सबदकोस – राजस्थानी साहित्य का परिचय

आर्यावर्त के विशाल भू-खंड में राजस्थान का विशिष्ठ ऐतिहासिक महत्त्व है। शताब्दियों से यहाँ के लोगों ने भारतीय संस्कृति, कला और साहित्य को अक्षुण्ण योग-दान दिया है जिसके महत्त्व पर आने वाली पीढ़ियाँ भी गर्व का अनुभव करती रहेंगी। यहाँ का बहुत प्राचीन इतिहास अभी अंधकार में है, पर जहाँ तक हमारे इतिहासकार पहुँचे हैं उनके लिखे इतिहासों को देखने से पता चलता है कि यहाँ के लोगों ने अपनी स्वतंत्रता और संस्कृति की रक्षा के लिए जो निरन्तर संघर्ष, तप और त्याग का जीवन व्यतीत किया है, उसके दर्शन अन्यथा दुर्लभ हैं।

इसी संघर्षमय जीवन में उन्होंने अपने सांस्कृतिक आदर्शों की रक्षा के लिए प्राणोत्सर्ग ही नहीं किया, उस संस्कृति को अपनी कलात्मक रचनाओं के माध्यम से अक्षुण्ण बना देने के लिए भी बहुत कड़ी साधना, मौलिक सूझ-बूझ और अमरता को वरण करने की अमिट लालसा का परिचय दिया है।

राजस्थान का प्राचीन कलात्मक वैभव सर्व-विख्यात है। यहाँ के विशाल एवं सुदृढ़ दुर्ग, जैन व अजैन मंदिर, भव्य राजप्रासाद, सती-स्मारक, समाधि-स्थान आदि वास्तु कला के अद्भुत नमूने हैं। इन राजप्रासादों और दुर्गों की बुलंदी आज भी उस समय के जीवन की बुलंदगी का संदेश दे रही है। इसी तरह यहाँ की मूर्ति कला में उस काल के कलाकारों की सौन्दर्यानुभूति ही सुरक्षित नहीं है, शताब्दियों से चली आ रही धार्मिक निष्ठा को कला के माध्यम से व्यंजित कर भारतीय संस्कृति की एकता और अखंडता का भी परिचय दिया है।

चित्रकला में राजपूत कलम के अगणित चित्र विभिन्न शैलियों में चित्रित किये गए। मुगल शैली से प्रभावित होने पर भी वैष्णव धर्म-भावना को राधा कृष्ण की लीलाओं के रूप में चित्रित कर नैसर्गिकप्रेम भावना को मौलिक अभिव्यक्ति देने में यहाँ के कलाकारों ने कोई कसर नहीं रखी। जीवन के ऐश्वर्य, विलास और प्रणय को चित्रित करने वाले कलाकारों ने विभिन्न रंगों और आकृतियों के माध्यम से जो भावानुभूति की बारीकियों का चित्रण किया है, उसकी विलक्षणता और सौन्दर्यानुभूति को भावोद्रेक से रंजित कर देने वाली क्षमता को कौन अस्वीकार कर सकता है? इन अमूल्य चित्रों के पीछे उन्हें चित्रित करने वाले कलाकारों की प्रेरणा और उनके आश्रयदाताओं की परिष्कृत रुचि हमारे कल्पना लोक को आज भी अभिभूत कर देती है।

संगीत के क्षेत्र में भी यह प्रांत पिछड़ा हुआ नहीं रहा। यहाँ के शासकों ने संगीत को प्रश्रय तो दिया ही परन्तु कई एक ने स्वयं संगीत की साधना कर इस विषय के ग्रंथों का निर्माण भी किया। राणा कुंभा का संगीतराज इसका प्रमाण है। राजस्थान के मध्ययुगीन भक्त कवियों ने विभिन्न राग-रागिनियों में हजारों पदों की रचना कर संगीत के माध्यम से ही उन्हें अपने-अपने इष्ट देवता को अर्पण किया है। मुगल सल्तनत का पतन हो जाने पर तो बहुत से प्रसिद्ध गायकों व नृत्यकारों को राजस्थान के शासकों ने ही प्रश्रय दिया था। यहाँ की मांड रागिनी (?) और अनेकानेक धुनें (तानें) आज भी यहाँ के लोकगीतों में सुरक्षित हैं। संगीत की विरल साधना के प्रतीक स्वरूप राग-रागिनियों के कितने ही सुन्दर व चित्ताकर्षक चित्रों का निर्माण यहाँ हुआ है।

विभिन्न कलाओँ को प्रश्रय देने वाली इस भूमि का प्राचीन साहित्यिक गौरव भी किसी प्रान्तीय भाषा के साहित्यिक गौरव से कम नहीं है। जिस परिमाण में यहाँ साहित्य सृजन हुआ है उसका सतांश भी अभी प्रकाश में नहीं आया। अनगिनत हस्तलिखित ग्रन्थों में वह अमूल्य सामग्री ज्ञात-अज्ञात स्थानों पर बिखरी पड़ी है। काव्य, दर्शन, ज्योतिष, शालिहोत्र, संगीत, वेदांत, दर्शन, वैद्यक, गणित, शकुन आदि से सम्बन्ध रखने वाले मौलिक ग्रन्थों के अतिरिक्त कितने ही संस्कृत, प्राकृत, फारसी आदि के प्राचीन ग्रन्थों के अनुवाद व टीकाओं का निर्माण यहाँ हुआ है।

इतना ही नहीं, यहाँ के शासकों ने प्राचीन संस्कृत साहित्य की रक्षा की ओर भी समय-समय पर ध्यान दिया है। औरंगजेब के समय में जब धार्मिक असहिष्णुता के कारण संस्कृत के धार्मिक ग्रन्थों को क्षति पहुँचाई जाने लगी तो बीकानेर के तत्कालीन महाराजा अनूपसिंहजी ने कितने ही महत्त्वपूर्ण ग्रंथों को सुदूर दक्षिण से मंगवा कर अपने यहाँ सुरक्षित रखा जो आज भी अनूप संस्कृत लाइब्रेरी बीकानेर में विद्यमान है। इसके अतिरिक्त अन्य शासकों ने भी अपने संग्रहालयों में संग्रहीत कर कितने ही ग्रन्थों को कालकवलित होने से बचाया।[1] जैन यतियों ने अपने सतत् प्रयत्नों से बहुत बड़ी साहित्यिक निधि को मंदिरों और उपाश्रयों आदि में सुरक्षित रखा। कितने ही ठाकुरों तथा जागीरदारों ने भी इस दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य किया। ये सभी प्रयत्न यहाँ के लोगों के प्रगाढ़ साहित्य-प्रेम के परिचायक हैं।

जिस सामाजिक ऊहापोह और राजनैतिक तथा साम्प्रदायिक उथल-पुथल के बीच यहाँ साहित्य-सृजन हुआ है, इतिहास इसका साक्षी है। काल-क्रम की पृष्ठ-भूमि के साथ आगे हम उसका उल्लेख यथास्थान करेंगे।

सम्पूर्ण प्राचीन राजस्थानी साहित्य को 4 मुख्य भागों में विभाजित किया जा सकता है। इस दृष्टि से संक्षेप में यहाँ कुछ विचार उनकी विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए किया जा रहा है।

(1) जैन साहित्य        (2) चारण साहित्य[2]

(3) भक्ति साहित्य      (4) लोक साहित्य

[1]सरस्वती भंडार उदयपुर, पोथीखाना जयपुर, अलवर का राजकीय संग्रह, जैसलमेर जैन संग्रहालय, जोधपुर का पुस्तक प्रकाश आदि।
[2]चारण-साहित्य से तात्पर्य यहां चारण शैली में लिखे गए साहित्य से है।

जैन साहित्य अधिकांश में जैन यतियों और उनके अनुगामी श्रावकों द्वारा लिखा गया है। उसमें उनके धार्मिक नियमों और आदर्शों का कई प्रकार से गद्य तथा पद्य में वर्णन है। यह साहित्य बहुत बड़े परिमाण में लिखा गया है और प्रारम्भिक राजस्थानी साहित्य की तो वह बड़ी धरोहर है। जैन साधुओं ने धार्मिक साहित्य का ही निर्माण किया है पर अन्य अच्छे साहित्य के संग्रह और सुरक्षा में संकीर्णता नहीं बरती। इस ओर हम पहले ही संकेत कर आये हैं। अतः उनकी राजस्थानी साहित्य को बहुत बड़ी देन है। पर उनका यह साहित्य जैन धर्म से सम्बन्धित होने के कारण जैन धर्मावलंबियों तक ही सीमित रहा। वह समूचे समाज की वस्तु न बन सका। जो मध्ययुगीन सन्तों की धार्मिक वाणियों तथा तुलसीकृत रामायण आदि का समूचे उत्तरी भारत में प्रचार-प्रसार हुआ और सूर, तुलसी, मीरां, कबीर, दादू आदि के पद जन-जन के कंठहार बन गए वैसी स्थिति जैन साहित्य की नहीं बन सकी। वह साहित्य जन-जन का साहित्य न बन सका और न समाज के बहुत बड़े क्षेत्र को ही उतना प्रभावित कर सका।

चारण शैली में साहित्य का निर्माण चारणों के अतिरिक्त राजपूत, मोतीसर, भोजक ब्राह्मण, ओसवाल आदि अनेक जाति के लोगों ने किया है पर चारणों की इसे विशेष देन है। चारण जाति का शासक वर्ग के साथ विशेष सम्बन्ध रहा है। वे मध्यकालीन राजपूत संस्कृति के प्रेरक स्रोत रहे हैं। संघर्ष के युग में उन्होंने अपने आश्रयदाताओं को कभी अपने कर्त्तव्य से च्युत नहीं होने दिया। उन्होंने तत्कालीन शासकों को ऐश्वर्य और विलासी जीवन से दूर ही नहीं रखा अपितु निरन्तर संघर्ष कर देश और धर्म की रक्षा करने के लिए प्राणोत्सर्ग कर देने की प्रेरणा देना ही अपने जीवन का ध्येय माना है। मौका पड़ने पर वे स्वयं रण भूमि में उपस्थित होकर वीरों को उत्साहित करने तथा स्वयं युद्ध करने में पीछे नहीं रहे हैं। आज उनके द्वारा किए गए युद्ध-वर्णन भले ही अतिशयोक्तिपूर्ण लगें पर यवनों द्वारा आतंकित समाज की सुरक्षा के लिए उन कवियों ने अपने योद्धाओं के समक्ष शत्रुओं की सेना रूपी कुंवरी (कुमारी) कन्या को वरण करने की मधुर कल्पना रख कर मौत के विकराल स्वरूप को जो तुच्छ रूप दिया है वह तत्कालीन परिस्थितियों के अनुसार अत्यन्त आवश्यक था। मनुष्य सभी कुछ आदर्श जीवन के लिए करता है और उस आदर्श की रक्षा के लिए सहज ही मृत्यु का आलिंगन करने वाले व्यक्ति के यशोगान में कौनसी उपमा अतिशयोक्तिपूर्ण हो सकती है? इसका अनुभव सहानुभूतिपूर्वक इस साहित्य का अध्ययन करने पर ही हो सकता है। कहने का तात्पर्य यह है कि उनका साहित्य अत्यन्त प्राणवान और जीवन्त साहित्य है। उसमें जीवन की जो ऊर्जस्विता दृष्टिगोचर होती है वह अन्यथा दुर्लभ है। इस प्रकार के साहित्य की रचना करने वाले कवियों की शासक वर्ग और समाज में बड़ी प्रतिष्ठा थी। शासक उन्हें जागीर देकर सम्मानित करते थे। राज दरबार में उन्हें उचित आसन मिलता था और समाज उन्हें आदर की दृष्टि से देखता था। शासकों पर कई बार जब कि आपत्ति आ जाती तो वे उनकी पूरी सहायता करते थे।[3] उन्हें दी गई जागीर “सांसण” के नाम से पुकारी जाती थी। क्योंकि उस जागीर पर पूरा अधिकार चारण का ही होता था। यहाँ तक कि राज्यद्रोह करने वाला व्यक्ति भी “सांसण” में शरण चला जाता तो उसे कोई दखल नहीं देता था। चारणों को इतना सम्मान मिलता था, इसके उपरांत भी वे शासकों को खरी-खरी सुनाने में भी कभी नहीं चूकते थे। युद्ध में वीर गति प्राप्त करने वाले की जहां वे प्रशंसा करते थे वहां युद्ध से भाग जाने वाले की निंदा करने में भी कसर नहीं रखते। सच तो यह है कि वे वीरता के उपासक थे और किसी भी वीर के वीरतापूर्वक कार्य की प्रशंसा किए बिना उनका मन नहीं मानता था, चाहे वह व्यक्ति उनका परिचित हो अथवा नहीं। यही कारण है कि उनके द्वारा रचा गया अधिकांश साहित्य वीररसात्मक है और उस समय में उस साहित्य का बड़ा ही सामाजिक महत्त्व रहा है।

राजस्थान में भक्ति साहित्य भी बहुत बड़े परिमाण में लिखा गया है। संत कवियों की वाणियां आज भी समाज में प्रचलित हैं। उत्तरी भारत की संत परम्परा से प्रभावित होने पर भी यहां की संत परम्परा में तथा भक्ति साहित्य में एक विशेषता यह है कि उनका झुकाव अधिकतया निर्गुण भक्ति की ओर रहा है। यहां के कवियों ने यहां की भाषा में नवीन उपमाओं और उत्प्रेक्षाओं आदि के माध्यम से अपने भावों की अभिव्यक्ति को एक नवीन रूप दिया है जो बड़ा ही प्रभावोत्पादक और सरस है।

किसी भी देश या प्रान्त का लोक साहित्य वहां के जनजीवन से निःसृत स्वाभाविक भावोद्रेक को व्यक्त करता है। राजस्थान की वीर प्रसविनी भूमि में जहाँ हजारों कवियों ने अपनी काव्य-कला के माध्यम से राजस्थानी साहित्य की सेवा की है वहां कितने ही अज्ञात जन कवियों ने अपनी सरल और सरस वाणी में अपने लौकिक अनुभवों को जन साधारण की निधि बना दिया है। लोक-गीत, पवाड़े, लोक कथायें, कहावतें, मुहावरे आदि राजस्थानी लोक साहित्य के अमूल्य रत्न हैं। लोक साहित्य जितने बड़े परिमाण में यहां सुरक्षित है उतना शायद भारत की किसी अन्य भाषा में उपलब्ध नहीं होगा। राजस्थानी लोक गीतों की विविधता और सरसता तो सर्वविख्यात है। राजस्थान की संस्कृति को समझने के लिए भी उनसे बढ़ कर अन्य कोई उपयोगी साधन शायद ही सुलभ होगा। क्योंकि यहाँ के जन-जीवन की सर्वांगीण निश्छल अभिव्यक्ति इसी साहित्य में सुरक्षित मिलती है। युगों-युगों से यह साहित्य जनता का मनोरंजन ही नहीं करता रहा है परन्तु इसने उन्हें व्यावहारिक जीवन दर्शन भी दिया है। राजस्थानी साहित्य को प्राणवान बनाने का और भाषा को नवीन रूप प्रदान करने का बहुमूल्य कार्य भी अज्ञात रूप से इसी साहित्य ने किया है।

इतने विशाल और विविधतापूर्ण राजस्थानी साहित्य की महानता को विद्वान सही रूप में तभी समझ पायेंगे जब वह सम्पूर्ण साहित्य सुलभ हो जायेगा। कोश-निर्माण के दौरान में मुझे इस साहित्य की कितनी ही हस्तलिखित प्रतियाँ देखने का और उनकी खूबियों पर विचार करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। अतः इस साहित्य के महत्त्व पर विचार करते समय कई बार प्रसिद्ध अंग्रेजी आलोचक मेथ्यू अरनॉल्ड की पंक्तियां याद आ जाती हैं जिनमें वह इंगलैण्ड की महानता उसके बहुत बड़े साम्राज्यवाद अथवा सैनिक शक्ति और असाधारण राजनीतिज्ञों की वजह से नहीं पर अंग्रेजी साहित्य की महानता की वजह से मानता है।[4] क्या राजस्थानी का इतना महान् साहित्य हमारे देश की महानता का प्रतीक नहीं है? सभी भारतीय भाषाओं का साहित्य अपने-अपने ढंग का निराला है पर राजस्थानी साहित्य की कुछ अपनी ऐसी विशेषतायें हैं जो अन्य बाषाओं के साहित्य में देखने में नहीं आतीं। विश्व कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भी मुक्त हृदय से इस विशेषता को स्वीकार किया है–“भक्ति रस का काव्य तो भारतवर्ष के प्रत्येक साहित्य में किसी न किसी कोटि का पाया जाता है। राधाकृष्ण को लेकर हर एक प्रांत ने मंद व उच्च कोटि का साहित्य पैदा किया है, लेकिन राजस्थान ने अपने रक्त से जो साहित्य निर्माण किया है उसकी जोड़ का साहित्य नहीं मिलता।”[5] राजस्थानी साहित्य के महत्त्व के सम्बन्ध में इससे अधिक और क्या कहा जाय?

[3] राव चूंडा अपने पिता वीरम की मृत्यु के उपरांत बचपन में आल्हा बारहठ के घर पर ही बड़ा हुआ था।
[4] And by nothing is England so glorious as by her poetry. Mathew Arnold. Preface to the 'Poems of Wordsworth'.
[5] डिं. वी. , हि. सा. स. प्रयाग, संवत् 2003, पृ. 68

राजस्थान का यह प्राचीन साहित्य डिंगल तथा पिंगल दो भाषाओं में प्राप्त होता है। कई विद्वानों ने पिंगल को डिंगल की ही एक शैली मान लेने की भूल की है। पर वास्तव में पिंगल डिंगल से भिन्न भाषा है जो ब्रज का ही एक स्वरूप है। कविराजा बांकीदास[1] एवं सूर्यमल्ल मीसण ने भी इन दोनों भाषाओं का अस्तित्व स्वीकार किया है। इस सम्बन्ध में डॉ. एल. पी. तैस्सितोरी ने एक स्थान पर लिखा है–

‘It is well known that there are two languages used by the bards of Rajputana in their poetical compositions and they are called ‘Dingala’ and ‘Pingala’. These are not mere ‘styles’ of poetry as held by Mahamahopadhyaya Har Prasad Shastri, but two distinct languages, the former being the local Bhasha of Rajputana and the letter Braja Bhasha, more or less vitiated under the influence of the former. ‘[2]

इसके अतिरिक्त सर जार्ज ग्रियर्सन ने भी इस सम्बन्ध में अपना निश्चित मत प्रस्तुत किया है–

‘Marwari has an old literature about which hardly anything is known. The writers some times composed in Marwari and some times in Brij Bhasa. In the former case, the language was called ‘Dingala’ and in the latter ‘Pingala’.[3]

डॉ. सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या ने उदयपुर में दिए गए अपने एक भाषण में कहा था कि “गुजरात और मारवाड़ के जैन आचार्य और पंडितों के द्वारा सौराष्ट्र अपभ्रंश से उद्भूत पुरानी पश्चिमी राजस्थानी में साहित्य का सृजन होने लगा पर साथ ही साथ शौरसेनी अपभ्रंश साहित्यिक भाषा, पूर्व से बदलती गई, इसका एक नवीनतम या अर्वाचीन रूप “पिंगल” नाम से राजस्थान और मालवा के कवियों में पूर्णतया गृहीत हुआ। पिंगल का एक साहित्य बन गया। पिंगल को शौरसेनी अपभ्रंश साहित्यिक भाषा और मध्यकालीन ब्रज भाषा, इन दोनों के बीच की भाषा कहा जा सकता है। ब्रज भाषा प्रतिष्ठित हो जाने के बाद पिंगल के साथ-साथ ब्रज भाषा ने भी राजस्थानी भाषाओं में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान बना लिया। समग्र राजस्थान ब्रज भाषा के लिए अपना क्षेत्र हो गया। ब्रज भाषा के कुछ श्रेष्ठ कवि राजस्थानी भाषी ही थे। फिर राजपूताने के भाट और चारणों ने “पिंगल” की अनुकारी एक नई कवि भाषा मारवाड़ी के आधार पर बनाई जो “डींगल” या “डिंगल” नाम से अब परिचित है।[4]

डॉ. चाटुर्ज्या ने जहां पिंगल के अनुकरण पर डिंगल नाम का प्रादुर्भाव होना माना है वहाँ डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने डिंगल के अनुकरण पर पिंगल नामकरण का अनुमान किया है।[5] वास्तव में पिंगल और डिंगल दो भिन्न भाषायें हैं।[6] पिंगल का विकास शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है[7] और डिंगल का गुर्जरी अपभ्रंश से।[8] देखा जाय तो डिंगल काव्य पिंगल की अपेक्षा अधिक प्राचीन है। जब ब्रज भाषा की उत्पत्ति हुई तो उसका तत्कालीन प्रभाव राजस्थान के पूर्वी प्रदेश पर भी पड़ा। शुद्ध डिंगल तथा ब्रज भाषा से प्रभावित डिंगल में अंतर स्पष्ट करने के लिए संभवतः दोनों का नामकरण हुआ हो। यह तो सर्वविदित है कि ब्रज भाषा के पहले से ही राजस्थानी में काव्य-रचना होती थी। अतः यह कहना उचित नहीं होगा कि पिंगल के आधार पर ही डिंगल का नामकरण-संस्कार किया गया। इस सम्बन्ध में डॉ. रामकुमार वर्मा का यह मत उचित मालूम देता है कि–“उचित तो यह ज्ञात होता है कि “डिंगल” के आधार पर ही “पिंगल” शब्द का उपयोग किया होगा। इस कथन की सार्थकता इससे भी ज्ञात होती है कि पिंगल का तात्पर्य छंदशास्त्र से है। ब्रज भाषा न तो छंदशास्त्र ही है और न उसमें रचित काव्य छंदशास्त्र के नियमों के निरुपण के लिए ही है। अतएव “पिंगल” शब्द ब्रज भाषा काव्य के लिए एक प्रकार से उपयुक्त ही माना जाना चाहिए। हां यह अवश्य है कि ब्रज भाषा काव्य में छंदशास्त्र पर अपेक्षाकृत अधिक ध्यान दिया गया है और सम्भवतः यही कारण है कि उसका नाम पिंगल रखा गया है।[9]

[1] डिंगलियां मिलियां करै, पिंगल तणौ प्रकास। संसक्रति व्है कपट सज, पिंगळ पढ़ियां पास। --बां. दा. ग्रं. भाग 2
[2] Journal of the Asiatic Society of Bengal, Vol. X No. 10 PP. 375
[3] Linguistic Survey of India, Vol. IX, Part II, Page 19.
[4] राजस्थानी भाषा : डॉ. सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या, पृष्ठ 65
[5] हिन्दी साहित्य : डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृष्ठ 67
[6] राजस्थानी भाषा और साहित्य : डॉ. हीरालाल माहेश्वरी, पृष्ठ 7
[7] (क) Linguistic Survey of India, Grierson, Pt. I, Page 126
   (ख) राजस्थानी भाषा : डॉ. सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या, पृ. 64
[8] (क) अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन के 33 वें अधिवेशन का विवरण--कन्हैयालाल माणिकलाल मुन्शी, पृष्ठ 9.
   (ख) राजस्थान का पिंगल साहित्य तथा राजस्थानी भाषा और साहित्य--श्री मोतीलाल मेनारिया।
[9] हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास, भाग 1, डॉ. रामकुमार वर्मा, पृ. 139-140

यहां हम प्राचीन राजस्थानी को डिंगल के नाम से अभिहित कर रहे हैं। कुछ विद्वानों का यह भी भ्रम है कि शायद राजस्थान में पिंगल साहित्य का निर्माण परिमाण में डिंगल से भी अधिक हुआ है, पर यह मान्यता भी निराधार है, जैसे कि हम पहिले कह आये हैं कि डिंगल का अधिकांश साहित्य अभी प्रकाश में नहीं आया है और बहुत-सा लिपिबद्ध भी नहीं हुआ है, इसीलिए शायद ऐसी भ्रामक धारणा बन गई है।

राजस्थानी साहित्य के इस विवेचन के पश्चात् अब हम उसके विकास-क्रम पर विचार करते हैं। राजस्थानी भाषा विवेचन के प्रकरण में हम यह स्पष्ट कर आये हैं कि राजस्थानी का निकास अपभ्रंश भाषा से हुआ है। अतः अपभ्रंश की अन्तिम अवस्था ही राजस्थानी का आदिकाल अथवा प्रारम्भिक काल माना जाता है। राजस्थानी का प्राचीन नाम मरु भाषा है। सर्व प्रथम मरु भाषा का नाम हमें मारवाड़ राज्य के जालोर ग्राम में रचे गए जैन मुनि उद्योतन सूरि के प्रसिद्ध ग्रन्थ “कुवलय माला” में मिलता है। इस ग्रन्थ की रचना विक्रम संवत् 835 में हुई थी। इसमें तत्कालीन 18 भाषाओं का उल्लेख है जिसमें मरु भाषा का नाम भी है। यथा–

“अप्पा-तुप्पा”, भणिरे अह पेच्छइ मारुऐ तत्तो
“न उरे भल्लउं” भणिरे अह पेच्छइ गुज्जरे अवरे
“अम्हं काउं तुम्हं” भणि रे अह पेच्छइ लाडे
“भाइ य इ भइणी तुब्भे” भणि रे अह मालवे दिट्ठे। (कुवलयमाला)

इससे यह प्रकट हो ही जाता है कि राजस्थानी साहित्य का निर्माण लगभग नवीं शताब्दी में होने लग गया था। इस समय की मुख्य भाषा अपभ्रंश थी और अधिकांश साहित्य की रचना इसी भाषा में हो रही थी, अतः ऐसे समय में नव विकसित भाषा में निर्मित होने वाला साहित्य इसके प्रभाव से अछूता कैसे रह सकता था। यही कारण है कि यद्यपि राजस्थानी साहित्य का निर्माण नवीं शताब्दी के प्रारम्भ से ही आरम्भ हो गया था, फिर भी 11 वीं शताब्दी तक हमें बहुत ही कम साहित्य उपलब्ध होता है। यह सब कुछ होते हुए भी यह तो निश्चित है कि राजस्थानी अपने प्रारम्भिक काल में राजस्थान की ही नहीं वरन् उसके आसपास के बहुत बड़े भूखंड की भाषा रही है। गुजराती भाषा के मर्मज्ञ एवं विद्वान स्वर्गीय झवेरचंद मेघाणी ने भी अपने शब्दों में इसे स्वीकार किया है।

“अपनी मातृ भाषा का नाम था–राजस्थानी! मेड़ता की मीरां इसी में पदों की रचना करती और गाया करती थी। इन पदों को सौराष्ट्र की सीमा तक के मनुष्य गाते तथा अपना कर के मानते थे। चारण का दूहा राजस्थान की किसी सीमा में से राजस्थानी भाषा में अवतरित होता तथा कुछ वेश बदल कर काठियावाड़ में भी घर-घराऊ बन जाता। नरसी मेहता गिरनार की तलहटी में प्रभु पदों की रचना करता और ये पद यात्रियों के कण्ठों पर सवार होकर जोधपुर, उदयपुर पहुँच जाया करते थे। इस जमाने का पर्दा उठा कर यदि आप आगे बढ़ेंगे तो आपको कच्छ, काठियावाड़ से लेकर प्रयाग पर्यन्त के भूखंड पर फैली हुई एक भाषा दृष्टिगोचर होगी..। इस व्यापक बोलचाल की भाषा का नाम–राजस्थानी। इसी की पुत्रियाँ फिर ब्रजभाषा, गुजराती और आधुनिक राजस्थानी का नाम धारण कर स्वतंत्र भाषायें बनीं।” अतः राजस्थानी भाषा में रचित साहित्य एक विस्तृत भू-भाग का साहित्य था।

किसी भी साहित्य के क्रमिक विकास का अध्ययन सुविधापूर्वक एवं समुचित रूप से तभी हो सकता है जब कि वह वैज्ञानिक रूप से उचित कालों में विभाजित हो। इसी दृष्टिकोण से अनेक विद्वान साहित्यकारों ने अपने- अपने मतानुसार राजस्थानी साहित्य को भी भिन्न-भिन्न कालों में विभाजित किया है। उनमें से अनेक विद्वानों का काल-विभाजन पूर्ण वैज्ञानिक एवं तर्कयुक्त है।

जैसा कि हम प्रारम्भ में लिख चुके हैं कि राजस्थानी की नींव नवीं शताब्दी में स्थापित हो चुकी थी इसलिए राजस्थानी साहित्य के प्राचीन काल का आरम्भ हम नवीं शताब्दी के आरम्भ से ही मानते हैं। डॉ. एल. पी. तैस्सितोरी ने प्राचीन पश्चिमी राजस्थानी का अपभ्रंश से अंतिम रूप से सम्बन्ध-विच्छेद कर लेने का समय तेरहवीं शताब्दी के आसपास निश्चित किया है। स्पष्ट तो यह है कि पन्द्रहवीं शताब्दी के आरम्भ तक डिंगल भाषा अपभ्रंश के प्रभाव से पूर्ण रूप से मुक्त न हो पाई थी। अतः पन्द्रहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक के साहित्य को प्रारंभिक काल के अंतर्गत रखना अधिक वैज्ञानिक है। लगभग इस काल के पश्चात् डिंगल एक स्वतंत्र एवं सुगठित भाषा के रूप में विकसित हुई। इसके पश्चात् का काल मध्यकाल माना जा सकता है। इस काल में रचित प्रचुर एवं विशिष्ट साहित्य ने ही राजस्थानी को पूर्ण विकसित रूप प्रदान किया और इसे उन्नति के शिकर पर बैठाने वाले अधिकांश कवि भी इसी काल में हुए। इस काल में पाई जाने वाली साहित्यिक विशेषतायें निरन्तर रूप से महा कवि सूर्यमल्ल मीसण की रचनाओं के पूर्व के समय तक मिलती रही है। अतः महाकवि सूर्यमल्ल के समय से ही राजस्थानी का आधुनिक युग माना जा सकता है। इस सम्पूर्ण विवेचन के अनुसार हम अपने दृष्टिकोण से राजस्थानी साहित्य को निम्न प्रकार से कालबद्ध कर सकते हैं–

1. आदिकाल वि. सं. 800 से सं. 1460
2. मध्यकाल वि. सं. 1460 से सं. 1900
3. आधुनिक काल वि. सं. 1900 से वर्तमान काल तक

वस्तुतः काल-विभाजन किसी काल विशेष की समाप्ति और दूसरे काल के आरम्भ होने के समय के मध्य कोई निश्चित सीमा रेखा नहीं है। अतः हमें यह नहीं मान लेना चाहिए कि काल की समाप्ति के पश्चात् उस काल की शैली व परम्परा में आगे कोई रचना नहीं होती। आरंभिक काल की भी कुछ विशेषतायें ऐसी हैं जो मध्यकाल की रचनाओं में भी पाई जाती हैं. इसके अतिरिक्त आधुनिक काल के भी अनेकानेक कवि मध्यकालीन ऐतिहासिक परंपरा का अनुसरण करते आ रहे हैं। अतः उपरोक्त सीमा रेखायें परिवर्तन के आरंभ की ही सूचक मानी जा सकती हैं। अब हम ऊपर दर्शाये हुए तीनों कालों को पृथक्-पृथक् लेकर उनमें रचे जाने वाले साहित्य पर प्रकाश डालेंगे।

पाठकों की सुविधा के लिए यहाँ काल-विभाजन के साथ केवल पद्यात्मक रचनाओं का ही वर्णन किया जा रहा है। गद्य साहित्य एवं लोक साहित्य का पृथक्-पृथक् शीर्षकों के अंतर्गत अलग से विवेचन प्रस्तुत करेंगे।

आदिकाल– विक्रम संवत् 800 से 1460

नवीं शताब्दी से पूर्व प्राचीन राजस्थानी के प्रारंभिक साहित्य की क्या दशा रही होगी इसकी कल्पना करने के लिए इतिहास में कोई सामग्री नहीं मिलती। यद्यपि यह तो माना जाता है कि अपभ्रंश से अन्य भाषाओं के उद्गम के समय अपभ्रंश के साथ-साथ उनमें भी साहित्यिक रचनायें अवश्य हुई हैं परन्तु प्रामाणिक सामग्री के अभाव में बहुत प्राचीन साहित्य के विषय में निश्चयपूर्वक कुछ भी नहीं कहा जा सकता। पूर्व वर्णित मुनि उद्योतन सूरि रचित “कुवलय माला” जिसका, काल सं. 835 है, से हमें राजस्थानी का परिचय मरु भाषा के नाम से मिलता है। यद्यपि यह ग्रन्थ राजस्थानी की रचना तो नहीं फिर भी इसमें राजस्थानी में वर्णित चर्चरी द्वारा हमें तत्कालीन राजस्थानी के स्वरूप की झलक अवश्य मिलती है। उदाहरण के लिए उक्त ग्रंथ का एक पद यहाँ उद्धृत किया जाता है–

उ.– कसिण-कमळ-दळ लोयण-चल रे, हंत ओ।
पीण-पिहुल-थण-कडियल भार किलंत ओ।।
ताण-चलिर वळियावळि-कळयळ-सद्द ओ।
रास यम्मि जइ लब्भइ जुबइ-सत्थ ओ।।

इससे यह तो पता चलता है कि राजस्थानी साहित्य का निर्माण नवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध से ही आरम्भ हो चुका था परन्तु इसके बाद 10 वीं शताब्दी के अन्त तक कोई प्रामाणिक लिपिनिष्ठ रचना प्राप्त नहीं होती। इसके अनेक कारण हैं। ऐसा माना जाता है कि राजस्थानी का अति प्राचीन तथा प्रारंभिक साहित्य अधिकांश में श्रुतिनिष्ठ साहित्य ही था। श्री किशोरसिंह बारहठ ने आरंभिक काल के साहित्य के सम्बन्ध में लिखा है कि चारण जाति के मरु देश में आने के पूर्व अर्थात् विक्रम की नवीं शताब्दी के आसपास उसके क्षेत्र में केवल एक नायक जाति ही ऐसी जाति थी जो अपने प्रारंभिक साहित्य को परम्परा से कंठस्थ करती हुई सुरक्षित रखे हुए थी। नायक लोग अपने पूर्वजों से सुन-सुन कर जो पंवाड़्या, गीत आदि कंठस्थ किया करते थे या नए रचा करते थे उन्हीं को गांवों में जाकर रात्रि के समय चौपाल, या गांव के मध्य के खुले स्थान में एकत्रित जन-समूह के बीच रावणहत्थे (एक प्रकार का तन्त्री वाद्य विशेष) पर गाते और उनका अर्थ श्रोताओं को समझाया करते। इसी समय उन्होंने एक और जाति का भी अस्तित्व स्वीकार किया है, वह है जोगी या नाथ जाति जिसने प्राचीन श्रुतिनिष्ठ साहित्य की सुरक्षा में अपना योगदान दिया है।[1]

[1]सौरभ पत्रिका, भाग 1, संख्या 1, पृ. 57, डिंगल भाषा और उसका साहित्य।--किशोरसिंह बारहठ

पंवाड़्यों तथा गीतों का साहित्य भी अधिक प्राचीन तथा श्रुतिनिष्ठ होने के कारण उनके रचयिताओं की पिछली संतान उसे ठीक रूप में याद न रख सकी। अनेक प्रक्षिप्त अंशों का समावेश होने के साथ-साथ कुछ चरितनायकों की जीवन-कथाओं के साथ अप्रासंगिक व चमत्कारिक बातें भी जोड़ दी गईं। अपनी प्राचीन थाती को इस प्रकार लुप्त होते देख कर संभव है उस समय के लोगों में इस साहित्य की रक्षा की इच्छा अवश्य उत्पन्न हुई होगी। इसी के फलस्वरूप चित्रलिपि का प्रयोग किया गया। अपने चरितनायकों का पूर्णजीवन-चरित चित्रों के रूप में अंकित किया जाने लगा। इन चित्रों का उन घटनाओं तथा कथाओं के साथ सम्बन्ध रहता था जो नायक आदि जाति के लोगों द्वारा रावणहत्थे पर मौखिक रूप से गाई जाती थी। इस चित्रलिपि के कारण चरित-नायकों के जीवन में अप्रासंगिक एवं चमत्कारिक घटनाओं का प्रवेश तो रुक गया किन्तु गाई जाने वाली भाषा में परिवर्तन तब भी होता गया। चित्र चित्रित होने के कारण स्थिर रहे परन्तु गीत गेय रूप में ही आने वाली पीढ़ियों को हस्तांतरित होने से उनकी मूल रचना में कितना अंश प्रामाणिक है और कितना प्रक्षिप्त, इसका पता लगाना अत्यन्त कठिन हो गया। राजस्थानी में इन चित्रों के आधार पर गाये जाने वाले गीतों को “फड़ें” कहते हैं जो पट का अपभ्रंश है। आज भी राजस्थान के सुदूर गांवों में यदाकदा इन पंवाड़्यों एवं फड़ों का आनन्द लिया जाता है।

लगभग नवीं शताब्दी के अन्तिम काल में एक ऐसी घटना हुई जिससे राजस्थानी साहित्य में एक नए युग का सूत्रपात हुआ। जिस समय राजस्थान में राजस्थानी की उपरोक्त दशा थी, ठीक उसी समय सिन्ध में वहां की तत्कालीन भाषा को वहां के चारण नवजीवन प्रदान कर रहे थे। सिन्ध के प्राचीन वीरों का यशोगान एवं वीरों का चरित्र-वर्णन उनकी कविताओं में स्पष्टतः लक्षित होता था। उस समय के सूमरा क्षत्रियों के अत्याचारों से वहां की जनता व्याकुल हो उठी. इसी समय सिन्ध में आवड़देवी का पिता मामड़ सकुटुम्ब आकर बस गया। ये कुल सात बहिनें थीं। सिंध के तत्कालीन राजा ने इनके सौन्दर्य-वर्णन पर लुभायमान होकर इन सातों बहिनों को अपने अधिकार में करने का प्रयत्न किया। ऐसी अवस्था में आवड़ देवी ने अपने अनुयायी समस्त चारणों को सिन्ध देश छोड़ कर राजस्थान की ओर जाने का निर्देश दिया और साथ में स्वयं भी सिन्ध छोड़ कर राजस्थान में आ बसी। आये हुए चारण कवियों ने यहां की लोक भाषाओं का प्रयोग धीरे-धीरे अपने साहित्य में किया। इस घटना से राजस्थानी साहित्य को एक नया मोड़ प्राप्त हुआ।

जिस समय राजस्थानी साहित्य में यह नवीन प्रवाह आया उस समय यहां की राजनैतिक परिस्थिति भी पूर्ण विचित्र थी जिसका प्रभाव तत्कालीन साहित्य पर स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। सोलंकी, पंवार, कछवाह, परिहार, तोमर, गहलोत, चौहान और यादव (भाटी) उस समय यहां शासन कर रहे थे। शासक वर्ग में परस्पर घोर संघर्ष चल रहा था। शासकीय स्थिति पूर्ण अनिश्चित थी। ऐसी स्थिति के मध्य प्रथम तो विशिष्ट साहित्य का सृजन होना संदिग्ध ही है, फिर भी यदि कुछ हो पाया तो वह आश्रयदाताओं को रणभूमि में उत्साहित करने के निमित्त फुटकर रचनायें ही थीं अथवा उनके मनोरंजनार्थ कोई प्रेम काव्य आदि। यही कारण है कि इस काल के प्राप्त ग्रंथों में जैन साहित्य को छोड़ कर, जो कि अधिकांश में अपने धर्म से ही सम्बन्धित है, अन्य सभी ग्रंथ प्रेम काव्य ही हैं। राज्याश्रय के कारण उनकी कुल रचनाओं के लिखित एवं प्रामाणिक रूप राज्य के संग्रहालयों में सुरक्षित रहे। किन्तु ये इतने थोड़े हैं कि तत्कालीन राजस्थानी साहित्य के सम्बन्ध में पूर्ण एवं स्पष्ट दृष्टिकोण उपस्थित नहीं करते। इसके अतिरिक्त जनसाधारण के मन में अपने वीर चरितनायकों के प्रति अपार श्रद्धा थी। इसका मुख्य कारण यह था कि ये ही वीर लोग संकट के समय जन साधारण के जीवन धन की रक्षा करते। जन जीवन की रक्षार्थ वे अपने प्राणों की आहुति देने के लिए सदैव तत्पर रहते। अतः ऐसे वीरों की प्रशंसा में बनाई गई कवितायें शीघ्र ही प्रचलित हो जाया करतीं और श्रुतिनिष्ठ साहित्य के रूप में पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती रहती थीं। उस काल में साहित्य को पूर्ण रूप से सुरक्षित रखने की प्रवृत्ति बहुत कम थी। यही कारण है कि आदि काल का लिपिनिष्ठ साहित्य बहुत ही कम मात्रा में प्राप्त होता है।

प्राचीन राजस्थानी साहित्य में जो कुछ भी लिखित एवं प्रामाणिक साहित्य प्राप्त हुआ है उसमें जैनाचार्यों का साहित्य भी अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। जैन-साहित्य की रचना संस्कृत काल से होती आयी है और यही कारण है कि प्राकृत और अपभ्रंश में भी जैन-साहित्य हमें प्रचुर मात्रा में प्राप्त होता है। इसका मुख्य कारण यही रहा है कि जैन मुनि तथा उनके श्रावकगण सदैव से ही अपने इस धार्मिक साहित्य की सुरक्षा के प्रति सचेष्ट एवं जागरूक रहते आये हैं। राजस्थानी में भी जो कुछ आदिकालीन जैन एवं जैनेतर साहित्य हमें मिलता है वह भी इनकी साहित्य सुरक्षा के प्रति इस प्रवृत्ति का ही परिणाम है। जिनालयों, जैन-भण्डारों, उपाश्रयों आदि में प्राप्त राजस्थानी साहित्य की प्राचीनतम प्रतियां इसका सही प्रमाण हैं। राजस्थानी के प्रारम्भिक काल में रचित जैन मुनियों की अनेक धार्मिक रचनायें प्राप्त होती हैं परन्तु यह काल अनेक देशी भाषाओं का जन्म-काल होने के कारण उन भाषाओं के विद्वानों ने तत्कालीन रचनाओं को अपनी भाषा की प्रारम्भिक रचनायें मान लिया है। फिर भी उस समय राजस्थान में रहने वाले जैन मुनियों तथा अन्य सिद्धों व नाथों द्वारा जो भी रचनाएँ हुईं वे प्रामाणिक रूप से राजस्थानी रचनायें ही मानी जा सकती हैं। इस प्रारंभिक काल की अनेक रचनायें उपलब्ध हैं परंतु कहीं पर वे अपने रचनाकारों के सम्बन्ध में मौन साधे हुए हैं तो कहीं अपना रचनाकाल प्रकट करने में पूर्ण असमर्थ। साहित्य की प्रामाणिकता के सम्बन्ध में शोध-कार्य अनेक वर्षों से हो रहा है और इसी के फलस्वरूप अन्धकार के गर्त में डूबे हुए अतुल साहित्य में से उसका कुछ भाग प्रकाश में आया है। अब हम इस काल के प्राप्त महत्त्वपूर्ण साहित्य को क्रमशः उनके संवतोल्लेख के अनुसार प्रस्तुत करेंगे।

खुम्माणरासौ

राजस्थानी साहित्य में प्रारम्भ से ही प्रथम काव्य-ग्रन्थ के रूप में “खुमाणरासौ” का उल्लेख किया जाता रहा है।[1] आज इसकी प्राप्त प्रतियों के आधार पर इसके रचनाकाल में अनेक विद्वानों को पूर्ण सन्देह है। इस काव्य-ग्रंथ में चित्तौड़ के महाराणा प्रतापसिंह तक का वर्णन दिया गया है। इससे यह प्रकट होता है कि यह ग्रन्थ समय-समय पर नई सामग्री प्राप्त करने के कारण अपने वास्तविक रूप से सर्वथा भिन्न हो गया है। एक स्थान पर इसके रचयिता का नाम दलपतविजय लिखा गया है। कुछ लोगों के मतानुसार ये जैन साधु थे।[2] कर्नल टॉड ने अपने इतिहास में चित्तौड़ के रावळ खुम्माण का उल्लेख किया है। उन्होंने अपने इतिहास में लिखा है कि काल भोज (बप्पा) के पश्चात् खुम्माण गद्दी पर बैठा। इतिहास में इस खुम्माण का नाम बहुत प्रसिद्ध है। इसके शासनकाल में ही बगदाद के खलीफा अलमांसू ने चित्तौड़ पर चढ़ाई की। कर्नल टॉड द्वारा यह वर्णन खुम्माणरासौ के आधार पर ही किया गया प्रतीत होता है। सम्भवतः कर्नल टॉड को इस विषय में भ्रान्ति हो गई। काल भोज (बप्पा) से लेकर तीसरे खुम्माण तक वंशावली इस प्रकार मानी गई है।[3]

कालभोज (बप्पा) > खुम्माण > मत्रट, भर्त्तृभट्ट > सिंह, खुम्माण (द्वितीय) महायक, खुम्माण (तृतीय)

इस प्रकार स्पष्ट है कि खुम्माण तीन हुए हैं। कर्नल टॉड ने इन तीनों को एक ही मान लिया है। लेकिन इन तीनों का शासनकाल इतिहासकार इस प्रकार मानते हैं।

  • खुम्माण (प्रथम) वि. सं. 810 से 835.
  • खुम्माण (द्वितीय) वि. सं. 870 से 900 तक।
  • खुम्माण (तृतीय) वि. सं. 965 से 990 तक।

अब्बासिया वंश के अलमामूं का समय भी वि. सं. 870 से 890 तक माना जाता है। इसी समय वह खलीफा रहा। यदि कोई लड़ाई अलमामूं के साथ खुम्माण की हुई होगी तो वह दूसरे खुम्माण के समय में ही हुई होगी। अतः यह अनुमान किया जा सकता है कि “खुम्माणरासौ” की रचना भी इसी काल में हुई।[4]

यह सब कुछ होते हुए भी मूल रचना के वास्तविक स्वरूप के अभाव में उसके रचनाकाल के सम्बन्ध में निश्चयपूर्वक कुछ भी नहीं कहा जा सकता। इस रचना में महाराणा प्रताप तक का वर्णन होने के कारण कई विद्वान इसे 17वीं शताब्दी ही की रचना मानते हैं। इसके साथ यह भी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि दलपति विजय इसका वास्तविक रचयिता था अथवा इसके प्रक्षिप्त अंश का।[5] इस प्रकार खुम्माणरासौ को प्रामाणिक रूप से प्रथम काव्य-ग्रन्थ स्वीकार नहीं किया जा सकता।

[1] हिन्दी साहित्य का इतिहास--लेखक रामचन्द्र शुक्ल, सातवां संस्करण, संवत् 2008, पृष्ठ 33.
[2] "ये (दलपत) तपागच्छीय जैन साधु शान्तिविजयजी के शिष्य थे। इनका असली नाम दलपत था किन्तु दीक्षा के बाद बदल कर दौलतविजय रख लिया गया था। विद्वानों ने इनका मेवाड़ के रावळ खुंमाण द्वितीय (सं. 870) का समकालीन होना अनुमानित किया है, जो गलत है। वास्तव में इनका रचनाकाल सं. 1730 और सं. 1760 के मध्य में है। राजस्थानी भाषा और साहित्य--लेखक मोतीलाल मेनारिया, पृष्ठ 82. 
[3] वीर विनोद, प्रथम भाग, कविराजा श्यामलदास, पृष्ठ 267 से 272 तक। 
[4] हिन्दी साहित्य का इतिहास--ले. रामचन्द्र शुक्ल, सातवां संस्करण, संवत् 2008, पृ. 33 के आधार पर।
[5] हिन्दी साहित्य का वृहत् इतिहास--सं. राजबली पांडेय, प्रथम भाग, पृष्ठ सं. 376.
ढोला मारू रा दूहा“–सं. 1000

राजस्थानी के श्रेष्ठ प्रणय-काव्य “ढोला मारू रा दूहा” का रचनाकाल श्री मोतीलाल मेनारिया ने वि.सं. 1000 के आसपास का अनुमान किया है।[1] ढोला मारू एक लोक-काव्य के रूप में प्रसिद्धि पा चुका है। ऐसे जन- प्रिय लोक-काव्यों की जो अवस्था होती है, उसकी विवेचना हम पहले कर चुके हैं। संभव है सर्वप्रथम इसकी रचना किसी सुयोग्य कवि ने की हो तथापि वर्तमान रूप में जो ढोला मारू की प्रतियाँ उपलब्ध हैं वे कालान्तर में अन्य लोगों द्वारा जोड़े गये प्रक्षिप्त अंश सहित ही मिलती हैं। काव्य की कथा ऐतिहासिक है तदपि पूर्ण ऐतिहासिक शोध के अभाव में यह निश्चित करना अत्यन्त कठिन है कि उसमें ऐतिहासिकता का अंश कितना है। कछवाह राजपूतों की ख्यातों के अनुसार यह कहा जा सकता है कि नल और ढोला ऐतिहासिक व्यक्ति हैं। काव्य में ढोला को नरवर के चौहान राजा नल का पुत्र बताया गया है किन्तु इतिहास के आधार पर यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि नरवर में चौहानों का राज्य कभी नहीं रहा। ओझाजी ने लिखा है[2] कि कछवाह वंश की ख्यातों में नल और ढोला का जो स्पष्ट वृत्तान्त मिलता है तथा ढोला को मारवणी का पति कहा है वह वस्तुतः सत्य है। अतः यह तो निसंदेह कहा जा सकता है कि ढोला कछवाह वंश का क्षत्रिय था। कछवाह वंश की ख्यातों में इसका समय संवत् 1000 के आसपास दिया गया है। अगर ढोला के शासनकाल में ही “ढोला मारू” की रचना की गई हो तो इसका रचनाकाल संवत् 1000 के आसपास माना जा सकता है।

श्री हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इन दोहों का सबसे पुराना रूप ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी का माना है।[3] डॉ. भोलाशंकर व्यास ने इसका रचनाकाल विक्रम की 13वीं-14वीं शती माना है।[4] 12वीं या 13वीं शती को इसका रचनाकाल मानने वाले इसकी रचना ढोला के तीन सौ वर्ष बाद हुई मानते हैं। सिद्ध हेमचन्द्र ने अपनी अपभ्रंश व्याकरण में दो तीन बार “ढोल्ला” शब्द का प्रयोग किया है।[5] वहाँ यह तीनों बार नायक के अर्थ में आया है। हेमचंद्र का जन्म संवत् 1145 और मृत्यु संवत् 1229 में मानी गई है।[6] श्री मोहनलाल दलीचंद देसाई ने भी इसका समर्थन किया है।[7] इससे यह तो स्पष्ट है कि उस समय ढोला के सम्बन्ध में जनसाधारण में काफी जानकारी प्रचलित होगी। जिस प्रकार राधा-कृष्ण ऐतिहासिक एवं वास्तविक व्यक्ति होते हुए भी कालान्तर में काव्य में समस्त कविता के नायक-नायिका के रूप में रूढ हो गये, ठीक उसी प्रकार ढोले का नाम भी तत्कालीन कविताओं में नायक के रूप में प्रयुक्त किया जाने लगा हो। आधुनिक राजस्थानी के लोक-गीतों में “ढोला” का प्रयोग नायक, पति, वीर आदि के लिये प्रचुरता के साथ पाया जाता है।[8] इससे यह सहज में ही अनुमान किया जा सकता है कि हेमचंद्र के समय तक ढोला के सम्बन्ध में दोहे जनसाधारण में इतने प्रचलित हो गये होंगे कि उस समय के कवियों ने उसके नाम का नायक के रूप में किसी भी कविता में प्रयोग करना आरम्भ कर दिया हो। जनसाधारण में दोहों के ऐसे प्रचलन के लिये सौ-डेढ़ सौ वर्ष का समय कुछ अधिक नहीं। अगर हेमचंद्र का समय संवत् 1145-1229 माना गया है तो ढोला मारू के इन दोहों का निर्माणकाल संवत् 1000 सहज ही माना जा सकता है। इस प्रकार के उदाहरणों में भाषा-विज्ञान के अनुसार अर्थ-विस्तार प्रायः हो जाया करता है। राजस्थानी भाषा की विवेचना करते समय ऐसे उदाहरण हम प्रस्तुत कर चुके हैं।

भाषा की दृष्टि से वर्तमान समय में प्रचलित ढोला मारू के दोहे इतने प्राचीन नहीं मालूम होते। वस्तुतः लोक-काव्य और अन्य साहित्यिक रचनाओं में काफी अंतर होता है। किसी साहित्यिक ग्रन्थ के निर्माण में कुछ न कुछ साहित्यिक कला का होना अत्यन्त आवश्यक समझा जाता है। लोक-गीतों की रचना-व्यवस्था इसके ठीक विपरीत होती है। लोक-गीतों का निर्माता यदि कोई हो सकता है तो देश विशेष की प्राचीनकालीन परिस्थिति और साधारण जनता की सामूहिक रागात्मक अभिरुचि ही हो सकती है। गेय गीतों को मौखिक रूप में आने वाली पीढ़ियों में हस्तान्तरित करने की परंपरा बहुत ही प्राचीन समय से प्रचलित रही है। अतः यह तत्कालीन जनता की साधारण अभिरुचि से प्रेरणा पाती रहती है। नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित ढोला मारू की भूमिका में इस सम्बन्ध में एक स्थान पर लिखा है[9] , यह काव्य मौखिक परंपरा के प्राचीन काव्य-युग की एक विशेष कृति है और संभव है कि तत्कालीन जनता की साधारण अभिरुचि को ध्यान में रख कर उससे प्रेरित होकर किसी प्रतिभासंपन्न कवि ने जनता के प्रीत्यर्थ उसी के मनोभावों को वर्तमान काव्य-रूप में बद्ध कर उसके समक्ष उपस्थित कर दिया हो और जनता ने बड़ी प्रसन्नता से इसे अपनी ही सामूहिक कृति मान कर कंठस्थ किया हो. ऐसी दशा में व्यक्ति विशेष कवि होने पर भी उसके व्यक्तित्व का सामूहिक अभिरुचि के प्रबल प्रवाह में लुप्त प्राय हो जाना संभव है। अतएव हमारा अनुमान है कि व्यक्ति विशेष का इसके बनाने में कुशल हाथ स्पष्टतः दृष्टिगोचर होते हुए भी सामूहिक मनोभावों की एकता और सहानुभूति एकत्रित होने के कारण कवि का व्यक्तित्व समूह में लुप्त हो गया है। और अंत में मौखिक परम्परा से चला आता हुआ यह काव्य हमको किसी व्यक्ति विशेष कवि की कृति के रूप में नहीं मिला बल्कि जनता के काव्य के रूप में उपलब्ध हुआ है।”

कुछ विद्वानों ने “कल्लोल” नामक एक कवि को ही इसका रचयिता माना है।[10] जोधपुर के सिवाना नामक ग्राम में एक जैन यति के पास से प्राप्त प्रति में इसके रचयिता का नाम लूणकरण खिड़िया लिखा है। खेद की बात है कि संवत् 1500 के पहले की लिखी कोई प्रति अभी तक उपलब्ध नहीं हुई है। वैसे तो “ढोला मारू रा दूहा” की बहुत- सी हस्तलिखित प्रतियाँ राजस्थान के पुस्तक भंडारों में मिलती हैं किन्तु वे अधिक पुरानी नहीं हैं। असली काव्य तो संभवतया सब का सब दूहों में ही लिखा गया होगा, परन्तु कालान्तर में दूहों की यह श्रृंखला छिन्न-भिन्न हो गई। संवत् 1618 के लगभग जैसलमेर के एक जन यति कुशललाभ ने तत्कालीन महाराव के आदेशानुसार “ढोला मारू” के विभिन्न दोहों को इकट्ठा किया और इस छिन्न-भिन्न कथा-सूत्र को मिलाने के लिए कुछ चौपाइयाँ बनाईं। इन चौपाइयों को दूहों के बीच में रख कर कुशललाभ ने पूरे कथा-सूत्र को ठीक कर दिया। अभी तक उपलब्ध प्रतियों में यही प्रति सबसे पुरानी मानी गई है। श्री गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने इन दोहों का निर्माण-काल संवत् 1500 वि. के लगभग माना है।[11]

[1] राजस्थानी साहित्य की रूपरेखा--ले. मोतीलाल मेनारिया, परिशिष्ट--पृष्ठ 219.
[2] टॉड राजस्थान--संपादक, गौरीशंकर हीराचंद ओझा, पृष्ठ 371, टिप्पणी संख्या 59.
[3] हिन्दी साहित्य का आदिकाल--डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृष्ठ 9.
[4] हिन्दी साहित्य का वृहत् इतिहास--प्रथम भाग, खंड 2, अध्याय 4, पृष्ठ 404.
[5] ढोल्ला सामला धण चम्पा-वण्णी।
    णाइ सुवण्णरेह कस-वट्ठइ दिण्णी।।8।4।330।1
    ढोल्ला मइँ तुहुँ वारिया मा कुरु दीहा माणु।
    निद्दए गमिही रत्तड़ी दडवड होइ विहाणु।।8।4।330।2
    ढोल्ला एॅह परिहासडी अइ भण-भण कवणहिं देसि।
    हउँ झिज्जउँ तउ केहिं पिअ तुहुँ पुणु अन्नहि रेसि।।8।4।425।1 --अपभ्रंश व्याकरण--आचार्य हेमचंद्र
[6] कुमारपालचरित : Introduction, Page XXIII-XXV, (1936)
[7] जैन गुर्जर कविओ प्रथम भाग, "जूनी गुजराती भाषानों संक्षिप्त इतिहास" : श्री मोहनलाल दलीचंद देसाई, पृष्ठ 113.
[8] (i) गोरी छाई छै जी रूप, ढोला, धीरां-धीरां आव।
   (ii) सावण खेती, भँवरजी, थे करी जी, हाँजी ढोला, भादूड़े कर्यो छो निनांण। सीट्टाँ रो रुत छाया, भँवरजी, परदेश में जी, ओ जी म्हांरा घण कमाऊ उमराव, थांरी प्यारी ने पलक न आवड़े जी।
   (iii) गोरी तो भीजै, ढोला, गोखड़े, आलीजो भीजै जी फौजाँ माँय। अब घर आयजा, आसा थारी लग रही हो जी।
   (iv) दूधां ने सींचावौ ढोलाजी रौ नीबूंड़ौ ओ राज। --ढोला मारू रा दूहा, सं. रामसिंह तथा नरोत्तमदास, पृष्ठ संख्या 398.
[9] "ढोला मारू रा दूहा"--भूमिका, पृष्ठ 36.
[10](क) राजस्थानी भाषा और साहित्य : डॉ. हीरालाल माहेश्वरी, पृष्ठ 201. 
   (ख) राजस्थानी भाषा और साहित्य : श्री मोतीलाल मेनारिया, पृष्ठ 101. 
   (ग) हिन्दी काव्य-धारा में प्रेम-प्रवाह : श्री परशुराम चतुर्वेदी, पृष्ठ 26. 
   (घ) प्राचीन राजस्थानी साहित्य, भाग 6, सं. गोवर्धन शर्मा, पृष्ठ 83-85. 
[11] "ढोला मारू रा दूहा"--प्रकाशक, नागरी प्रचारिणी सभा, काशी, डॉ. ओझा द्वारा लिखित प्रवचन, पृष्ठ 7.
जेठवे रा सोरठा1100

राजस्थानी साहित्य की रूपरेखा के परिशिष्ट में श्री मेनारिया ने “जेठवे रा सोरठा” का निर्माणकाल सं. 1100 के लगभग दिया है।[1] इनके साहित्यिक महत्त्व को छोड़ कर पहले इन पर ऐतिहासिक दृष्टिकोण से विचार कर लेना आवश्यक है। श्री मेनारियाजी के अतिरिक्त अन्य किसी व्यक्ति ने इन दोहों की रचना इतनी प्राचीन नहीं मानी है। प्रायः प्रत्येक सोरठे के अंत में जेठवा या मेहउत शब्द आया है। स्वर्गीय श्री झवेरचंद मेघाणी ने जेठवे के गुजराती सोरठों का संकलन किया था। इसी प्रसंग में एक स्थान पर उन्होंने लिखा है–“यह कथा श्री जगजीवन पाठक ने सन् 1915 में “गुजराती” के दीपावली अंक में लिखी थी तथा “मकरध्वजवंशी महीपमाला” पुस्तक में भी लिखी है। इसमें सम्पादक ताळाजा के “एलमवाला” का प्रसंग (सात हुकाळी, मंत्रेभहरण आदि : देखो रसधार, 1 : पृष्ठ 188) मेहजी के साथ जोड़ते हैं। इसके पश्चात् यह प्रसंग बरड़ा पर्वत पर नहीं परन्तु दूर ठांगा पर्वत पर घटित मानते हैं। मेहजी को श्री पाठक 144 वीं पीढ़ी में रखते हैं परन्तु उनका वर्ष व संवत् नहीं बताते। उनके द्वारा बाद के 147 वें राजा को 12 वीं शताब्दी में रखने के अंदाज से मेहजी का समय दूसरी या तीसरी शताब्दी के भीतर किया जा सकता है। परन्तु वे स्वयं दूसरे एक मेहजी को (152) संवत् 1235 के अन्तर्गत लेते हैं। ऊजळी वाले मेहजी यह तो नहीं हो सकते। कथा के दोहे 1000-1500 वर्ष प्राचीन तो प्रतीत नहीं होते। घटना होने के पश्चात् 100-200 वर्षों में इसका काव्य-साहित्य रचा गया होगा। यदि इस प्रकार गणना करें तो मेह-उजळी के दोहे संवत् 1400-1500 तक प्राचीन होने की कल्पना अनुकूल प्रतीत होती है। तो फिर इस कथा के नायक का 152वां मेहजी होने की संभावना अधिक स्वीकार करने योग्य प्रतीत होती है।” इसके अतिरिक्त इन सोरठों की भाषा भी नवीन है। कालान्तर में जेठवे के नाम पर विभिन्न कवियों द्वारा रचे गये सोरठे भी इसमें सम्मिलित होते गये। उदाहरण के लिए निम्नलिखित दो सोरठे मथानिया-निवासी श्री जैतदान बारहठ द्वारा संवत् 1974-75 में लिखे गये थे, किन्तु बाद में वे “जेठवे के सोरठे” के नाम से प्रसिद्ध हो गये–

डहक्यौ डंफर देख, वादळ थोथौ नीर विन,
हाथ न आई हेक, जळ री बूंद न जेठवा।
दरसण हुआ न देव, भेव बिहूणा भटकिया,
सूना मिंदर सेव, जलम गमायौ जेठवा।

उपरोक्त दोहे जेठवे के नाम से परम्परा के “जेठवे रा सोरठा” नामक अंक में प्रकाशित हो चुके हैं। अतः इन दोहों का ठीक रचनाकाल निश्चित् करना अत्यन्त कठिन है। जो सोरठे पुराने कहे जाते हैं वे भी साहित्यिक दृष्टि से पन्द्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी के प्रतीत होते हैं–चाहे इनका ऐतिहासिक आधार कितना ही पुराना क्यों न हो।

“ढोला मारू रा दूहा” तथा “जेठवे रा सोरठा” इन दोनों लौकिक प्रेम-काव्यों में ऐतिहासिक तथ्य गौण ही है। डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ठीक ही कहा है[2] कि “वस्तुतः इस देश में इतिहास को ठीक आधुनिक अर्थ में कभी नहीं लिया गया। बराबर ही ऐतिहासिक व्यक्ति को पौराणिक या काल्पनिक कथानायक बनाने की प्रवृत्ति रही है। ….. कर्मफल की अनिवार्यता में, दुर्भाग्य और सौभाग्य की अद्भुत शक्ति में और मनुष्य के अपूर्व शक्तिभंडार होने में दृढ़ विश्वास ने इस देश के ऐतिहासिक तथ्यों को सदा काल्पनिक रंग में रंगा है। यही कारण है कि जब ऐतिहासिक व्यक्तियों का भी चरित्र लिखा जाने लगा तब भी इतिहास का कार्य नहीं हुआ। अन्त तक ये रचनायें काव्य ही बन सकीं, इतिहास नहीं।”

बीसलदेव रासौ[3]

प्राचीनता की दृष्टि से बीसलदेव रासौ का अत्यधिक महत्त्व है। साहित्यिक दृष्टि से इसका मूल्य कितना ही नगण्य क्यों न हो किन्तु प्राचीनता उसकी एक ऐसी विशेषता है जिसके कारण इसके अध्ययन-अध्यापन की ओर कई विद्वानों का ध्यान गया है। अगर देखा जाय तो यही ग्रन्थ राजस्थानी का प्राचीनतम प्रामाणिक ग्रन्थ है। किसी भी प्राचीन ग्रन्थ का अपने शुद्ध रूप में मिलना संभव नहीं है और फिर एक ऐसे ग्रन्थ का जो सैकड़ों वर्षों तक गाया जाता रहा हो, शुद्ध प्राचीन रूप में मिलना सर्वथा असंभव है। अतः इसी को आधार मान कर कुछ विद्वानों ने समस्त प्राचीन ग्रंथों को आधुनिक सिद्ध करने में ही अपनी अधिकांश शक्ति खर्च कर दी है। “बीसलदेव रासौ”के बारे में डॉ. उदयनारायण तिवारी लिखते हैं[4] –“वास्तव में नरपति न तो इतिहासज्ञ था और न कोई बड़ा कवि ही। किसी सुनेसुनाये आख्यान के आधार पर लोगों को प्रसन्न करने के लिए उसने कुछ बेतुकी तुकबंदी कर के काव्य का एक ढांचा–येन-केन-प्रकारेण खड़ा कर दिया, जिस पर उसके पश्चात् के कवियों ने भी नमक-मिर्च लगाया। इस प्रकार एक साधारण कवि के मिथ्या-बहुल-काव्य को लेकर जिसका असली रूप भी इस समय सुरक्षित नहीं, इतनी ऐतिहासिक ऊहापोह करनी ही व्यर्थ है।” श्री मेनारिया ने इस संबंध में एक नई कल्पना की है। उन्होंने “नरपति नाल्ह” का सम्बन्ध “नरपति” नामक एक गुजराती कवि से जोड़ दिया है।[5] इन दोनों को वे एक ही कवि मानते हैं एवं इनका रचनाकाल संवत् 1545-1560 के आसपास माना है। डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने भी श्री मेनारिया के मत का समर्थन किया है।[6]

“बीसलदेव रासौ” को प्राचीनतम मानने के लिये इसके निर्माणकाल की विवेचना अत्यन्त आवश्यक है। नरपति नाल्ह ने अपनी पुस्तक की रचना-तिथि निम्नलिखित प्रकार से दी है।

[1] राजस्थानी साहित्य की रूपरेखा : पं. मोतीलाल मेनारिया, पृष्ठ 219.
[2] हिन्दी साहित्य का आदिकाल--डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृष्ठ 71.
[3] इसका विशुद्ध राजस्थानी रूप "व़ीसलदे रासौ" है।
[4] "वीर काव्य"--ले. डॉ. उदयनारायण तिवारी, पृष्ठ 208.
[5] राजस्थानी भाषा और साहित्य--ले. पं. मोतीलाल मेनारिया, पृष्ठ 88-89.
[6] हिन्दी साहित्य : डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृष्ठ 52.

बारह सै बहोत्तरां हां मंझारि।
जेठ वदी नवमी बुधवारि।।
“नाल्ह” रसायण आरंभई।
सारदा तूठि ब्रह्म कुमारी।।[1]

इसी के आधार पर बीसलदेव रासौ की रचना-तिथि मिश्र बंधुओं ने[2] संवत् 1354, लाला सीताराम ने 1272 तथा सत्यजीवन वर्मा ने[3] 1212 माना है। श्री रामचंद्र शुक्ल ने भी वर्माजी के मत का अनुमोदन किया है।[4] मिश्र बंधुओं ने अपनी “विनोद” में लिखा है–“चंद और जल्हण के पीछे संवत् 1354 में नरपति नाल्ह कवि ने बीसलदेव रासौ नामक ग्रंथ बनाया। इसमें चार खंड हैं और उनमें बीसलदेव का वर्णन है। नरपति नाल्ह ने इसका समय 1220 लिखा है, पर जो तिथि उन्होंने बुधवार को ग्रंथ-निर्माण की लिखी है वह 1220 संवत् में बुधवार को नहीं पड़ती परन्तु 1220 शाके बुधवार को पड़ती है। इससे सिद्ध होता है कि यह रासौ 1220 शाके में बना।” विक्रम संवत् और शक संवत् में लगभग 134 वर्ष का अंतर है अतः उन्होंने ग्रंथ का रचनाकाल संवत् 1354 मान लिया। मिश्र बंधुओं की इस विवेचना का आधार बाबू श्यामसुंदरदास की एक रिपोर्ट[5] है जिसमें उन्होंने लिखा था कि– ‘The author of this chronicle is Narpati Natha and he gives the date of the composition of the book as samvat 1220. This is not vikram samvat.’ किन्तु गौरीशंकर हीराचंद ओझा की मान्यता के अनुसार राजपूताने में पहले शक संवत् प्रचलित नहीं था।[6] यहाँ के लोग विक्रम संवत् का ही प्रयोग करते थे, अतः शक संवत् की कल्पना उचित प्रतीत नहीं होती। इसके अतिरिक्त “बहोत्तरां” का अर्थ “बीस” मान कर इसका रचनाकाल 1220 मानना भी ठीक नहीं है। “मिश्र बंधु विनोद” में एक दामों नामक कवि का विवरण आता है। उसने “लक्ष्मणसेन-पद्मावती” की कहानी लिखी थी। उसने अपने ग्रंथ में कहानी का रचनाकाल इस प्रकार दिया है–

संवत् पदरइ सोलोत्तरां मझार, ज्येष्ठ वदी नौमी बुधवार।
सप्त तारिका नक्षत्र दृढ़ जान, वीर कथा रस करू बखान।।

मिश्र बंधुओं ने इस सोलोत्तराँ का अर्थ सं. 1516 लिखा है। तत्पश्चात् एक “हरराज” नामक अन्य कवि का वर्णन है, जिसने राजस्थानी में “ढोला मारू बानी” चौपइयों में लिखी थी। उसमें भी कहानी का रचनाकाल “संवत् सोलह सै सत्तोतरइ” दिया है। मिश्र बंधुओं ने यहाँ भी इसका अर्थ 1607 किया है, 1677 नहीं। आश्चर्य तो यह है कि वे “पंदरइ सोलोत्तराँ” को तो 1516 और “सोलह सै सत्तोतरइ” को 1607 मान लेते हैं किन्तु “बारह सै बहोत्तराँ” को 1212 न मान कर 1220 मानते हैं। वस्तुतः “बहोत्तर” “द्वादशोत्तर” का रूपान्तर मात्र है। डॉ. माताप्रसाद गुप्त “बीसलदेव रासौ” को संवत् 1400 में रचा हुआ मानते हैं।[7] इस सम्बन्ध में उनका तर्क यह है कि जिन स्थानों के नाम “बीसलदेव रासौ” में आते हैं, उनमें से कोई भी सं. 1400 के बाद का नहीं प्रमाणित हुआ है।”

श्री सत्यजीवन वर्मा एवं श्री रामचंद्र शुक्ल ने “बीसलदेव रासौ” का रचनाकाल संवत् 1212 माना है।[8] इसका कुछ ऐतिहासिक आधार भी है। “बीसलदेव रासौ” में सर्वत्र क्रिया का प्रयोग वर्तमान काल में किया गया है। इससे प्रतीत होता है कि कवि बीसलदेव का समकालीन था। दिल्ली की प्रसिद्ध फिरोजशाह की लाट पर संवत् 1220 (विक्रमी), वैशाख शुक्ला 15 का खुदा हुआ एक लेख मिलता है।[9] उसके द्वारा यह पता चलता है कि बीसलदेव संवत् 1210-1220 तक अजमेर का शासक था।

“बड़ा उपाश्रय” बीकानेर में “बीसलदेव रासौ” की एक और प्रति कुछ दिन पहले मिली थी।[10] इसमें “बारह सै बहोत्तरां मंझारि” के स्थान पर ग्रंथ का रचनाकाल इस प्रकार लिखा है–

संवत सहस तिहतरइ जाणि,
नाल्ह कवीसर सरसीय वाणि।

इसके अनुसार “बीसलदेर रासौ” का रचनाकाल संवत् 1073 ठहरता है। डॉ. रामकुमार वर्मा ने भी इसी मत की पुष्टि करते हुए संवत् 1073 को ही उचित ठहराया है।[11] उन्होंने अपने इतिहास में लिखा है[12] –गौरीशंकर हीराचंदजी ओझा के अनुसार बीसलदेव का समय संवत् 1030 से 1056 माना गया है।[13] …..यदि गौरीशंकर हीराचंद ओझा के अनुसार बीसलदेव का काल संवत् 1030 से 1056 मान लिया जाय तो बीसलदेव रासौ की रचना 156 वर्ष बाद होती है। ऐसी स्थिति में लेखक का वर्तमान काल में लिखना समीचीन नहीं जान पड़ता। अतएव या तो बीसलदेव काल जो वीसेंट स्मिथ और गौरीशंकर हीराचंद ओझा द्वारा निर्धारित किया गया है, उसे अशुद्ध मानना चाहिये, अथवा बीसलदेव रासौ में वर्णित इस “बारह सै बहोत्तरां हां मंझारि” वाली तिथि को।” इस प्रकार ग्रंथ के रचनाकाल की तिथि संवत् 1212 को गलत ठहराते हुए उन्होंने संवत् 1073 को ही ठीक माना है।

वीसेन्ट ए. स्मिथ ने अपने इतिहास में लिखा है–

‘Jaipal, who was again defeated in November 1001, by Sultan Mahmud, committed suicide and, was succeeded by his son Anandpal, who like his father joined a confederacy of the Hindu powers under the supreme command of Vishal Dev, the Chauhan Rajah of Ajmer.’

इस प्रकार डॉ. वर्मा द्वारा यह लिखा जाना कि या तो बीसलदेव काल जो वीसेंट स्मिथ और गौरीशंकर हीराचंद ओझा द्वारा निर्धारित किया गया है, उसे अशुद्ध मानना चाहिये अथवा रासौ में वर्णित इस “बारह सै बहोत्तरां मंझारि” वाली तिथि को, ठीक नहीं जान पड़ता। सांभर एवं अजमेर की चौहान परंपरा में चार बीसलदेव हुए हैं। बीसलदेव विग्रहराज द्वितीय का समय संवत् 1030 से 1056 तक माना जाता है। बीसलदेव विग्रहराज तृतीय का काल 1112-1116 के आसपास तथा बीसलदेव विग्रहराज चतुर्थ का राज्यकाल संवत् 1210- 1220 के आसपास होना अनुमानित किया गया है। संवत् 1073 में ग्रंथ-रचना के विचार के समर्थक इस ग्रंथ के नायक बीसलदेव को विग्रहराज द्वितीय मानते हैं एवं संवत् 1212 के समर्थक विग्रहराज चतुर्थ।

बीसलदेव रासौ में उल्लिखित ऐतिहासिक घटनाओं के आधार पर इन तिथियों का विवेचन करना अत्यन्त आवश्यक है। यह पहला ग्रंथ है जिसका रचना-काल शोध द्वारा ठीक निर्धारित किया जा सकता है।

संवत् 1073 के पक्ष में कई तर्क दिये जाते हैं। बीसलदेव का विवाह भोज की कन्या राजमती के साथ होना लिखा है। राजा भोज के समय के सम्बन्ध में वीसेंट ए. स्मिथ लिखते हैं[14]

“Munja’s nephew, the famous Bhoja ascended the throne of Dhar in those days the capital of Malwa, about 1018 A.D. and reigned gloriously for more than forty years.”

[1] बीसलदेव रासौ : सं. सत्यजीवन वर्मा--कासी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित, प्रथम सर्ग, 4.
[2] मिश्रबंधु विनोद।
[3] नागरी प्रचारिणी सभा, काशी द्वारा प्रकाशित "बीसलदेव रासौ" की भूमिका, पृष्ठ 5.
[4] हिन्दी साहित्य का इतिहास--रामचंद्र शुक्ल (सातवां संस्करण), पृष्ठ 34.
[5] हिन्दी हस्तलिखित पुस्तकों की रिपोर्ट, सन् 1900.
[6] काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित बीसलदेव रासो की भूमिका, पृष्ठ 6 में दिये गये डॉ. ओझा के पत्र का उल्लेख।
[7] "बीसलदेव रास"--सं. डॉ. माताप्रसाद गुप्त एवं श्री अगरचन्द नाहटा, हिन्दी परिषद्, विश्वविद्यालय प्रयाग द्वारा प्रकाशित, भूमिका 58.
[8] "बीसलदेव रासो" सं. सत्यजीवन वर्मा, काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित, भूमिका, पृष्ठ 6.
[9] आविन्ध्यादाहिमाद्रे विरचितविजयस्तीर्थयात्रा प्रसंगादुद्ग्रीवेषु प्रहर्पा न्नृपतिषु विनमत्कन्धरेषु प्रयत्नः। आर्यावर्तं यथार्थं पुनरपि कृतवान्म्लेच्छविच्छेद नाभिद्रेंवः शाकंभरीन्द्रों जगति विजयते वीसलः क्षोणिपालः। ब्रूते सम्प्रति चाहुबाणतिलकः शाकंभरी भूपतिश्रीमान विग्रहराज एष विजयी सन्तानजानात्मनः। अस्माभिः करंदब्याधापि हिमवद्विन्ध्यान्तरालंभुवः शेष स्वीकरणीयमस्तु भवतामुद्वेगशून्य -मनः।।
[10] नागरी प्रचारिणी पत्रिका, भाग 14, अंक 1, पृष्ठ 99
[11] हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास, प्रथम खंड, डॉ. रामकुमार वर्मा, पृष्ठ 147.
[12] वही, पृष्ठ 147.
[13] हिन्दी टॉड राजस्थान, प्रथम खंड, पृष्ठ 358.
[14] "Early History of India."-V. A. Smith, page 393.

इस दृष्टि से राजा भोज बीसलदेव विग्रहराज द्वितीय का समकालीन ही सिद्ध होता है। ऐसी स्थिति में बीसलदेव का राजा भोज की पुत्री से विवाह होना संभव है। अगर संवत् 1212 को रचना-काल माना जाय तो यह निश्चित है कि “बीसलदेव रासौ” घटना-काल के काफी बाद में लिखा गया होगा, किन्तु जैसा कि हम लिख चुके हैं, रासौ की भाषा में वर्तमान-काल का इस ढंग से प्रयोग किया गया है कि कवि को नायक का समकालीन मानना ही होगा। अतः अगर “बीसलदेव रासौ” के नायक को विग्रहराज चतुर्थ मान लिया जाय तो एक प्रश्न यह उपस्थित होता है कि राजा भोज की पुत्री के साथ विवाह किस प्रकार संभव है। धार में उस समय कोई भोज नामक राजा नहीं था। बीसलदेव के एक परमारवंशीय रानी तो अवश्य थी, क्योंकि उसका वर्णन पृथ्वीराज रासौ में भी आता है।[1] हो सकता है राजा भोज के पश्चात् उस वंश ने यह उपाधि प्राप्त करली हो जिससे आगे होने वाले परमारवंशी सरदार व राजा का भोज उपाधिसूचक नाम रहा हो। नरपति नाल्ह ने अपने रासौ में असली नाम न देकर केवल उपाधिसूचक नाम ही दे दिया हो। किन्तु परमार वंशी कन्या के लिए जो शब्द प्रयुक्त हुए हैं, उनके द्वारा यह भ्रम हो जाता है कि राजा भोज का नाम कहीं पीछे से मिलाया हुआ न हो, जैसे–“जन्मी गौरी तू जैसलमेर” “गोरड़ी जैसलमेर की”। धार के परमार इधर राजपूताने में भी फैले हुए थे अतः राजमती का उनमें से किसी सरदार की कन्या होना भी संभव है।

इस सम्बन्ध में एक और मत का उल्लेख आवश्यक है। डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने लिखा है[2] — “बीसलदेव रासौ नामक हिन्दी काव्य में मालवे के राजा भोज की पुत्री राजमती का विवाह चौहान राजा बीसलदेव (विग्रहराज तीसरे) के साथ होना लिखा है और अजमेर के चौहान राजा सोमेश्वरके समय के (वि.सं. 1226) बीजोल्यां (मेवाड़) के चट्टान पर खुदे हुये इस बड़े शिलालेख में बीसल की रानी का नाम राजदेवी मिलता है। राजमती और राजदेवी एक ही राजपुत्री के नाम होने चाहिये, परन्तु भोज ने सांभर के चौहान राजा वीर्यराम को मारा था। ऐसी दशा में भोज की पुत्री राजमती का विवाह बीसलदेव के साथ होना सम्भव नहीं। उदयादित्य ने चौहानों से मेल कर लिया था अतएव सम्भव है कि यदि बीसलदेव रासौ के उक्त कथन में सत्यता हो तो राजमती उदयादित्य की पुत्री या बहिन हो सकती है।” अवंती के राजा भोज ने सांभर के चौहान राजा वीर्यराम को मारा था, ऐसा उल्लेख पृथ्वीराजविजय में भी है।[3] वीर्यराम विग्रहराज तृतीय का ताऊ था अतः बीसलदेव विग्रहराज तृतीय और परमारवंशी राजा भोज में परस्पर वैमनस्य पैदा हो गया था। ऐसी दशा में राजा भोज का बीसलदेव तृतीय के साथ अपनी पुत्री का विवाह करना सम्भव नहीं जान पड़ता। किन्तु श्री रामबहोरी शुक्ल और भगीरथ मिश्र ने इसका समाधान इस प्रकार प्रस्तुत किया है कि[4] “यह तो निश्चित ही है कि भोज-वीर्यराम युद्ध के बाद मालवा और शाकंभरी के राजाओं में सुलह हो गई थी। क्या यह सम्भव नहीं कि वीर्यराम के भतीजे बीसलदेव तीसरे की वीरता से मुग्ध होकर भोज ने अपनी लड़की उसे ब्याह दी हो और इसी सम्बन्ध के कारण बीसलदेव ने उदयादित्य को सहायता दी हो। तब यह कहना होगा कि नरपति ने बीसलदेव चौथे के राज्य-काल में सं. 1212 वि. (1155 ई.) में बीसलदेव रासौ की रचना की परन्तु उसमें जो कहानी दी वह बीसलदेव तीसरे की थी।”
बीसलदेव रासौ में बीसलदेव की यात्रा का वर्णन इतने स्पष्ट शब्दों में किया गया है कि धार के राजा के सिवाय अन्य किसी के साथ सम्बन्ध की कल्पना करना ही उचित नहीं जंचता। बीसलदेव अजमेर से रवाना होता हुआ चित्तौड़ होकर धार पहुँचता है। यात्रा के स्थानों का वर्णन भी स्पष्ट है। अतः यह आवश्यक है कि बीसलदेव राजा भोज का समकालीन हो। सं. 1073 वि. मानने से ऐसा संभव है।

रासौ में लिखा है कि शादी के पश्चात् बीसलदेव तीर्थयात्रा के प्रसंग में उड़ीसा गया था तथा उड़ीसा जाने के पहले भी सात वर्ष बाहर रहा था। मुहणौत नैणसी की ख्यात का अनुवाद व सम्पादन करते हुए श्री रामनारायण दूगड़ ने एक टिप्पणी में लिखा है[5] कि “बीसलदेव दूसरे ने नरबदा तक देश विजय किया, गुजरात के प्रथम सोलंकी राजा मूलराज को कंथाकोट में भगाया, अणहिलवाड़े के पास बीसलपुर का नगर बसाया और भड़ौंच में आसापूरा देवी का मन्दिर बनवाया। सोलंकी राजा मूलराज के साथ युद्ध करने के कारण बीसलदेव साल-डेढ़ साल बाहर रहा था, तथा बीसलपुर नामक नगर बसाया था।” श्री ओझाजी भी इसका समर्थन करते हुए लिखते हैं[6] –“मूलराज को इस प्रकार उत्तर में आगे बढ़ता देख कर सांभर के राजा विग्रहराज (बीसलदेव दूसरे) ने उस पर चढ़ाई कर दी जिससे मूलराज अपनी राजधानी छोड़ कर कंथादुर्ग (कंथाकोट का किला : कच्छ राज्य) में भाग गया। विग्रहराज साल भर तक गुजरात में रहा और उसको जर्जर करके लौटा।”

सम्भव है कवि ने साल-डेढ़ साल को सात वर्ष की अवधि में परिणत कर दिया हो तथा नरबदा व पूर्व के देश जीतने के लिये कुछ वर्ष उसे बाहर बिताने पड़े हों और नरपति नाल्ह ने उस अवधि को बारह वर्ष लिख डाला हो।

उपरोक्त सब दृष्टियों से संवत् 1073 की तिथि ही अधिक प्रमाणित मालूम देती है। किन्तु इस सम्बन्ध में एक शंका और होती है। विग्रहराज द्वितीय सांभर का शासक था, जैसा कि स्व. गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने भी अपने इतिहास में स्पष्ट किया है।[7] प्रस्तुत रासौ का नायक अजमेर का शासक था–

‘गढ़ अजमेरां को चाल्यौ राव।’

‘गढ़ अजमेरां गम करऊ।’

‘गढ़ अजमेरां पहुतां जाई।’

अजमेर नगर अर्णोराज के पिता अजयदेव (अजयराज) द्वारा बसाया गया था। श्री ओझाजी ने भी पृथ्वीराज प्रथम (सं. 1162 वि.) के पुत्र अजयदेव को अजमेर बसाने वाला कहा है। श्री रामनारायण दूगड़ भी इसका समर्थन करते हैं।[8] अजयदेव का समय सं. 1170 वि. के आसपास का माना जाता है। इस दृष्टि से बीसलदेव विग्रहराज द्वितीय (जो लगभग एक सौ वर्ष पहिले हो चुका था) का अजमेर का शासक होना संभव नहीं है।

अपने विवाह के पश्चात जब बीसलदेव धार से अजमेर लौटता है तो उसे आनासागर मार्ग में मिलता है।

दीठउ आनासागर समंद तणी बहार।
हंस गवणी म्रग लोचणी नारि।।
एक भरइ बीजी कलिख करइ।
तीजी धरी पावजे ठंडा नीर।।
चौथी घनसागर जूं घूलई।
ईसी हो समंद अजमेर को वीर।।[9]

आनासागर झील को बनाने वाले अर्णोराज बीसलदेव विग्रहराज चतुर्थ के पिता थे। ओझाजी ने बी इसी मत की पुष्टि[10] की है। बाबू श्यामसुंदरदास इसे अनार्पण देवी के नाम पर बना हुआ मानते हैं।[11] बाबू साहब बीसलदेव रासौ में

[1] देखो भूमिका H. Search Report, 1900
[2] राजपूताने का इतिहास, Vol. I- गौरीशंकर हीराचंद ओझा (दूसरा परिवर्द्धित संस्करण), पृष्ठ 216.
[3] वीर्यरामसुतस्तस्य वीर्येण स्यात्स्मरोपमः।
   यदि प्रसन्नया दृष्ट्या न दृश्यते पिनाकिना।।65
   अगम्यो यो नरेन्द्राणां सुधादीधितिसुन्दर।
   जघ्ने यशश्चयो यश्च भोजेना वन्ति भूभुजा।।67 --पृथ्वीराजविजय, सर्ग 5.
[4] हिन्दी साहित्य का उद्भव और विकास, लेखक--रामबहोरी शुक्ल और भगीरथ मिश्र, पृष्ठ 93.
[5] मुहणौत नैणसी की ख्यात (प्रथम भाग), (हिन्दी अनुवाद), सं. रामनारायण दूगड़, पृष्ठ 199 की फुट-नोट में दी गई टिप्पणी।
[6] राजपूताने का इतिहास, Vol. I., ले. गौरीशंकर हीराचंद ओझा, पृष्ठ 240. 
[7] वही, पृष्ठ 240.
[8] मुहणौत नैणसी की ख्यात (प्रथम भाग), हिन्दी अनुवाद--सं. रामनारायण दूगड़, पृष्ठ 199 की फुटनोट में दी गई टिप्पणी।
[9] बीसलदेव रासौ--सं. सत्यजीवन वर्मा, ना. प्र. स., प्रथम सर्ग, पृष्ठ 27, छंद 75.
[10] "अजयदेव के पुत्र अर्णोराज (आना) के समय मुसलमानों की सेना फिर इधर आई, पुष्कर को नष्ट कर अजमेर की तरफ बड़ी और पुष्कर की घाटी उल्लंघन कर आनासागर के स्थान तक आ पहुँची, जहाँ अर्णोराज ने उसका संहार कर विजय प्राप्त की। यहाँ मुसलमानों का रक्त गिरा था अतएव इस भूमि को अपवित्र जान जल से इसकी शुद्धि करने के लिये उसने यहाँ आनासागर तालाब बनवाया। --राजपूताने का इतिहास, Vol. I., पृष्ठ 305. 
[11] नागरी प्रचारिणी पत्रिका, भाग 5, पृष्ठ 141.

वर्णित आनासागर और अर्णोराज द्वारा बनाये गये आनासागर में भेद करते हैं, किन्तु वह एक ही है जो अजमेर से कुछ दूरी पर है। विग्रहराज चतुर्थ बीसलदेव जब विवाह कर के लौटा होगा तो इस सागर की शोभा नवीन रही होगी तथा उसके पिता की कीर्ति-स्मरण के लिये कवि ने इसका वर्णन किया हो। ऐसी अवस्था में विग्रहराज द्वितीय व तृतीय को (जो अर्णोराज से डेढ़ सौ वर्ष पहले हो चुके थे) शादी के पश्चात् आनासागर मिलना असंभव-सा हो जाता है।

उपरोक्त दो विरोधाभासी ऐतिहासिक तथ्यों के कारण बीसलदेव रासौ का रचनाकाल निश्चित् रूप से तय किया जाना कुछ कठिन-सा है। इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता कि यह सैकड़ों वर्षों तक गाया जाता रहा। गेय रूप में होने के कारण किसी गायक ने उस समय परिस्थितियों के अनुसार अगर उसमें थोड़ा बहुत परिवर्तन कर लिया हो तो आश्चर्य नहीं। जो विरोधाभासी ऐतिहासिक तथ्य मिलते हैं, उनका यही कारण जान पड़ता है। वास्तव में संवत् 1073 की तिथि ही निश्चित् रूप से जान पड़ती है। बीसलदेव तथा धार का राजा भोज पँवार दोनों ग्यारहवीं शताब्दी में सं. 1000 और 1073 के बीच में थे। राजा भोज का राज्यासीन होने का समय संवत् 1055 माना जाता है। किन्तु जिस समय राजा भोज गद्दी पर बैठा उस समय उसकी आयु केवल नौ वर्ष की थी। अतः राजमती का भोज की पुत्री न होकर बहिन होना ही अधिक उचित मालूम पड़ता है। रासौ के अनुसार कवि बीसलदेव का समकालीन ही मालूम देता है। अगर बीसलदेव विग्रहराज द्वितीय का स्वर्गवास सं. 1056 में मान लिया जाय तो बीसलदेव रासौ का रचनाकाल उसके सत्रह वर्ष बाद होता है। 17 वर्ष का समय इतना लंबा नहीं जो बीसलदेव और भोज जैसे प्रसिद्ध राजाओं की स्मृति को भुला दे और उनके सम्बन्ध में कवि को कल्पना का आश्रय लेना पड़े। अजमेर एवं आनासागर सम्बन्धी वर्णन गायकों ने बीसलदेव विग्रहराज चतुर्थ के समय तथा उसके भी बाद संभवतया सम्मिलित कर लिये हों।

बीसलदेव रासौ की भाषा भी आरंभिक राजस्थानी का उदाहरण है। कई सौ वर्षों तक मौखिक रूप में रहने पर कई स्थल वस्तुतः बदल गये हैं किन्तु अंतस्थल में अभी वही प्राचीनता का ढांचा वर्तमान है। इसमें कुछ फारसी शब्द भी प्रयुक्त हुए हैं जैसे–महल, इनाम, नेजा, चाबुक आदि। ये शब्द बाद में मिलाये गये प्रतीत होते हैं। किन्तु यह भी संभव है कि नरपति नाल्ह ने स्वयं भी इनका प्रयोग किया हो, क्योंकि उस समय मुसलमानों का भारत में प्रवेश हो गया था। बीसलदेव के सरदारों में एक मुसलमान सरदार भी था जैसा कि नरपति नाल्ह ने रासौ में लिखा है–

चढ़ि चाल्यौ छै मीर कबीर।
खुद कार तुह्म टुकेटुक धीर।।1-43

महल पलांण्यो ताज दीन।
खुरसांणी चढ़ी चाल्यो गोड।।1-41

मुसलमानों के सम्पर्क में आकर अगर नरपति नाल्ह ने कुछ फारसी शब्दों को ग्रहण कर लिया हो तो कोई आश्चर्य नहीं। प्राकृत एवं अपभ्रंश की छाप इस काव्य में पूरी तरह स्पष्ट है। यह ग्रंथ उस समय रचा गया जब कि साहित्यिक विद्वानों की भाषा प्राकृत व अपभ्रंश थी। उस समय बोलचाल की भाषा में नरपति नाल्ह ने काव्य- रचना कर वास्तव में बड़े साहस का कार्य किया। कहीं-कहीं मेलन, चितह, रणि, आपिजइ, इणीविधि, ईसउ, नायर, पसाऊ, पयोहर आदि प्राकृत शब्द भी आ गए जिनका प्रयोग अपभ्रंश काल के पीछे तक भी होता रहा।

बीसलदेव रासौ में कारक दो प्रकार से व्यक्त हुए हैं। कुछ में तो विभक्तियों का प्रयोग है, कुछ में कारक चिह्न लगे हैं। इस प्रकार भाषा में संयोगात्मक और वियोगात्मक दोनों अवस्थायें प्राप्त हैं। वर्तमान काल भी इसमें दो प्रकार से व्यक्त हुए हैं। एक तो “छइ” वा “हइ” मूल क्रिया में लगा कर तथा दूसरे मूल क्रिया में परिवर्तन कर के। भाषा यद्यपि काफी नवीन रूप में हो गई है किन्तु प्राचीन रूप भी पूर्णतया नष्ट नहीं हुआ। प्रायः संज्ञायें, कारक आदि प्राचीन रूप में मिलते हैं। विसनपुरी, म्हारउ, मिलिअ, पणमिअ, अछइ, वे, राखइ, जेणि इत्यादि अपभ्रंश के ठीक पश्चात् की लोक-भाषा के प्रयोग हैं। ऐसे प्रयोगों की संख्या काफी अधिक है। कई ऐसे प्रयोग भी मिलते हैं जो सोलहवीं शताब्दी की भाषा के रूप कहे जा सकते हैं। जैसे–“बेटी राजा भोज की” में “की” और “उलिगाणा गुण वरणिता” में “वरणिता” का प्रयोग। किन्तु ऐसे शब्द बहुत कम हैं। इस तनिक से शब्द-साम्य पर इसे सत्रहवीं शताब्दी का रचित जाली ग्रंथ कह देना उचित नहीं। भाषा की परीक्षा उसके शब्दों से न होकर व्याकरण से होती है। “बीसलदेव रासौ” की भाषा को व्याकरण की कसौटी पर कसने से पता चलता है कि उसमें अपभ्रंश के नियमों का विशेष पालन हुआ है। इस सम्बन्ध में दो उदाहरणों से यह बात अधिक स्पष्ट हो जायेगी–

कसमीरां पाटणह मंझारि। सारदा तुठि ब्रह्मकुमारि।।
“नाल्ह रसायण नर भणइ। हियडइ हरषि गायण कइ भाइ।।
खेला मेल्ह्या मांडली। बहस सभा मांहि मोहेउ छइ राइ।।
–खंड 1, छंद 6.

नाल्ह बषाणइ छइ नगरी जू धार।
जिहां बसइ राजा भोज पंवार।
असीय सइहस सजे करि मैमत्ता।
पंच क्षोहण जे कर मिलइ निरिंदा।।
कर जोड़े “नरपति” कहइ।
विसनपुरी जाणे वसइही गोव्यंद।।
–खंड 1, छंद 12

ग्रंथ के रचयिता के विषय में भी नाम के अतिरिक्त अन्य जानकारी बहुत ही कम है। इतना अवश्य कहा जा सकता है कि सोलहवीं शताब्दी के गुजरात के “नरपति” और “बीसलदेव रासौ” के रचयिता नरपति नाल्ह एक व्यक्ति नहीं हैं। श्री मोतीलाल मेनारिया की एक होने की धारणा[1] का खंडन करते हुए श्री माताप्रसाद गुप्त ने लिखा है[2] –“गुजरात के “नरपति” ने अपने को कहीं “नाल्ह” नहीं कहा जबकि “बीसलदेव रासौ” का रचयिता अपने को “नाल्ह” कहता है। फिर जो पंक्तियाँ तुलना के लिए दोनों कवियों से दी गई हैं, उनमें चार तो इस संस्करण में प्रक्षिप्त माने गए छंदों की हैं, और शेष तीन पंक्तियों में जो साम्य है वह साधारण है। उस प्रकार का साम्य देखा जावे तो मध्य युग के किन्हीं भी दो कवियों की रचनाओं में मिल सकता है। फिर “बीसलदेव रासौ” में न जैन नमस्क्रिया है और न कोई अन्य बात मिलती है जिससे इसका लेखक जैन प्रमाणित होता हो। केवल आंशिक नाम-साम्य के आधार पर इस रचना को सोलहवीं-सत्रहवीं शती के किसी जैन लेखक की कृति मानना तटस्थ बुद्धि से सम्भव नहीं ज्ञात होता है।”

कवि की जाति भी विवादास्पद है। आचार्य शुक्ल ने इसे भाट माना है।[3] श्री अगरचन्द नाहटा इसे ब्राह्मण (सेवग) मानते हैं।[4]

[1] राजस्थानी भाषा और साहित्य, ले. पं. मोतीलाल मेनारिया, पृष्ठ 88-89.
[2] "बीसलदेव रास", सं. डॉ. माताप्रसाद गुप्त तथा श्री अगरचन्द नाहटा, प्रकाशक : हिन्दी परिषद्, विश्वविद्यालय प्रयाग, भूमिका, पृष्ठ 60.
[3] हिन्दी साहित्य का इतिहास--रामचन्द्र शुक्ल, सातवां संस्करण, पृष्ठ 37.
[4] राजस्थानी, भाग 3, अंक 3 में प्रकाशित नाहटाजी का एक लेख।

बीसलदेव रासौ की रचना के बाद से ही राजस्थानी भाषा शनैः शनैः अपभ्रंश से दूर होकर अपना स्वतन्त्र रूप ग्रहण करने लगी। 11वीं शताब्दी से लेकर आदि काल के अन्तिम समय, अर्थात् लगभग पन्द्रहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक प्राचीन राजस्थानी के जैन कवियों के अनेक प्रामाणिक ग्रंथ हमें प्राप्त हैं परन्तु इस अवधि की जैनेतर स्वतन्त्र रचनायें प्रायः अनुपलब्ध ही हैं। ढोला मारू रा दूहा, जेठवा रा दूहा और बीसलदेव रासौ जो 11वीं शताब्दी की ही रचनायें मानी गई हैं, को छोड़ कर 15वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक कोई अन्य जैनेतर स्वतन्त्र ग्रंथ प्राप्त नहीं होता। इसका अभिप्राय यह नहीं कि इस काल में कोई जैनेतर रचना हुई ही नहीं। साहित्य की सुरक्षा के प्रति शिथिलता एवं उदासीनता के कारण ही तत्कालीन रचनायें अपना स्थायित्व नहीं रख सकीं। उस समय की रचनाओं के अनेक फुटकर पद इन्हीं शताब्दियों में जैन मुनियों द्वारा रचित प्रभावकचरित्र, प्रबन्धकोश, प्रबन्ध चिन्तामणि, उपदेशतरंगिणी, पंचशती कोश आदि ग्रंथों में उद्धृत मिलते हैं। यहां हम तेरहवीं शताब्दी तक की जैनेतर रचनाओं के प्राप्त फुटकर पदों को उदाहरणस्वरूप प्रस्तुत कर आगे प्रामाणिक जैन साहित्य का शताब्दी अनुसार उल्लेख करेंगे। जैनेतर फुटकर पद जो भी प्रबन्धादि ग्रंथों में उद्धृत मिलते हैं प्रायः चारणों, भाटों तथा ब्राह्मणों आदि की ही रचनायें हैं।

1. उदाहरण–प्रभावकचरित्र–

1. अणु हुल्लीय फुल्ल म तोडहु मन आरामा म मोडहु।
मण कुसुमहिं अच्चि निरञ्जणु, हिण्डह काइं वणेण वणु।

2. नवि मारिअइ नवि चोरिअइ, पर-दारह अत्थु निवारिअइ।
थोवाह विथोवं दाइअइ, तउ सग्गि टुगुट्टुगु जाइयइ।
(वृद्धवादि सूरिचरितम् में संग्रहीत)

2. ढूमण चारण–

जीव वधन्तां नग्ग गइ, अवधन्तां गइ सग्गि।
हुं जाणुं दुइ वट्टड़ी, जिणि भावै तिणि लग्गि।
(उपदेशतरंगिणि)

3. रामचन्द्र चारण–

काहूं मती विभंतड़ी, अजीय मणिअड़ा गुणेह।
अखय निरंजण परम पथा, अजय जय न लहेह।।

अम्हे थोड़ा रिपु घणा, इम कायर चिंतंति।
मुद्ध निहालउ गयणयलु, के उज्जोउ करंति।।
(पुरातनाचार्यप्रबन्ध)

4. बागण कवि–

कुमरउ! कुमर विहार, एता कांइं कराविया।
ताहं कु करिसइ सार, सीप न आवइं सयं घणी।।
(पुरातनाचार्यप्रबन्ध)

5. आमभट्ट–

रे रक्खइ लहु जीव वड विरणि मयगळ मारइ,
न पीइ अणगल नीर हेलिरायह संहारइ।

अवरन बंधइ कोइ सघर रयणायर बंधइ,
पर नारी परिहरइ लच्छि पररायह रूंधइ।

ए कुमार पाल! कोपिं चडिउ फोडइ सत्त कडाहि जिम,
जे जिणधम्म न मन्निसिइं तींहवी चाडिसु तेम तिम।
(उपदेशतरंगिणी)

6. उदयसिंह चारण–

सुन्दर सर असुराह दलि, जल पीधउं वयणेहिं।
उदयनरिंदहिं कड्ढ़ीउं, तीहं नारीनयणेहिं।।
(प्रबन्धचिन्तामणि)

7. मुंजराजप्रबन्ध–

देव अम्हारी सीख, कीजइ अवगणिअइ नहीं।
तूं चालंती भीख, इणि मंत्रिहिं हुस्यइ सही।।

सामी मुहतउ वीनवइ, ए छेहलउ जुहार।
अम्ह आइसु हिव सीसि तुह, पडतउं देखूं छारु।।

जा मति पच्छइ सम्पज्जइ, सा मति पहिली होइ।
मुंज भणइ मुणालवइ, विघन न वेढ़इ कोइ।।
(प्रबन्धचिन्तामणि)

8. संवत् 1199 के आसपास श्री विजयसिंह ने सांचोर के दहियों का राज्य छीन लिया था। उस समय के जिस पद का उल्लेख मुहणौत नैणसी ने अपनी ख्यात में किया है वह निम्न है–

धरा धूंण धकचाळ कीध दरिया दल्लव है।
सवदी सवळां साल प्राण मेवास पहै।।

आल्हणसुत विजयसी वंस आसराव प्रागवड़।
खाग त्याग सत्रवाट सरण विजय पंजर सोहड़।।

चहुआंण राव चौरंग अचल नरांनाह अणभंग नर।
धूमेर सेन ज्यां लग अचळ तांम राज सांचोरधर।।

जिनवल्लभ सूरि

11वीं शताब्दी तक राजस्थान में रचित अपभ्रंश काव्य के प्रकाश में आगे चल कर तेरहवीं शताब्दी में अनेक जैन मुनियों ने राजस्थानी में भी रचना की है। उन्हीं की रचनाओं के आधार पर इस शताब्दी तक राजस्थानी को गुजराती तथा अपभ्रंश से मुक्त होना माना जाता है। जैन साहित्य में प्रथम ग्रंथ हमें जैनाचार्य जिनवल्लभ सूरि रचित “व्रद्ध नवकार” प्राप्त होता है। सूरिजी का देहान्त संवत् 1167 में माना जाता है। अतः यह निश्चित है कि “व्रद्ध नवकार” की रचना भी संवत् 1167 के पहिले ही की गई होगी। 1 इस ग्रंथ की भाषा के उदाहरण के लिए एक पद प्रस्तुत किया जाता है–

उ.– चित्रा वेली काज किसै देसांतर लंघउ।
रयण रासि कारण किसै सायर उल्लंघउ।।
चवदह पूरव सार युगे एक नवकार।
सयल काज महि पल सरै दुत्तर तरै संसार।।

वज्रसेन सूरि

इसके बाद प्राप्त होने वाली रचनाओं में वज्रसेन सूरि रचित “भरतेश्वर-बाहुबलिघोर” रचनाकाल वि.सं. 1225 और शालिभद्र सूरि रचित “भरतेश्वर बाहुबलि रास” वि.सं. 1241 प्राचीन राजस्थानी की प्राचीनतम रचनायें हैं। इन ग्रंथों की भाषा के उदाहरण-स्वरूप दो पद यहाँ उद्धृत हैं–

धर डोलइ खलभलइ सेनु, दिणियरु छाइजइ।
भरहेसरु चालियउ कटकि, कसु ऊपमु दीजइ।।
तंति सुणे विणु बाहू बलिण, सीवह गय गुड़िया।
रिण रहसिंहि चउरंग दलिहि, बेऊ पासा जुडिया।।
(बाहुबलि घोर)

कंधग्गल केकाण, कवी करडइं कडियाला
रण णइं रवि रण वखर सखर घण घाघरीयाला,
सींचाण वरि सरइं, फिरइं सेलइं फोकारइं
ऊडइं आडइं अंगि रंगि, असवार विचारइं।
(बाहुबलि रास)

इनके अतिरिक्त तेरहवीं शताब्दी की अन्य अनेक उल्लेखनीय जैन रचनायें हैं। स्थानाभाव के कारण प्रत्येक ग्रंथ का पूर्ण परिचय एवं उसकी भाषा का उदाहरण देने में असमर्थ से हैं। फिर भी पाठकों की सुविधा के लिए प्राप्त प्रामाणिक ग्रंथों के नाम, उनके रचनाकार एवं रचनाकाल यहां प्रस्तुत कर रहे हैं–

  • मुनि शालिभद्र सूरि कृत–बुद्धिरास, वि.सं. 1241.
  • कवि आसिगु कृत–जीवदयारास, चन्दनबाला, वि.सं. 1257.
  • धर्म (धम्म) मुनि कृत–जम्बूस्वामी, वि.सं. 1266.
  • मुनि जिनपति सूरि कृत–जिनपतिसूरि बधावण गीत, वि.सं. 1232.
  • विजयसेन सूरि कृत–रेंवतगिरि रास, वि.सं. 1287.
  • पल्हण कवि कृत–आबूरास, नेमिनाथ बारहमासा, वि.सं. 1289.
  • जिनभद्र सूरि रचित–वस्तुपाल तेजपाल प्रबन्धावली, वि.सं. 1290.
  • सुमतिगणि रचित–नेमिरास तथा गजधर सार्धशतक वृहद्वृत्ति, वि.सं. 1295.
  • अभयदेव सूरि रचित–जयंतविजय, वि.सं. 1285.

इनके अतिरिक्त शान्तिनाथ रास, महावीरजन्माभिषेक, श्री वासुपूज्य बोलिका चाचरी, शान्तिनाथ बोली, रसविलास, गयसुकुमाल रास आदि भी इसी शताब्दी की रचनायें मानी जाती हैं। इस काल की भाषा के उदाहरण के लिए मुख्य ग्रंथों के कुछ पद यहां उद्धृत किये जाते हैं–

1.
के नर सालि दालि भुंजंता, धिय धलहलु मज्झे विलहंता।

के नर भूखा दूखियइं, दीसहिं परघरि कम्मु करंता।
जीवता विमुया गणिय, अच्छहिं बाहिरि भूमि रुलंता।
~~जीवदयारास सं. 1257

2.
अगुण अंजण अंबिलीय अंबाडय अंकुल्लु।

उंबरु अंबरु आमलीय, अगरु असोय अहल्लु।।
वेयलु वंजलु बडल वडो, वेडस वरण विडंग।
वासंती वीरिणि विरह, वंसियाली वण वंग।।
सींसमि सिंबलि सिरसमि, सिंधुवारि सिरखंड।
सरलसार साहार सय, सागु सिगु सिणदंड।।
~~रेंवतगिरि रास वि.सं. 1287

3.
विसय सुक्खु कहिं नरय दुवारु, कहि अनंत सुहु संजम भारु।

भलउ बुरउ जाणत विचारइ, कग्गिणि कारणि कोडि कुहारइ।।
~~नेमिरास वि.सं. 1295

4.
कासमीर मुख मंडण देवी वाएसरि पाल्हणु पणमेवी।

पदमावतिय चक्केसरि नमिउं, अंबिक देवी हउ वीनवउं।।
चरिउ पयासउ नेमि जिण केरउं, कपीतु गुण धम्म निवासो।
जिम राइमइ वीओगु भओ, “बारहमास” पयासउ रासौ।।
~~नेमिनाथ बारहमासा वि.सं. 1289

तेरहवीं शताब्दी की साहित्यिक परम्परा चौदहवीं शताब्दी के ग्रंथों में भी परिलक्षित है। इस शताब्दी की प्राप्त स्वतंत्र रचनाओं में अधिकांश जैन मुनियों के ही ग्रंथ प्राप्त हैं। प्राप्त ग्रंथों का उल्लेख कर हम नीचे इस काल की भाषा के उदाहरणस्वरूप विख्यात ग्रंथों के पद उद्धृत करेंगे।

चौदहवीं शताब्दी की रचनायें–

  • अभयतिलक गणि कृत–महावीर रास, वि.सं. 1307.
  • लक्ष्मीतिलक उपाध्याय कृत–बुद्धचरित्र, श्रावकधर्म प्रकरण वृहतवृत्ति, वि.सं. 1311.

आणंद सूरि एवं प्रेम सूरि रचित–

  • द्वादश भाषा (ढ़ाल) निबद्ध तीर्थ माला स्तवन, वि.सं. 1323.
  • मुनि राजतिलक रचित शालीभद्र रास, वि.सं. 1332.
  • कवि सोममूर्ति कृत–1. जिनेश्वर सूरि दीक्षा विवाह वर्णन रास, सं. 1331.
  • कवि सोममूर्ति कृत–2. जिनप्रबोध सूरि चर्चरी, वि.सं. 1332.
  • कवि हेमभूषण मणि कृत जिनचंद्रसूरि चर्चरी, वि.सं. 1341.
  • मुनि मेरुतुंगाचार्य कृत प्रबन्ध चिन्तामणि संग्रह, सं. 1361.
  • श्रावक कवि वस्तिम रचित वीस विरह मान रास, सं. 1362.
  • गुणाकार सूरि रचित श्रावक विधि रास, सं. 1371.
  • अंबदेव सूरि कृत समरा रास, सं. 1371.
  • मुनि धर्मकलश कृत जिनकुशल सूरि पट्टाभिषेक रास, सं. 1377.
  • जिनप्रभ सूरि रचित पद्मावती चौपई, वि.सं. 1385.

इनके अतिरिक्त कवि छल्हु कृत क्षेत्रपाल, द्विपदिका, कवि सारमूर्ति कृत “पद्मसूरि पट्टाभिषेक रास”, जिनपद्म सूरि रचित स्थूलिभद्र फाग, पउम रचित शालीभद्र काव्य, सोलणु कृत चर्चरिका आदि भी इसी शताब्दी की रचनायें हैं।

चौदहवीं शताब्दी के ग्रंथों में प्रयुक्त राजस्थानी भाषा–

तसु उवरि भवणु उत्तंग वर तोरणं, मंडलिय राय आएसि अइ सोहणं।
सुहाणा भुवण पालेण करावियं, जगधरह साहु कुलिकलस चडावियं।
हेम धय दंड कलसो तहिं कारिउ, पहु जिणेसर सुगुरु पासि पयठाविउ।
विक्कमे वरिस तेरहइ सत्तरुत्तरे, सेय वयसाह दसमीई सुहवासरे।
~~महावीर रास

“संत जिणेसर” वर भुयणि, मांडिउ नंदि सुवेह।
वरिसहिं भविय दाणजलि, जिम गयणंगणि मेह।
ताहि अगयारिय नीपजइ, झाणनलि पजलंति।।
तउ संवेगहि निम्मियउ, हथलेवउ सुमहुत्ति।
~~जिनेश्वर सूरि दीक्षाविवाहवर्णन रास

वाजिय संख असंख नादि काहिल दुडुदुड़िया,
घोड़े चडइ सल्लार सार, राउत सींगडिया।
तउ देवालउ जोत्रि वेगि, घाघरिखु झमकइ,
सम विसम नवि गणइ कोइ नवि वारिउ थक्कइ।।
सिजवाळा धर धड़हड़इ वहिणि बहुवेंगि।
धरणि धड़क्कइ रजु ऊडए, नवि सूझइ मागो।
हय हींसइ आरसइ करह वेगि वहइ वइल्ल,
साद किया थाहरइ अवरु नवि देई बुल्ल।
~~समरा रास

बंझ नारि तुह पय झापंति, सुरकुमरोवम पुत्त लहंति।
निंदू नंदण जणइ चिराउ, दूहव पावइ वल्लह राउ।।
चिंतियफल चिंतामणि मंति तुज्झ पसायिं फलइ नियंतु।
अणुग्गह नर पिक्खेवि, सिज्झइ सोलह विज्जाएवि।।
~~पद्मावती चौपई

सीमळ कोमल सुरहि वाय जिम जिम वायंते।
माणमडफ्फर माणणिय तिम तिम नाचंते।।
जिम जिम जलभर भरिय मेह गयणंगणि मिलिया।
तिम-तिम कामी तणा नयण नीरिहि झलहलिया।।
भास मेहारव भर उलटिय, जिम जिम नाचइ मोर।
तिम-तिम माणिणि खळभळइ, साहीता जिम चोर।।
~~स्थूलीभद्र फाग

चौदहवीं शताब्दी के पश्चात् पन्द्रहवीं शताब्दी के मध्य तक की उल्लेखनीय रचनायें निम्नलिखित हैं। ग्रन्थों की नामावली के पश्चात् भाषा के उदाहरणस्वरूप कुछ पद उद्धृत किए जा रहे हैं।-

  • राजेश्वर सूरि कृत प्रबन्ध कोश, नेमिनाथ फागु, वि.सं. 1405.
  • कवि हलराज कृत स्थूलिभद्र फाग, वि.सं. 1409.
  • मुनि शालिभद्र सूरि कृत पांच पांडव रास, वि.सं. 1410.
  • मुनि विनयप्रभसूरि कृत गौतमस्वामी रास, वि.सं. 1412.
  • जैन मुनि ज्ञानकलश रचित जिनोदय सूरि पट्टाभिषेक रास, वि.सं. 1415.
  • श्रावक विद्धणु रचित ज्ञानपंचमी चौपई, वि.सं. 1423.
  • मेरुनंदण गणि कृत जिनोदयसूरि गच्छनायक विवाहलु, वि.सं. 1432.
  • देवप्रभ गणि कृत कुमारपाल रास। कवि चंपा कृत देवसुन्दर रास, वि.सं. 1445.
  • साधु हंस कृत शालिभद्र रास, वि.सं. 1455.

1.
वंकुडियालीय भुंहडियहं, भरि भुवणु भमाडइ।
लाडी लोयण लह कुडलइ सुर सग्गह पाडइ।।

किरि सिसि बिंब कपोल, कन्नहिंडोल फुरंता।
नासा वंसा गरुड चंचु दाड़िम फल दंता।।

अहर पवाल तिरेह कंठुराजलसर रूडउ।
जाणु वीणु रणरणइं, जाणु कोइल टहकडलउ।।

~~नेमिनाथ फागु

2.
जिम सहकारिहिं कोयल टहकउ,
जिम कुसुमह वनि परिमल बहकउ,

जिन चंदनि सोगंध विधि,
जिम गंगाजलु लहरिहिं लहकइ,

जिम कणयाचलु तेजिहिं झलकइ,
तिम गोयम सोभाग निधि।।

~~गौतम स्वामी रास

3.
इक्कु जगि जुग पवरु अवरु निय दिक्ख गुरु
थुणिसुं हउं तेण निय मइ बलेण।

सुरभि किरि कंचणं दुद्धु सक्कर घणं
संखु किरि भरीउ गंगा जलेण।।

अत्थि गूजरधरा” सुंदरी सुंदरे,
उरवरे रयण हारोवमाणं।

लच्छि केलिहरं नयरु “पल्हणपुरं”,
सुरपुरं जेम सिद्धामिहांण।।

~~जिनोदय सूरी गच्छनायक वीवाहलु

आदि काल की इस अंतिम अवधि में जैन ग्रंथों के साथ-साथ कुछ उल्लेखनीय जैनेतर रचनाओं का भी निर्माण हुआ है। प्रामाणिक रचनाओं के रूप में प्राप्त होने के कारण आदिकाल के साहित्य में इन जैनेतर रचनाओं का अपना विशेष महत्त्व है। इन रचनाओं में सर्वप्रथम “बारूजी सौदा” के फुटकर गीतों का उल्लेख मिलता है। ये उदयपुर के महाराणा हम्मीर के समकालीन थे। इस दृष्टि से इनका रचनाकाल संवत् 1408 से 1421 के बीच माना जा सकता है। वैसे इनका लिखा हुआ कोई ग्रंथ स्वतंत्र रूप में तो नहीं मिलता लेकिन कुछ फुटकर गीत यत्र-तत्र मिल जाते हैं जो उस काल की साहित्यिक विधाओं को समझने में सहायक होते हैं। उदाहरणस्वरूप उनका लिखा एक गीत यहां उद्धृत किया जाता है–

ऐळा चितौड़ा सहै घर आसी, हूँ थारा दोखियां हरूं।
जणणी इसौ कहूँ नह जायौ, कहवै देवी धीज करूं।।1

रावळ बापा जसौ रायगुर, रीझ खीझ सुरपंत री रूंस।
दस सहंसां जेहो नह दूजौ, सकती करैं गळा रा सूंस।।2

मन साचै भाखै महमाया, रसणा सहती बात रसाळ।
सरज्यौ लै अड़सी सुत सरखो, पकड़े लाऊं नाग पयाळ।।3

आलम कलम नवै खंड एळा, कैलपुरारि मींढ किसौ।
देवी कहै सुण्यौ नह दूजौ, अवर ठिकांणै भूप इसौ।।4

प्राचीन राजस्थानी साहित्य, भाग 6[1] में असाइत नामक एक कवि का और उल्लेख किया गया है। इन्होंने वि. संवत् 1427 में “हंसाउली” काव्य की रचना की। “हंसाउली” मुख्यतः एक प्रेम-काव्य है जो चार खण्डों में विभक्त है तथा 440 कड़ियों में लिखा हुआ है। सम्पूर्ण काव्य चौपाइयों में रचा गया है किन्तु बीच-बीच में दोहों का भी प्रयोग किया गया है। इस ग्रन्थ के निर्माण के पूर्व ही एक जैन कवि विनयभद्र “हंसवच्छ” काव्य चौपाइयों में लिख चुका था। उसमें भी इसी प्रेम-कथा का वर्णन है। कवि असाइत ने उसी प्रेम-गाथा को अपने “हंसाउली” में नवीन रूप में प्रस्तुत किया। इनकी कविता पर जैन कवियों की शैली व परम्परा की पूर्ण छाप दृष्टिगोचर होती है। “हंसाउली” की भाषा निम्न उद्धरण से देखी जा सकती है–

विवध फूल फल निव नैवेद्य, वीणा वस गाइ गुण भेद।
सोइ जि परवरी पंचसि नारि, दीठी कुंयरि मंत्रि मढि बारि।।
यथु देवी तब बुद्धि निधांन, हाकि मुनि केसर प्रधांन।
नरहत्या ति किधी धणी मुझ मढ़ि मर हेसि पापिणी।।
हंसाउली सबद जव सुणी, जांण्यु देवि कुपी मुझ भणी।
कर जोडीनि ऊभी रहि गत, पूरब भव वीतक कहि।।

श्रीधर व्यास द्वारा रचित “रणमल छन्द” नामक रचना भी इस काल की एक प्रामाणिक रचना मानी जा चुकी है। उक्त कवि के सम्बन्ध में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है, फिर भी इनकी रचना ऐतिहासिक दृष्टि से पूर्ण प्रामाणिक है। “रणमल छंद” सत्तर छंद का एक वीर काव्य है जिसमें पाटण के तत्कालीन सूबेदार मुजफ्फरशाह और ईडर के वीर राठौड़ नरेश रणमल्ल के युद्ध का सजीव चित्रण है। इस युद्ध का समय अनेक विद्वानों ने ई. सन् 1397 माना है। इसके सम्बन्ध में इतिहासज्ञों का भिन्न-भिन्न मत है, फिर भी गुजरात के प्रसिद्ध विद्वान के. ह. ध्रुव ने सन् 1397 को ही स्वीकार किया है।[2] इस दृष्टि से इस ग्रन्थ का रचनाकाल वि.सं. 1454 के आसपास ही ठहरता है। इसकी भाषा के उदाहरण हेतु एक पद नीचे प्रस्तुत किया जाता है–

गोरी दल गाहवि दिट्ठ दहुद्दिसि गढ़ि मढ़ि गिरिगह्वरि गडियं।
हणहणि हवकन्तउ हुं हुं हय हय हुंकारवि हयमरि चडियं।।
धडहडतउ धडि कमधज्ज धरातळि धसि धगडायण धूंसधरइ।
ईडरवइ पंडर वेस सरिसु रणि रांमायण रणमल्ल करइ।।

इसी समय कवि जाखौ मणिहार भी हो चुके हैं जिन्होंने लगभग 1453 में बोलचाल की राजस्थानी में “हरिचंद पुराण” नामक धार्मिक ग्रन्थ की रचना की। उपर्युक्त सम्पूर्ण विवेचन के आधार पर यह स्पष्ट है कि आदिकालीन राजस्थानी साहित्य हमारे समक्ष मुख्यतः दो रूप में आता है–जैनेतर साहित्य एवं जैन साहित्य। इस काल की प्राप्त सभी रचनाओं में जैनेतर साहित्य की अपेक्षा जैन साहित्य अधिक मात्रा में उपलब्ध है और वह पूर्ण प्रामाणिक भी है। इस प्रारंभिक साहित्य के कई ग्रन्थों की प्रामाणिकता को लेकर भिन्न-भिन्न साहित्य-विशेषज्ञों तथा इतिहासकारों ने यद्यपि अपनी मतभिन्नता प्रकट की है, फिर भी इन रचनाओं को उन्होंने प्रामाणिक रूप से आदिकालीन रचनायें ही स्वीकार किया है। दोनों ही प्रकार की रचनाओं के उल्लेख के समान यथास्थान पर दिये गए पदों के उदाहरण तत्कालीन राजस्थानी भाषा पर प्रकाश ही नहीं डालते परन्तु भाषा के निजी अस्तित्व का प्रमाण भी प्रस्तुत करते हैं। निष्पक्ष दृष्टिकोण से यह तो मानना ही होगा कि इस काल की रचनाएं हमारी अमूल्य निधि रही हैं। हिन्दी व राजस्थानी इसी विधि के द्वारा ही अपनी मां अपभ्रंश से सम्बन्ध स्थापित करती हैं। इन रचनाओं में वास्तव में हम प्राचीनता के दर्शन करते हैं, चाहे वे पूर्ण न होकर आंशिक ही हों। ये रचनाएं उस मिली-जुली अवस्था की प्रतिनिधि हैं जब राजस्थानी अपभ्रंश से पृथक् स्वतंत्र सत्ता ग्रहण करने का प्रयत्न कर रही थी। इस दृष्टि से इन रचनाओं का महत्त्व और भी अधिक बढ़ जाता है।

आदिकालीन राजस्थानी साहित्य के वर्णन के समय अनेक विद्वानों का प्रायः यही मत उल्लिखित मिलता है कि यह साहित्य वीररस-प्रधान है। हिन्दी साहित्य के इतिहास के लेखकों ने तो राजस्थानी की इन्हीं प्रारम्भिक रचनाओं के नाम उल्लेख कर उसे वीरगाथा-काल नाम भी दे दिया है, जब कि राजस्थानी साहित्य में पन्द्रहवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक वीररस का कोई ग्रंथ उपलब्ध भी नहीं होता। परन्तु वास्तव में ऐसी बात नहीं है। विद्वानों का यह मत पूर्ण भ्रमात्मक ही प्रतीत होता है। इस काल की उल्लेखित रचनाओं में एक भी स्वतंत्र रचना ऐसी नहीं है जिसे हम वीररस-प्रधान कह सकते हैं। प्राप्त रचनायें मुख्यतः प्रेम-काव्य होने के कारण श्रृंगारिक हैं। अन्य या तो धार्मिक ग्रन्थ होने के कारण उपदेशात्मक हैं या फिर वस्तु-वर्णन-प्रधान। यह सत्य तो अवश्य है कि इस काल में राजनैतिक स्थिति संघर्षपूर्ण थी। राजपूत शासक युद्ध के लिए सदैव ही तत्पर रहते थे। अनेक राजपूत वीरों ने युद्ध के मैदान में अपने अद्भुत शौर्य का परिचय भी दिया परन्तु उनकी वीर-प्रशंसा तथा युद्ध-वर्णन का तत्कालीन कोई ग्रन्थ नहीं मिलता। अतः इस सम्बन्ध में तत्कालीन लिपिनिष्ठ रचनाओं के अभाव में इस समय के साहित्य को वीररस-प्रधान बताना असंगत ही है। हो सकता है, उस समय वीर-चरित-नायकों की वीर-प्रशंसा में श्रुतिनिष्ठ साहित्य प्रचलित हो।

डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अपने “हिन्दी साहित्य का आदिकाल” में आचार्य शुक्ल के हिन्दी के आदिकाल को वीरगाथा काल बताने के मत का खण्डन करते हुए बताया कि शुक्लजी द्वारा जिन 12 ग्रंथों के आधार पर इस काल को वीर गाथा काल नाम दिया गया है उनमें से कई रचनायें तो बाद की निकलती हैं और कुछेक के सम्बन्ध में यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि उनका मूल रूप क्या था।[3] खुमाण रासौ बहुत पीछे की रचना निकलती है तो पृथ्वीराज रासौ के मूल रूप का पता नहीं चलता, बीसलदे रासौ कोई वीर रस-प्रधान रचना नहीं है। अतः उन्होंने भी मिश्रबंधुओं द्वारा दिये गये नाम–आदिकाल के ही पक्ष में अपना मत दिया है।

[1] उदयपुर साहित्य संस्थान।
[2] प्राचीन गुर्जर काव्य--के. ह. ध्रुव, प्रस्तावना, पृष्ठ 3.
[3] हिन्दी साहित्य का आदिकाल--डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी, प्रथम व्याख्यान, पृ. 11

साहित्य-विशेषज्ञ एवं विद्वद्जन आदिकालीन रचनाओं के सम्बन्ध में निरन्तर रूप से अनुसन्धान एवं साहित्य शोध-कार्य करते आ रहे हैं। इसी के परिणामस्वरूप राजस्थानी के प्राचीनतम साहित्य का दिग्दर्शन सम्भव हो सका है। प्राचीन राजस्थानी की अनेक रचनायें आज भी अज्ञानता के अंधकार में लुप्त हैं। जन- साधारण की अशिक्षा के कारण और प्राचीन साहित्य के महत्त्व की अनभिज्ञता के कारण कई प्राचीन मौलिक ग्रन्थ व ग्रन्थों की प्रतियां सुदूर गांवों में विनाश को प्राप्त हो रही हैं। इसके अतिरिक्त प्राप्त रचनाओं में से भी कुछेक काल-प्रमाण के अभाव में विवादग्रस्त पड़ी हुई हैं। ऐसी स्थिति में अप्राप्त रचनाओं की खोज एवं प्राप्त साहित्य के सम्बन्ध में शोधकार्य अत्यन्त आवश्यक रूप से अपेक्षित है। इस प्रकार का कार्य न केवल साहित्य की अभिवृद्धि ही करेगा अपितु उसकी प्रामाणिकता को और अधिक पुष्टि प्रदान करता हुआ हमारी अपनी प्राचीन संस्कृति की सुरक्षा करने में भी सहयोगी सिद्ध होगा।

मध्यकाल–वि.सं. 1460 से 1900 तक

आदिकालीन राजस्थानी साहित्य की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में हम यह बता आए हैं कि लगभग विक्रम की तेरहवीं शताब्दी तक राजपूताने के प्रत्येक विभाग पर राजपूती राज्य की स्थापना हो चुकी थी। देश में होने वाले बाह्य आक्रमणों एवं राजपूत राजाओं के पारस्परिक युद्धों के कारण तत्कालीन राजनैतिक स्थिति पूर्ण अनिश्चित थी। आगे चल कर मध्ययुग में विदेशी सत्ताधारियों के राज्य-विस्तार के लोभ एवं राजपूतों के पारस्परिक वैमनस्य तथा फूट के कारण यह स्थिति अधिकाधिक संघर्षपूर्ण बनती गई। उत्तर-पश्चिम से आने वाले मुसलमान आक्रमणकारियों ने देश की कमजोरी से लाभ उठा कर उत्तरी भारत में अपनी सत्ता कायम कर दी। जब दिल्ली की बादशाहत से उन्हें सन्तोष नहीं हुआ तो वे राजपूताने के राज्यों को भी अपने अधिकार में करने के लिए प्रयत्न करने लगे। इसके लिए उन्हें अनेक युद्ध करने पड़े। वीर राजपूत लोग, विदेशी सत्ता तो दूर रही, उस समय अपने पड़ौसी राजपूत राजा की अधीनता भी स्वीकार करने के लिए कभी तैयार नहीं थे। अतः उन आक्रमणों का कोई परिणाम नहीं निकला। तुगलक वंश की कमजोरी के समय राजपूत राजाओं ने उन सभी राज्यों को पुनः प्राप्त कर लिया जिन्हें मुसलमानों ने हस्तगत कर लिया था।

मध्य युग में यद्यपि दिल्ली में मुस्लिम सल्तनत कायम हो चुकी थी, फिर भी बाह्य आक्रमणों का अंत नहीं हुआ था। वि. सं. 1455 (ई. सन् 1398) में अमीर तैमूर ने हिन्दुस्तान पर चढ़ाई कर दिल्ली को फतह किया, उसे लूटा और वहाँ मारकाट की। इन बाह्य आक्रमणों एवं आंतरिक युद्धों के कारण तुगलक शासक बिल्कुल कमजोर हो गए और सैयदों ने उनसे राज्य छीन लिया। ये कुछ ही वर्ष रह पाये थे कि लोदी पठानों ने इनसे बादशाहत छीन ली। इस वंश के बादशाहों ने भी राजपूत राजाओं पर अनेक आक्रमण किये परन्तु यहां के शासकों ने सभी आक्रमणों का सदैव ही वीरता के साथ प्रतिरोध किया। जिसके फलस्वरूप दिल्ली में कोई स्थायी सल्तनत कायम न हो सकी और निरन्तर आक्रमणों के कारण इन मुस्लिम शासकों की शक्ति क्षीण हो गई और अवसर का लाभ उठा कर अनेक क्षेत्रीय शासकों ने अपनी स्वाधीन रियासतें कायम कर दीं। इन रियासतों में भी एकता का परम अभाव था। इनमें पारस्परिक द्वेष एवं फूट की वृद्धि होती गई जिसके कारण इसकी शक्ति का भी ह्रास हो गया।

ऐसी स्थिति में मुगल सरदार बाबर ने हिन्दुस्तान में आकर अपनी सल्तनत कायम करने का प्रयत्न किया। यद्यपि स्वतंत्रता-प्रेमी मेवाड़ राज्य के वीर शासक राणा सांगा ने खानवा के युद्ध (वि.सं. 1584) में बाबर से लड़ते समय अद्भुत वीरता एवं अदम्य साहस का परिचय दिया तथापि दुर्भाग्यवश विजय बाबर के ही हाथ रही। इस पराजय के कुछ ही दिनों बाद राणा सांगा की मृत्यु हो गई जिसके कारण समूचे भारतवर्ष की स्वाधीनता ही अंधकार में विलीन हो गई। इस समय देश में कोई ऐसी एक दृढ़ सत्ता न रह गई थी जो विदेशी सत्ता को देश से निकाल बाहर करती। इसके फलस्वरूप मुगल सल्तनत की नींव ही भारत में अधिक गहरी जमती गई। हुमायू की मृत्यु तक तो कुछ उथल-पुथल अवश्य होती रही और उसमें कई विघ्न उत्पन्न हुए, परन्तु हुमायू की मृत्यु के बाद अकबर जब गद्दी पर बैठा तो उसने अपने शासन को दृढ़ करने के लिए हिन्दुओं को प्रसन्न रखने व राजपूत राजाओं के साथ मेल-जोल बढ़ाने की नीति को अपनाया। वह राजपूतों की वीरता से परिचित हो चुका था। इस समय राजपूताने में कुल 11 राज्य थे[1], जिनमें मेवाड़ (उदयपुर) और जोधपुर राज्य मुख्य थे। अकबर ने सर्व प्रथम आंबेर के राजा भारमल कछवाहा को कुछ प्रलोभन देकर अपनी ओर मिला लिया। परन्तु इसके साथ ही वह राजपूताने की मुख्य शक्ति मेवाड़ को भी अपने अधीन करने के लिए पूर्ण उत्सुक था। इसी उद्देश्य से उसने वि.सं. 1624 में महाराणा उदयसिंह पर चढ़ाई की। महाराणा इस युद्ध में हार अवश्य गए परन्तु उन्होंने अधीनता स्वीकार नहीं की। चित्तौड़ का किला छोड़ने के उपरान्त भी वे युद्ध करते ही रहे। महाराणा उदयसिंह के देहांत के बाद महाराणा प्रताप ने स्वतंत्रता के व्रत को कायम रखा। उन्होंने यवनों के विरुद्ध जिस वीरता का परिचय दिया वह विश्व-विदित है। इसी प्रकार मुगल सल्तनत के अन्तिम काल तक स्वाधीनता-प्रेमी राजपूत समय-समय पर अपनी मर्यादा एवं हिन्दुत्व की रक्षा के लिए निरन्तर युद्ध करते हुए अपनी वीरता का परिचय देते रहे। औरंगजेब ने जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह की मृत्यु के बाद जोधपुर को खालसे कर लिया और मेवाड़ के राणा से अप्रसन्न होने के कारण उस पर चढ़ाई कर दी। उसके बाद बहादुरशाह ने महाराजा जयसिंह से आमेर छीन लिया था परन्तु मुगल सल्तनत का पतन होते देख जोधपुर के महाराजा अजीतसिंह व आमेर के राजा जयसिंह ने महाराणा अमरसिंह द्वितीय की सहायता से अपने-अपने राज्यों पर पुनः अधिकार कर लिया। इस अवसर पर महाराजा अजीतसिंह को राज्याधिकार प्राप्त कराने में उनके सामंत वीर राठौड़ दुर्गादास ने पूर्ण सहयोग देकर सच्ची स्वामी-भक्ति का परिचय दिया।

मुगल सल्तनत के पतन के समय जब मरहठों की शक्ति बढ़ती जा रही थी तब यहां के शासकों को तो उनका भी प्रतिरोध करना पड़ा। इसके परिणामस्वरूप मरहठों तथा राजपूतों में भी निरन्तर संघर्ष चलता ही रहा।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि यह काल भयंकर युद्ध एवं संघर्ष का युग रहा। इस संघर्ष में विशेषतः राजपूताने के वीरों ने जो अतुल शौर्य का परिचय दिया वह कहीं अन्यत्र दृष्टिगोचर नहीं होता। अपनी मर्यादा और मातृभूमि की रक्षा के लिए युद्ध भूमि में हँसते-हँसते प्राणों की आहुति दे देना ही इनके जीवन की विशेषता थी। यही कारण है कि इस संघर्ष काल में वीरता, साहस और बलिदान का परिचय देने वाले योद्धाओं की अनेक गाथाओं से राजस्थानी साहित्य का भंडार भरा हुआ है। ऐसे शूरवीर नायकों की कीर्ति गाथायें इस समय के साहित्य की मुख्य धरोहर हैं।

इस अमर साहित्य का सृजन करने वाले कवि प्रायः राज्याश्रित होने पर उनका उद्देश्य राजा की प्रशंसा करना ही नहीं होता था। वे जहाँ भी वीरता और मानवीय गुणों का परिचय पाते, अपनी काव्य-प्रतिभा के माध्यम से उन गुणों को जन साधारण तक पहुँचाते, चाहे वर्णन साधारण योद्धा के सम्बन्ध में हो, चाहे किसी बड़े शासक के सम्बन्ध में। कविवर दुरसा आढ़ा ने जनता एवं स्थानीय शासक के मध्य भी सम्मान प्राप्त किया और प्रताप की प्रशंसा में “विरुद छिहतरी” लिख कर बादशाह अकबर के दरबार तक में अधिक ख्याति पाई।

दूसरा उदाहरण कविराजा बांकीदासजी का भी है। ये जोधपुर के महाराजा मानसिंह के राजकवि थे पर जब खांडप के एक साधारण व्यक्ति लाधा सोलंकी ने भीषण दुष्काल के समय अपने क्षेत्र की प्रजा की यथाशक्ति सहायता की और आने-जाने वाले यात्रियों की सुविधा के लिए बहुत से प्रयत्न किए तब कवि ने उसके सुकृत्यों की प्रशंसा में भी गीत कह कर उसे अमर कर दिया।[2] इस काल के कवियों की अपनी निजी विशेषता थी। ये केवल सरस्वती के उपासक ही नहीं होते थे पर रणचण्डी का आह्वान भी समय पड़ने पर स्वीकारते थे। रणस्थल में उपस्थित हो अपनी ओजस्वी वाणी द्वारा वीरों में जोश की उमंगें भरते तथा आप स्वयं भी हाथ में तलवार ले अपने नायक का साथ देते। वीरों की प्रशंसा में कर्नल टॉड ने जहां अपने ये विचार व्यक्त किए हैं कि….. ‘There is not a petty State in Rajasthan that has not had its Thermopylae and scarcely a city that has not produced its Leonidas’ वहां इस प्रसंग में प्रो. नरोत्तमदास स्वामी ने उचित ही लिखा है कि “कर्नल टॉड यह लिखते समय इतना और लिखना भूल गए थे कि थर्मापोली से रणक्षेत्र तैयार करने वाले वीर सैनिक कवियों से भी राजस्थान का साधारण से साधारण गांव भी खाली नहीं रहा है।” -राजपूत लोग अपने धर्म एवं स्वतंत्रता की रक्षा के लिए रणोन्मत्त होकर सहर्ष मृत्यु को गले लगाते और उनकी स्त्रियां और बच्चे मर्यादा की रक्षा के लिए अपने आपको अग्नि देवी की गोद में समर्पित करते। कवि लोग प्रत्येक परिस्थिति में साथ रहते। इसलिए प्रत्यक्ष दृश्यानुभूति होने के कारण उनकी लेखनी ऐसे वीरों के उज्ज्वल चरित्र की अभिव्यक्ति के लिए बरबस ही फूट पड़ती।

[1] उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़, जोधपुर, बीकानेर, आंबेर, बूंदी, सिरोही, करौली और जैसलमेर।
[2] झरहरियौ आभ न कूमांडे झड़, विखमां जग परहरियौ बाव।
   जो उगणतरौ थरहरियौ जग में, चाळक न परहरियौ चाव।।1
   अंन बिन लोक चहूं चक ओड़ै, गया माळवे छोडे गेह।
   दोवां नाडकां छेह दिखायौ, "आसावत" दरियाव अछेह।।2
   मानव बिकै पाव अंन माट, दुरभिख जग में ताव दियौ।
   अंन रांधै कोरे नह ऊतर, लाधे हद सो भाग लियौ।।3
   भेटे कोय गयौ नंह भूखौ, परजाची कीधी प्रतिपाळ।
   खोटे समय उणंतरे खांडप, सोलंकी दरसियौ सुकाळ।।4 
      --बांकीदास ग्रन्थावली, भाग 3, भूमिका

इन कवियों की रचना में आज लोगों को भले ही अतिशयोक्ति लगे परन्तु जिन वीरों की अद्भुत वीरता एवं बलिदान ने शत्रुओं को भी मुक्त कंठ से प्रशंसा करने के लिए बाध्य कर दिया और वे ऐसे वीरों की प्रशंसा करते अघाये नहीं,वे सच्चे देश भक्त वास्तव में ही प्रातःस्मरणीय हैं। चित्तौड़ दुर्ग की रक्षा के लिए अकबर की विशाल सेना के विरुद्ध युद्ध करते हुए वीरशिरोमणि जयमल मेड़तिया और वीरवर पत्ता सीसोदिया ने जिस अद्भुत वीरता, प्रगाढ़ देशप्रेम और सच्ची स्वामी-भक्ति के दर्शन कराये उसकी अकबर जैसा समृद्धिशाली बादशाह भी अपने सच्चे हृदय से सराहना किये बिना न रह सका। वीरों ने अपने चमत्कारों द्वारा अपनी प्रतिष्ठा उसके हृदय पर अमिट रूप से अंकित कर दी। बादशाह ने इन वीरों की केवल अपने मुख से ही प्रशंसा नहीं की अपितु युग्म वीर जयमल और पत्ता की वीरता को चिरस्थायी एवं चिरस्मरणीय करने के लिए दोनों वीरों की पाषाण की गजारूढ़ दीर्घ प्रतिमायें बनवा कर आगरे में अपने शाही किले के प्रधान द्वार पर बड़ी प्रतिष्ठा के साथ स्थापित करा दी।[1]

मूर्ति-स्थापन के साथ यह भी प्रसिद्ध है कि बादशाह अकबर ने इन दोनों मूर्तियों पर उन वीरों की प्रशंसा की याद में निम्नलिखित दोहा भी खुदवा दिया था–

जयमल बढ़तां जीवणे, पत्तौ बायें पास।
हिन्दू चढ़िया हाथियां, अडियौ जस आकास।।

जहां प्रतिपक्षी द्वारा वीरों की कीर्ति एवं यश की रक्षा के लिए इतनी चेष्टा की जाय वहाँ लेखनी द्वारा ऐसे वीरों के लिए जो कुछ भी लिखा जाय वह बहुत थोड़ा है।

वीरों की कीर्ति-रक्षार्थ यशगान करने वाले कवि स्वयं भी वीर होते और उन्हें वीरता का सच्चा अनुभव भी होता था। इसीलिए उनके द्वारा रचित साहित्य में हमें वीरत्व की जीवन्त झांकी के दर्शन होते हैं। इस कथन की पुष्टि में अनेक उदाहरण प्रस्तुत किए जा सकते हैं।

खानवा के युद्ध में महाराजा संग्रामसिंह जब घायल हो गए तो उनके सैनिक लोग उन्हें उठा कर ले आये। मूर्च्छा खुलने पर राणा उदासीन हुए और अपने आपको अंग भंग देख राणा के पद के लिए अनुपयुक्त घोषित कर दिया। उसी समय कवि जमणाजी अपने एक ही गीत द्वारा उनमें उत्साह की उमंग भर देते हैं और इस गीत से प्रभावित होकर सांगा ने राणा पद को पुनः स्वीकार कर लिया।

।।गीत।।
सतबार जरासंघ आगळ स्री रंग, बिमहा टीकम दीध बग।
मेलि घात मारे मधुसूदन, असुर घात नांखे अळग।।1

पारथ हेकरसां हथणापुर, हटियौ त्रिया पडंतां हाथ।
देख जका दुरजोधण कीधी, पछै तका कीधी कांइ पाथ।।2

इकरां रांमतणी तिय रांवण, मंद हरेगौ दहकमळ।
टीकम सोहि ज पथर तारिया, जगनायक ऊपरा जळ।।3

एक राड भव मांह अवत्थी, ओरस आणै केम उर।
माल” तणा केवा कज मांगा, सांगा तू सालै असुर।।4

राजपूताने के वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की वीरता, त्याग एवं बलिदान से कौन परिचित नहीं है। अकबर जैसे सम्राट ने भी महाराणा प्रताप की वीरता का लोहा माना और प्रमुख शत्रु होते हुए भी उसकी सदैव प्रशंसा की। राणा ने अपना समस्त जीवन युद्ध में ही व्यतीत किया। राणा के प्रति तत्कालीन कवि सूरायच टापरिया का कहा हुआ गीत कायर के हृदय में भी उत्साह की लहर उत्पन्न कर देता है–

।।गीत।।
वरियाम विडंग न लहै वेसांमी, खग सावरत रण पैसै खाप।
अकबर साह न छाडै आरंभ, पांण न छाडै रांण प्रताप।।1

बे म्रतलोकि नरींद बराबर, पेखे पदम हाथ लहै परै।
मेले जोगणिपुरौ महादळ, केळपुरौ उखेळ करै।।2

प्रभणै किरण पेखि कीळापति, देखै मीढ़ण तणौ दुह राव।
नंद-हमाऊं रीस न नामै, सीस न नामै “सिंघ” सुजाव।।3

सूरज-चंद तांम समासै, खरै आव वाजियौ खरौ।
हेकां सिर खीटै बाबर हर, हेकां अमट “संग्राम” हरौ।।4

मध्यकालीन राजपूत राजा लोग जहाँ अपनी शूरवीरता के लिए प्रसिद्ध हो चुके हैं वहाँ दानशीलता एवं त्याग में भी वे अपना प्रतिद्वन्द्वी नहीं रखते। वीरों के प्रभावशाली व्यक्तित्व एवं वीरता के अद्भुत कार्य-कलापों की प्रेरणा से जिस प्रकार वीर-काव्यों की रचना हुई है, उसी प्रकार दानवीरों की दानवीरता भी इन कवियों की कविता में उद्भूत हुई है। अपने आश्रित कवियों को उनकी सुन्दर रचनाओं पर करोड़ पसाव और लाख पसाव देने की परम्परा सर्वविदित है। इस प्रकार के दान और पुरस्कार में भी परस्पर प्रतिस्पर्धा की भावना रहती और दान देने में अपना नाम उच्च रखने के लिए एक दूसरे से बढ़ कर दान दे दिया करते। कवि शंकर बारहठ की कविता पर प्रसन्न होकर बीकानेर महाराजा रायसिंह ने उसे सवाकोड़ का पुरस्कार प्रदान किया। इसकी सूचना जब जयपुर के महाराजा मानसिंह को उसकी रानी, जो महाराज रायसिंह की लड़की थी, द्वारा मिली तो उन्होंने प्रातः ही 6 श्रेष्ठ कवियों को बुला कर 6 करोड़ पसाव का पुरस्कार दे दिया।[2] इस प्रकार की पुरस्कार व्यवस्ता से राजा लोग अपने आश्रित कवियों को सम्मानित कर साहित्य-सृजन के लिए प्रोत्साहित करते तथा साहित्य के प्रति अपना अटूट प्रेम भी प्रगट करते। मध्यकालीन कवियों को निरन्तर रूप से साहित्य रचना के लिए इस प्रकार का प्रोत्साहन मिलने के कारण भी इस काल में राजस्थानी का अतुल भंडार उपलब्ध होता है।

[1] बर्नियर्स ट्रेवल्स इन दी मुगल एम्पायर, कान्स्टेबल और स्मिथ कृत, पृष्ठ 256-57.
[2] पोळ पात हरपाळ1 , प्रथम प्रभता कर थप्पे।
   दळ में दासो2 नरू3 सहोड़ घण हेत समप्पे।
   ईसर4 किसनो5 अरघ, बड़ी प्रभता बाधाई
   भाई डूंगर6 भणे, क्रीत लख मुखां कहाई।
   अई अई "मांन" उनमान पहो, हात धनो-धन धन हियौ।
   सुरज घड़ीक चढ़ता समौ, दे छ कोड़ दातण कियौ।।
      --वीरविनोद, भाग 2, कविराजा श्यामलदास, पृ. 1285

विक्रम की सत्रहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध अर्थात् अकबर के शासन-काल के आरम्भ होेने तक भारत में मुगल राज्य की नींव सुदृढ़ हो चुकी थी और निरन्तर युद्ध एवं मुगलों के प्रभुत्व ने राजपूत राजाओं की शक्ति को जर्जर कर दिया था। ऐसी स्थिति में भी वीरता के उपासक राजपूत अब भी अपने धर्म एवं हिन्दुत्व की रक्षार्थ अवसर पड़ने पर प्राणों की बाजी लगाने से चूकते नहीं थे। इस्लाम का आतंक देशव्यापी हो गया था। राजस्थान के सुदूर गांवों में भी हिन्दू जाति की साधारण जनता को धर्म के नाम पर बहुत बुरी तरह से कष्ट दिया जा रहा था। गायों को लूट कर ले जाना, मन्दिरों को नष्ट करना, लूट-मार करना आदि दिन प्रति दिन की घटनायें थीं। ऐसे संकट काल में उस जनता के वीर नायक प्रायः ये ही वीर राजपूत उनकी रक्षार्थ सामने आते और आततायियों के अन्याय का अन्तिम श्वास तक प्रतिरोध करते। ऐसे धर्मवीरों के चरित्र-वर्णन एवं उनके बलिदान की प्रशंसा के लिए तत्कालीन कवियों की लेखनी मौन कैसे रह सकती थी। इसीलिये धर्मवीरों के बलिदान की अनेक गाथायें मध्ययुगीन राजस्थानी साहित्य में हमें उपलब्ध होती हैं। गायों की रक्षा करते समय मर मिटने वाले के प्रति रचा हुआ कवि का निम्न गीत कितना हृदयस्पर्शी है।

।।गीत।।
मिळ भायां मतौ कियौ मा जायां दळ बळ सज आयां दुरत।
गायां गीयां जीवीयां कुण गत गायां वांसै मुआं गत।।1

सजीयां खाग “प्रीयाग” समोभ्रम, साची कहै बंधतां सार।
वित जावै ऊभा वाहरुआं, लांणत वा वाहरुआं लार।।2

“बदरै” “अने” करी वातां बे मुख सुरां दैणौ मरण…..।
धन धारियां लाज की धणियां, धणीयां ऊभौ जाय धण।।3

अरजा देव प्रथी परमाणै….. ओजो मांटीपणौ अई।
भारत कट पड़ीयां बे भायां, गायां घट खूंदती गई।।4

इसी प्रकार धर्म रक्षा में रत अनेक बहादुरों ने स्थान-स्थान पर मंदिरों, देवरों की रक्षा में अपने प्राणों की आहुति दी है। एक वीर राठौड़ मेड़ता के मंदिर की रक्षा करते करते काम आ गया, जिसके सम्बन्ध में कहा हुआ गीत बरबस ही हमारी भावनाओं को झकझोर देता है।

झिरमिर झिरमिर मेवा बरसै, मोरां छती छाई।
कुळ में छै तौ आव “सुजांणा”, फौज देवरै आई।।

।।गीत।।
आया दळ असुर देवरां ऊपर कूरम कमधज एम कहै।
ढहियां सीस देवळ ढहसी, ढह्यां देवाळौ सीस ढहै।।1

“माल” हरौ “गोपाल” हरौ मंढ़ अडिया दुहूँ खागां अणअंग।
उतगंग साथ उतरसी अंडौ अंडा साथ पड़ै उतमंग।।2

“स्यांम” सुतन “पातळ” सुत सझिया, निज भगतां बांध्यौ हर नेह।
देही साथ समायां देवळ, देवळ साथ समायां देह।।3

कुरम खंडेले कमंध मेड़ते, मरण तणौ बांध्यौ सिर मोड़।
“सूजा” जिसौ नहीं कोइ सेखौ, “राजड़” जिसौ नहीं राठौड़।।4

जहां राजपूत वीरों ने अपनी वीरता, बलिदान और दानशीलता आदि का अपूर्व परिचय देकर साहित्य-सृजन के लिए तत्कालीन कवियों को प्रेरित किया, वहां इनकी वीर स्त्रियों ने भी किसी प्रकार की कसर न रखी। जैसे वीर राजपूत पुरुष वैसी ही उनकी वीर नारियां। पुरुषों की भांति इन्हें भी प्राणों का मोह लेश मात्र भी नहीं था। जिस प्रकार कायर कहलाने की अपेक्षा वीर राजपूत मर जाना अधिक पसंद करते थे, उसी प्रकार राजपूत वीरांगनायें किसी कायर की मां, बहन या पत्नी कहलाना अपने लिए महान् लज्जा की बात समझती थीं। युद्ध के समय मातायें अपने वीर पुत्रों, पत्नियां सुभट पतियों तथा बहिनें बहादुर भाइयों को सहर्ष अपने हाथ से तिलक कर लड़ने के लिए विदा देने में अपना अहोभाग्य समझती थीं। विदाई के अवसर पर उनके द्वारा प्रकट किये जाने वाले हृदयोद्गार वस्तुतः उनके वीर हृदय का परिचय देते हैं। युद्ध में जाने वाले वीर से माता यही कहती कि पुत्र! तूने मेरे स्तन का पान किया है अतः युद्ध में मेरे दूध को कलंकित न करना। बहिन यह कह कर विदा देती कि, मेरे वीर (भ्राता) यह चुनड़ी तूने अपने हाथ से मुझ पर ओढ़ाई है अतः इस चुनड़ी को अपने नाम से लज्जित न करना, और पत्नी यह कह कर शकुन मनाती कि आर्य पुत्र! यह अहिवात (चूड़ौ) मैं तुम्हारे नाम का धारण किए हुए हूं अतः इसे तुम किसी तरह से कलंकित न होने देना। अवसर पड़ने पर वे नारियां स्वयं भी रणचण्डी का रूप धारण कर शत्रुओं का संहार करने के लिए युद्ध-भूमि में आ उतरतीं और आवश्यकता होने पर अपनी मर्यादा की रक्षा के लिए हँसते-हँसते जौहर की ज्वाला को भी वरण करतीं। राजस्थानी साहित्य इसके अनेक उदाहरण प्रस्तुत करता है।

राजस्थानी साहित्यकारों ने इन वीरांगनाओं के उज्ज्वल चरित्र को बड़े ही आदर और श्रद्धा के साथ अपने साहित्य में अभिव्यक्त किया है। नारी के जिन विभिन्न रूपों का उन्होंने दर्शन किया, उसका अपने साहित्य में दिग्दर्शन कराया है। शक्ति रूप में उसकी पूजा की है, माँ के रूप में उसकी वंदना की है, वीरांगना के रूप में उसका सम्मान किया है। जयसिंह कछवाहा की पुत्री किसनावती अपने पुत्रों की रक्षा हेतु शक्ति रूप धारण कर युद्ध में शत्रुओं का संहार करती है; उसका वर्णन तत्कालीन कवि गोरधन बोगसे ने किया है जिसमें नारी की वीरता पर देवता तक न्यौछावर हुए हैं।

।।गीत।।
भारथ मझि मिळै दूसरौ भारथ, रथ ठांमियौ जोवण ग्रहराज।
उमया ईस उभै आहुड़िया, किसनावती तणै सिर काज।।

क्रत सूरति पेखे कछवाही, हुवौ पदम हथ विमुह हथ।
आदमियां उतवंग लै आदम, संकति रूप कहियौ सकत।।

अमुख-अमुख चर नारद औसर, त्रिपति पांच मिळि पांचतत।
हूँ सर तिरपति सुज जांण हरि, त्रिसगति त्रिहूँ रति तिरपत।।

रुद्र-घरणी जंपै, सांभळि रुद्र, आज लगै तैं लिया अनेक।
जैसिंघ-धूय तणौ धू जोतां, अंबर भर मो जुड़ियौ एक।।

हरि-दरगाह न्याय गा हाले, ब्रह्म वांटियौ करे विचार।
सतरमौ सिंणगार सिवा सिव सिर आधै पूरौ सिणगार।।
~~(राजस्थानी) वीर गीत, गीत 117

इसी प्रकार वीर पत्नी का स्वरूप हमें कवि ईसरदास कृत “हालां झालां रा कुंडलिया” में हाला जसवंतसिंहजी (जसा जी) की पत्नी द्वारा पति को कहे हुए शब्दों में मिलता है। हलवद नरेश झाला रायसिंह, हाला जसवन्तसिंह पर चढ़ाई कर उसके नगर ध्रोल में आ पहुँचे तब हाला ठाकुर की पत्नी उन्हें युद्ध के लिए तत्पर करती है–

उठि ऊढ़ंगा बोलणा, कांमणि आखै कंत।
अै हल्ला तो ऊपरां, हूंकळ कळळ हुवंत।।
हूंकळै सींधवौ वीर कळ हळ हुवै।
वरण कजि अपछरां सूरिमां वह बुवै।।
त्रिजड़-हथ मयंद जुध गयंद घड़ तोड़णा।
उठि हर धवळ सुत अढ़ंगा बोलणा।।
~~हालां झालां रा कुंडळिया, पृ. 6

मध्य युग में स्त्री समाज में सती प्रथा का विशेष महत्त्व था। प्राचीन काल से चली आ रही इस प्रथा को इस युग में बड़े सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। प्रारम्भ में पति की मृत्यु के पश्चात् अनुसरण या सहगमन करना ही स्त्रियों का जीवनादर्श था। पति के साथ चितारोहण करती हुई नारी को यह दृढ़ विश्वास होता था कि उसके सती होने के बाद उसे अमर लोक में अमर सौभाग्य मिलेगा। आगे चल कर प्रचलित होेने वाली जौहर प्रथा भी इसी का विकसित रूप है। मध्यकाल में युद्धों की अधिकता थी। युद्ध में वीर राजाओं, सामंतों तथा सैनिकों का काम आ जाना ही जब निश्चित-सा प्रतीत होता तो उसके पूर्व ही उनकी वीर स्त्रियां महलों आदि में चिता की तैयारी कर उसमें अपने प्राणों की बलि दे देतीं। उनका यह तेजोमय आदर्श बहुत ऊंचा था। इसकी झलक मध्यकाल की रचनाओं में स्थान-स्थान पर मिलती है। किशनगढ़ के महाराजा बहादुरसिंह ने अखां नामक वीरांगना के सती होने पर जो गीत कहा उसे उदाहरणार्थ यहां प्रस्तुत किया जाता है–

।।गीत।।
लगी लाय प्रत रोम धकतीरथी धोम लख,
बोम अंतरीक बहती बताई।
जळ पाखां चाढ़ती सकळ जग जोव ज्यो,
अनळ झळ पड़णवा “अखां” आई।।1

बर सबद रांम रांमेत मुख बोलती,
तोलती देह सत बरत तावै।
दुनी कौतक कहै भ्रमी वा देख ज्यो,
उक्रमी गयण मग क्रमी आवै।।2

आरखत बदन “अजबेस” बाली उमंग,
मछर छळ छोड उर अकाळी मीच।
कीच कुळ उकासण कंथ आसण करै,
बैठगी विखम झळ हुतासण बीच।।3

रूप दाहे दवन अंगारा……… मन
भवन अगन जस हूंत मंडगी।
कुळ उतंग डोर आवागवन भंग कर,
चंग पवन संग जिम सुरंग चडगी।।4

…क्रमशः


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