रबंध मृगांक पद्मावती रास” तथा अन्य फुटकर गीत आदि भी अधिक विख्यात हैं। “पुरंदर चौपाई” का एक उदाहरण नीचे प्रस्तुत किया जाता है–

अति प्रीतम जउं वीछड़इ, तउ ही न मरणौ जाइ।
हीयड़ा सांबरसींग ज्युं, दिन दिन नीठुर थाइ।।
पांणी तणइ वियोग, कादम ज्युं फाटइ हीयउ।
इम जौ मांणस होइ, साचउ नेह तौ जाणिजइ।।
अइ वाळहां वियोग, पांणी पापिण नीसरइ।
साचउ नेह ते जोइ, जइ लोयण लोहू वहइ।।

बारहठ ईसरदास– राजस्थानी साहित्य के इस स्वर्णिम काल में बारहठ ईसरदार का विशेष महत्त्वपूर्ण स्थान है। कवि ईसरदास ने चारण परम्परानुसार केवल वीररसात्मक रचनायें ही नहीं कीं अपितु राजस्थानी साहित्य में भक्ति रस की अनुपम रचना देकर अपने एक भक्त होने का परिचय भी दिया है। इनकी लेखनी से वीर रस और भक्ति रस की दोनों ही धारायें समान रूप से प्रवाहित हुई हैं। कवि एवं भक्त ईसरदास का जन्म संवत् 1595 में माना जाता है। ऐतिहासिक आधार तथा उनकी जन्मपत्री इसी बात की पुष्टि करते हैं।[1] अपने जीवनकाल में इन्होंने निम्नलिखित ग्रन्थों की रचना की–

1. हरिरस, 2. छोटा हरिरस, 3. गुण भागवत हंस, 4. गरुड़ पुरांण, 5. बाळलीला, 6. निंदा-स्तुति, 7. देवियांण, 8. गुण आगम, 9. गुण वैराट, 10. सभापर्व, 11. रास-कैळास, 12. हालां झालां रा कुण्डळिया और 13. दांण लीला।

उनकी इन रचनाओं में “हरिरस” और “हालां झालां रा कुंडळिया” इनकी सर्वोत्कृष्ट रचनायें हैं। “हरिरस” शान्त रस का ईश्वर भक्ति का ग्रन्थ है जिसमें अटूट तन्मयता, अगाध प्रेम एवं दृढ़ विश्वास भरा पड़ा है। ईश्वर के अनेक नामों की महिमा, उसके प्रति कवि का प्रेम, दीन जनों का कारुणिक प्रकार आदि सभी बातों का “हरिरस” में सुन्दर समन्वय हुआ है। कवि ने कर्म, उपासना तथा ज्ञान तीनों विषयों का उल्लेख विषद विवेचना के साथ किया है। पूर्ण अध्ययन से इस ग्रंथ में श्रीमद्भागवत का संक्षिप्त सार मिल जाता है। भक्ति रस का ग्रंथ होने के कारण यह राजस्थान तथा गुजरात के लोगों का दैनिक पाठ करने का ग्रंथ बन गया है। हरि-भक्तों में जैसा “हरिरस” का प्रचार यहाँ हुआ वैसा किसी अन्य रचना का नहीं। ग्रंथ में यत्र-तत्र सगुण तथा निर्गुण दोनों रूपों की मिली-जुली झलक भी दृष्टिगोचर होती है।

निरग्गुण नाथ नमौ जिय नाथ, स्रबंगत देव नमौ ससिमाथ।
नमौ तौ नमौ तो लीला नांम, सोहं अवतार नमौ स्रीरांम।।
निरंजण नाथ परम्म न्रवांण, किसन्न महाघण-रूप कल्यांण।
स्रबग्गुण देव अतीत संसार, बिभू अति गुज्झ परम्म बिचार।।

अब उनकी भक्ति के उदाहरण के लिए निम्न कवित्त देखिये–

जनम-पीड़ जगदीस, ईस अवतार म आंणे।
छळ-बळ करि-छोडवण, जनम आपण कर जांणे।
भणे नांम हूँ भणिस, जोति जगती जगदीसै।
क्रपा साधना करण, तवन कोड़ै तेतीसै।
द्रगदेव दिनंकर ससि दुवै, त्रिगुण नाथ तारण-तरण।
“ईसरो” कहै असरण-सरण, किसूं तूझ कारण करण।।

“हरि रस” में भाषा की विविधता पायी जाती है। कहीं संस्कृत के तत्सम एवं तद्भव शब्दों की बहुलता है तो कहीं फारसी शब्दों तथा साधारण बोलचाल के शब्दों का भी प्रयोग पाया जाता है। जहाँ ऐसे शब्दों का प्रयोग हुआ है वहाँ भाषा अत्यन्त सरल एवं चलती हो गई है।

अवगुण मोरा बापजी, बगस गरीब निवाज।
जो कुळ पूत कपूत व्है, तो ही पिता कुळ लाज।।

म्हैं तौ कुछ करता नहीं, करता है करतार।
देखौ करता क्या करै, रख बंदा इतबार।।

रांम भरोसे ऊकळै, आदण ईसरदास।
ऊकळता में ओर दै, बंदा रख बीसास।।

कवि ईसरदास का दूसरा प्रसिद्ध ग्रंथ “हालां झालां रा कुंडलिया” है। यह वीर-रस-प्रधान काव्य है। श्री मोतीलाल मेनारिया द्वारा उदयपुर से प्रकाशित ग्रंथ में 50 कुंडलिया दिए गए हैं। ऐसा कहा जाता है कि स्व. पुरोहित श्री हरिनारायणजी के संग्रह में 63 कुंडलिया संग्रहीत थे। ये कुंडलिया स्फुट रूप में ही मिलते हैं तथा इन छंदों में क्रमबद्धता का अभाव है। प्रत्येक कुंडळिया अपने आप में पूर्ण है। “हालां झालां रा कुंडळिया” का वर्ण्य- विषय हलवद (वर्तमान नाम ध्रांगध्रा) के अधिपति झाला रायसिंह ध्रोल राज्य के ठाकुर हाला जसवन्तसिंह (जसाजी) जो कि उनके निकट सम्बन्धी भी थे[2] , के बीच होने वाले युद्ध से सम्बन्धित है। राजस्थानी भाषा की सर्वश्रेष्ठ वीररसात्मक कृतियों में इस ग्रंथ का स्थान है। कवि ने ओजस्विनी भाषा का प्रयोग कर इसे वीररस की एक सजीव कृति बना दिया है। कवि ने इसमें झड़-उलट कुंडळिया का प्रयोग किया है जिससे रचना में और भी सार्थकता आ गई है। ग्रंथ की भाषा क्लिष्ट न होकर पूर्ण प्रसादगुणयुक्त है। मौलिक भावों की अभिव्यंजना के लिए सुन्दर शब्दावली का चयन कवि की अपनी निजी विशेषता है। शब्दों का विषयानुकूल प्रयोग एवं उनकी विशिष्ट ध्वन्यात्मकता से बरबस ही ओज फड़क उठता है। वीर-रस का रूप वास्तविक नीचे दिए गए उदाहरण में देखा जा सकता है–

एकौ लाखाँ आंग में सीह कहीजै सोय।
सूरा जेथी रोड़ियै कळहळ तेथी होय।।

कळळ हूंकळ अवसि खेति सूरा करै।
धीरपै सुहड़ रिण चलण धीरा धरै।।

आगि व्रजागि जसवंत अकळावणौ।
खाग बळि एकलौ लाख दळ खावणौ।। (8)

इस ग्रंथ में अधिकांश पद्यों को ईसरदास ने स्त्री के मुंह से कहलवाया है। वीर जसाजी की राणी अपने पति, अपनी सखी आदि के समक्ष अपने वीर-भाव प्रकट करती है। कवि की इस अभिव्यक्ति में बड़ी स्वाभाविकता एवं सरसता आ गई है। इससे समस्त रचना भाव-सौन्दर्य से अभिभूत हो गई है–

ऊठि अचूंका बोलणा, नारि पयंपै नाह।
घोड़ां पाखर घमघमी, सींधू राग हुवाह।।

हुवौ अति सींधवौ राग बागी हकां।
थाट आया पिसण घाट लागै थकां।।

अखाडां जीति खग अरि घड़ा खोलणा।
ऊठि हरधवळ सुत अचूंका बोलणा।।4

ग्रंथों के अतिरिक्त कवि द्वारा रचे हुए कुछ फुटकर गीत भी मिलते हैं। गीतों की भाषा प्राचीन चारण काव्य-परंपरा का सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत करती है–

रंग रातौ चीत कवट-हर राजा, अवरां हूंतौ ऊतरीयौ।
तो मुख दीठै लाख-तियागी “विजा” जगत सहु वीसरीयौ।।1

“विजमल” तुझ दीठै वीसरिया, सयळतणा भूपति सिगळेय।
दूजा तीह भज्जे किम डूंगर, निरख्यौ ज्यां सुरगिरि नयणेह।।2

अनिजळ तीह थियै किम आरति, जमण-गंग-तट वसिया जाइ।
दीठै तूझ पछै “दूदावत”, दूजा सुपह न आवै दाइ।।3

[1] "हरिरस" (राजस्थान रिसर्च सोसायटी, कलकत्ता)।
[2] झाला रायसिंह जसाजी के भानजे थे।

वीठू मेहा– कवि ईसरदास की भांति वीर रस की सुन्दर रचना देने वालों में कवि वीठू मेहा का नाम भुलाया नहीं जा सकता। इनकी रचनाओं में “पाबूजी रा छंद”, “गोगाजी रा रसावला” तथा कर्मसी और सांवलदास के प्रति कहे हुए कवित्त बहुत प्रसिद्ध हैं। “पाबूजी रा छंद” की हस्तलिखित प्रति का विवरण डॉ. तैस्सितोरी ने दिया है[1] जो अनूप संस्कृत लाइब्रेरी बीकानेर में सुरक्षित है। इस प्रति में इसके रचनाकाल तथा लिपिकाल का कहीं उल्लेख नहीं मिलता, फिर भी इसके साथ ही अन्य रचना “जैतसी रौ पाधड़ी छंद, लिखा हुआ है जिसका लिपिकाल सं. 1672 लिखा हुआ है।[2] दोनों ही रचनायें एक ही हाथ की लिखी होने के कारण “पाबूजी रा छंद” का लिपिकाल सं. 1672 के बाद ही माना जा सकता है। इससे यह अनुमान किया जा सकता है कि बीठू की यह रचना संवत् 1672 के पूर्व ही प्रसिद्ध हो चुकी होगी। बीठू मेहा के जोधपुर के कूंपा मेहराजोत पर लिखे हुए फुटकर गीत भी प्राप्त होते हैं। कूंपा मेहराजोत संवत् 1600 में जोधपुर की ओर से शेरशाह के विरुद्ध लड़ कर काम आया था।[3] इस दृष्टि से बीठू मेहा का रचनाकाल सत्रहवीं शताब्दी का प्रथम चरण ही माना जा सकता है।

“गोगाजी रा रसावला” भी फुटकर छन्दों की रचना है जिसमें गोगाजी चौहान का युद्ध, उनकी वीरता तथा गायों की रक्षार्थ किए गए आत्म-त्याग का विषद वर्णन है। वीररस के फुटकर कवित्तों में बागड़ के करमसी और सांवलदास चौहान की वीरता पर कहे हुए कवित्त बहुत प्रसिद्ध हैं। ये दोनों वीर डूंगरपुर के महारावळ आसकरण (सं. 1606-37) की ओर से महाराणा उदयसिंह की सेना के विरुद्ध लड़ कर काम आये।[4] वीठू के ये कवित्त वीररस के सजीव उदाहरण हैं जिसकी झलक निम्न उद्धरण में देखी जा सकती है–

डइणि डक्क डहक्क, हक्क होए हलकारां।
वाजे धक्क झड़क्क, लंक त्रूटे झझारां।
डरे कूंत खरड़क्क सार झाबक्क सबक्कां।
फोफर फटिय मुबक्क, रकत ऊबके खळक्कां।
वर वंक वधे चहुवांण वंस, विढ़ण वंक आंकह चलै।
सामळै सुहड़ सौ खंड किय, खळां सरै सारण खळै।।

[1] Descriptive Catalogue, Sec. II, Pt. I, Page 8-9.
[2] संवत् 1672 वर्षे शाके 15 माह मासे शुक्ल पक्षे त्रितीयां तिथौ गुरुवासरै.....।
[3] मारवाड़ का इतिहास, प्रथम भाग, वि. रेउ., पृ. 128-131.
[4] डूंगरपुर राज्य का इतिहास : गो. ही. ओझा, पृ. 89-90.

रामा सांदू– ये मेवाड़ के राणा उदयसिंह के समकालीन थे।[1] इन्होंने महाराणा की प्रशंसा में 15 वेलिया छंदों में “वेलि राणा उदयसिंघरी” की संवत् 1628 के आसपास रचना की। इसके अतिरिक्त इन्होंने फुटकर गीतों की भी रचना की है। उदाहरण के लिए एक गीत यहाँ दिया जा रहा है।

।।गीत।।
दळ पैलां अकळ उलटा देखै,

खळ मैगळ प्रजाळण खाग,
धूहड़ खत सूरत धड़हड़ियौ,
“ईसर” तिकर पराळी आग।।1

माहव तणौ महाबळ मिळियौ
घणा जूंझार वधै घण घाय।।
पंडवेसां पटहथां प्रजाळण
लांप तणै गंज लागी लाय।।2

आडै घाय बाजियौ “ईसर”
खळ मैंगळ जाळण खुरसांण
आग अंगारै लाग उडियौ
उजवाळै झाळां असमांण।।3

“माधव” हरौ अछरां वरमाळै
सुजड़ उजाळै तेरे साख
“ईसर” दावानळ उझमियौ
रिम लाकड़ घड़ बाळै राख।।4

[1] नैणसी की ख्यात, भाग 1, पृ. 111.

अखौ भाणावत– ये रोहड़िया शाखा के चारण थे और जोधपुर के राजा मालदेव के कृपा-पात्र भाना बारहठ के पुत्र थे। बाल्यकाल में ही माता-पिता की मृत्यु के कारण इनका पालन-पोषण मालदेव की झाली रानी स्वरूपदे ने अपने पुत्र उदयसिंह और चन्द्रसेन के साथ किया। बड़े होने पर भी ये उदयसिंह के साथ ही रहते थे। कारणवश उदयसिंह ने चारणों के गाँव छीन लिए थे। इसके विरुद्ध संवत् 1643 में आउआ ठिकाने में चारणों ने धरना दिया। उदयसिंह ने अखा को उनसे सुलह करने के लिए भेजा परन्तु अखाजी सुलह करने के बजाय स्वयं धरने में शामिल हो गए और वहीं उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए।

अखाजी डिंगल के कवि थे। द्वारकादास दधवाड़िया ने अपने ग्रन्थ “दवावैद” में अपने से पूर्व के कवियों का वर्णन किया है, उसमें अक्खाजी का भी उल्लेख कवि के रूप में किया है। इन्होंने वेलिया छंद में “वेलि देईदास जैतावत री” नामक ग्रंथ की रचना की। इस वेलि में 23 दोहलों में देवीदास जैतावत के युद्ध एवं वीरता का वर्णन है। संवत् 1616 में देवीदास ने जालोर को अपने अधिकार में कर लिया और बदनोर से जयमल को भी निकाल दिया। ये अकबर से शाही सेना की सहायता लेकर मेड़ता पर चढ़ आये। यहीं देवीदास ने उनसे युद्ध किया और वहीं वीरगति को प्राप्त हुआ। कवि की रचना इस घटना की सम-सामयिक ही जान पड़ती है। अतः इसका रचनाकाल संवत् 1620 के आसपास ही माना जा सकता है। इस वेलि से एक पद नीचे उदाहरण-स्वरूप दिया जाता है–

मिळि जमलि रांण कल्यांण मेड़तै, घणंजू वैहता बिरद घण।
बळ छाडियौ तुहारै बोले, त्रिहं ठाकुरे जैततण।।11

अखाजी वैसे किसी ग्रंथ आदि की रचना के लिए प्रसिद्ध नहीं हैं परन्तु फुटकर गीतों की रचना के लिए राजस्थानी साहित्य-जगत् में इनकी प्रसिद्धि अधिक है। गीत बड़े ही सुन्दर हैं जिनकी भाषा शैली बड़ी प्रसादगुणयुक्त है। इनके द्वारा लिखे गए एक गीत का उदाहरण देखिये–

ताकंती फिरै हिंदवां तुरकां जुड़ै न भरता भांत जुई।
मरण तुहारे चंद मछर गुर अकबर फौज सचीत हुई।।1

कसै न जूसण राग कलासै, विलखी फिरै न पूछै बात।
एकण कमंध मरण उतरिया, असपत फौज तणै अैह बात।।2

रचै न जूसण टोप राखड़ी, हिए न कांचू जिरह न हार।
“गंगा” हरा मरण गहलांणी, सारी फौज तणा सिणगार।।3

मांणण हार “माल” तण मूऔ, सजती जै ऊपर सिणगार।
साह घड़ा राठौड़ सरीखा, भव दूजै पांमिस भरतार।।4

अल्लू कविया– ये जाति के कविया गोत्र के चारण थे और जोधपुर के राजा मालदेव के समकालीन थे। इनका जन्म सिणला ग्राम में हेमराज कविया के घर संवत् 1560 में हुआ।[1] इनका रचनाकाल संवत् 1620 के लगभग माना जा सकता है। इनका रचा हुआ कोई भी ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है। सम्भव है इन्होंने कोई ग्रंथ लिखा ही न हो, फिर भी इनके कुछ फुटकर छप्पय एवं गीत मिलते हैं जिनकी विशेष प्रसिद्धि है। इनकी कविता को पढ़ कर किसी ने ठीक ही कहा है–

कविते अलू दूहे करमाणंद, पात ईसर विद्या चौ पूर।
छंदे “मेहौ” झूलणे “मालौ”, सूर पदे गीते हर सूर।।

इनकी कविताओं से कोई ठोस ऐतिहासिक सामग्री प्राप्त नहीं होती परन्तु सभी कवितायें सरस, हृदयग्राही एवं भक्ति-रस से परिपूर्ण अवश्य हैं–

गोप नार चित हरण, प्रेम लच्छण समप्पण
कुंज विहारी क्रस्ण रास व्रन्दावन रच्चण
गोवरधन ऊधरण ग्राह मारण गज तारण
जुरासिंधु सिसपाळ भिड़ै भू-भार उतारण
जमलोक दरस्सण परहरण भौ भग्गौ जीवण मरण
ओ मंत्र भलौ निस दिन “अलू” सिमर नाथ असरण सरण।।

इन्होंने जोधपुर के राव मालदेव की विभिन्न विजयों के वर्णन हेतु कुछ कवित्तों की रचना की है जिनमें से अनूप संस्कृत लाइब्रेरी बीकानेर की हस्तलिखित प्रति[2] में 4 कवित्त मिलते हैं। इन कवित्तों में वीर-रस की झलक दिखाई देती है। इनके बून्दी के हाडा सूरजमल पर लिखे गीत भी प्राप्त हैं जो कवि के भाव पक्ष को स्पष्ट करने में सहायक हैं।

[1] परम्परा, भाग 12, सिद्धभक्त कवि अलूनाथ कविया : श्री सौभाग्यसिंह शेखावत, पृ. 55.
[2] प्रति नं. 96.

गोरधन बोगसौ– कवि गोरधन बोगसौ गोत्र के चारण, मेवाड़ राज्य के निवासी थे। ये महाराणा प्रताप के समकालीन थे अतः इनका रचनाकाल संवत् 1633 के आस-पास माना जाता है। ये अपने वीररसपूर्ण फुटकर गीतों के लिए ही अधिक प्रसिद्ध हैं। इनके ओजपूर्ण गीत पाठकों के हृदय में उत्साह का संचार करने में पूर्ण समर्थ हैं। भाषा सरस एवं मंजी हुई है। गीतों में जथा और उक्तियों का निर्वाह भली प्रकार से हुआ है।

हल्दी घाटी के युद्ध में कवि स्वयं महाराणा प्रताप के साथ थे। अतः अपने गीतों में हल्दी घाटी के युद्ध एवं राणा प्रताप के शौर्य एवं पराक्रम का आंखों देखा वर्णन करने से उनमें सजीवता आ गई है। गीत के पढ़ते ही सारा दृश्य आंखों के समक्ष उपस्थित हो जाता है। इसी युद्ध के वर्णन का एक गीत देखिये–

गयंद “मांन” रै मुहर ऊभौ हुतौ दुरदगत,
सिलह पोसां तणा जूथ साथै।
तद बही रूक अणचूक “पातळ” तणी,
मुगळ बहलोल खाँ तणै माथै।।1

तणै भ्रम “ऊद” असवार चेटक तणै,
घणौ मगरूर बहरार घटकी।
आचरै जोर मिरजातणैं आछटी,
भाचरै चाचरै बीज भटकी।।2

सूरतन रीझतां भीजतां सैलगुर
पहां अन दीजतां कदम पाछे।
दांत चढ़तां जवन सीस पछटी दुजड़
तांत साबण ज्युहीं गई ताछे।।3

वीर अवसांण केवांण ऊजबक बहे,
रांण हथवाह दुय राह रटियौ।
कट झिलम सीस बगतर बरंग अंग कटे,
कटे पाखर सुरंग तुरंग कटियौ।।4

सूरा टापरिया– ये टापरिया शाखा के चारण थे। ये भी महाराणा प्रताप और पृथ्वीराज राठौड़ के समकालीन थे। दिल्ली में अनायास ही इनकी मुलाकात पृथ्वीराज से हो गई थी। पृथ्वीराज ने इनका खूब सम्मान किया और इन्हें बादशाह अकबर के दरबार में ले गये, वहाँ सूरा ने निम्नलिखित सोरठा कहा–

अकबरिया इण वार, मर रे मैंगळ हर धणी।
सोयळौ सह संसार, दोयळौ कोई देखां नहीं।।

अकबर ने इसका अर्थ शीघ्र समझ लिया और सूरा से अपनी मृत्यु की कामना करने का सोरठा फिर से सुनाने को कहा। तब शीघ्र ही सूरा ने उसे पलट कर इस प्रकार कहा–

अकबरिया इण वार, म मरे मैंगळ हर धणी।
सोयळौ सह संसार, दोयळौ कोई देखां नहीं।।

इस पर बादशाह बहुत प्रसन्न हुआ और उसने सूरा की इच्छापूर्ति की। सूरा निस्सन्देह श्रेष्ठ कवि था। वह सत्यवादी एवं वीरता का उपासक होने के साथ-साथ सच्चा राष्ट्र भक्त भी था। इसकी कविता में राष्ट्रीय भावना स्पष्ट रूप से झलकती है। महाराणा प्रताप के प्रति कहे हुए सोरठे वीररस के सुन्दर उदाहरण हैं–

मांझी मोह मराट, “पातल” रांण प्रवाड़ मल।
दुजड़ां किय दह बाट, दळ मैंगळ दांणव तणा।।

चंपौ चीतोड़ाह, पोरस तणौ प्रतापसी।
सोरभ अकबर साह, अलियळ आभड़ियौ नहीं।।

अैही भुजे अरीत, तसलीमज हिंदू तुरक।
माथै निकर मजीत, परसाद कै प्रतापसी।।

चौकी चीतोड़ाह, “पातल” पंडवेसां तणी।
रहचेबा रांणाह, आयौ पण आयौ नहीं।।

सूरा के फुटकर गीत भी अनेक प्राप्त हैं जो उसकी काव्य-प्रतिभा के सच्चे प्रमाण हैं। गीतों की भाषा ओजपूर्ण है। शब्द-चयन पूर्ण विषयानुकूल है जो बरबस ही पाठकों में उत्साह की उमंग पैदा कर देता है। एक गीत का उदाहरण देखिये–

आलापै राग गारड़ू अकबर, दै पैंतीस असट कुळ दाव।
रांण सेस बसुधा कथ राखण, राग न पांतरियौ अहराव।।

मिणधर छत्रधर अवर गेल मन, ताइधर रजधर “सींघतण”।
पूंगी दळ पतसाह पेरतां, फेरै कमळ न सहसफण।।

गढ़ गढ़ राफ मेटे गह, रैण खत्रीध्रम लाज अरेस।
पंडर बेस नाद अण पीणग, सेस न आयौ पतौ नरेस।।

आया ऊन भूपत आवाहण, भुजंगे भुजंग तजे बळ भंग।
रहियौ रांण खत्रीध्रम राखण, सेत उरंग कळोधर “संग”।।

हीर कलश– राजस्थानी के जैन कवि हीर कलश खरतरगच्छ की सागरचन्द्र सूरि शाखा के विद्वान थे। जीवनकाल के अधिकांश भाग में ये बीकानेर तथा जोधपुर राज्य में ही रहे अतः इनका जन्म इन दोनों राज्यों में होना सम्भव है, जो वि.सं. 1595 में हुआ था। कवि ने बहुत संख्या में रचनायें लिखी हैं जिनका रचनाकाल सं. 1615 से 57 है। इस प्रकार इन्होंने लगभग 42 वर्ष तक साहित्य-साधना में रत रह कर कई श्रेष्ठ रचनाओं का निर्माण किया।

श्री अगरचन्द नाहटा ने कवि के 30 ग्रंथों का संवत् क्रम से नामोल्लेख किया है।[1] इनकी अन्तिम रचना “हीयाली” सं. 1657 नागौर के निकटवर्ती “डेह” नामक स्थान पर रची हुई मिलती है। कवि का स्वर्गवास इसी स्थान पर होने का अनुमान लगाया जाता है। इनकी रचना “मोती कपासिया संवाद” का एक उदाहरण देखिये–

मोती–
कहि मोती सुणि कांकड़ा, मइ तइ केहौ साथ।
हूं साव्हुं कंचण सरिस, तइ खळ कूकस बाथ।।
मइ सुर नरवर भेटीया, कीधां जिहां सिंगार।
तइ भेटीया गोधण बळद, जिहां कीधा आहार।।

कपासिया–
ऊतर दीयइ कपासीयउ, अम्ह आहार जोइ।
गायां गोरस नीपजइ, वळदे करसण होइ।।
गोधण जदि वांटउ न हुइ, तदि वरतइ कंतार।
धांन वडइ तव वेचीयइ, सोवन मोती हार।।

कनक सोम– इसी समय के अन्य जैन कवि कनक सोम की रचनायें भी राजस्थानी साहित्य में उल्लेखनीय हैं। ये खरतरगच्छ के अमर माणिक्य के शिष्य थे। डॉ. माहेश्वरी ने इनके ग्रंथों की सूची में 12 नाम गिनाये हैं।[2] ग्रन्थों में संवतोल्लेख के अनुसार इनका रचनाकाल भी 1625 से 1655 तक के लगभग ठहरता है। इनकी प्रसिद्ध रचना “आषाढ़ भूति चौपाई” का उदाहरण देखिये–

नट ए पुत्री सीखवी, ए मुनिवरनि मोहउ रे।
हाव भाव विभ्रम करी, काम दुधा घरि दोहउ रे।
भुवन सुंदर जय सुन्दरी, मुनि मोहन वर नारी रे।
जन मन रंजन अवतरी, गोरी रति अनुकारी रे।
कुंच विच हार विण्यउ इस्यउ, गिरि विचि गंग प्रवाहा रे।
नाभि मंडळ सागर संगरइ, जांनु कि तीरथ लाहा रे।।

[1] शोध पत्रिका, भाग 7, अंक 4 : राजस्थानी भाषा के एक बड़े कवि हीर-कलश।
[2] राजस्थानी भाषा और साहित्य : डॉ. हीरालाल माहेश्वरी, पृ. 265-266.

रंगरेलौ बीठू– इनके जन्मकाल के सम्बन्ध में विशेष पता नहीं चलता। इतना अवश्य प्रचलित है कि ये जैसलमेर के रावल हरराज और बीकानेर के राजा रायसिंह के समकालीन थे। इनका जन्म जैसलमेर राज्य के सांगड़ ग्राम में हुआ था, परन्तु बचपन में ही कच्छभुज चले गए और वहीं विद्याध्ययन किया। इसके पश्चात् वे देशाटन के लिए निकल पड़े और विभिन्न नगरों एवं देशों में घूमते हुए उनका वर्णन अपनी कविता में करने लगे। इनकी कवितायें व्यंग के लिए बहुत प्रसिद्ध हैं। ये घूमते हुए अपने देश जैसलमेर आ पहुँचे और यहीं पर जैसलमेर का वर्णन अपनी व्यंगपूर्ण भाषा में किया और यहाँ के रावल को सुना दिया। रावल ने इसे दूषित समझ बीठू को कैद कर लिया। बीकानेर के राजा रायसिंह अपना विवाह करने जैसलमेर पहुँचे तब इनको छुड़ा कर साथ ले आये। यहाँ इन्होंने रायसिंह की प्रशंसा में कुछ फुटकर गीतों की रचना कीं। एक समय राजा के कहने पर कवि ने रानी के समक्ष जैसलमेर का वर्णन सुनाया। वह व्यंगपूर्ण होने के कारण रानी को कटु लगा, इससे उसने नौकरों द्वारा रात्रि में बीठू को पलंग सहित कूए में पटकवा दिया। भाग्य से वे वहाँ बच गये और निकल कर भीनमाल चले गये जहाँ से जालोर का बिहारी पठान अपने साथ ले गया। इनकी रचना के उदाहरण देखिये–

।।राठौड़ महाराजा रायसिंह कल्याणमलोत रौ गीत।।
पाताळ तठै बळि रहण न पाऊं,
रिध मांडे स्रग करण रहै।

मो म्रितलोक राइसिंघ मारै,
कठै रहूं हरि दळिद्र कहै।।1

विरोचंद-सुत अहिपुर वारै,
रवि-सुत तणौ अमरपुर राज।

निधि- दातार कलाउत नरपुर,
अनंत रौर-गति केहि आज।।2

रयण-दियण पाताळ न राखै,
कनक-व्रवण रूधौ कविळास।

महि-पुड़ि गज-दातार ज मारै,
विसन कसै पुड़ि मांडूं वास।।3

नाग अमर नर भुवण निरखतां,
हेक ठौड़ छै, कहै हरि।

घर अर नांन्हा सिंघ घातिया,
कुरिंद तठै जाइ वास करि।।4

।।ऊमर कोट।।
पद्दमण पांणी जावत प्रात,
रुळंती आवत आधी रात।

बिलक्खा टाबर जोवे बाट,
धिनौ धर धाट धिनौ धर धाट।।

अरोगै नीर गधां सर आंण,
सराप संदेस धरां सोढ़ांण।

कविसर पारख ठोठ न कोय,
हसती भेस बराबर होय।।

परख्या ऊन बरोबर पाट,
धिनौ धर धाट धिनौ धर धाट।।

दूदा आसिया– राजस्थानी साहित्य में इस समय चारण परम्परा की बहुलता थी। समस्त राजस्थान में यह लहर व्यापक रूप से व्याप्त थी। अन्य चारण कवियों की भाँति इसी समय दूदा आसिया भी प्रसिद्ध कवि हो चुका है। ये आसिया गोत्र के चारण सिरोही राज्य के निवासी थे। इनका रचनाकाल संवत् 1633 से 1644 के लगभग माना जाता है। सिरोही के राव सुरताण ने इन्हें सीवाणा के राठौड़ कल्ला के पास भेजा था। यहाँ पर इन्होंने राठौड़ कल्ला की वीरता की प्रशंसा में अनेक कुंडलिया तथा फुटकर गीत लिखे। इनके रचे कुंडलियों की संख्या 140 के लगभग कही जाती है, यद्यपि अभी तक केवल 20 कुंडलिये ही उपलब्ध हैं। दूदाजी के गीत निस्सन्देह सुन्दर रचनायें हैं। भाषा और भाव दोनों ही इनकी काव्य-प्रतिभा के द्योतक हैं। उदाहरण के लिए इनका निम्न गीत देखिये–

सवीयांण “कल्यांण” तणै म्रत सीधौ,
अगै भेटिया असत अग्यांन।

आजस आभड़ छौत उतरीयौ,
स्रोण गंगोदक हुऔ सनांन।।1

सर नांमियौ गंगाजळ स्रोणी,
सत सीधौ “कल्यांण” सकाज।

असती पोहां तणौ आभड़ियौ,
अनड़ प्रवीत हुऔ तिण आज।।2

“माल” हर गढ़ सीस मरंतै,
मंजन गाळिया मिले मळ।

“लाखावटे” तुहाळौ लोई,
जांणै लधियौ गंगजळ।।3

पांणी स्रोण सीस-पांणीजै,
सत सीधौ कल्यांण सपोत।

मोटा अनड़ तणै सिर मरतै,
“छाडा” हरै उतारी छौत।।4

माला सांदू– माला सांदू बीकानेर के राजा रायसिंहजी के समकालीन थे। इनके जीवन का अधिकांश भाग रायसिंहजी के साथ ही व्यतीत हुआ प्रतीत होता है। “दयाळदास की ख्यात” से पता चलता है कि इन्होंने रायसिंह से दो बार पुरस्कार प्राप्त किया था।[1] ओझाजी के अनुसार संवत् 1627 में अकबर के नागौर आने पर बीकानेर के राव कल्याणसिंह अपने पुत्र रायसिंह के साथ उससे मिले। संवत् 1630 में कल्याणमल का देहान्त हुआ।[2] इसी समय गुजरात विजय पर जोधपुर का राज्य अकबर ने रायसिंह को दिया। “दयाळदास की ख्यात” के अनुसार संवत् 1649 में रायसिंह ने जैसलमेर के रावळ हरराज की पुत्री से विवाह किया।[3] कवि की रायसिंहजी के सम्बन्ध की लिखी रचना व अन्य रचनाओं के आधार पर इनका रचनाकाल सं. 1630 से 1660 माना जा सकता है। इनके लिखे तीन ग्रंथ मिलते हैं–

(1) झूलणा महाराज रायसिंघजी रा।
(2) झूलणा दीवांण श्री प्रतापसिंघजी रा।
(3) झूलणा अकबर पातसाहजी रा।

उपर्युक्त तीनों ही रचनायें झूलणा छन्द में हैं, जिनमें कवि ने अपने समय के तीन ऐतिहासिक प्रसिद्ध वीरों, अकबर, प्रताप और रायसिंह के पराक्रमों का वर्णन किया है। रचनायें घटनाओं की सम-सामयिक जान पड़ती हैं जिससे उनमें वास्तविकता आ गई है। हल्दी घाटी के युद्ध-वर्णन में इनकी भाषा पूर्ण ओजस्विनी हो गई है और इसमें कवि की राष्ट्रीय भावना स्पष्ट रूप से झलकती दिखाई देती है। उदाहरण के लिए एक पद नीचे देखिये–

जोगण खप्पर मांडीय पळ रत अघाई
नाळां गोळा पूरीया की सोर सजाई
सोर पलीता गड़ड़ीया हथनाळ हवाई
धर पड़सादे परबतां फिर गैंण गजाई
सिर चढ़ीतौ सीसोदीयौ सोहीयौ सेलारां
आळूझै अंत्रावळी वणीयौ तिण वारां।।
रिड़ै रगत्र सगत्र पत्र भरीया कर भारां,
खाळ ज वहैड हिगळ का पड़नाळ पयारां।
लट छूटा तूटा कमळ घट फूटा धारां,
जांण क मट उपटीया विच हट रंगारां।

इन झूलणाओं के अतिरिक्त कवि के कई फुटकर गीत और कवित्त मिलते हैं। गीतों की भाषा भी पूर्ण प्रवाहमयी तथा ओजगुण-सम्पन्न है। भाव पक्ष प्रबल होने के कारण गीत बड़े ही आकर्षक हो पाये हैं। राव जोधा के पुत्र करमसी के प्रति कहे एक गीत के दो दोहले यहाँ उदाहरण में देखिये–

राखत जो नहीं “कमौ” रिण रहचै।
धाय मिळे रिण असुर घड़।
तो जड़ जंगळ जात जैता।
ज्यूं जैतायण ही जात जड़।।1

पोह धमोरौ अनै द्रोणपुर।
पैह मेड़तौ जांगळू पैह।
काडत जड़ां सहत किलमायण।
“करमट” जो नह करत कळैह।।2

[1] क. गांव एक भदोरौ नागौर रौ मालै सांदू नूं दीनौ। ख. हाथी एक मालै सांदू नूं। (ख्यात, भाग 2, पृ. 118, 125)
[2] बीकानेर राज्य का इतिहास : गौरीशंकर हीराचंद ओझा, पृ. 163 का फुटनोट।
[3] दयाळदास री ख्यात, भाग 2, पृ. 123.

हेमरत्न सूरि– ये पद्मराज गणि के शिष्य थे।[1] सत्रहवीं शताब्दी के जैन कवियों में इनका नाम भी उल्लेखनीय है। इनकी निम्नलिखित रचनायें हैं–

1. महिपाळ चौपाई, 2. अमर कुमार चौपाई, 3. सीता चरित्र, 4. गोरा बादळ पदमनी चौपाई।

उपरोक्त प्रमुख रचनाओं के अतिरिक्त अन्य अनेक फुटकर रचनायें भी हैं। ग्रंथों में प्रयुक्त भाषा शुद्ध राजस्थानी है। इनकी “गोरा बादल पदमनी री चौपाई” वीररस की अनूठी रचना है। श्रृंगार रस का प्रयोग भी गौण रूप से इसमें हुआ है। गोरा बादल की वीरता एवं पद्मनी के शील का कवि ने बहुत सुन्दर ढंग से वर्णन किया है। कवि के वीररस का उदाहरण देखिये–

धड़ ऊपरि धड़ ऊथलि पड़इ,
ग्रहि करवाळ मूंड विणु भिड़इ।
रण चाचरि नाचइ रजपूत,
पाड़इ पड़इ किहाडइ भूत।
नवि चीतारइ घर सुख साथ,
वाहइ बहकि छछोहा हाथ।
रे! रे! मुगळ आंधा ढ़ोर,
इम कहि वाहइ खग अघोर।
पदमिण साटइ ले करवाळ,
किहां दिल्लीधर धन संभाळि।।

[1] जै. गु. क., तृतीय भाग, पृ. 680.

बारहठ शंकर– इस शताब्दी के पूर्वाद्ध के कवियों में बारहठ शंकर भी उल्लेखनीय कवि हैं। ये रोहड़िया शाखा के चारण थे और बीकानेर के प्रसिद्ध राजा रायसिंहजी के ही समकालीन थे। रायसिंहजी द्वारा संवत् 1651 में कवि को सवा करोड़ का दान देना सर्वप्रसिद्ध है।[1] संवत् 1643 में जोधपुर के राजा उदयसिंह के समय राज्य के चारणों ने आउआ गाँव में धरना दिया तब उसमें ये भी थे किन्तु किसी कारणवश उस धरने को छोड़ कर चले गये। कहा यह जाता है कि इनकी पत्नी पद्मा जो माला सांदू की बहिन थी, इन्हें छोड़कर चली गई और आजीवन रायसिंह के भाई अमरसिंह को अपना धर्म भाई बना कर उसी के पास रह गई।

कवि शंकर बारहठ की “दातार सूर रौ संवाद” प्रसिद्ध रचना है।[2] इसकी हस्तलिखित प्रतियाँ अनूप संस्कृत लाइब्रेरी, बीकानेर में विद्यमान हैं। इस रचना में, जैसा कि इसका नाम है, दानवीर और शूरवीर पुरुषों के संवाद हैं। इस परस्पर वार्तालाप में प्रत्येक एक दूसरे से श्रेष्ठ होने का दावा करता है। अन्त में रायसिंहजी अपनी विशेष युक्ति देकर दानी को श्रेष्ठ बता कर उनका न्याय करते हैं। इस रचना के अतिरिक्त कवि के अन्य फुटकर गीत भी बहुत मिलते हैं। गीतों की भाषा साधारण होते हुए भी वे बड़े प्रभावपूर्ण प्रतीत होते हैं। उदाहरण के लिए निम्न गीत देखिये–

अकळ थाट असमांण अर ऊपरै आंणिया,
दूहरी कुंजरै ढाल ढळकांणियां।
सिखर भुरजां चढ़ी सखी साहवांणियां,
रायसिंघ संपेखै नंद गिररांणियां।।

कळहळै बगतरां टोप री झरहरी,
घमघमै घूघरां पाखरां छरहरी।
कोट कमसीस पैह निजर सांमी करी,
“कला” सुत पेखियौ कोड राय करी।।

धूपटै धरा पुर जोध हरसै धणी,
वेहद राज ऊजळी सिह माथै बणी।
तुरी आफाळतां विख अरबद तणी,
मारवौ राव साराहियौ पदमणी।।

पूजवै “सिंध” पाहाड़ सिर पोगरां,
कमंध असफेरिया अचळ रा कांगरां।
हुवै हैकेंप तिण वार “वीजड़” हरां,
वीनवै अभै मांगत त्रिय नै वरां।।

[1] दयाळदास री ख्यात, भाग 2, पृ. 126-127.
[2] Descriptive Catalogue, Sec. II, Pt. I, Page 14 : Tessitori.

पद्मा सांदू– राजस्थान की स्त्री कवियों में पद्मा का नाम भी महत्त्वपूर्ण है। यह ऊपर वर्णित कवि बारहठ शंकर की पत्नी और प्रसिद्ध कवि माला सांदू की बहिन थी। इसने अपने भाई माला से ही शिक्षा पाई थी। इसका रचनाकाल संवत् 1640 के आसपास ही माना जाता है। सं. 1643 में जोधपुर राज्य के चारणों द्वारा आउआ गांव में दिये जाने वाले धरने में से शंकर बारहठ के लौट आने पर यह उनसे रुष्ट होकर राजा रायसिंह के भाई अमरसिंह के पास चली आई और उसके अन्तःपुर में रहते हुए कविता करने लगी। अमरसिंह के विद्रोही हो जाने के कारण संवत् 1654 में अकबर ने अपने सेनापति अरबखां को इन्हें पकड़ने के लिए भेजा। अमरसिंह अफीम ज्यादा खाते थे, अतः इनहें जगाना आसान कार्य न था। इस पर पद्मा ने नीचे उदाहरण में दिये गये गीत द्वारा उसे जगा कर युद्ध के लिए प्रेरित किया। अमरसिंह इसी युद्ध में मारे गये। इनका पृथक् कोई ग्रंथ तो नहीं मिलता परन्तु फुटकर गीत प्राप्त हैं जो निस्सन्देह सुन्दर हैं–

सहर लूटतौ सरब नित देस करतौ सरद,
कहर नर प्रगट कीधी कमाई।
उज्यागर झाल खग “जैतहर” आभरण,
“अमर” अकबर तणी फौज आई।।1

वीकहर साहिधर मार करतौ वसू,
अभंग अरिव्रंद तो सीस आया।
लाग गयणाग खग तोल भुज लंकाळा,
जाग हो जाग कलियांण-जाया।।2

गोळ भर सबळ नर प्रगट अर-गाहण,
अरबखाँ आवियौ लाग असमांण।
निवारौ नींद कमधज अबै निडर नर,
प्रगट हव “जैतहर” दाखवौ पांण।।3

जुड़ै जमरांण घमसांण मातौ जठै,
साज तुरकांण भड़ वीज समरौ।
आपरी जिका थह न दी भड़ अवर नै,
आपरी जिके थह रह्यौ “अमरौ”।।4

दुरसा आढ़ा– मध्यकाल में साहित्य की विभिन्न धारायें भिन्न-भिन्न कवियों द्वारा पूर्ण रूप से पोषित हुई हैं। ऐतिहासिक परिस्थितियों के अनुकूल देश के लिए बलि होने वाले, स्वतन्त्रता के उपासक एवं धर्म-रक्षक वीरों के प्रति उनके यशोगान एवं वीर प्रशंसा में इस काल के कवियों ने अपनी लेखनी चलाने में कोई कसर उठा न रखी। ऐसे कवियों की कविताओं में देश एवं मर्यादा की रक्षा के लिए प्राणोत्सर्ग करने वालों के प्रति श्रद्धा एवं सहानुभूति स्पष्ट रूप से झलकती है। उनकी कविताओं में राष्ट्रीय भावना की धारा अविरल रूप से बही है। इस युग के वीर शिरोमणि, राजस्थान के सूर्य राणा प्रताप का यशोगान जितना उनके समकालीन कवियों ने किया है वह अन्यत्र दुर्लभ ही है। ऐसे कवियों में दुरसा आढ़ा का नाम अग्रगण्य है। काव्य-चमत्कार एवं भाषा-सौष्ठव की दृष्टि से इनकी तुलना इनके समकालीन कवि पृथ्वीराज राठौड़ से भले ही न की जा सके तथापि प्राचीन परंपरागत डिंगल में गीत-रचना की दृष्टि से इनका महत्त्व कम नहीं है।

दुरसा आढ़ा गोत्र के चारण मेहाजी के पुत्र थे। इनका जन्म संवत् 1592 में जोधपुर राज्य के अन्तर्गत धूंदला गांव में हुआ था। इनकी माता का नाम धन्नीबाई था जो बोगसा गोविन्द की बहिन थी। अत्यधिक निर्धनता के कारण दुरसा के जन्म के पूर्व ही इनके पिता मेहाजी ने संन्यास ग्रहण कर लिया था। इनकी माता ने बड़ी कठिनाइयों का सामना करते हुए इनका पालन-पोषण किया। बाल्यकाल में ही बगड़ी के ठाकुर प्रतापसिंह सूंडा इन्हें एक किसान के पास से ले गये और पालन-पोषण करते हुए इनकी शिक्षा आदि का प्रबन्ध किया। दुरसा ने ठाकुर के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए यह दोहा कहा–

माथै मावीतांह, जनम तणौ क्यावर जितौ।
सूंडौ सुध पाताह, पाळणहार प्रतापसी।।

काव्य-रचना के फलस्वरूप दुरसा को अपने जीवन में धन, यश एवं सम्मान बहुत प्राप्त हुआ। कहा जाता है कि जोधपुर पर अधिकार के समय बीकानेर के राजा रायसिंह ने इनको चार गांव, एक करोड़ का पुरस्कार और एक हाथी प्रदान किये थे।[1] इन्होंने बादशाह अकबर तथा सिरोही के राव सुरताण से भी एक-एक करोड़ का पुरस्कार प्राप्त किया था।[2] इस प्रकार हम देखते हैं कि दुरसा अपने काल के अत्यन्त लोकप्रिय कवि थे। इनके लिखे हुए तीन ग्रंथ बतलाये जाते हैं–

(1) विरुद छहत्तरी (2) किरतार बावनी, और (3) श्री कुमार अजाजी नी भूतर मोरी नी गजगत।

अन्तिम दो ग्रंथों को इनके रचे मानने का कोई निश्चित प्रमाण प्राप्त नहीं हुआ है। “विरुद छिहत्तरी” वास्तव में इनकी एक अनोखी रचना है। इसमें कवि ने महाराणा प्रताप की प्रशंसा मुक्त कंठ से की है। यह 76 दोहों का ग्रंथ है। ये दोहे पृथ्वीराज द्वारा रचित दोहों से किसी रूप में कम नहीं हैं। यही कारण है कि कुछ दोहों में इतनी समानता आ गई है कि लोग भ्रम से दुरसा आढ़ा के दोहों को भी पृथ्वीराज द्वारा रचा गया मान लेते हैं। उदाहरण के लिए देखिये–

अकबर समंद अथाह, सूरापण भरियौ सजळ।
मेवाड़ौ तिण मांह, पोयण फूल प्रतापसी।।
–पृथ्वीराज

अकबर समंद अथाह, तिहँ डूबा हिन्दू तुरक।
मेवाड़ौ तिण मांह, पोयण फूल प्रतापसी।।
–दुरसा आढ़ा

अकबर एकण बार, दागल की सारी दुनी।
अणदागल असवार, रहियौ रांण प्रतापसी।।
–पृथ्वीराज

अकबरिये इक बार, दागल की सारी दुनी।
अणदागल असवार, एकज राण प्रतापसी।।
–दुरसा आढ़ा

अकबर बादशाह के दरबार में दुरसा को बहुत सम्मान प्राप्त हुआ था। यहां उनकी प्रतिष्ठा बहुत अधिक थी। इतना सब कुछ होते हुए भी उन्होंने अकबर की प्रशंसा में अपनी लेखनी कभी नहीं चलाई। अकबर के समक्ष भी वे सदैव राणा प्रताप की ही प्रशंसा करते थे। इससे कवि की आन्तरिक राष्ट्रीय भावना का स्पष्ट पता चलता है। महाराणा प्रताप की मृत्यु का समाचार जब बादशाह ने सुना तो उनकी आंखें भर आईं और एक लम्बी निश्वास छोड़ी। इस पर दुरसा उनके हृदय के भाव को समझ गये और शीघ्र ही निम्न कवित्त सुनाया–

अस लेगौ अण दाग, पाघ लेगौ अणनांमी
गौ आडा गवड़ाय, जिकौ बहतौ धुर वांमी
नवरोजे नंह गयौ, न गौ आतसां नवल्ली
न गौ झरोखां हेठ, जेथ दुनियांण दहल्ली
गहलोत रांण जीती गयौ, दसण मूंद रसणा डसी।
नीसास मूक भरिया नयण, तो मृत साह “प्रतापसी”।।

कवि के कवित्त में अपने भावों का सच्चा प्रतिबिम्ब देख बादशाह प्रसन्न हुये।

राजस्थानी साहित्य में दुरसा का स्थान बहुत ऊंचा है। इन्होंने अपने ग्रंथों के अतिरिक्त फुटकर रचना भी बहुत की है। ईश-कृपा से इन्होंने दीर्घायु प्राप्त की अतः अनुमान लगाया जा सकता है कि अपने जीवनकाल में इन्होंने प्रचुर मात्रा में साहित्य रचना की। फुटकर रचनाओं में इनके–1. राउ श्री सुरतांण रा कवित्त, 2. झूलणा रावत मेघा रा, 3. दूहा सोळंकी वीरमदेजी रा, 4. गीत राजि श्री रोहितासजी रौ, तथा 5. झूलणा राव श्री अमरसिंघजी गजसिंघोत रा आदि बहुत प्रसिद्ध हैं। दुरसाजी हिन्दू-धर्म, हिन्दू-जाति और हिन्दू-संस्कृति के अनन्य उपासक थे। अपनी कविता में उन्होंने तत्कालीन हिन्दू समाज की विपन्नावस्था और अकबर की कूटनीति का बड़ा ही सजीव, वीर-दर्पपूर्ण एवं चुभता हुआ वर्णन किया है।[3] इनकी भाषा प्रसादगुणयुक्त होने के साथ-साथ ओजपूर्ण एवं प्रभावमयी है जो पाठकों के हृदय पर अपनी छाप छोड़े बिना नहीं रहती। फुटकर रचना के एक गीत का उदाहरण देखिये–

सामौ आवियौ सुरसाथ सहेतौ,
ऊंच बहा ऊदांणा।
अकबर साह सरस अणमिळियां,
रांम कहै मिळ रांणा।।1

प्रम गुर कहै पधारौ “पातल”,
प्राझा करण प्रवाड़ा।
हेवै सरस अणमिळिया हींदू,
मोसूं मिळ मेवाड़ा।।2

एकंकार ज रहियौ अळगौ,
अकबर सरस अनैसौ।
विसन भणै रुद्र ब्रह्म बिचाळै,
बीजा “सांगण” बैसौ।।3

निस्सन्देह दुरसाजी अपने समय के बहुत ऊंचे कवि थे। डिंगल भाषा को ऐसे कवियों पर गर्व है।

[1] दयाळदास री ख्यात, भाग 2, पृ. 118.
[2] राजस्थानी भाषा और साहित्य : डॉ. मोतीलाल मेनारिया, पृष्ठ 137, 139.
[3] डिंगळ में वीररस, पृ. 51.

पृथ्वीराज राठौड़– मध्यकाल में राजस्थानी साहित्य जब अपने उच्च शिखर पर था और दुरसा आढ़ा जैसे कवि अपनी रचनाओं से उसका पोषण कर रहे थे, उसी समय साहित्य क्षेत्र में एक ऐसे व्यक्ति का अवतरण हुआ जिसने अपूर्व साहित्य की रचना कर केवल साहित्य को ही नहीं अपितु राजस्थानी भाषा को भी उन्नति के उच्चतम शिखर पर पहुंचाने में अमूल्य सहयोग दिया। ये व्यक्ति थे, बीकानेर नरेश राव कल्याणमल के पुत्र एवं राव जैतसी के पौत्र श्री पृथ्वीराज राठौड़। इनका जन्म संवत् 1606 में हुआ था। ये उच्च कोटि के कवि एवं योद्धा होने के साथ-साथ पूरे भगवद्भक्त भी थे। इस समय में उत्तरी भारत में व्याप्त भक्ति-लहर से ये भी पूर्ण प्रभावित थे और इसी कारण इनकी रचनाओं में इनकी भक्ति-भावना की झलक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। भक्त कवि नाभादास ने अपनी भक्तमाल में इनका भी गुणगान किया है।[1]

अपनी विशिष्ट विद्वत्ता एवं उच्च कोटि की रचनाओं के कारण राजस्थानी साहित्य के सर्वोत्कृष्ट कवियों में इनका स्थान है। इनके लिखे पांच ग्रंथ मिलते हैं–

1. वेलि क्रिसन रुकमणी री।
2. दसम भागवत रा दूहा।
3. गंगा लहरी।
4. वसदे रावउत, और
5. दसरथ रावउत।

अंतिम चारों रचनायें शांत रस के भक्ति सम्बन्धी छंदों से परिपूर्ण हैं। “दसम भागवत रा दूहा” में कृष्ण भक्ति सम्बन्धी 184 दोहे हैं। “दशरथ रावउत” में श्री रामचन्द्रजी की स्तुति में 50 के लगभग दोहे हैं। “वासदे रावउत” में श्री कृष्ण का गुणानुवाद किया गया है तथा “गंगा लहरी” में गंगा की महिमा का वर्णन करते हुए 80 के लगभग दोहे हैं।

प्रथम रचना “वेलि क्रिसन रुकमणी री” पृथ्वीराज की काव्यमयी प्रतिभा की सर्वोत्कृष्ट रचना है। इसके रचनाकाल के सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद है। एक मत के अनुसार इसकी रचना संवत् 1637 में हुई।[2] इसके समर्थक डॉ. तैस्सितोरी[3] , सूर्यकरण पारीक[4] , रामकुमार वर्मा[5] प्रभृति विद्वान हैं। दूसरा मत डॉ. मोतीलाल मेनारिया का है। इन्होंने सरस्वती भंडार, उदयपुर से प्राप्त वेलि की तीन हस्तलिखित प्रतियों के आधार पर इसका रचनाकाल संवत् 1644 माना है।[6] श्री मेनारिया का अनुमान है कि संवत् 1637 “वेलि” को आरम्भ करने का समय है तथा इसका समाप्ति काल 1644 ही है। यह ग्रंथ डिंगल साहित्य के प्रसिद्ध छंद वेलियौ गीत में लिखा हुआ 305 दोहालों का एक खण्ड काव्य है। यह ग्रंथ साहित्य जगत् में कितनी प्रसिद्धि प्राप्त कर चुका है, इसका अनुमान दुरसा आढ़ा नामक समसामयिक कवि के निम्न छंद से ही लगा सकते हैं, जिसने “वेलि” को “पांचवा वेद” कह कर पुकारा है–

रुकमणि गुण लखण रूप गुण रचावण,
“वेलि” तासु कुण करै वखांण।
पांचमौ बेद भाख्यौ पीथळ,
पुणियौ उगणीसमौ पुरांण।।

“वेलि” की कथा का बीज रूप आश्रय श्रीमद्भागवतपुराण, दशम स्कन्ध के अन्तर्गत अध्याय 52, 53, 54 व 55 से ग्रहण किया गया है। यह बात स्वयं कवि ने ग्रंथ के छन्द 291 में सुन्दर रूपक का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए स्वीकृत की है–

वल्ली तसु बीज भागवत वायौ,
महि थांणौ प्रथुदास मुख।
मूल ताल जड़ अरथ मंडहे,
सुथिर करणि चढ़ि छांह सुख।।291

कथा-विस्तार में श्रीकृष्ण रुक्मिणी के विवाह, उनकी रति-क्रिड़ा और अन्त में प्रद्युम्न के जन्म का वर्णन किया गया है। साथ ही साथ रुक्मिणी का नख-शिख-रूप-वर्णन, षट्ऋतुवर्णन आदि का भी हुआ है, यद्यपि इसका कथा के साथ कोई विशेष सम्बन्ध नहीं है। कथानक केवल बीज रूप में ही ग्रहण किया गया है। काव्य-सौष्ठव व वर्णन-शैली पूर्णतया मौलिक है। जिस समय तुलसीदासजी अपने “रामचरित मानस” की रचना द्वारा वैष्णव भक्ति के प्रचार में संलग्न थे उसी समय राजपूताने में प्रवाहित होने वाली भक्तिधारा में पृथ्वीराज ने यह श्रृंगार रस का अनूठा ग्रंथ लिखा। वीररसात्मक काव्य की प्रचुरता के कारण कुछ लोगों की ऐसी धारणा हो गई थी कि राजस्थानी भाषा तो वीररसात्मक काव्य के लिए ही उपयुक्त है तथा श्रृंगार की श्रेष्ठ कविताओं की रचना इस भाषा में नहीं की जा सकती। “वेलि” की रचना ने यह भ्रम पूर्ण रूप से निवारण कर दिया। भक्ति की भावना के साथ श्रृंगार की रसीली साधना भी है। ग्रंथ में 15 से 24 तक के दोहलों में उच्च श्रृंगार-प्रधान भावमयी उक्तियां भरी पड़ी हैं जिनसे कवि की श्रेष्ठ कल्पना, गहन सूझ एवं मनन का स्पष्ट पता चलता है। कवि ने देवी रुक्मिणी के यौवनागमन एवं वयसंधि का जिस विलक्षण दक्षता से वर्णन किया है उससे कवि की उच्च काव्य-प्रतिभा को स्वीकार करने में कोई सन्देह नहीं रह जाता। जिस विधि से कवि ने अपनी वर्णन-शैली के माध्यम से मानव-विज्ञान एवं दर्शनशास्त्र का सामंजस्य उपस्थित किया है वह किसी भी पाठक के हृदय पर अपनी अमिट छाप छोड़े बिना नहीं रह सकता। वयसंधि का अनुपम श्रृंगारिक वर्णन देखिये–

पहिलौ मुख राग प्रगट थ्यौ प्राची अरुण कि अरुणोद अम्बर।
पेखे करि जागिया पयोहर सज्झा वंदण रिखेसर।।16

इसी प्रकार यौवन प्रकट करने वाले अंगों के उभार के सम्बन्ध में जो कवि की सूझ है वह देखते ही बनती है। यह अद्भुत श्रृंगारिक उक्ति पाठकों के हृदय को छूए बिना नहीं रहती–

आगळि पित मात रमंती अंगणि कांम विरांम छिपाड़ण काज।
लाजवती अंगि एह लाज विधि लाज करंती आवै लाज।।18

इस प्रकार भक्ति के उस युग में रीति का यह मनोरंजक और सरस वर्णन राजस्थानी साहित्य की अनोखी वस्तु है। इस सबका श्रेय राठौड़ पृथ्वीराज को ही है।

153

वेलि का ढांचा प्राचीन राजस्थानी का ही है, किन्तु मध्यकाल की प्रचलित विशेषतायें भी इसमें मिलती हैं। देखा जाय तो वेलि की अक्षरी सर्वथा माध्यमिक राजस्थानी की सी ही है। इतना अवश्य है कि इसकी रचना तत्कालीन बोलचाल की भाषा में न की जाकर साहित्यिक डिंगल में ही की गई है। शब्दों का तोड़-फोड़ करने की जो परम्परा मध्यकाल में रचित राजस्थानी के साहित्यिक ग्रंथों में मिलती है वह “वेलि” में बहुत कम दृष्टिगोचर होती है। इसी विशेषता के कारण यह श्रृंगारिक-काव्य डिंगल भाषा पर कर्णकटुता, कठोरता तथा कांतगुणहीनता आदि के लगाये जाने वाले आरोपों को सर्वथा मिथ्या सिद्ध करने में सफल हो सका है। इस सम्बन्ध में वेलि का संपादन करते हुए श्री रामसिंह तथा श्री सूर्यकरण पारीक ने लिखा है–“वेलि जैसे डिंगल के सर्वोत्तम श्रृंगार ग्रंथ को रखते हुए यह विश्वास करते हैं कि इस ग्रंथ रत्न के उच्चतम भाषा-सौन्दर्य, शब्द-सौष्ठव, छंद-माधुर्य, विविध अलंकृति और अर्थगौरव से मुग्ध होकर सहृदय पाठक न केवल डिंगल भाषा सम्बन्धी काठिन्य एवं श्रुति-कटुत्व के ही भावों को सदा के लिए विस्मृत कर देंगे वरन् यह जान कर कि डिंगल में भी संस्कृत, परिमार्जित हिन्दी तथा अन्यान्य उन्नत प्रान्तीय भाषाओं के समान समस्त काव्य गुणों को धारण करने की पूर्ण क्षमता है, अत्यन्त संतुष्ट होंगे।[7]

वस्तुतः वेलि की भाषा सौन्दर्ययुक्त होने के साथ-साथ पूर्ण प्रवाहमयी है। कवि द्वारा विषयानुकूल शब्द- चयन ने ग्रंथ की सरसता एवं स्वाभाविकता को द्विगुणित कर दिया है। स्वाभाविकता के साथ-साथ कविता की संगीतमयी मधुरिमा ने ग्रंथ को सर्वोच्च स्थान पर लाने में पूर्ण सहयोग दिया है। इसकी एक विशेषता यह और है कि यह श्रृंगारिक काव्य है पर इसकी आत्मा में आध्यात्मिक संदेश निहित है। इसका मूल संदेश भक्तिमय है और वह अवश्य ही साधारण जीवन-निर्वाह के लिए एक आदर्श स्थापित करता है। परन्तु जिस उच्च श्रृंगारिक आवरण में अपनी गहन आध्यात्मिकता प्रस्तुत की वह जन साधारण के लिए बोधगम्य न हो सकी। यही कारण है कि पृथ्वीराज अपने समसामयिक रामभक्त कवि तुलसी की भांति लोक शिक्षा के लिए भक्ति का आदर्श रखने में असमर्थ रहे। कवि की विद्वत्ता एवं अनुभव-दक्षता के सम्बन्ध में किंचित मात्र भी सन्देह नहीं है। उनका यह ग्रंथ ही इस बात का सही प्रमाण है। स्वयं कवि ने भी यह स्पष्ट कर दिया है कि ग्रंथ की गहनता एवं उसका अर्थ ज्ञान प्राप्त करने के लिए पाठक को भी विविध शास्त्रों के मर्म का ज्ञाता होना अत्यन्त आवश्यक है। सत्य तो यह है कि कवि के व्यक्तित्व को समझने पर ही उनकी इस गहन काव्य-चातुरी और विशिष्ट अभिव्यक्ति को हृदयंगम किया जा सकता है। पृथ्वीराज के व्यक्तित्व के विषय में कर्नल टॉड ने लिखा है–

‘Pirthi Raj was one of the most gallant chieftains of the age, and like the Troubadour princes of the west could grace a cause with the soul inspiring effusions of the muse, as well as aid it with his sword; nay in an assembly of the bards of Rajasthan the palm of merit was unanimously awarded to the Rathore cavalier ?’[8]

वास्तव में जो व्यक्ति समस्त भारत की शक्तियों को नतमस्तक करने वाले मुगल साम्राज्य की शक्ति के अधीनस्थ रहते हुए भी अपने देश की स्वतंत्रता की कामना प्रकट कर सके उसके शौर्य्य के आदर्श की सहज ही में कल्पना की जा सकती है। वे राजपूत थे और साहस और उत्साह का मूल्य पहचानते थे। महाराणा प्रताप को लिखे गये पत्र के विशिष्ट ऐतिहासिक महत्त्व से लोग आज भी भली भांति परिचित हैं।

निस्सन्देह “वेलि” समस्त काव्य-गुणों को पूर्णता प्राप्त कर एक अत्यन्त प्रौढ़ कलाकृति हो गई है। ग्रंथ में कला पक्ष एवं भाव पक्ष का जो सुन्दर सामंजस्य उपस्थित हुआ है वह अन्यत्र सुलभ नहीं। वर्ण्य-विषयानुकूल नादसौन्दर्ययुक्त शब्द-चयन, एवं प्रसंगानुकूल भाषा में लोच “वेलि” की अपनी निजी विशेषता है। कवि का प्रकृति-वर्णन जो षड्-ऋतु वर्णन के रूप में हुआ है, परंपरानुगत और पिष्टपेषित नहीं है। कवि ने राजस्थान के ऋतु-परिवर्तनों को बड़ी सूक्ष्म दृष्टि से देख कर उन्हें हूबहू उतारने का सफल प्रयास किया है। वैसे तो कवि ने साधारणतः सभी ऋतुओं के वर्णन में अपनी मौलिक प्रतिभा का परिचय दिया है तथापि इनकी ये सब कल्पनायें इनके अपरिचित वस्तु ज्ञान भंडार एवं निजी सांसारिक अनुभवों पर आश्रित हैं।

“वेलि” की भाषा के लालित्य एवं सहज प्रवाह में अलंकारों का विशेष हाथ है। शब्दालंकार एवं अर्थालंकार दोनों का ही स्वाभाविक रूप से प्रचुर प्रयोग हुआ है। अर्थालंकारों में उपमा, रूपक एवं उत्प्रेक्षा का अधिकाधिक प्रयोग हुआ है। कवि की उपमाओं के सम्बन्ध में डॉ. मेनारिया का कथन है कि “वे अपनी उपमाओं में न केवल उपमेय उपमान का साधर्म्य कथन करते हैं प्रत्युत दोनों के आसपास के पूरे वातावरण को ही शब्दों में ला उतारते हैं जिससे भाव सजीव होकर जगमगाने लगता है।”[9] यथा–

संग सखी सीळ कुळ वेस समांणी,
पेखि कळी पदिमणी परि।
राजति राजकुंअरि राय अंगण,
उडियण बीरज अंबहरि।।

वस्तुतः वेलि अपने काल की प्रौढ़तम रचना है। इसमें राजस्थानी साहित्य का परम्परानुगत प्रेम, भक्ति एवं वीर रस की त्रिवेणी के दर्शन होते हैं। राजस्थानी की पूर्व प्रचलित प्रमुख काव्यधाराओं की समष्टि पूर्णरूपेण हो पाई है। कवि की इस अनुपम कृति के विषय में डॉ. तैस्सितोरी ठीक ही लिखते हैं–

‘The Veli…..is one of the most fulgent gems in the rich mine of the Rajasthani literature…..is one of the most perfect productions of the Dingala literature, a marvel of poetical ingenuity, in which like in the Taj of Agra, elaborateness of detail is combined with simplicity of conception and exquisitness of feeling is glorified in immaculateness of form.’[10]

पृथ्वीराज की कविता-शैली के व्यापक प्रभाव ने न केवल राजस्थानी साहित्य के महत्त्व की अभिवृद्धि ही की अपितु इसने पिंगल पर डिंगल की श्रेष्ठता भी स्थापित कर दी। पृथ्वीराज यदि चाहते तो इस ग्रंथ की रचना पिंगल में भी कर सकते थे। ब्रज भाषा माधुर्यगुण से ओतप्रोत है, किन्तु ओजगुण की उसमें कमी है। डिंगल इस कमी की पूर्ति करती है। बिना ओजगुण के वेलि में वह बल, वह उल्लास, वह लावण्य और वह तेज नहीं होता जिसके दर्शन आज हमें इस ग्रंथ में स्थल-स्थल पर होते हैं। इस मत का प्रतिपादन करते हुए डॉ. तैस्सितोरी लिखते हैं–

‘It is certain that had Prithiraj chosen to compose his Veli in emasculated Pingala, he would have given us a very difference composition, not superior in musicality, and considerably inferior in naivete. But fortunately for us, he preferred to compose in the literary bhasa of his native land, the Dingala of the bards’.[11]

डिंगल ग्रंथों के अतिरिक्त महाराजा पृथ्वीराज ने अनेक फुटकर गीत एवं दोहे भी लिखे हैं। गीत-रचना में उन्होंने चारण परम्परा का ही अनुकरण किया है। महाराणा प्रताप ने जीते-जी अकबरकी अधीनता स्वीकार नहीं की। उनकी प्रशंसा में लिखा पृथ्वीराज का प्रसिद्ध गीत आज भी जनसाधारण में खूब प्रचलित है। उदाहरण के लिए उसे ही हम यहाँ उद्धृत करते हैं[12]

नर जेथि निमांण नीलजी नारी अकबर गाहक वट अवट
आवै तिणि हाटै “ऊदावत” वेचै किम रजपूत वट।।1

रोजाइतां तणै नउरोजै जेथि मुसीजै जणो-जण
चौहटि तिणि आवै चीतोड़ौं “पतौ” न खरचे खत्रीपण।।2

पड़पंच दीठ वध लाज न व्यापति खोटौ लाभ कुलाभ खरौ
रज्ज वेचिवा नायौ “रांणौ” हाटि मीर “हमीर” हरौ।।3

पिंड आपरै दाखि पुरसातण रह अणियाळ तणै बळ रांणै
खत्र वैचियौ जठै वड खत्रिए खत्र राखियौ जठै खुम्मांणि।।4

जासी हाट वात रहिसी जगि अकबर ठगि जासी एकार
रहि राखियौ खत्री ध्रम रांणै सगळौ ई वरतै संसार।।5

इनकी लेखनी में ओज ही नहीं बल्कि रचना के आधार पर इनके हृदय की दृढ़ता एवं ओजस्विता स्पष्ट प्रकट होती है। इनके वीर रस में जहाँ अनुपम ओज की छवि है वहाँ शान्त रस में विरक्ति भाव के दर्शन होते हैं। शान्त रस के एक गीत का कुछ अंश देखिये–

सुखरास रमंता पास सहेली दास खवास मौकळा दांम
न लियौ नांम पखै नारायण “कलिया” उठ चलिया बेकांम।।1

माया पास रही मुळकंती सजि सुंदरि कीधां सिणगार
बहु परिवार कुटंब चौ बाधौ हरि बिन गयौ जमारौ हार।।2

हास हसंता रह्या धौळहर सुखमै राजत जे सिणगार
लाखां धणी पयाणै लांबै जातां नह भेजिया जुहार।।3

x x x

केसर चनण चरचतौ काया भणहणता ऊपर भ्रमर
रजियौ राख तणै पूगरणै घणा मुसांणां बीच घर।।

खाटी सौ दाटी धर खोदे साथ न चाली हेक सिळी
पवन ज जाय पवन बिच पैठौ माटी माटी मांहि मिळी।।

[1] सवैया गीत श्लोक, वेलि दोहा गुण नव रस।
   पिंगळ काव्य प्रमांण, विविध विधि गायौ हरजस।।
   परिदुख विदुख सलाध्य, वचन रसना जु उच्चारै।
   अरथ विचित्रन मोल, सबै सागर उद्धारै।।
   रुकमणी लता बरणण अनुप, वगीस वदन कल्याण सुव।
   नरदेव उभै भासा निपुन, प्रथीराज कविराज हुव।।
[2] हिन्दुस्तानी एकेडेमी प्रयाग से प्रकाशित "वेलि क्रिसन रुकमणी री", पृ. 272, दो. 305.
   वरसि अचळ गुण अंग ससी संवति, तवियौ जस करि श्री भरतार।
   करि श्रवणे दिन रात कंठ करि, पासै स्री फळ भघति अपार।।
[3] "वेलि क्रिसन रुकमणी री" एशियाटिक सोसाइटी, कलकत्ता, Introduction, Page IX.
[4] "वेलि" (हिन्दुस्तानी एकेडेमी) भूमिका, पृ. 97, 99.
[5] हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास, पृ. 112 (प्रथम संस्करण)
[6] क. सोळह सै संबत चमाळै वरसै, सोम तीज वैसाख सुदि। (सं. 1701 की प्रति)
   ख. सोळह सै संवत चमाळै वरखै सोमतीज वैसाख समंधि। (सं. 1728 की प्रति)
   ग. सोळह सै संवत चमाळीसै वरसै, सोम तीज वैसाख सुदि। (सं. 1795 की प्रति)
[7] वेलि क्रिसन रुकमणी री : सं. ठाकुर रामसिंह तथा पं. सूर्यकरण पारीक, हिन्दुस्तान एकेडेमी, प्रयाग से प्रकाशित-- भूमिका पृष्ठ 109
[8] 'Annals of Mewar' Chapter XI, Page 273 of Routledge's edition.
[9] राजस्थानी भाषा और साहित्य : डॉ. मोतीलाल मेनारिया, पृष्ठ 125.
[10] वेलि क्रिसन रुकमणी री--सम्पादक डॉ. एल. पी. तैस्सितोरी, भूमिका, पृ. 1.
[11] वेलि क्रिसन रुकमणी री--सं. डॉ. तैस्सितोरी, भूमिका, पृ. 12. 
[12] वही, पृ. 4.

लक्खोजी– ये रोहड़िया शाखा के चारण मारवाड़ राज्य के अन्तर्गत साकड़े परगने के नानणियाई ग्राम के निवासी थे। ये बादशाह अकबर के कृपापात्रों में थे। ऐसा कहा जाता है कि अकबर ने इन्हें मथुरा के पास अन्तर्वेद में साढे तीन लाख की जागीर दी और मथुरा में रहने के लिए हवेली प्रदान की। बादशाह ने उन्हें “वरण पतसाह” अर्थात् चारणों के बादशाह की उपाधि भी दी थी जिसके प्रमाण में यह दोहा है–

अकबर मुंह सूं आखियौ, रूड़ौ कहै दोहूं राह,
मैं पतसाह दुन्यानपत, लखा बरण पतसाह।

“दयाळदास की ख्यात” में बीकानेर नरेश रायसिंह द्वारा इन्हें एक करोड़ पसाव और दो हाथी देने का उल्लेख मिलता है।[1] इनके नाम के दो पट्टे मिलते हैं। एक पट्टा संवत् 1658 और दूसरा सं. 1672 का है। इनसे इनका बादशाह अकबर के समय से लेकर जहांगीर के समय तक विद्यमान रहने का पता चलता है। इनका लिखा एक ग्रंथ “पाबू रासौ” मिलता है। इसके अतिरिक्त इन्होंने अन्य फुटकर गीतों की रचना के साथ राठौड़ पृथ्वीराज की “वेलि” पर टीका भी लिखी थी। “पाबू रासौ” दोहा छंद में रचित एक चरित्र काव्य है जिसमें पाबूजी राठौड़ के जीवन-चरित्र का वर्णन है। इनका रचा एक गीत जैमळ मेड़तिया की प्रशंसा में मिला है।

।।गीत।।
गज रूप चढ़ण अंग रहण असंभगति,
पहप कमळ दैसोत पगि,
जिम जगदीसर पूजतौ “जैमल”
जैमल तिम पूजिजै जगी।।

गज आरोह वद वद गढ़पति,
चौसरा धरि बंदे चलण,
“वीर” तणौ अरचतौ विसंभर,
तिम अरचीजै आपतण।

मोटा पहु आराध करै महि,
मोटे गढ़ लीजतै मुऔ,
जगि हरि भगत तुहाळौ “जैमल”,
हरि सारीख प्रताप हुऔ।

रथि हाथ रूक समरथ रे खगि,
महिपति पग तिस अेक मण,
प्रम कमधज जिण वडम पूजतौ,
आप वडिम सूजि आचरण।।

[1] दयाळदास री ख्यात, भाग 2, पृ. 105, 118, 124.

इस शताब्दी में एक ओर जहाँ कवि लोग राजा-महाराजाओं के यशोगान, उनका देश-प्रेम और वीरता की प्रशंसा में अपनी ओजस्विनी वाणी द्वारा प्रचुर मात्रा में वीर-रस की रचना कर रहे थे, वहाँ दूसरी ओर भक्ति के प्रभाव से भक्त कवि लोग शान्त रस की अधिकाधिक रचना कर साहित्य की अभिवृद्धि कर रहे थे। इन भक्त कवियों में केसोदास गाडण, माधोदास दधवाड़िया, सायांजी झूला आदि का नाम उल्लेखनीय है। यहाँ संवत्-क्रम के अनुसार इन्हीं के साहित्य का परिचय दे रहे हैं।

केसोदास गाडण– ये गाडण शाखा के चारण थे। इनका जन्म जोधपुर राज्यान्तर्गत गाडणों की बासनी में सदामल के घर संवत् 1610 में हुआ था। डॉ. मोतीलाल मेनारिया ने इन्हें सोजत परगने के चिड़िया नामक गांव का निवासी बताया है[1] जो अशुद्ध है। इनके विषय में यह बात प्रसिद्ध है कि ये गृहस्थ होते हुए भी सदैव साधुओं की भांति गेरुआं वस्त्र पहिनते थे। इस विषय में और इनकी प्रशंसा में “वेलि क्रिसन रुकमणी” के रचयिता राठौड़ पृथ्वीराज ने निम्न दोहा कहा था–

“केसौ” गोरखनाथ कवि, चेलौ कियौ चकार।
सिध रूपी रहता सबद, गाडण गुण भंडार।।

केसोदास महात्मा ईसरदास के समकालीन ही थे। ईसरदास की प्रशंसा में इन्होंने निम्न दोहा कहा है–

जग प्राजळतौ जांण, अघ दावानळ ऊपरां।
रचियौ रोहड़ रांण, समंद हरी रस सूरवत।।

कहा जाता है कि इसके बदले में ईसरदास ने भी उनकी रचना की प्रशंसा निम्न दोहा कह कर की–

नीसांणंद नीसांण, “केसव” परमारथ कियौ।
पोह स्वारथ परमांण, सो बीसोतर बरण सिर।।

केसोदास जोधपुर के महाराजा गजसिंहजी के कृपा-पात्र थे। इनके अनुसार इनका रचनाकाल लगभग 1640 के पश्चात् ही माना जा सकता है। संवत् 1697 में इनका देहान्त हो गया था। इनकी रची हुई निम्नलिखित रचनायें कही जाती हैं–

1. गुणरूपक बंध, 2. राव अमरसिंहजी रा दूहा, 3. नीसांणी विवेक वारता, 4. गजगुण चरित और अन्य फुटकर दोहे, गीत आदि।

इन ग्रंथों में “गुणरूपक” सबसे बड़ा ग्रंथ है। ग्रंथ का विषय वही है जो हेम कवि ने अपने ग्रन्थ “भाखा चरित्र” का रक्खा है। विषय समान होते हुए भी “गुणरूपक” हेम कवि के ग्रन्थ से विस्तार में कहीं अधिक है। महाराजा गजसिंह ने मुगल बादशाह जहांगीर की ओर से शाहजादा खुर्रम के विरुद्ध युद्ध किया था। यह युद्ध संवत् 1681 में हुआ था और कवि ने अपना ग्रन्थ भी सं. 1681 में सम्पूर्ण किया जैसा कि “गुणरूपक” के अंतिम कवित्त में लिखा है–

सोळह सै संमत हुऔ, जोगणपुर चाळौ
समै एकासियै मास काती बडाळौ

पूनम थावर वार सरद रितु है पळट्टी
वीर खेत पूरब्ब रितु हेमंत प्रगट्टी।

सुरतांण खुरम भागौ, भिड़े चाड़ चिकत्था चक्कवै।
गजसिंह प्रवाड़ौ खाट्टियौ, गिळे भीम चित्तौड़वै।

इसी ग्रंथ पर प्रसन्न होकर महाराजा गजसिंह ने इनको एक लाख पसाव का पुरस्कार दिया था। दोहा, कवित्त, गाहा, अड़ल, मथाणा इत्यादि मिला कर कुल एक हजार छन्द इस ग्रन्थ में हैं। उदाहरण के लिए निम्न छंद देखिये–

गरजंति धनख गुणबांण बणण घण,
आग अकारण उडवियं।
गज थाटां गहण गणण गयणंगण,
सोक सणण भरपूर थियं।
धड़हड़ि धक धोम वळिक खग धड़ि धड़ि,
रावत वड़ि वड़ि रोस चडै।
गड़ि गड़ि नीसांण गयण किरि गड़िअड़,
खांडा खड़ि खड़ि खाट खड़ै।।

“नीसांणी विवेक वारता” इनकी शान्त रस की रचना है जिसमें वेदान्त का वर्णन है। यह 33 नीसांणी छंद[2] का ग्रन्थ है। कवि की आस्था परब्रह्म में प्रकट होती है। परब्रह्म की स्तुति की एक नीसांणी देखिये–

फूलां मझे वासना तिल तेल वलाया,
वेसन्नर लकड़ी पाखांण जिम लोह लुकाया,
थण मझे जिम खीर सीर ऊदरत कहाया,
आठां अंगां मझ लै तत पांचे कहाया,
गोरस चोपड़ एकठा दोय हेक देखाया,
सूरिज घांम संजोईया जिम आग उनाया,
जिम चेतन मनख वन मंझ मन मंडे माया,
आदर खांणी अध भुजां जिम बीज बंधाया,
कांसा मझे गेबका जिम सबद सुणाया,
पांणी हंदे प्रतीबिंब जिम दरपण छाया,
दैवां देतां अहि नरां एह ग्यांन दढ़ाया,
विण खोज्यां पाया नहीं खोज्या जिहां पाया।

[1] राजस्थानी भाषा और साहित्य : डॉ. मोतीलाल मेनारिया, पृ. 119.

[2] छंद में प्रायः चार पंक्ति होती हैं परन्तु नीसांणी छन्द में जहां तक तुकबन्दी मिलती है वहाँ तक एक ही नीसांणी रहती है। पंक्तियों की सीमा-रेखा से यह छन्द मुक्त है। तुक के अनुसार पंक्तियों की कमी व अधिकता हो सकती है।

माधोदास दधवाड़िया– केसोदास गाडण के समकालीन भक्त कवियों में माधोदास दधवाड़िया का नाम भी बड़े आदर के साथ लिया जाता है। इनका जन्म जोधपुर राज्य के बलूंदा ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम चूंडाजी था। इनका जन्मकाल निश्चित तो नहीं है पर कई विद्वानजन अपनी अटकल से सं. 1610 और 1615 के मध्य किसी समय मानते हैं। जोधपुर नरेश सूरसिंहजी इनके आश्रयदाता थे। पृथ्वीराज राठौड़ से भी इनका अच्छा परिचय था। “वेलि” को सुन कर ये बड़े खुश हुए और मुक्त कंठ से पृथ्वीराज की इस रचना की प्रशंसा की। इस पर पृथ्वीराज ने भी इनकी प्रशंसा में निम्न दोहा कहा–

चूंडे चत्रभुज सेवियौ, ततफळ लागौ तास।
चारण जीवौ चार जुग, मरौ न माधौदास।।

इनका रचनाकाल सत्रहवीं शताब्दी का तृतीय चरण ही माना जा सकता है। मिश्र-बन्धुओं ने इनका कविताकाल सं. 1664 माना है।[1] ऐसा कहा जाता है कि इनके जीवन के अन्तिम काल में मुसलमान लोग इनकी गायें चुरा कर ले गये। इनको पता लगने पर अपने पुत्र को साथ लेकर उनका पीछा किया और उनसे युद्ध किया। इसी युद्ध में सं. 1690 में उनका स्वर्गवास हुआ।

माधोदास उच्च कोटि के कवि एवं धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे अतः इनकी रचना शान्त रस से ओतप्रोत है। इनके रचे हुए तीन ग्रन्थ प्राप्त हैं। 1. रामरासौ, 2. भासा दसमस्कंध, और 3. गजमोख।

“रामरासौ” इनका सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ है जो सोलह सौ से अधिक छंदों का एक वृहत् ग्रन्थ है। इसमें राम कथा का विविध छंदों में विस्तार के साथ वर्णन किया है। इसमें साहित्यिक डिंगल एवं बोलचाल की राजस्थानी का सुन्दर मिश्रण है। इसी के प्रभाव से ग्रंथ की भाषा सरस एवं प्रवाहमय हो पाई है। सीता-हरण के पश्चात् सूनी कुटिया के द्वार पर राम का विलाप-वर्णन देखिये–

लखमंण सूना झूपड़ा सीता चोर पइठ।
वर धण दीसौ नाह विण, धण विण नाह म दिठ।
तरि तरि पेखि न कलपतरू, सर सर हंस म सोझि।
कुसळ न लखमंण जांनकी, नडि नडि विहड़ न खोजि।
भंणि भंणि सीत सुभांम, वंन वंन खिण खिण विचरतां।

व्यापै रांम विरांम, जळ तोछै थळ माछ जिम।

“गजमोख” नीसांणी छंदों में लिखी गई छोटी रचना है। महाभारत की “गज-ग्राह” कथा के आधार पर इसकी रचना की गई है। इसके अतिरिक्त कवि के अन्य फुटकर गीत भी मिलते हैं।

[1] मिश्रबन्धु विनोद : प्रथम भाग, पृ. 376.

सायांजी झूला– भक्त कवियों में सायांजी झूला का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। इनका जन्म संवत् 1632 में और मृत्यु 1703 में हुई। ये ईडर नरेश राव कल्याणमल के आश्रित थे। सायांजी श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त थे। अपनी समस्त कविता इन्होंने भगवान् श्रीकृष्ण के सम्बन्ध में लिखी है जो भक्तिरस से परिपूर्ण है। इनकी भाषा परिमार्जित एवं प्रभावोत्पादक है। कहीं-कहीं पर गुजराती का प्रभाव भी दृष्टिगोचर होता है। सायांजी स्वयं काठियावाड़ी थे अतः उनकी कविताओं में गुजराती का पुट होना संभव ही है।

इनके लिखे दो ग्रंथ मिलते हैं–1. रुषमणीहरण तथा 2. नागदमण। दोनों ही ग्रंथ कृष्णभक्ति सम्बन्धी हैं। “रुषमणी-हरण” में भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा रुक्मिणी का हरण एवं उन दोनों के विवाह की कथा का वर्णन है। यह 436 छंदों का एक प्रसिद्ध ग्रंथ है। इसके सम्बन्ध में अकबर का यह कथन है कि पृथ्वीराज की वेलि को सायांजी के “हरणिया” चर गये, बहुत प्रचलित है। वास्तव में ऐसी बात नहीं है, पृथ्वीराज की “वेलि” सर्वश्रेष्ठ काव्यकृति है और “रुषमणी हरण” एक साधारण श्रेणी का वर्णनात्मक ग्रंथ। इन दोनों की तुलना करना ही अनुचित है।

सायांजी का दूसरा ग्रंथ “नागदमण” है। इसमें 127 भुजंगप्रयात, 4 दोहे तथा एक छप्पय कुल मिला कर 132 छंद हैं। ग्रंथ में विषयों के वर्णन की शैली जो कवि ने अपनाई है उससे इसकी विशेषता अधिक बढ़ गई है। कवि ने कृष्ण की बाललीला-वर्णन, नागणी के साथ संवाद तथा कालिया-मर्दन का सजीव चित्रण उपस्थित किया है। ग्रन्थ की भाषा प्रसाद-गुणयुक्त तो है ही तथापि विषयानुकूल वात्सल्य, माधुर्य, ओज, भय, विस्मय आदि भावों की सुन्दर अभिव्यक्ति के कारण उसमें विशेष रस प्रवाहित हो गया है। कवि के दोनों ही ग्रन्थों के उदाहरण यहाँ नीचे दिए जाते हैं–

।।रुखमणी हरण।।
स्रीक्रसन भेटबा देवळ दिस संचरी।

पाखती पूज रै साज बहु परवरी।
मेघमाळा जही सोमरथ सारखी।
पींजरै अंबरै गरद री पालखी।।
दुलहणी पाखती हालियौ हेम दळ।
मयंक खड़िया मले जांण तारा-मंडळ।
आव ऊभा सया काज संकेत रा।
देहळी ओळंगी भीतरै देहरा।।
वींटियौ आव चक्रवेध चहुंवै वळे।
देहरा सहित सिसपाळ वाळै दळै।
गैदळां हैदळां पैदळां गूंथणी।
चालतौ कोट चौफेर लीधौ चुणी।।

।।नागदमण।।
कृष्ण कालिय नाग का मर्दन कर उसके फणों पर सवार होकर व्रजवासियों को दर्शन देते हैं, इसका वर्णन देखिये–

उवारे घणां आप आपे अरच्चे
चुवे चंदणं कासमीरी चरच्चे

अही नाथियौ पोयणी नाळ आणे
अस्सवार आपे हुवे अप्पलांणे।।121

काळी मारियौ कम्मळांमार कांने
पड़्यौ आय पाताळ सुं आप पांने

अस्सवार काळी तणौ कांन आयौ
विवीधं विधी व्रज्ज नारी वधायौ।।122

हेम सामोर– कवि हेम, सामोर शाखा के चारण, बीकानेर राज्यान्तर्गत सीथल गाँव के निवासी थे। ये जोधपुर के महाराजा गजसिंह के कृपा-पात्र थे। संस्कृत, प्राकृत, फारसी के विद्वान होने के कारण इनका विशेष सम्मान था। इनका रचनाकाल संवत् 1685 के आसपास माना जा सकता है। इनका लिखा हुआ “गुण भाखा चरित्र” नामक एक ग्रन्थ मिलता है जिसमें महाराजा गजसिंहजी का चरित्र वर्णित है। इसी ग्रन्थ के युद्ध-वर्णन का एक उदाहरण देखिये–

व्है ऊजळा वीजळा सार वज्जै।
भड़ां अंधळां कंधळां कंध भज्जै।

डळां हड्डळां गुड्डलां टूट उड्डै।
वड़ां अत्तुळां सातळां नीर बुड्डै।।1

चळां रत्तळां वाहळां स्रोण चल्लै।
झुकै कम्मळां सम्मळां भुक्ख झल्लै।

रुळां अंतुळां तंतुळां घाव रूकां।
हुळां साबळां स्रोण भब्भक्क हूकां।।2

इस काल में संत कबीर के उपदेशों का जनता पर अच्छा प्रभाव पड़ रहा था। कबीर पंथ की सफलता से प्रभावित होकर राजस्थान में भी कुछ उसी प्रकार के पंथों की नींव पड़ी, जिनमें दादू पंथ, चरणदासी पंथ आदि प्रमुख हैं। संत-साहित्य के सम्बन्ध में पर्याप्त लिखा जा चुका है। इसी संत-परम्परा में जो कवि हुए उनमें से कुछ संत तो ऐसे भी हुए जिनका भाव-प्रदर्शन के साथ-साथ काव्य-चमत्कार एवं भाषा-लालित्य पर भी अधिकार था। कला पक्ष की दृष्टि से भी उनकी कविता उच्च कोटि की होती थी, किन्तु ऐसे संत कवियों की संख्या अधिक नहीं थी। अधिकतर संत कवियों ने जो कुछ लिखा उनमें अपने धर्म-सिद्धांतों के प्रचार तथा प्रसार की भावना अधिक थी, साहित्य-सौन्दर्य उनमें उतना नहीं है।

दादूदयाल– संत कवियों में दादूदयाल का स्थान बहुत ऊंचा है। संवत् 1631 में इन्होंने ब्रह्म-संप्रदाय की स्थापना की, जिसका कार्य वे मृत्युपर्यन्त अविच्छिन्न रूप से चलाते रहे। ये कबीर के समकालीन नहीं थे, किन्तु इनकी रचनाओं पर कबीर का प्रभाव स्पष्टतः लक्षित होता है। महात्मा दादूदयाल के जन्म एवं जन्म-स्थान के सम्बन्ध में कोई निश्चित प्रमाण नहीं है। अनेक विद्वानों के मतानुसार ये संवत् 1601 में अहमदाबाद नगर के ब्राह्मण लोदीराम को साबरमती में बहते हुए एक शिशु के रूप में प्राप्त हुए थे। उन्होंने ही इनका पालन-पोषण किया। इनके प्रारम्भिक जीवन के संबंध में विशेष वृत्तान्त उपलब्ध नहीं है।

दादू की भाषा मुख्यतः राजस्थानी है। कहीं-कहीं गुजराती और पश्चिमी हिन्दी का तथा बहुत ही कम पंजाबी का मिश्रण पाया जाता है।[1] दादूजी ने अपने भावों तथा सिद्धांतों को वाणियों के रूप में ही प्रकट किया है जिनमें इनकी आत्मानुभूति की अभिव्यक्ति प्रतीत होती है। दादूदयाल की वाणियों का संकलन एवं संग्रह इनके शिष्यों ने किया है। वाणियों की सरलता ही इनकी अपनी विशेषता है। इनकी वाणी का निम्न उदाहरण देखिये–

जीवां मांहै जीव रहै, ऐसा माया मोह।
सांईं सूधा सब गया, “दादू” नहीं अंदोह।।1
दादू इण संसार सां, निमखन कीजौ नेह।
जांमण मरण आवटण, छिन-छिन दाझै देह।।2
आपै मरै आपकूं यह जीव विचारा।
साहिब राखणहार है, सो हितू हमारा।।3
मरिबै की सब ऊपजै, जीबै की कछु नाहिं।
जीवै की जांणै नहीं, मरबै की मन मांहि।।4
दादू नीका नांव है, तीन लोक ततसार।
रात दिवस रटिबौ करै, रे! मन इहै विचार।।5
दादू सब जग निरधना, धनवंता नहिं कोइ।
सो धनवंता जांणिए, जाके रांम पदारथ होइ।।6

[1] राजस्थानी भाषा और साहित्य : डॉ. हीरालाल माहेश्वरी, पृ. 284.

रज्जबजी– महात्मा दादू की शिष्य-परम्परा में रज्जबजी नाम के प्रसिद्ध संत हुए हैं। ये दादू के प्रधान शिष्यों में थे। रज्जबजी की साखियाँ जनसाधारण में बहुत प्रचलित हो चुकी हैं और उनकी वाणी को बहुत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। इनके रचे दो ग्रंथ प्राप्त हैं–1. “बांणी” जिसमें साखी और अनेक पद हैं और 2. “सर्वंगी” जिसमें अपनी वाणी के साथ पूर्वकालीन महात्माओं के वचन संगृहीत हैं। अपने निजी ज्ञान एवं अनुभव के कारण उनकी वाणी में विशेष प्रभाव छलक आया है।

रज्जबजी का जन्म सांगानेर में एक सैनिक पठान के घर हुआ था। इनका जन्म-संवत् कहीं लिखा नहीं मिलता। साधुजनों में प्रचलित मत से वे 122 वर्ष की आयु प्राप्त कर चुके थे। उनकी मृत्यु सं. 1746 के लगभग मानी जाती है इसके अनुसार उनका जन्मकाल सं. 1624 ठहरता है।[1] ऐसा कहा जाता है कि रज्जबजी जब विवाह के लिए जा रहे थे तब आमेर में दूल्हे के वेश में ही दादूजी से मिले और वहीं उनके शिष्य बन कर वैराग्य ले लिया। यहां सन्त सत्संग के प्रभाव से उनके ज्ञान की अभिवृद्धि हुई और धीरे-धीरे वे अपनी वाणी भी सुनाने लगे। इस समय उनके भी शिष्य हो गये जो सावधानीपूर्वक इनकी वाणियों को लिखते रहते। उनकी ज्ञान-पिपासा अत्यन्त प्रबल थी और इसकी शांति के लिए वे सतत् प्रयत्नशील रहते। धीरे-धीरे इनका अनुभव बढ़ता ही चला गया और वे दादूजी के प्रिय एवं प्रधान शिष्यों में हो गये। वे अपने गुरु के अनन्य भक्त थे एवं अपने गुरु में अटूट श्रद्धा रखते थे। एक बार दादूजी रज्जबजी के “अस्थल” पर सांगानेर पधारे तब उन्होंने अपने गुरु की बड़े प्रेम और भक्तिभाव से सेवा की। इस प्रसंग में उन्होंने कुछ छंद और पद भी कहे हैं। गुरु-भक्ति का उदाहरण देखिये–

रज्जब रजा खुदाय की, पाया दादू पीर।
कुल मंजिल महरम किया, दिल नांही दिलगीर।।
देख्या पारस परसतां, लोहे लाभ सुलीन।
रज्जब गुर दादू मिळत, सो गति हमसों लीन।।
गुर दादू का हाथ सिर, हिरदे त्रिभुवन नाथ।
रज्जब डरिए कौन सों, मिळिया सांईं साथ।।

रज्जबजी की भाषा साधारण राजस्थानी की बोलचाल की भाषा है। इस सरल भाषा में उन्होंने अपने गम्भीर ज्ञान एवं उच्च अनुभव को ऐसे सुन्दर ढंग से व्यक्त किया है कि जिज्ञासुओं को उनकी उक्तियों में रत्न भरे मिलते हैं। दृष्टान्तों के प्रयोग से रचना का भाव-वैचित्र्य और भी बढ़ गया है और “वांणी” प्रभावपूर्ण बन गई है। रज्जबजी के जीवनकाल में ही उनके अनेक भक्त शिष्य बन गये जिन्होंने अपनी वाणियाँ रच कर अपने गुरु रज्जबजी को भेंट कर दी। अब यहाँ रज्जबजी की रचना का उदाहरण देखिये–

संतो मगन भयौ मन मेरौ।
अहनिस सदा एक रस लागा, दियौ दरीबै डेरौ।।
कुळ मरजाद मैंड सब भागी, बैठा भाठी नेरौ।
जाति पांति कछु समझौं नाहीं, किसकूं करै परैरा।।
रस की प्यास आस नहिं औरों, इहिं मत किया बसेरा।
ल्याव-ल्याव याही लै लागी, पीवैं फूल घनेरा।।
सो रस मांग्या मिळै न काहू, सिर साटै बहुतेरा।
जन रज्जब तन मन दै लीया, होय धणी का चेरा।।

x x x

रज्जब सांचा सूर कौ, बेरी करै बखांण।
साध सराहै सो सती, जती जोखता जांण।।
रजब पराये बाग में, दाख तोर कर खाहि।
अपणू कछू न बीगरै, असही सही न जाहि।।
रज्जब पारस परसतै, मिटिगौ लोह बिकार।
तीन बात तौ रहि गई, बांक धार अरु मार।।
रज्जब ऐसा मन करौ, जैसा पहिली था।
जांणै रस्सा मूंज का, लाध्या ही न था।।
सरज्यौ आवै अरस सूं, बूठां करै सुकाळ।
अण सरज्यौ रज्जब कहै, खादौ देत उखाल।।
भली कहत मांनत बुरी, यह परक्रति है नीच।
रज्जब कोठी गार की, ज्यूं धोवे ज्यूं कीच।।

[1] "राजस्थान" वर्ष 1, संख्या 2, महात्मा रज्जबजी, पुरोहित श्री हरिनारायण, पृ. 68-69.

हरिदास– इनके भी प्रारम्भिक जीवन के विषय में प्रामाणिक रूप से कुछ भी ज्ञात नहीं है। अन्य प्राचीन संतों की भांति इनका जीवन चरित्र भी जनश्रुति के आधार पर ही ज्ञात है। कोई इन्हें बीदा राठौड़ और कोई जाट बतलाते हैं। कुछ भी हो, इतना अवश्य है कि ये एक उच्च कोटि के संत और सहृदय कवि थे। अनुमानतः ये सत्रहवीं शताब्दी के मध्य में ही हुए हैं। इनके मृत्युकाल के सम्बन्ध में भी विद्वानों के भिन्न-भिन्न मत हैं। कुछ मृत्यु-संवत् 1700[1] मानते हैं तो किन्हीं ने अपने मतानुसार सं. 1595[2] और सं. 1600[3] भी दिया है।

इनके विषय में यह प्रसिद्ध है कि इनकी भक्ति-साधना से इनकी ख्याति डीडवाणे के आसपास के क्षेत्रों में फैल गई थी और वहीं पर इनके कई शिष्य भी हो गए थे। हरिदास ने अपने जीवनकाल में निरंजन निराकार की उपासना कर एक नवीन सम्प्रदाय का प्रचलन किया जो आगे चल कर निरंजनी सम्प्रदाय कहलाया। डीडवाने के निकट ही गाढ़ा नामक गांव इनका प्रमुख स्थान है जहाँ प्रति वर्ष फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष में 1 से 12 तक मेला लगता है।

हरिदासजी ने भले ही निरंजन निराकार की उपासना के आधार पर नवीन मत का प्रतिपादन कर एक नए सम्प्रदाय को जन्म दिया हो, परन्तु उनकी रचना-शैली और भक्ति-साधना के आधार पर उन्हें निर्गुणमार्गी संतों की परम्परा से पृथक् नहीं माना जा सकता। इनकी रचना ज्ञान, भक्ति और वैराग्य से सराबोर है। इन पर कबीर का प्रभाव स्पष्ट रूप से झलकता है। इसी के फलस्वरूप इनकी रचना में साम्प्रदायिक कट्टरता की घोर भर्त्सना मिलती है। विषय-निरूपण का ढंग इनका अपना निजी है जो सुन्दर भाषा के प्रयोग के कारण अत्यन्त चित्ताकर्षक बन पड़ा है। इनकी रचना का उदाहरण देखिये–

स्याह लाल जरदा सफेद, गिरिवर सुत हाथि हजूरि।
लोह पलटि कंचन करे, सोतो पारस कहूं दूरि।।
हीरा की सोभा कहां, सोतो चोर ले जाय।
वो हीरा कोइ और है, उलटि चोर कूं खाय।।
मन मरजी वा तन समंद, उलटा गोता खाय।
हीरा ले न्यारा रह्या, खरा जळ न सुहाय।।

(शब्द परीक्षा योग से)

मन पंखिया मैं तू जांण्यौ रे भाई। उलटै खेलि परम निधि पाई।।
अगम अगाहि अंतरि अविनासी। मन निहचळ काया तन कासी।।
अवरण वरण करम नहिं काया। सूछिम व्रछ सूं सीतळ छाया।।
जन हरिदास निरभै भै नांही। (म्हारौ) प्रांण बसै हरि तरवर मांही।।

[1] "श्री हरिपुरुषजी की वांणी" में वर्णित हरिदास का संक्षिप्त जीवन-चरित्र--साधु देवदास : जोधपुर सं. 1988.
[2] मरु भारती, वर्ष 4, अंक 1, अप्रेल 1956. पंद्रह सौ पचांणवें, सुद फागण छठ जांण, वीसा सो वपु राख के, पहुंचे पद निर्वांण।
[3] वही : संवत सोळह सै सईकै, हरि पुरुस गये धांम हरि कै।

समयसुन्दर– सत्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में अपनी अनूठी साहित्यिक रचनाओं के कारण विशेष ख्याति प्राप्त करने वालों में जैन कवि समयसुन्दर का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इनका जन्म जोधपुर राज्यान्तर्गत सांचोर ग्राम में हुआ था जो कवि स्वयं द्वारा लिखित “सीताराम चतुष्पदी” के खण्ड 6 ढाल तीसरी के अन्तिम पद से प्रकट होता है–

“मुझ जनम स्री सांचोर मांहि,
तिहां च्यार मासि रह्या उछाहि।

इनका जन्म-समय अज्ञात है तथापि अनेक विद्वानों ने अनुमानतः सं. 1620 माना है।[1] आपने सत्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से मृत्युपर्यन्त लगभग 50 वर्ष तक निरन्तर साहित्य की सेवा करते हुए विशाल साहित्य का निर्माण किया। कवि समयसुन्दर अपनी भावुकता और औदार्य के कारण ही कवि थे। ये अपने समय में अपनी विशालहृदयता के कारण अत्यधिक प्रसिद्ध थे। संवत् 1687 में गुर्जर देश में होने वाले भयंकर दुष्काल ने इनके जीवन को और भी कारुणिक और दयनीय स्वरूप प्रदान किया। कविवर इस प्रकार सर्वतोमुखी प्रतिभा को धारण करने वाले एक उद्भट विद्वान थे। साहित्य-चर्चा करने वाले उत्कृष्ट वाचक के साथ-साथ ये श्रेष्ठ कवि भी थे। इन्होंने अपनी लेखनी से अनेकार्थी साहित्य, व्याकरण, साहित्य, ज्योतिष, पादपूर्ति साहित्य, सैद्धान्तिक और भाषात्मक गेय साहित्य की मौलिक रचनायें और टीकायें ग्रंथित कर जो भारतीय वाङ्मय की सेवा की है, वह वस्तुतः अनुपमेय है।[2] इनके द्वारा रचित अपार साहित्य के कारण यह स्पष्ट ही है कि ये अपने समय के अत्यन्त प्रख्यात कवि और प्रौढ़ विद्वान थे। कविवर की “पुण्य छत्तीसी” का उदाहरण देखिये–

पुण्य तणा फळ परतिख देखौ, करौ पुण्य सहु कोय जी।
पुण्य करंतां पाप पुळावे, जीव सुखी जग होय जी।
अभयदांन सुपात्र अनोपम, वळि अनुकंपा दांन जी।
साधु स्रावक धर्म तीरथ यात्रा, सील धर्म तप ध्यांन जी।।
इनके “बारह मासा” वर्णन का कुछ अंश नीचे दिया जाता है–
सखि आयउ स्रांवण मास, पिउ नहीं मांहरइ पासि।
कंत बिना हुं करतार, कीधी किसा भणी नारि।।
भाद्रवइ वरसइ मेह, विरहणी धूजइ देह।
गयउ नेमि गढ़ गिरनारि, निरवही न सकी नारि।।
आंसू अमी झरइ चंद, संयोगिनी सुखकंद।
निरमळ थया सर नीर, नेमि बिना हुं दिलगीर।।
कातियइ कामिनी टोळ, रमइ रासड़इ रंग रोळि।
हुं घरि बइसी रहि एथि, मन माहरउ पिउ जेथि।।

[1] समयसुन्दर-कृत "कुसुमांजली" : सम्पादक अगरचन्द नाहटा, भंवरलाल नाहटा, में महोपाध्याय विनयसागर द्वारा लिखित कविवर का जीवन चरित्र, पृ. 2 का फुट नोट।
[2] समयसुन्दर-कृत "कुसुमाञ्जली" : सम्पादक, अगरचन्द नाहटा, भंवरलाल नाहटा, में महोपाध्याय विनयसागर द्वारा लिखित कविवर का जीवन चरित्र, पृ. 50-60.

कल्याणदास मेहडू– ये डिंगल के कवि जाडा मेहडू के पुत्र थे और जोधपुर के महाराजा गजसिंह के कृपा- पात्रों में थे। इनका रचनाकाल संवत् 1685 के लगभग था। ये असाधारण गुण-सम्पन्न प्रतिभावान व्यक्ति थे। ये वीरता के उपासक थे अतः इनकी रचना अधिकतर वीर पुरुषों और वीर जातियों की प्रशंसा में ही लिखी हुई मिलती है। भाषा पूर्ण मजी हुई और भाव उच्च कोटि के हैं। इनके सुन्दर गीतों और इनकी असाधारण काव्य-प्रतिभा के कारण ही महाराजा गजसिंह ने इनको लाखपसाव प्रदान किया था।[1]

बूंदी के वीर हाडा राव रतनसिंह पर लिखी हुई “राव रतन री वेलि” इनकी प्रसिद्ध रचना है।[2] इस खण्ड काव्य में कवि ने रतनसिंह के जीवन चरित्र का वर्णन करते हुए इनके पूर्वजों की वीरता का भी उल्लेख किया है। इस काव्य में कुल तीन षट्पदियां और 121 छंद हैं। काव्य में वर्णित भिन्न-भिन्न विषय उचित उपमाओं के प्रयोग से आकर्षक हो गये हैं। यद्यपि रचना एक लघु काव्य ही है पर कवि की प्रतिभा बताने में पूर्ण सफल व समर्थ है। वेलि का उदाहरण प्रस्तुत किया जाता है–

वाछंट औझटा कटक घट वढ़ीया, दुजड़े ऊलट पुलट दूवौ।
मेह रयण घाइ झड़ वट मंडीयौ, हेवै काळ सुकाळ हूवौ।।81
रड़वड़ीया रूंड मूंट राइजादां, धड़ बेरूंड गुड़ीया धार।
मांणिक डंड प्रचंडां माथै, मेह रयण बूठौ झड़ मार।।82

[1] वीर विनोद : श्यामलदास, द्वितीय भाग, पृ. 820.
[2] शोध पत्रिका, दिसम्बर 1960 : कल्याणदास मेहडू री कही "राव रतन री वेलि" : श्री सौभाग्यसिंह शेखावत।

वीठू सुन्दरदास– इस शताब्दी के अन्तिम दशक में प्राप्त होने वाली रचनाओं में वीठू सुन्दरदास की रचनायें उल्लेखनीय हैं। कवि सुन्दरदास वीठू शाखा के चारण थे और इतिहास-प्रसिद्ध जोधपुराधिपति महाराजा गजसिंह के पुत्र अमरसिंह के आश्रित थे। इनका रचनाकाल संवत् 1694 के आसपास माना जा सकता है। ये बड़े स्वामीभक्त थे और इसी के कारण वे अमरसिंह के विशेष कृपा-पात्रों में थे। एक बार अपने स्वामी के प्राण बचाने पर इन्हें झोरड़ा नामक ग्राम पुरस्कार में प्राप्त हुआ था जिसके विषय में निम्न दोहा व छप्पय प्रसिद्ध है–

आय चोर अमरेस री, फाड़ी तम्बू कनात।
सिर तोड़्यौ समसेर सूं, हद सुंदर रौ हात।।

।।छप्पय।।
पट्ट पर सुं उत्तराध, कोस दस गांव कहीजै।
इम कह्यौ “अमरेस”, दवागिरां लिख दीजै।।
झास गांव झोरड़ौ, भळे परगने भदांणौ।
तांबा पत्र तांम हुवौ, सांसण हिंदवांणै।
केकांण रीझ मोतीकड़ां, जग परसिध जस वासणै,
“अमरेस” दियौ सांसण अचळ, सुकवि सुंदरदास नै।।

बादशाह शाहजहाँ की भरी सभा में अमरसिंह ने एक कटार से एक ही वार में सलावत खाँ को मारा था। उस समय सुन्दरदास भी उनके साथ थे और उनकी प्रशंसा में अनेक कवित्त बनाये। एक छंद उदाहरण के लिए देखिये–

सिंध करणाटक रुस रोम सोम बलख बीच, ऐसे विसरांणी कांनी कांनी घबरांणी है।
दूजा “गजेस” जीत जाहिर विदेस देस, चहुं कांनी छांनी नहीं हरख हिंदवांणी है।
पातसाही कहां क्या उथाप थाप तेरे हाथ, सात सर पार फतह सरसांणी है।
कहै कवि सुंदरदास, राव अमरेस आज, ऐसे अदल्ली हूंत दिल्ली दहलांणी है।।

इसके अतिरिक्त इनके अनेक फुटकर गीत भी हमारे संग्रह में प्राप्त हैं। उनमें से अमरसिंहजी का एक गीत यहाँ दिया जाता है–

अडर खेड़ेचे मघ ऊसर धर ऊपरा, भिड़ण जंग निडरता बीया “बाघा”।
हारिया घणा अड़ हसम पतसाह रा, भिड़िया भड़ धके सोई धके भागा।।1
जोधहर तोय कर तेग जग जाहरां, थाहरां दळा थिर विजै थावै।
साबळां खळां वप सलोहा साझिया, जंगां जुड़ निलोहा नाह जावे।।2
अडर नर झोक रै अमर आपायता, विचळ हुए असुर धर सोर बरते।
नीसा भर सेझ सुख ओझके नींद में, डरे इम साह नित तोय डरते।।3
जवन मन हार हिंदवांण धजराज कौ, पूज कुण रीझ कज खाग पांणे।
परा गिर वार सूं जार…..पति, जोस अंग ऊफणे जगत जांणे।।4
सेख हर पठांणां मुगळ हर स्ययद्दां, भेचके निसा दिन फिकर भरिया।
खळां वप घाविया खास अंब खास में, “अमर” कज इसी विध अमर करिया।।5

सत्रहवीं शताब्दी के अन्तर्गत उल्लिखित कवियों के अतिरिक्त और भी अनेक कवि हैं जो अपनी फुटकर रचनाओं यथा–गीत, दोहे, कवित्त आदि के लिए प्रसिद्ध हैं। ऐसे कवियों की रचना में विशेष ग्रंथ तो प्राप्त नहीं होते परन्तु उनकी फुटकर रचनाओं का कोई पार नहीं है। केवल सत्रहवीं शताब्दी के ही फुटकर कवि इतने हैं कि उन सभी के नाम गिनाना प्रायः कठिन सा ही है, फिर भी कुछ प्रसिद्ध कवियों के नाम नीचे दिए जा रहे हैं।

सादूळ (सं. 1600-10), सांखला करमसी रुणेचा (सं. 1610), रतना खाती (सं. 1617), दयासागर (सं. 1617), रावळ हरराज (1618), रांमा सांदू (सं. 1628), किसनौजी भादौ (सं. 1630-34), देरौ (सं. 1632), पीथोजी आसियौ (सं. 1633), उपाध्याय गुणविनय (सं. 1613-76), रतनू देवराज (सं. 1635), सिंढ़ायच गैपौ (सं. 1635), गरीबदास (सं. 1632-35), जाडा महडू (सं. 1635), दल्लौ आसियौ (सं. 1640), बखनाजी (सं. 1640), बाजिंदजी (सं. 1650), गरीबदास (सं. 1632 से 90), चम्पा दे (सं. 1650), महाराणा प्रतापसिंह (सं. 1632-1653), महाराजा रायसिंह (सं. 1628 से 1668), सेवारांम (सं. 1656-60), हरनाथ (सं. 1660), हरपाळ (सं. 1660), नरूजी (सं. 1660), किसनदास (सं. 1660), राजसिंह (सं. 1660), डूंगरसिंह (सं. 1662), सेवादास (सं. 1660), नेतौ (सं. 1662), हरखौ (सं. 1665), महारांणा अमरसिंह (सं. 1653-73), महाराजा मांनसिंह (सं. 1656-1671), आसौ सिंढ़ायच (सं. 1665), किसनौ आढ़ौ (सं. 1670), रूपसिंह लाळस (सं. 1670), परशुरांमदेव (सं. 1677), आसियौ भोपत (सं. 1680), कवि मांन (सं. 1673-80), चुतरौ मोतीसर (सं. 1685), भोजग मनोहर (सं. 1690), खेतसिंह (सं. 1690), माधौदास गाडण (सं. 1695), हरिदास भाट (सं. 1700)।

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