सबदकोस – राजस्थांनी व्याकरण (भाग-1)

संज्ञा राजस्थानी में व्यञ्जनान्त अन्त्य स्वर[1] अधिकतर निम्नलिखित मिलते हैं–

आ– वांमा, रमा आदि।
इ– कवि, रवि आदि।
ई– सगती, मुगती, माळी, दही, रोही आदि।
उ– भानु।
ऊ– भालू, चक्कू, डाकू आदि।
ए–
ऐ– नेपै, रावळै।
औ– घोड़ौ, लड़कौ, बेटौ, कोठौ, माटौ इत्यादि।

अन्त्य व्यञ्जन साधारणतः निम्नलिखित हैं–

क– नाक, चाक, चमक, लटक आदि।
ख– राख, पंख, आंख, परख आदि।
ग– साग, आग,रोग, चंग आदि।
घ– बाघ, जांघ, ऊंघ आदि।
ड़– बाड़, नाड़, पीड़, मोड़ आदि।
च– आंच, नाच, काच, मच आदि।
छ– छाछ, पांछ आदि।
ज– राज, काज, लाज आदि।
झ– सांझ, बांझ आदि।
ट– बाट, दाट, पेट, ईंट, ऊँट आदि।
ठ– ओठ, सेठ, मठ आदि।
ड– सांड, लाड आदि।
ढ़– कोढ़, बाढ़ आदि।
ण– मांण, कांण, बांण आदि।
त– मात, पित, रेत, पोत आदि।
थ– हाथ, थोथ, नथ आदि।
द– दाद, तूंद, मोद, नाद आदि।
ध– कांध, दूध।
न– कांन, मन, तन आदि।
प– पाप, चेप, सांप, कप आदि।
फ– बाफ, बरफ, सूंफ आदि।
ब– अरब, गरब, आब आदि।
भ– लाभ, गरभ, नभ, आभ आदि।
म– कांम, नांम, बिदांम, दम आदि।
य– हाय, राय आदि।
र– हार, खुर, अमचूर आदि।
ल– काल, रेल आदि।
ळ– काळ, दाळ, साळ आदि।
व– गांव, घाव आदि।
व़– वाव़।
स– हूंस, बांस, ओस, उसांस आदि।
ह– उछाह, कळह आदि।

लिंग स्वावाभिक रूप से पुरुष, स्त्री एवं नपुंसक ये तीन वर्ग प्रकृति में मिलते हैं। इसी कारण प्रायः कई भाषाओं में इन तीनों का प्रयोग हुआ है। प्राचीन पश्चिमी राजस्थानी, मराठी एवं गुजराती– इन तीन भाषाओं में ये तीनों लिंग पाये जाते रहे हैं। प्राचीन राजस्थानी के बाद निरंतर दो ही लिंग मानने की ओर राजस्थानी में झुकाव रहा। आज प्रायः पु. एवं. स्त्री. इन दो ही लिंगों का प्रयोग होता है।[2] स्थान-भेद के कारण विभिन्न बोलियों में कुछ लिंग-भेद मिलते हैं। स्नांन को पु. माना गया है, किन्तु जैसलमेर की ओर स्थानीय रूप में इसे स्त्री. माना गया है। परन्तु प्रामाणिक रूप से शब्दों का मानकीकरण Standard प्रायः स्थिर है।

आधुनिक रूप में राजस्थानी में नपुंसक लिंग नहीं है। किन्तु प्रकृत्यनुसारी पु. एवं. नपुं. लिंग का थोड़ा-सा भेद कर्मकारक के परसर्ग ने प्रयोग में अवश्य दृष्टिगत होता है, यथा–

1. माळीने बुलावौ।
2. घोड़ीने खोल दौ।
3. बळीतौ लाओ।

अन्य परसर्गों में लिंग विकार होता है किन्तु ने नपुं. के समान दोनों लिंगों में समान रूप प्रयुक्त होता है।

प्रायः राजस्थानी में तद्भव शब्दों का लिंग वही है जो तत्सम रूपों का है। तत्सम रूपों से उन तद्भव रूपों तक आते-आते कुछ घिसा-पिटी इस प्रकार की हो गई है कि अन्य भाषा-भाषियों के लिए राजस्थानी की लिंग समस्या कुछ दुरूह-सी हो गई है। यह दुरूहता केवल राजस्थानी में ही नहीं है अपितु हिन्दी तथा कुछ अन्य आर्य भाषाओं में भी वैसी ही है, यथा–

पु.
स्त्री.
हिसाब
किताब
व्याळू
वेळू
सूत
लूट
दाग
आग

साधारण जन के लिए यह दुरूह है कि जब हिसाब पुलिंग है तो किताब स्त्री. क्यों है? मकान शब्द पु. है, जबकि दुकांनकबांन शब्द स्त्री. है। इससे जन-साधारण की धारणा कुछ इस प्रकार की बनती है कि यह लिंग-विधान नितांत अनियमित है। मेरी “राजस्थांनी व्याकरण” में मैंने इस लिंग-विधान की विवेचना एवं व्याख्या करने का प्रयत्न अवश्य किया है तथापि उसी क्रम में आने वाले विभिन्न-लिंगी शब्दों को अपवाद माना गया है। तब भी लिंग-विधान के विकास-क्रम की कुछ अधिक सूक्ष्म एवं सरलतर व्याख्या की आवश्यकता है। यह समस्या उस समय और भी जटिल हो जाती है जबकि तत्सम रूपों का लिंग तद्भव रूपों में परिवर्तित रूप में प्रचलित हो जाता है, यथा–

संस्कृत
राजस्थानी
अग्नि (पु.)
आग (स्त्री.) [ प्राचीन पश्चिमी राजस्थानी में अगि पु. में प्रयुक्त हुआ है। ]
देवता (स्त्री.)
देवता (पु.) [ इन्द्रिय-पराजय-शतक का बालावबोध–83. ]

तत्सम रूपों के नपुंसक लिंग के बारे में यह माना गया है कि वे पु. एवं स्त्री. में बँट गए हैं। अतः इस बँटवारे में सम्बन्धित भाषाओं ने स्वतंत्र विचार द्वारा लिंग निश्चित किए हैं। इस प्रस्तुत कोश में भी प्रामाणिक लिंग रूपों को ही प्रस्तुत किया गया है। प्रचलित पु. शब्दों के साथ ही उनके स्त्री. रूप दे दिए गए हैं। अलग स्त्री. रूप उन्हीं शब्दों के दिए गए हैं जिनका पु. रूप बहुत कम प्रयुक्त होता है। अतः प्रचलित शब्दों के स्त्री. शब्दों को उनके पु. रूपों में ही खोजने का प्रयत्न करना चाहिये।[3]

[1] राजस्थानी में व्यंजनांत (हलंत) शब्दों की अंतिम व्यंजन ध्वनि या तो लुप्त हो जाती है या अ जोड़ कर अकारांत बना दी जाती है, यथा–मन (मनस्), जग (जगत्) आदि। अपभ्रंश में भी यही परंपरा मिलती है, देखो–हिन्दी साहित्य का वृहत इतिहास, प्रथम भाग; सं.–राजबली पांडे, पृ. 322.
[2]लिंगsex पर आधारित न होकर व्याकरण पर आधारित है। इस सम्बन्ध में निम्नलिखित उद्धरण उल्लेखनीय है–
“The gender is not based on sex distinctions, but as in the Semitic and Indo-European families it is “grammatical”. Perhaps it would be more correct to say that nouns are divided into two classes, which answer more or less to our masculine and feminine genders. As a general rule the big and strong things are ‘masculine’ and the weak and small things are feminine.” — Elements of Science of Language, by Taraporewala, Page 358, Para 240 (iii).
[3]कुछ प्राणीवाचक शब्द सदैव पु. रूप में हीप्रयुक्त होते हैं, यथा–बाबहियौ, माछर, कागलौ आदि तथा कुछ सदैव स्त्री. रूप में ही प्रयुक्त होते हैं, यथा–कोयल, मैना, चील, उदेई, चुड़ैल आदि।

वचन संस्कृत में एकवचन, द्विवचन एवं बहुवचन तीनों का प्रयोग होता था। मध्य भारतीय आर्य भाषा काल के प्रारम्भ में ही द्विवचन लुप्त हो गया।[1] इसी उत्तराधिकार के फलस्वरूप आधुनिक आर्य भाषाओं में केवल दो ही वचन होते हैं–एकवचन एवं बहुवचन। आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं के प्रारम्भिक काल तक प्राचीन भारतीय आर्य भाषा का पु. प्रथमा, बहुवचन का प्रत्यय अपभ्रंश की पदांत हृस्व-स्वर लोप की प्रवृत्ति के कारण समाप्त हो गया।[2] यथा– सं. एकवचन पुत्र, बहुवचन पुत्राः। राजस्थानी में यह प्रवृत्ति विसर्ग लोप के साथ कुछ उलटफेर से अब भी प्रचलित है। यहां अकारांत एकवचन शब्दों का बहुवचन अंत्य-स्वर के बदले आं करने से बनता है, यथा–

एकवचन
बहुवचन
पु.
नर
नरां
खेत
खेतां
कायर
कायरां
स्त्री.
रात
रातां
चील
चीलां

इकारांत एवं ईकारांत एकवचन शब्दों के बहुवचन रूप में यां लगाया जाता है–

 एकवचन
 बहुवचन
 पु.
 कवि
 कवियां
 तेली
 तेल्यां, तेलियां
 स्त्री.
 मूरती
 मूरत्यां, मूरतियां
 रोटी
 रोट्यां, रोटियां
 घोड़ी
 घोड़्यां, घोड़ियां

औकारांत शब्दों के बहुवचन रूप आकारांत हो जाते हैं, यथा–

 एकवचन
 बहुवचन
 पु.
 घोड़ौ
 घोड़ा
 भालौ
 भाला
 पोतौ
 पोता

राजस्थानी में प्रायः औकारांत शब्द स्त्रीलिंग नहीं होते। लिंग परिवर्तन में उनका रूप ईकारांत अथवा अकारांत हो जाता है। अपवादस्वरूप एक अक्षरिक जो स्त्रीलिंग औकारांत शब्द मिलते हैं उनका बहुवचन रूप वां लगने से होता है, यथा–

पौ एक व. का पौवां बहु. व.
गौ एक व. का गौवां बहु. व.

आकारांत एवं ऊकारांत शब्दों में भी वां लगा कर उनका बहुवचन रूप बनाया जाता है, यथा–

 एकवचन
 बहुवचन
 मा
मावां
 लू
 लूवां
 बहू
 बहुवां

उपरोक्त रूपों के अतिरिक्त कुछ शब्दों की सहायता से भी बहुवचन प्रकट किया जाता है। प्रायः ये शब्द- समूह का बोध कराते हैं। इस प्रकार के शब्दों का योग होने पर कारक परसर्ग संज्ञा पद के साथ न लग कर इन्हीं शब्दों के बाद लगते हैं। इस प्रकार के कुछ शब्द ये हैं– लोग, सब, सैंग (अथवा इनके रू. भे.) गण आदि। उदाहरणस्वरूप निम्नलिखित प्रयोग दृष्टव्य हैं– राजा लोग, कवि लोगां सूं, सैंग तारां, सैंग जणा आदि।

जैसलमेर आदि स्थानों में स्त्रीलिंग शब्दों के बहुवचन रूप एकारांत होते हैं, यथा–

 एकवचन
 बहुवचन
 रोटी
 रोटै
 सती
 सतै
 ओळ 
 ओळै

एकवचन एवं बहुवचन तथा इनके कारक प्रत्ययों की विवेचना करने का यहाँ हमारा उद्देश्य नहीं है। यह कार्य वैयाकरणों एवं व्याकरण का है। प्रस्तुत कोश में एकवचन शब्दों को ही उपस्थित किया गया है। व्याकरण के नियमानुसार उनका बहुवचन रूप स्वयमेव समझ लेने का प्रयत्न अधिक उचित होगा। अपवादस्वरूप कुछ शब्द अपने बहुवचन रूप में ही प्रयुक्त होते हैं। उनका एकवचन प्रायः होता ही नहीं, अगर होता है तब भी वह अत्यन्त महत्त्वहीन होता है। वे सदा बहुवचन रूप में ही सार्थक होते हैं,यथा– परियां[3] , कैंपा (चिआं), आखा आदि।

इस प्रकार के शब्दों को सोल्लेख उपस्थित किया गया है। फिर भी मोटे रूप से हमने कोश को कोश ही बनाये रखना वांछनीय समझा है, उसे व्याकरण बनाने का उद्देश्य हमारा कदापि नहीं है। प्रत्येक भाषा के अपने स्वयं के व्याकरण सम्बन्धी कुछ नियम होते हैं। जब कोई भाषा अन्य भाषाओं से किन्हीं शब्दों को ग्रहण करती है तब उन शब्दों को वह भाषा अपने व्याकरण के ढाँचे के अनुकूल ढाल लेती है। राजस्थानी में भी विदेशी शब्दों को स्वदेशी रूप में बहुवचनान्त बना लिया जाता है, यथा–

 विदेशी एकवचन शब्द
 स्वदेशी बहुवचनान्त रूप
 स्टेशन, स्टेसन
 स्टेसनां
 मोटर 
 मोटरां
 टिकट 
 टिकटां

कारक भारत की प्राचीन भाषाओं तथा योरोपीय भाषाओं में संज्ञाओं का सम्बन्ध उपसर्गों (Preposition) द्वारा प्रकट कर दिया जाता था। इनके अतिरिक्त अरबी-फारसी आदि भाषाओं में भी उपसर्गों की सहायता से कारक प्रकट किये जाते हैं। किन्तु भारतीय भाषाओं में प्राचीन काल से ही कुछ परिवर्तन दृष्टिगोचर होने लगा था। इस परिवर्तन के अनुसार उपसर्ग क्रियाओं के साथ जुड़ने लगे और संज्ञाओं के कारक सम्बन्ध नियमित करने का इनका कार्य समाप्त हो चला। इस काल के उपरांत शब्दों के प्रातिपदिक रूप में विभक्ति-प्रत्यय लगा कर भिन्न-भिन्न कारक रूप निष्पन्न किये जाते रहे। प्राचीन भारतीय आर्य भाषा, यथा– संस्कृतादि में छः कारक (संस्कृत में सम्बन्ध एवं संबोधनकारक का समावेश नहीं था। राजस्थानी में इन दोनों को मिला कर कारक संख्या आठ मानी जाती है) माने गये और प्रत्येक कारक का एकवचन, द्विवचन एवं बहुवचन का रूप अलग-अलग विभक्ति प्रत्ययों के योग से बनता था। इस दृष्टि से प्रत्येक शब्द के सामान्य रूप से चौबीस रूप होते थे। शब्दों के कारक रूपों में समीकरण की प्रवृत्ति के प्रसार के साथ ही प्राचीन भारतीय आर्य भाषाओं में शब्द रूपों की बहुलता निरंतर कम होती गई एवं केवल पांच-छः रूप ही शेष रह गये। अपभ्रंश काल में तो शब्द-रूपों के अनुसार कारकों के केवल तीन ही वर्ग शेष बच रहे।

ध्वनि-परिवर्तन के कारणवश विभक्ति प्रत्ययों के मूल रूप की अस्पष्टता अपभ्रंश काल तक इस अवस्था में पहुँच गई कि कारक प्रकट करने के लिये सहायक शब्दों का प्रयोग आवश्यक माना जाने लगा। आगे चल कर विभक्ति प्रत्ययों में और भी कमी हो गई। केवल कर्ता बहुवचन, करणकारक, सम्बन्ध बहुवचन और अधिकरण एकवचन के विभक्ति प्रत्यय ही जिस किसी रूप में शेष बच पाये, किन्तु उनमें समानता न रही।

[1]हिन्दी साहित्य का वृहत् इतिहास, प्रथम भाग–सं. राजबली पांडे, पृ. 269.
[2]हिन्दी भाषा का उद्गम औरविकास–उदयनारायण तिवाड़ी, पृ. 434.
[3]पूर्वजों के अर्थ में।

राजस्थानी में कारकों के निर्विभक्तिक और सविभक्तिक रूप दोनों देखने को मिलते हैं। विभक्ति चिह्न इस भाषा में अन्य भाषाओं की अपेक्षा कुछ अधिक एवं अनेक रूपों में मिलते हैं, यथा–

कारक
विभक्तियां
विभक्ति चिह्न 
करता
प्रथमा विभक्ति
x
करम
द्वितीया विभक्ति
ने, नूं, नां, को, कूं।
करण
तृतीया विभक्ति
सूं, ऊँती, ती, सेती, सात, हूंत, हूंता, सां, सै, संथो।
संप्रदान
चतुर्थी विभक्ति
रै, कै, बैंई, बैई, लिये, आंटा, माटै, आंटै, वासते, कारण, सारू, तांईं।
अपादान
पंचमी विभक्ति
तृतीया विभक्ति के समान।
सम्बन्ध
षष्ठी विभक्ति
रा, री, रै, रौ, का, की, के, को, चो, चा, च, ची, तणौ, तणी[1], तण।
अधिकरण
सप्तमी विभक्ति
मै, में, मांय, परे, पै, माथै, ऊपरै, तांईं, तक, खनै, कनै, नखै, नकै,
खंडे, खूंडै, गोडै, दीहा, पां, दीसा, वळ, वळाकौ, पाहै, 
पास, पासै,
पागती, पसवाड़ै, पा’ड़ै, पासड़ै।
सम्बोधन
अष्टमी विभक्ति
हे, हो, अरे, ओ।

राजस्थानी में विभक्ति सहित बहुवचन बनाने के कुछ विशेष नियम हैं। यह व्याकरण का विषय होने के कारण उसका विस्तारपूर्वक उल्लेख यहाँ संभव नहीं है, तथापि कुछ विशिष्ट विशेषताओं से परिचित कराना विषयान्तर न होगा।

बहुवचन बनाने में अकारांत विकारी शब्द आंकारांत तथा आकारांत विकारी शब्द आंकारांत या वांकारांत हो जाते हैं, यथा–

एकवचन
बहुवचन
घर
घरां (ने)
वात
वातां (सूं)
खेत
खेतां (में)
राजा
राजाआं, राजावां (ने)
पिता 
पिताआं, पितावां (ने)

इकारांत तथा ईकारांत शब्दों को बहुवचन बनाने के लिये इकारांत शब्दों में यां जोड़ा जाता है एवं ईकारांत शब्दों में को हृस्व कर यां जोड़ दिया जाता है–

एकवचन
बहुवचन
कवि
कवियां 
टोपी 
टोपियां
घोड़ी 
घोड़ियां

उकारांत तथा ऊकारांत शब्दों को बहुवचन बनाने के लिये उकारांत शब्दों में आं अथवा वां जोड़ दिया जाता है एवं ऊकारांत शब्दों में को हृस्व कर आं या वां जोड़ा जाता है–

 एकवचन
 बहुवचन
 साधु
 साधुआं, साधुवां
 चरू
 चरुवां

एकारांत शब्दों को बहुवचन बनाने के लिये आंकारांत एवं हांकारांत बनाया जाता है, यथा–

 एकवचन
 बहुवचन
 मे
 मेआं, मेहां
 खे
 खेआं, खेहां

ऐकारांत शब्द दोनों वचनों में समान रूप से प्रयुक्त होते हैं–

 एकवचन
 बहुवचन
 रावळै
 रावळै (पु.)
 कळै
 कळै (स्त्री.)

औकारांत शब्दों का बहुवचन आकारांत करने पर हो जाता है, यथा–

 एकवचन
 बहुवचन
 दादौ
 दादां, दादा
 छोकरौ
 छोकरां, छोकरा

कुछ विशिष्ट परसर्गों का विवेचन करना इस दृष्टिकोण से उचित होगा–

नै इस परसर्ग का व्यवहार राजस्थानी की एक प्रमुख विशेषता है। कुछ अन्य भाषाओं में भी इसका व्यवहार परसर्ग के रूप में होता है। प्रायः इसके स्थान पर यदा-कदा नूं, कूं, को, नां आदि भी प्रयुक्त होते हैं–

1. घोड़ां नै मारौ।
2. घोड़ां नूं मारौ।
3. घोड़ां कूं मारौ।
4. घोड़ां को मारौ आदि।

जो अप्राणीवाचक शब्द हो, उसके साथ साधारणतया ने का प्रयोग नहीं किया जाता, यथा–

1. कपड़ा खोल दौ।
2. घास काटौ।
3. नळ खोल दौ।

किन्तु जोश, क्रोध, गर्वोक्ति, उद्देश्य-विधेय, निश्चयात्मक भावों आदि में नै लगाना आवश्यक है अन्यथा भाव विशेष अस्पष्ट रहेगा एवं साधारण भाव ही प्रकट होगा।

इस ने परसर्ग की व्युत्पत्ति के विषय में विद्वानों में काफी मतभेद है। प्रायः इसका सम्बन्ध प्राचीन भारतीय आर्य भाषा की करण-कारक एकवचन की विभक्ति एन से जोड़ते हैं एवं वर्णव्यत्यय से एन का ने में परिणत होने का अनुमान करते हैं, किन्तु यह मत ठोस प्रमाणों पर आधारित नहीं माना जाता। डॉ. चाटुर्ज्या इस परसर्ग की व्युत्पत्ति सं. शब्द कर्ण से मानते हैं। उनके अनुसार इस परसर्ग का प्राचीन रूप कनै था। राजस्थानी में आधुनिक काल में भी यह शब्द “समीप” के अर्थ में प्रयुक्त होता है, यथा–म्हारै कनै आव (मेरे पास आ)। सं. कर्ण मध्य भारतीय आर्य भाषा काल में कन्न एवं अपभ्रंश में इसका अधिकरण रूप कन्नहि बनता है, जिसमें तथा हू के लोप से नइ और गुण द्वारा नै रूप निष्पन्न हुआ। संस्कृत कर्ण का शब्दार्थ कान होते हुए भी यह सामीप्य का बोधक है। अतः राजस्थानी में भी यह संज्ञा एवं क्रिया के मध्य संबंध स्थापित करने में प्रयुक्त होता रहा है।[2]

[1]“तण” का प्रयोग हेमचंद्र के दोहों में षष्ठी वाले रूपों के साथ भी मिलता है। बाद में जाकर इन्हीं से राजस्थानी में तणा-तणी का विकास हुआ है–देखिये–” हिन्दी का वृहत् इतिहास”, प्रथम भाग, सं. राजबली पांडे, पृ. 326.
(मेरे द्वारा लिखित ” राजस्थांनी व्याकरण”, पृष्ठ 38)
[2]हिन्दी भाषा का उद्गम और विकास–डॉ. उदयनारायणतिवारी, पृष्ठ 440-441.
राजस्थानी में सामीप्य के बोधक इस प्रकार के अनेक अंगवाची शब्द मिलते हैं = गोडै, नखै, पाहड़ै आदि।

हम ऊपर लिख चुके हैं कि को राजस्थानी में नै परसर्ग के स्थानापन्न रूप में प्रयुक्त होता है, यथा–

रांम नै रोटी घालौ।
रांम को रोटी घालौ।

अन्य भाषाओं में इन परसर्गों के प्रयोग से अर्थान्तर हो जाता है, यथा–

रांम ने रोटी खाई।
रांम को रोटी डालिये।

राजस्थानी में इस प्रकार का विभेद नहीं है। निम्नलिखित उदाहरणों से परसर्गों की व्याख्या अधिक स्पष्ट हो जायगी–

1. करम–

(i) रथ थंभि सारथी विप्र छंडि रथ, औ पुर हरि बोलिया इम।
आयौ कहि, कहि नांम अम्हीणौ, जा सुख दे स्यांमा नै जिम।।– वेलि. 69

(ii) आजूणउ धन दीहड़उ, साहिब कउ मुख दिट्ठ।
माथा भार उळथ्थियउ, आँख्याँ अमी पयट्ठ।।– ढो.मा. 531

(iii) राजा रांणी नूं कहइ, बात विचारउ जोइ।
आज विखइ द्यां दीकरी, हांसउ हसिली लोइ।।– ढो.मा. 7

2. करण–

(i) चकड़ोळ लगै इणि भांति सुं चाली, मति तै वाखांणण न मूं।
सखी समूह मांहि इम स्यांमा, सीळ आवरित लाज सूं ।।– वेलि. 103

(ii) गादह दाध्यउ दग्ग करि , सासू कहइ वचन्न।
करहउ ए कूड़इ मनइ, खोड़उ करइ यतन्न।।– ढो.मा. 335

3. सम्प्रदान–

(i) तदि न्रप पग वंदि मुनि तणा, कोधज छिमा कराय।
साथ दिया लछमण सहित, रछ्या कजि रघुराय।।– सू.प्र., पृष्ठ 26

(ii) रोहड़ छळि राजा रतन।– वचनिका रतनसिंघजी री

(iii) सीख रतन कीधी स्रगि सारू ।– वचनिका रतनसिंघजी री

4. अपादान–

(i) इंद्र मांगै जिन कनै (सूं) दक्षिणा।– अज्ञात

(ii) नदी हेम थी ले चली जांणि नीर।– वचनिका रतनसिंघजी री

(iii) चीतारंती चुगतियाँ कुंझी रोवहियांह।
दूरां हुंता तउ पलइ, जऊ न मेल्हहियांह।।– ढो.मा. 203

5. सम्बन्ध–

(i) करहा कहि कासूं कराँ, जो ए हुई जकाह।
नरवर केरा माणसां, कारँ कहिस्याँ जाह।।–ढो.मा. 445

(ii) साहिब आया, हे सखी, कज्जा सहु सरियांह।
पूनिम- केरे चंद ज्यूं, दिसि च्यारे फळियांह।।– ढो.मा. 528

(iii) साल्ह चलंतइ परठिया, आंगण वीखड़ियांह।
कूवा- केरी कुहड़ि ज्यूं, हियड़इ हुइ रहियांह।।– ढो.मा. 367

(iv) सखी अमीणां कंत रौ, औ इक बड़ौ सुभाव।
गळियारां ढीलौ फिरै, हाकां ़ वागां राव।।– हा.झा. 17

(v) सिंघ सरस रायसिंघ रै रहियौ झूझै रांम।
आड़ौ सरवहियौ अछै कळह तणौ धरि कांम।।–हा.झा. 36

(vi) विढंतौ जसौ बिसकन्या बाखांणियौ।
परणती कंथ चौ मुरड़ पहचांणियौ।।– हा.झा. 25

(vii) कांम संग्राम ची हांम जुध कांमणी।
घणा नर जोवती भोमि आई घणी।।– हा.झा. 22

(viii) जिण दीध जनम, जगि, मुखि दे जीहा, क्रिसन जु पोखण भरण करै।
कहण तणौ तिणि तणौ कीरतन, स्रम कीधां विणु केम सरै।।– वेलि. 7

(ix) ग्रहै अंत्रावळि उड़ि चली ग्रीझणी।
त्रिहूँ भुयण रही वात सोहड़ां तणी ।।– हा.झा. 47

(x) संहितासु तणै पुत्र अक्रसासु(स)।
अक्रसासु तणै पुत्र जवनासु।।–सू.प्र. पृष्ठ 11

(xi) फिरि फिरि झटका जै सहै हाका बाजंतांह।
त्यां घरि हंदी बंदड़ी घरणी कापुरसांह।।– हा.झा. 38

6. अधिकरण–

(i) कुंदणपुर हूंता वसां कुंदणपुरि, कागळ दीधौ एम कहि।
राज लगैं मेल्हियौ रुखमणी, समाचार इणि मांहि सहि।।– वेलि. 56

(ii) सींगण कांइ न सिरजियां, प्रीतम हाथ करंत।
काठी साहंत मूठि- माँ, कोडी कासी संत।।– ढो.मा. 416

(iii) मारू लंक दुइ अंगुळां, वर नितंब उर मंस।
मल्हपइ मांझ सहेलियां, मांन सरोवर हंस।।– ढो.मा. 461

(iv) वपु नीलवसन मझि इम वखांण।
जगमगत घटा मझि छटा जांण।।–सू.प्र., पृष्ठ 15

(v) सींगाळौ अवखल्लणौ, जिण कुळ हेक न थाय।
जास पुराणी व़ाड़ जिम, जिण जिण मत्थै पाय।।– हा.झा. 32

(vi) घणा मझ घातियां भार झालै घणौ।
बहुत अबगुण कियां थोड़हौ बोलणौ।।–हा.झा. 15

(vii) मधि त्रेता जुग चैत्रमास, सकंति-मेखि सरि।
करक लगन पख सुकळ, धरा पुन्नवसु नखित्र धुरि।।–सू.प्र., पृष्ठ 20

(viii) रमैं हसै नरिंदरं, मझार राज मिंदरं।
करै उछाह सुक्किया, पचास सातसै प्रिया।।– सू.प्र., पृष्ठ 22

(ix) अणी चढ़ि खेति जसवंत सूं आहुड़ी।
पिय नखै पौढ़सी नहीं पणिहारड़ी।।– हा.झा. 31

 

परसर्गों रहित कारक विभक्तियों के उदाहरण–

1. कर्त्ता–

(i) सीखावि सखी राखी आखै सुजि, रांणी पूछै रुखमणी।
आज कहौ तौ आप जाइ आवूं, अंब जात्र अंबिका तणी।।–वेलि. 79

(ii) तरै बांण बांदे गयौ देखि तासं।
सुरांराज झल्ले न हल्ले सरासं।।–सू.प्र., पृष्ठ 28

2. करम–

(i) दुसटां रचियौ दाव, द्रोपद (को) नागी देखवा।
अब तो बेगो आव, साय करण नै सांवरा।।– द्रो.पु. 50

(ii) हलै हेक राई न को स्रम्म होतां।
जती जीव चालै न ज्यूं बांम (को) जोतां।।– सू.प्र., पृष्ठ 28

3. करण–

(i) सांवण आयउ साहिबा, पगइ ( से) विलंबी गार।
ब्रच्छ (से) विलंबी बेलड़्यां, नरां (से) विलंबी नार।।–ढो.मा. 269

4. सम्प्रदान–

(i) हंसां (के लिये) नग हरनूं तुचा, दांत किरातां (के लिए) दीध।– बां.दां.

(ii) प्रिव माळवणी परहरे, हाल्यउ पुंगळ (के लिये) देस।
ढोला म्हां बिच मोकळा, वासा घणा वसेस।।– ढो.मा.

5. अपादान–

(i) कुमकुमै मंजण करि धौत वसत धरि,
चिहुरे (से) जळ लागौ चुवण।– वेलि. 81

(ii) ऊनमियउ उत्तर दिसइँ, गाज्यउ गुहरि गंभीर।
मारवणी प्रिय संभर्यउ, नयणे ( से) वूठउ नीर।।– ढो.मा. 18

6. सम्बन्ध–

(i) केवियां (के) दळ तंडळ जेणि किया।
दन सांसण लक्ख गजेन्द्र दिया।।–वचनिका रतनसिंघजी री

(ii) छुटै अम्रताधार, अप्पार छंदं।
चवै वंस (का) वाखांण बे भांण चंदं।।–सू.प्र. 28

(iii) इंद्रां (का) वाहण नासिका, तासु तणइ उणिहार।
तस भख हूवउ प्राहुणउ, तिणि सिणगार उतार।।–ढो.मा. 580

(iv) पछैं जमी आकास, पवन पांणी, चंद सूरज नूं प्रणांम करि आरोगी (क) दोळी परिक्रमा दीन्ही।
–वचनिका रतनसिंघजी री

7. अधिकरण–

(i) रचे चिंतामणी सु हार, कंठि (मे) रंक कीजियै।
पलं पलं विलोकि पुत्र, जेण भांति जीजियै।।–सू.प्र., पृष्ठ 25

(ii) सखिए, साहिब आविया, जांहकी हूंति चाइ।
हियड़उ हेमांगिर भयउ, तन पंजरे (में) न माइ।।– ढो.मा.

(iii) चंचळां (पर) चढ़ि महा सरवर री पाळि आइ ऊभी रही।–वचनिका रतनसिंघजी री

8. सम्बोधन–

(i) सखिए साहिब! आविया, मन चाहंदी मोइ।
वाड़ी हुवा वधांमणा, सज्जण मिळिया सोइ।।– ढो.मा. 532

(ii) रजस्वळा नारीह! कथा गोप किणसूं कहूं।
समझौ हरि सारीह, ( म्हारी) सरम मरम री सांवरा।।–द्रो.पु. 47

प्रस्तुत कोश में मूल शब्दों को ही स्थान दिया गया है। शब्दों के अर्थ के प्रमाण में दिये जाने वाले उदाहरणों में कहीं-कहीं उसी शब्द का परिवर्तित रूप लिख दिया गया है, किन्तु वे मूल शब्दों की भूमि को अधिक स्पष्ट करते हैं। विकारी शब्दों के उपरोक्त उदाहरणों में शब्दों के परिवर्तित एवं मूल रूप का सम्बन्ध पूर्णतया स्पष्ट हो जाएगा।

सर्वनाम–

वैदिक तथा पाणिनिकालीन संस्कृत के विभिन्न सर्वनामों का स्थिरीकरण पर्याप्त रूप से हो चुका था। किन्तु कालांतर में प्राकृत, अपभ्रंश एवं राजस्थानी आदि आधुनिक आर्यभाषाओं तक आते-आते सर्वनाम के इन रूपों में काफी परिवर्तन दृष्टिगोचर होने लगा। राजस्थानी में भी विकल्प से सर्वनामों के अनेक रूप उपलब्ध हैं, किन्तु उन सभी को कतिपय मूल रूपों के अन्तर्गत लाया जा सकता है।

समय के बीतने के साथ ही संज्ञापदों की भाँति सर्वनामों के विकारी रूपों का भी लोप होता गया। प्राचीन काल की आर्य भाषा संस्कृत में उत्तम एवं मध्यम पुरुष में लिंग-भेद न था, केवल अन्यपुरुष के लिए इसका समावेश था, परन्तु समय की प्रगति के साथ ही इसका भी लोप हो गया। अगर वास्तव में देखा जाय तो राजस्थानी आदि आधुनिक भाषाओं के अंतर्गत सम्बन्धकारक के रूप विशेष्य के अनुसार होने के कारण वे विशेषण होते हैं, यथा–

(i) मारी घोड़ी
(ii) मारौ घोड़ौ

सर्वनाम के कई भेद बताये जाते हैं। डॉ. उदयनारायण ने नौ भेदों का उल्लेख किया है[1], किन्तु राजस्थानी में प्रायः सात प्रकार के भेद माने गये हैं[2]:–

1. पुरुषवाचक
2. निजवाचक
3. निश्चयवाचक
4. अनिश्चयवाचक
5. सम्बन्धवाचक
6. आदरसूचक
7. प्रश्नवाचक

इनका विस्तार से उल्लेख पुस्तक “राजस्थांनी व्याकरण” में किया जा चुका है। यहाँ संक्षिप्त विवेचन ही पर्याप्त होगा।

[क] उत्तमपुरुष–राजस्थानी में इसके निम्नलिखित रूप मिलते हैं।

 एकवचन
 बहुवचन
 अविकारी–
 हूं, मूं, म्हैं
 म्हे, म्हां, अमे, अमां
 कर्म–
 म्ह, मी, मो
 म्हां
 सम्बन्ध–
 म्हारौ, म्हाअजौ
 म्हांअली, म्हांअजौ, मांणौ
 स्त्री. म्हारी
 मांणी

अविकारी मूं, म्हैं की उत्पत्ति[3] संस्कृत मया+एन से हुई है। प्राकृत के करणकारक में मया–मए, राजस्थानी में म्हैं रूप मिलता है। अपभ्रंश में इसके मैं तथा मइँ रूप हैं। इसी मइँ से मूं राजस्थानी रूप बना है। अनुनासिक होने के कारण वस्तुतः एन है। प्रायः सभी बोलियों एवं आर्य-भाषाओं में यह अनुनासिकता वर्तमान है।

बहुवचन रूप अमे, अमां की उत्पत्ति भी वैदिक अस्मे से ही हुई है। प्राकृत में अस्में का रूप आम्हे बना। इससे आम्हि बनता हुआ राजस्थानी में अमें या अमां रूप बहुवचन में मिलता है।[4]

संस्कृत के अहकम् का संक्षिप्त रूप अप. हउँ से राजस्थानी में हूँ हो गया। आधुनिक गुजराती में भी हुं का काफी प्रचलन है। यद्यपि यहाँ अउँ से के सबल रूप की अपेक्षा उँ वाले दुर्बल रूपों की प्रबल प्रवृति है, तथापि आधुनिक राजस्थानी में हूँ रूप सुरक्षित है।

सम्बन्ध विकारी रूप मुझ, मझ की उत्पत्ति भी संस्कृत के मह्यम से हुई है। सं. मह्यम से प्राकृत में तथा अप. में मज्झु तथा राजस्थानी में मुझ या मझ होता है। गुजराती में इसी का रूप मज मिलता है। पुरानी राजस्थानी में अपवाद-स्वरूप मेरउ और मोरउ रूप भी मिलते हैं। ये दोनों रूप पूर्वी प्रदेश की ओर संकेत करते हैं और ब्रज तथा बुन्देली के विकारी रूप मो, मे के सदृश हैं। इन्हीं का बिगड़ कर आधुनिक राजस्थानी में म्हारौ या मा’रौ बन गये हैं।

[1]हिन्दी भाषा का उद्गम और विकास–डॉ. उदयनारायण तिवारी नेपृष्ठ 460 पर निम्नलिखित नौ भेदों का उल्लेख किया है–

1. व्यक्तिवाचक या पुरुषवाचक (Personal) 2. उल्लेखसूचक (Demonstrative)
(क) प्रत्यक्ष-उल्लेख-सूचक (Near Demonstrative)
(ख) परोक्ष या दूरत्व उल्लेखसूचक (Remote Demonstrative)
3. साकल्यवाचक (Inclusive) 4. सम्बन्धवाचक (Relative)
5. पारस्परिक सम्बन्धवाचक(Co-relative)
6. प्रश्नसूचक (Interrogative)
7. अनिश्चयसूचक (Indefinite)
8. आत्मवाचक (Reflexive)
9. पारस्परिक (Reciprocal)

[2]राजस्थांनी व्याकरण– मेरेद्वारा लिखित–पृ. 68 से 71

[3]संस्कृत के प्रसिद्ध विद्वान् स्व. पं. श्रीनित्यानन्दजी शास्त्री ने इसकी उत्पत्ति संस्कृत-अस्मद् (अहम्) से मानी है। परवर्ती दोनों अक्षरों के वर्ण-विपर्यय और आदिम अकार के लोप से “म्है” रूप होना माना है।

[4]अपभ्रंश में भी सर्वनाम रूपों में अस्मत् शब्द के प्रथमा एक वचन में “हउं” , “मइ-मइ” रूप देखे जाते हैं। बहुवचन में अम्हें, अम्हइ– हिन्दी साहित्य का वृहत् इतिहास, प्रथम भाग–सं. राजबली पांडे, पृष्ठ 324

आधुनिक राजस्थानी में आंपांणै या आपांणौ रूप भी मिलता है। प्रायः इसका प्रयोग उत्तम पुरुष सर्वनाम के ऐसे बहुवचन में होता है, जिसमें सम्बोधित व्यक्ति भी वक्ता द्वारा अपने में सम्मिलित कर लिया जाता है। प्राचीन राजस्थानी की पांडुलिपियों में यह आंप, आंपे रूपों में कर्ता के लिए तथा आपां रूप में सम्बन्ध विकारी के लिए आया है। इस द्वितीय रूप का सम्बन्ध स्पष्टतः अपभ्रंश के अप्पांह, अप्पहँ से है जो संस्कृत के आत्मन् से उत्पन्न हैं। आधुनिक राजस्थानी में इसका प्रयोग अविकारी कारकों के लिए भी बढ़ा दिया गया है।

[ख] मध्यमपुरुष–

 एकवचन 
 बहुवचन
 अविकारी–
 तूं, तूंह, थूं
 तैं, थैं, थां
 कर्म–
 तइँ, तुझे
 तुम्ह, तुम्हां, थां
 तिर्यक या विकारी–
 तुझ
 तुम्ह
 सम्बन्ध (पु.)–
 थांरौ
 थांकौ, थांणौ
 (स्त्री.)
 थांरी
 थांकी, थांणी

मध्यमपुरुष के रूप भी एकदम उत्तमपुरुष के समानान्तर ही मिलते हैं। वैदिक तु-अम में तूं या थूं की उत्पत्ति निहित है। वैदिक तु-अम से संस्कृत त्वम् या त्वकम् ; प्राकृत तू, अपभ्रंश तुहूं उससे राजस्थानी रूप तूं, तउं मिलते हैं। इसी तूं का महाप्राण थूं भी प्रचलित हो गया। संस्कृत के युष्मद (युष्मे) प्रा. तुम्हें होता हुआ राजस्थानी में तुम्ह, तुम्हां या थां हो गया।

प्राचीन पांडुलिपियों में तइं का प्रयोग कर्म में भी हुआ है। यह मइं के समान ही विकारी रूप हो गया है–

सं. त्वयां, प्रा. तइं, तइं, राज. तइं, तिं, तिइं (कां.दे.प्र.)

सम्बन्ध विकारी तुझ की उत्पत्ति भी संस्कृत के तुभ्यम एवं अपभ्रंश के तुज्झु से हुई है। आधुनिक राजस्थानी का थारौ भी तोरउ रूप से बना है–

सं. तुहकार्य, अप. तुहारउ, ताहरउ, तोरउ । इसका अधिकरण रूप ताहरइ बनता है।[1]

बहुवचन रूप तुम्हे, तुम्हि, तम्हे, तम्हि, तुहे आदि प्राचीन राजस्थानी में प्रयुक्त हुए हैं। ये सब अपभ्रंश के तुम्हें एवं संस्कृत के तुष्मे से बने हैं।[2] आधुनिक राजस्थानी में अविकारी कारक के लिये तमे, थे (प्राचीन पश्चिमी राजस्थानी में तुहे), विकारी के लिये तमां, थां जो प्राचीन पश्चिमी राजस्थानी के तुम्हां का परिवर्तित रूप है और सम्बन्धी-सम्बन्ध के लिये तमांरौ या थांरौ (थारौ) होता है।

विशेषण रूप होने के सम्बन्ध में डॉ. तैस्सितोरी ने अपने एक लेख “Notes on the Grammar of the old western Rajasthani with special reference to Apabhreamsa and Gujarati and Marwari”[3] में लिखा है–“सर्वनाम के जो रूप क्रिया विशेषण हो गये हैं, मुख्यतः उनके थोड़े से अपवादों को छोड़ कर ठेठ सर्वनाम विशेषण की तरह भी प्रयुक्त होते हैं और ठीक इसके विपरीत अधिकांश सार्वनामिक विशेषण स्वतंत्र सर्वनामों का भी कार्य करते हैं।” मेरी राय में ऐसे ही भ्रम के कारण संभवतः अपभ्रंश एह ( सं. एष ) के सादृश्य पर जेह, तेह, केह जैसे रूप जो मूलतः सार्वनामिक विशेषण हैं, ठेठ सर्वनाम के क्षेत्र में आ गये।

[ग] अन्य पुरुष–

प्रत्यक्ष उल्लेख मूलक–

 एकवचन
 बहुवचन
 अविकारी–
 
 
 तिर्यक–
 इण
 इन्हां

परोक्ष उल्लेख सूचक–

 एकवचन
 बहुवचन
 अविकारी–
वौ
वे
 तिर्यक–
उण
उणां

व्युत्पत्ति–

सं. असौ; पा. असु; प्रा. असौ, ओह; रा.
सं. एते; प्रा. एए, एये (य श्रुति से); अप. एह; रा.
सं. अमुष्याम् > अमुनाम > अउणं > उण्ह > उण

निजवाचक–

प्रायः इस सर्वनाम के अंतर्गत आप, आपण, आपणप, आपोप आदि रूप मिलते हैं जो अपभ्रंश के अप्प या अप्पण से होते हुए मूल रूप में आर्य भाषा संस्कृत के आत्मन् से उत्पन्न हुए हैं। आप अथवा आपण प्रकृति विशेषण की तरह (संबंधी सम्बन्ध कारक की रचना में) और सर्वनाम की तरह (उत्तम पुरुष सर्वनाम, बहुवचन के स्थानापन्न रूप में) दोनों प्रकार से प्रयुक्त होते हैं। इस सर्वनाम की रूप-रचना निम्नलिखित ढंग से की गई है–

 एकवचन
 बहुवचन
 कर्ता–
 आप
 आंप, आंपे, आपण
 सम्बन्ध विकारी–
 आपणपा
 आंपां, आपां
 सम्बन्धी-सम्बन्ध–
 आपणपइँ
 आपणउ
 अधिकरण–
 आपणपइँ
 आपणइँ

प्रायः परसर्गों के मेल से अविकारी शब्द आप प्रत्येक विभक्ति में प्रयुक्त हो जाता है।

निश्चयवाचक–

प्राचीन राजस्थानी में और प्रकृति के दो समूहों में विभक्त है। आधुनिक राजस्थानी में रूप और मिलता है। इनके अर्थ में कोई विशेष अंतर नहीं है, यद्यपि और से निश्चय की कुछ गहरी मात्रा का बोध उत्पन्न होता है।[4]

कारक  प्राचीन पश्चिमी राज.  आधुनिक राज.
 एकवचन  बहुवचन  एकवचन  बहुवचन
 कर्ता–  एह, ए, आ    वो, औ  वे, औ
 करण–  एण्इँ, एणी, इणी  एणे  उण, उवै  उणां, उआं, उवां
 संबंध विकारी–  एह, ए  ईयां, एह  उण, उवै  उणां, वणां, उवां

प्राचीन राजस्थानी में वाले रूपों का उदाहरण बहुवचन में नहीं मिलता। वहाँ, ए, एह रूप उभयलिंग है। रूप का एकवचन वाला अर्थ आधुनिक राजस्थानी में लुप्त हो चुका है। आधुनिक गुजराती में और को सामान्यतः सभी कारकों, वचनों और लिंगों में अपनाया गया है। प्राचीन रूप एण्इँ आधुनिक राजस्थानी में इणि हो गया।

[1]यह उत्पत्ति भी डॉ. तैस्सितोरी द्वारा मानी गई है। (देखो–पुरानी राजस्थानी, पारा 87)। तैस्सितोरी ने अपना मत संभवतया पिशैल के व्याकरण के आधार पर स्थित किया है। (देखो –प्राकृत भाषाओं का व्याकरण–मूल. ले. रिचर्ड पिशल, अनु. हेमचन्द्र जोशी , पारा 422)। कुछ विद्वानों के अनुसार इसकी व्युत्पत्ति “त्वाम” अथवा “युष्मद” से मानी जा सकती है।
[2]इस लेख का अनुवाद “पुरानी राजस्थानी” के नाम से नागरी प्रचारिणी सभा, काशी द्वारा प्रकाशित हो चुका है। इसका अनुवाद डॉ. नामवरसिंह द्वारा किया गया है।
[3]यह उत्पत्ति डॉ. एल.पी. तैस्सितोरी द्वारा दी गई है।(देखो–पुरानी राजस्थानी–मू. ले. तैस्सितोरी, अनु. नामवरसिंह, पारा 86) तैस्सितोरी का यह मत ठीक नहीं मालूम होता। संभवतया यह सं. ते (तेरा) से बना है।
[4]आधुनिक समय में स्त्री. एवं पु. रूप में प्रयुक्त होता है। का प्रयोग दोनों के समान रूप से बहुवचन रूप में होता है।

अनिश्चयवाचक–

इस सर्वनाम का रूप प्रायः प्रश्नवाचक सर्वनाम के समान ही होता है। मुख्यतया केवल एक अंतर यह होता है कि अनिश्चयवाचक सर्वनाम में जोर देने के लिये अंत में ही का अर्थबोधक एक शब्द और जोड़ दिया जाता है।

निश्चयवाचक सर्वनाम के रूपों में एवं इसके रूपों में कुछ समानता है–

कारक प्राचीन राजस्थानी  आधुनिक राज.
 एकवचन   बहुवचन   एकवचन   बहुवचन
कर्ता– जो, जु, सो, सोय जे, जेअ, जेह,
ते, तेअ, तेह
जिकौ, जकौ,
जिण, जै, ज्यों
जिकै, जकां, जिणां,
जां, ज्यां
करण– जेणइँ, जीणइँ,
जिणइ,
तेणइँ, तीणइँ,
तिणि, तेणीयइँ
 जेहे, जीए,
जेउणोइँ,
तेहे, तीए,
तेणे, तीणे,
तेउणोइँ
 जिकण, जकण,
जणी, जीं,
तिण 
 जकां, जिकां, 
जणां, त्यां,
तिणां
सम्बन्ध अविकारी–  जास, जस,
जसु,
तास, तस,
तसु, तह,
तेह 
जेह, जीह,
जेहँ, जे,
तेह, तीह, 

तेहँ, ते,
तीयाँ
 जकण, जीण,
जै
 जका, जणां,
जां

आधुनिक राजस्थानी में रूपों की सीमा कुछ अधिक व्यापक है जिनमें से कुछ प्रमुख ये हैं– जो, सो और जिकौ, तिकौ, सामान्य कारक एकवचन के लिये, तथा बहुवचन और विकारी एकवचन के लिये जिण, तिण ( प्राचीन राजस्थानी में जिणि, तिणि ) तथा विकारी बहुवचन के लिये ज्यां, त्यां (प्राचीन पश्चिमी राजस्थानी में जीआं, तीआं ) जिकौ-तिकौ के समान संयुक्त रूप सम्बन्धवाचक तथा नित्यसम्बन्धी सर्वनाम रूपों के साथ अनिश्चयवाचक को के संयोग से बनते हैं। आधुनिक राजस्थानी में इनके रूप सभी कारकों में किसी सामान्य सर्वनाम की तरह ही मिलते हैं, यथा–

एकवचन सामान्य– जिकौ, जिकां। कर्तृ– जिकण, जिकइ
एकवचन विकारी– जिकण।

बहुवचन सामान्य– जिका, जिकइ। कर्तृ– जिका।
बहुवचन विकारी– जिकां।

आदरसूचक–

आदरवाची सर्वनाम राजस्थानी में एक विशेष रूप में प्रयुक्त होते हैं। हिन्दी या अन्य भाषाओं में संस्कृत आत्मन् से निकला हुआ आप शब्द प्रचलित है।[1] राजस्थानी में भी आप शब्द का प्रचलन है। राजस्थानी में कुछ ऐसे शब्द भी प्रचलित हैं जिनका अर्थ कुछ विशिष्ट व्यक्तियों से ही सम्बन्धित होता है किन्तु आदर के लिये सर्वसाधारण में भी किसी सामान्य व्यक्ति के लिये वे सर्वनाम रूप में प्रयुक्त हो जाते हैं। उदाहरण के लिये रावळौ (सं. राजकुल से उत्पन्न) शब्द राजा या किसी ठाकुर के निवास-स्थान का अर्थ देता है। प्रायः राजा या ठाकुर के लिये ही कहा जाता है– रावळै सूं कठै बिराजै ? यही शब्द जन-साधारण में आप के अर्थ में प्रचलित होकर आदरसूचक बन गया है। इस प्रकार के शब्द जो प्रमुख रूप से राज, रावळै, आप, पींडा, डीलां आदि हैं, बहुधा बहुवचन में भी इसी प्रकार प्रयुक्त होते हैं।

प्रश्नवाचक–

एकवचन 
बहुवचन 
 कर्ता–
कुंण, कूंण, कवण, को, का, किण
कुण, किणां
 कर्म–
किणनै, किण, किणि, केण, कवण, कीनै
कीनै, कणां नै
 सम्बन्ध–
कींरा, किणरा, कुणह
किणांरा

व्युत्पत्ति–सं. कः पुनः > कपुण > कवुण ( इससे राजस्थानी का कवण रूप बना है।) > कउण > कुंण

इन उपरोक्त प्रकार के सर्वनामों के अतिरिक्त परिमाण, गुण और स्थान के अनुसार सार्वनामिक विशेषण भी होते हैं। सर्वनामों के उपरोक्त रूपों में प्रस्तुत कोश में मूल सार्वनामिक रूपों को तो स्थान दिया ही है, यथासंभव विभक्तिरहित प्रयुक्त होने वाले परिवर्तन रूपों को भी स्थान देने का प्रयत्न किया गया है।

परिमाणवाचक सार्वनामिक विशेषण भी तीन वर्गों में विभाजित किये गये हैं–

(अ)–

 प्राचीन राजस्थानी
 आधुनिक राजस्थानी
 एतउ, जेतउ, तेतउ, केतउ
 इत्ता, जित्ता, कित्ता

ये संस्कृत के अयत्त्व और ययत्त्य से उत्पन्न माने गये हैं।[2] कुछ लोगों ने इनकी उत्पत्ति इयत्, यत्वत् तथा तस्वत् से मानी है।

(आ)–

प्राचीन राजस्थानी
आधुनिक राजस्थानी
एतलउ, जेतलउ, तेतलउ, केतलउ
इत्तौ, कित्तौ, किता

इनकी उत्पत्ति अप. एत्तुलउ, जेत्तुउल आदि से मानी जाती है।

(इ)–

प्राचीन राजस्थानी
आधुनिक राजस्थानी
एवडउ, जेवडउ, तेवडउ, केवडउ
अवडौ, इडौ, किडौ

सं. अयवड्रक, ययवड्रक[3] तथा अप. एवडउ, जेवडउ इत्यादि से उपरोक्त रूपों की उत्पत्ति हुई है।

मोटी दृष्टि से परिमाणवाचक सार्वनामिक विशेषण के उपरोक्त रूप आर्य भाषा संस्कृत के इयत्, यावत्, तावत् एवं कियत् के पर्याय हैं। इनके द्वारा किसी सबल विशेषण के समान रचना होती है।

गुणवाचक सार्वनामिक विशेषण भी पाँच वर्गों में विभाजित किये गये हैं–

(अ) प्राचीन राजस्थानी में इनके इसउ, असउ, जिसउ, तिसउ, किसउ, इसिउ, असिउ, जिसिउ, तिसिउ, किसिउ, इस्यउ, जिस्यउ, तिस्यउ, किस्यउ आदि रूप मिलते हैं जो अपभ्रंश भाषा के अइसउ, जइसउ, तइसउ, कइसउ से होते हुए संस्कृत के यादृश, तादृश से निकले हैं। इन रूपों में से किसउ तथा इसके रूपभेद किसिउ एवं किस्यउ सामान्यतः प्रश्नवाचक और अनिश्चयवाचक सामान्य सर्वनामों के लिये प्रयुक्त होते हैं। आधुनिक राजस्थानी में उपरोक्त इन्हीं रूपों से निःसृत इनके रूप-भेद यथा– इसौ, जिसौ, तिसौ, किसौ आदि प्रयुक्त होते हैं जिनमें किसौ प्रश्नवाचक एवं अनिश्चयवाचक सामान्य सर्वनामों के लिये प्रयुक्त होता है।

(आ) दूसरे वर्गभेद के अन्तर्गत प्राचीन राजस्थानी के एहउ, जेहउ, तेहउ, केहउ आदि रूप आते हैं। आधुनिक राजस्थानी में इनका प्रयोग अल्प मात्रा में ही होता है तथापि कुछ सुधरे रूप में ये एहौ, जेहौ, केहौ आदि रूपों में प्रयुक्त होते हैं। जहाँ कहीं भी ये विशेषण की तरह प्रयुक्त होते हैं इनमें लिंग,वचन और कारक के अनुसार रूपविकार होता है।

[1]“आप” शब्द की व्युत्पत्तिदो प्रकार से होती है। जब यह निजवाचक में स्वयं के लिये प्रयुक्त होता है तब उसकी उत्पत्ति “आत्मन्” से मानी जा सकती है, किन्तु जब “आप” किसी दूसरे केलिये आदरसूचक रूप में प्रयुक्त होता है, तो उसकी उत्पत्ति सं. “आप्त” से ही मानी जायगी।
[2]देखो–“पुरानी राजस्थानी” पारा 93 (i) तथा पिशैल का प्राकृत व्याकरण, पारा 153. स्व. पं. नित्यानंदजी शास्त्री इनकी उत्पत्ति सं. इयत्, यावत् तथा कियत् से मानते हैं।
[3]स्व. पं. नित्यानंदजी शास्त्री के अनुसार यहाँ सं. अयवर्त एवं ययवर्त होना चाहिये।

(इ) यह प्रायः केवल प्राचीन राजस्थानी में ही मिलता है। आधुनिक राजस्थानी में इनके ये रूप लुप्तप्राय हो गये हैं। इनके इस पुरानेपन पर अपभ्रंश की छाप स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। पुरानी राजस्थानी में एहवउ, जेहवउ, तेहवउ, केहवउ तथा इनके रूप भेद एव्हउ, जेव्हउ, तेव्हउ, केव्हउ मिलते हैं। आधुनिक गुजराती में इसके समक्ष ऐवौ, जेवौ रूप प्राप्य हैं।

(उ) उपरोक्त रूपों के रूपभेदों के अनुरूप ही प्राचीन राजस्थानी में एहवडउ, जेहवडउ, तेहवडउ, केहवडउ भी मिलते हैं। इनके ये रूप लुप्त-प्राय हैं। केवल तैस्सितोरी ने अपने राजस्थानी भाषा सम्बन्धी एक लेख में उल्लेख करते हुए लिखा है[1] कि “जहाँ तक मुझे मालूम है, अपादान हवडाँ, हिवडाँ (एहवडाँ) और अधिकरण हवडइ (एहवडइ), जो कि क्रिया विशेषण की तरह प्रयुक्त हुआ है, अधिकरण क्रियाविशेषण के अतिरिक्त इसका प्रयोग कहीं नहीं मिलता।”

(ए) आधुनिक राजस्थानी में एडौ, जेडौ, तेडौ एवं केड़ौ, जिनका प्राचीन राजस्थानी में एहडउ, जेहडउ, तेहडउ, केहडउ रूप मिलते हैं, प्रयुक्त होते हैं।

इन उपरोक्त पाँचों वर्गों के ये रूप जब विशेषण के समान प्रयुक्त होते हैं तो अर्थ की दृष्टि से ये संस्कृत के ईदृशः, यादृशः के समकक्ष होते हैं।

स्थानकवाचक सार्वनामिक विशेषण के रूपों में आधुनिक राजस्थानी में क्षेत्रीय रूप से कुछ स्थानों में एथ, जेथ, तेथ, केथ (प्राचीन राजस्थानी रूप एथउ या अथउ, जेथउ, तेथउ, केथउ ) प्रयुक्त होते हैं। अपभ्रंश भाषा में इन्हीं स्थानवाचक सार्वनामिक विशेषणों के लिए इस प्रकार के रूप नहीं मिलते, किन्तु स्थानवाचक सार्वनामिक क्रियाविशेषण रूप एत्थु, जेत्थु, तेत्थु, केत्थु का हेमचंद्र[2] ने प्रयोग किया है। प्राचीन राजस्थानी एवं आधुनिक राजस्थानी के प्रयोगों द्वारा यह स्पष्ट हो जायगा–

प्रा. रा. केथउँ कर्यू त्रिसूल (कां.दे.प्र. 102)
आ.रा. बै केथ गया? (क्षेत्रीय)

कुछ सर्वनाम क्रियाविशेषण के रूप में प्रयुक्त होते हैं अतः उन्हें सार्वनामिक क्रिया विशेषण का नाम दिया गया है। अपादान रूप में इहाँ (ईहां रू.भे.) अहाँ, जिहाँ, तिहाँ, किहाँ आदि रूप मिलते हैं जो अपभ्रंश के एअहाँ, आअहाँ, जहाँ, तहाँ, कहाँ एवं प्राकृत के एअम्हा, आअम्हा, जम्हा, तम्हा, कम्हा, से होते हुए संस्कृत– एतस्मात्, अयस्मात्, अदस्मात्[3] , यस्मात्, तस्मात्, कस्मात् रूपों से निःसृत हुए हैं। कुछ ग्रंथों में इनके संक्षिप्त रूप जाँ, ताँ, काँ का प्रयोग हुआ है। इनमें जाँ, ताँ, रूप तो प्रायः पर्यन्त अर्थ में प्रयुक्त होते हैं जो अर्थ में संस्कृत के यावत्, तावत् के समान है। अधिकरण क्रिया विशेषण रूप में एहीं, अहीं, जहीं, तहीं, कहीं प्रयुक्त होते हैं। अपभ्रंश रूप एअहिं, आअहिं, जहिं, तहिं, कहिं प्राकृत रूप एअम्हि, आअम्हि, जम्हि, तम्हि, कम्हि एवं संस्कृत रूप एतस्मिन्, अदस्मिन् या अयस्मिन्, यस्मिन्, तस्मिन्, कस्मिन् से इनकी व्युत्पत्ति मानी जा सकती है।[4]

अव्यय क्रिया विशेषण के रूप में इम, जिम, किम, तिम का प्रयोग होता है। कविता में ऐम, जेम इत्यादि का भी प्रयोग मिलता है।

विशेषण–

प्राचीन भारतीय आर्यभाषा में विशेषण पदों के रूपों में भी अपने विशेष्य पदों के अनुसार परिवर्तन होता था एवं मध्य भारतीय आर्यभाषा काल में भी यह प्रणाली बहुत कुछ सुरक्षित रही। आधुनिक राजस्थानी में भी विशेषणों की रूप-रचना संज्ञा शब्दों की तरह ही होती है और ये अपने विशेष्य के लिंग, वचन, कारक के अनुसार होते हैं। स्त्री लिंग के रूप इसके अपवाद कहे जा सकते हैं,ये वचन और कारक संबंधी विशेषता से रहित होते हैं। प्रायः स्त्री लिंग विशेषण इकारान्त होते हैं, यथा–

उर चौड़ी कड़ पातळी, झीणी पांसळियांह।
कै मिळसी हर पूजियां, हीमाळै गळियांह।।

विशेषणों का प्रयोग जब क्रिया विशेषण की तरह होता है तो उनकी वाक्य-रचना दो प्रकार की हो जाती है– एक तो वे जो नपुंसक एक वचन में रहते हुए सभी कारकों में अपरिवर्तित रहते हैं; दूसरे वे जो किसी समानाधिकरण विशेषण की तरह लिंग, वचन और कारक के अनुसार रूपरचना करते हैं।

सर्वनामों के रूप एवं उन पर आधारित गुणवाचक तथा परिमाणवाचक विशेषण निम्नलिखित चित्र से भली प्रकार समझे जा सकेंगे–

सर्वनाम 
रूप 
गुणवाचक विशेषण
परिमाणवाचक विशेषण
औ, यो 
अण, अणी, इ, इं,
इण, इयै
ऐड़ौ, इसौ, इस्यौ,
ऐसौ 
इतौ, इतरौ, इतरोई,
इडौ
औ, ऊ, बौ, वौ, एवौ
उण, उणी, वण,
वणी, विणी, वण,
बिण, बिणी, बी,
वीं, उवै
वेड़ौ, ऊड़ौ,
विसौ (विस्यौ),
वैसो, बिसौ
उतौ, उतरौ, उतरोई,
वतौ, वतरौ, वतरोई,
वितौ, वितरौ, वितरोई,
तिकौ 
तण, तिण 
तैड़ौ, तिसौ, तैसौ 
तितौ, तितरौ, तितरोई,
तिडौ
जिकौ 
जण, जिण, जी
जैड़ौ, जिसौ,
जिस्यौ
जितौ, जितरौ,
जितरोई, जिडौ
कुण 

कण, किण 

 

कैड़ौ 

कितौ, कितरौ, 

कितरोई, किडौ।

तुलनात्मक विशेषण रूपों का प्रयोग राजस्थानी में जिस वस्तु से तुलना की जाती है वह अपादान कारक में होती है। इस प्रक्रिया में विशेषण अपरिवर्तित रहते हैं। प्राचीन राजस्थानी में अपादान परसर्ग मुख्यतया ये प्रयुक्त होते थे–

पाहिं-पाहंति और थकी, थी।[5]

आधुनिक रूप में तुलनात्मक विशेषणस्वरूप प्रायः सूं, करतां आदि का प्रयोग होता है, यथा–

आ किताब उण सूं चोखी है।
रांम इण करतां चौखौ टाबर है।

[1]पुरानी राजस्थानी,मूल. ले. एल.पी.तैस्सितोरी, अनु. नामवरसिंह, पृष्ठ 120 अथवा पारा 94
[2]सिद्ध हेमचंद्र, 4-405
[3]संदिग्ध
[4]पुरानी राजस्थानी,मूल. ले.–एल.पी. तैस्सितोरी, अनु.–नामवरसिंह, पारा 98, पृष्ठ 124
[5]देखो–पुरानी राजस्थानी,तैस्सितोरी, पारा 79, अनु. नामवरसिंह

गणनावाचक संख्याओं का प्रयोग प्रायः अविकारी रूप में ही होता है, केवल करण कारक में उनके अंत में प्रत्यय लगता है। राजस्थानी में उनके विकारी रूपों का भी प्रयोग मिलता है, यथा–

चौसठ– साठ और चार के योग के बराबर।
चौसठमौं– जो क्रम में तिरेसठ के बाद पड़ता हो।
चौसठेक– चौसठ के लगभग।
चौसठौ– 64 वाँ वर्ष।
चौसठे, चौसठी– 64 वें वर्ष में।

प्रस्तुत कोश में प्रायः गणनावाचक संख्याओं के उपरोक्त समस्त रूपों को देने का प्रयत्न किया गया है। कुछ रूप तो राजस्थानी की अपनी विशेषता हैं, जैसे– चारेक, पांचेक, सातेक, बीसेक, पचासेक आदि। इस प्रकार के समस्त रूपों में गणनावाचक संख्या के साथ एक जुड़ा है, यथा–

चार+एक=चारेक
पांच+एक=पांचेक
सात+एक=सातेक

यह एक लगभग का अर्थ उत्पन्न करता है। इसके अतिरिक्त मौं शब्द का रूप भी क्रमानुसार मिलने वाले स्थान का अर्थ देता है। अन्य अर्थ मुख्य भाषाओं के इसी समान रूप के साथ रखने से यह अर्थ स्पष्ट हो जायगा–

 संस्कृत 
 हिन्दी 
 राजस्थानी
 षष्ठ 
 छठां, छठवां 
 छठौ
 द्वादश 
 बारहवां 
 बारमौं
 द्वितीय 
 दूसरा 
 दूजौ, बीजौ, दूसरौ

अंतिम उदाहरण मौं रूप का नहीं है। गुणवाचक प्रथम चार संख्याओं में मौं नहीं लग कर उनका रूप इस प्रकार होता है पै’लौ, दूजौ, तीजौ, चोथौ । इनके अतिरिक्त सब में मौं लग कर क्रमानुसार मिलने वाले स्थान का अर्थ उत्पन्न करता है। केवल छः का विकारी रूप छठौ ही होता है।

इनकी व्युत्पत्ति इस प्रकार मानी जा सकती है–

सं. मः [ यथा सं. पञ्चमः ] वं > मःमौं । किन्तु प्रथम चार संख्याओं में जिनमें कि मौं नहीं लगता, उनकी व्युत्पत्ति इस प्रकार से की जायगी–

पै’लौ– सं. प्रथम अप. पढ़म+इल्ल, पढ़िल्ल, पहिल
दूजौ– सं. द्वितीय  रा. दूजौ, बीजौ
तीजौ– सं. तृतीय अप. तीज, तीजौ
चोथौ– सं. चतुर्थ अप. चउत्थ, चोथौ

गुणात्मक संख्यावाचक विशेषण में भी राजस्थानी में दूना, तिया, चौका आदि प्रयुक्त होते हैं। चटसाल में आज भी बालक बोलते हुए दिखाई देते हैं–

1. एक एकम् एक
2. दो दूणी चार
3. तीन तिया नौ
4. चार चौक सोळै, स़ोळ
5. पांच पंजा पच्चीस
6. छै छका छत्तीस
7. सातौ साती गुणपचा
8. आठौ आठी चौसठ
9. नमे नमे इक्यासी
10. दाहे दाहे सौ

इस प्रकार के विशेषणों का साधारणतः गणित के पहाड़ों में ही प्रयोग होता है। समूहवाचक संख्याओं (Collective Numerals) के भी कुछ रूपों का प्रयोग राजस्थानी में होता है।

जोड़ौ, जोड़ी (सं. युत या युतक ) – दो का समूह
चौक (सं. चतुष्क ) – चार का समूह
सैकड़ौ (सं. शत ) – सौ का समूह
लख, लखी (स. लक्ष ) – लाख का समूह यथा नवलखी हार
सतसई (स. सप्त+शत+ई ) – सात सौ का समूह

उपरोक्त समूह रूपों के अतिरिक्त गंजीफे के खेल में विभिन्न इकाइयों के पत्तों को भी इक्कौ, दूग्गी, तिग्गी, चौकी, पंजी, छक्की, सत्ती, अट्ठी, नैली, दैली अथवा पुल्लिंग रूप इक्कौ (इसके पश्चात्) पंजौ, छक्कौ, सत्तौ, अट्ठौ, नैलौ एवं दैलौ कहते हैं। इनकी व्युत्पत्ति का ठीक-ठीक पता नहीं चलता तथापि इनके द्वित्व-व्यंजनों की स्थिति से इन पर पंजाबी अथवा प्राचीन नागर अपभ्रंश का प्रभाव लक्षित होता है।

समानुपाती संख्यावाचक विशेषण के अंतर्गत साधारणतया संख्याओं में गुण [ सं. गुण ( + ), प्रा. गुणअ ] के योग से समानुपाती संख्यावाचक पद बनाये जाते हैं। इनके योग से गणनात्मक संख्यावाचक शब्द के रूप में थोड़ा परिवर्तन हो जाता है, यथा– दुगणौ, दूणौ (=दो+गुना, द्वि+गुणक), तिगणौ-तिगुणौ, चौगणौ-चौगुणौ, पंचगुणौ अथवा पांचगुणौ आदि।

भिन्नात्मक संख्यावाचक विशेषण (Fractional Numerals) भी राजस्थानी में विभिन्न रूपों में मिलते हैं। सभी आर्य-भाषाओं में ये मिलते हैं। आधुनिक राजस्थानी में इनके रूप इस प्रकार हैं–

1/4 पाव [ सं. पाद, अप. पाअ ]
3/4 पूण [ सं. पाद < पादोन < पाउण < पूण ]
1/2 आदौ, आधौ, अद्धौ [ सं. अर्द्धक < अद्धअ ]
1 1/4 सवा [ सं. सपाद < सवाअ ]
1 1/2 डोड, डोढ [ द्वि अर्द्ध (क) < डि-अड्ढ ]
2 1/2 अडाई, अढाई, ढाई [ अर्द्ध-तृतीय(क) < अड्ढइअ ][1]

इसके अतिरिक्त गणित के पहाड़े रूप में 3 1/2 को हूंटा 4 1/2 गुणा को ढंचा, 6 1/4 गुणा को सिटिया कहते हैं। इनकी व्युत्पत्ति के सम्बन्ध में कुछ स्पष्टतया ज्ञात नहीं हो सका है।

तिर्यक रूप में 1/2 का प्रयोग साढ़े के अर्थ में प्रायः सभी संख्यावाचक गणनाओं में (एक एवं दो को छोड़कर) होता है। सं. सार्द्ध , प्रा. सड़ढ से साढे रूप की व्युत्पत्ति मानी जा सकती है।[2]

बिंदी अथवा शून्य को संख्यावाचक गणनाओं में राजस्थानी में अशुभ माना गया है। व्यापारी अपने आंकड़ों में, तौल में तथा अन्य साधारण जनता भी 100 के स्थान पर 101 लिखना अधिक ठीक समझती है। अगर बीच की शून्य भी हट सके तो अति उत्तम। इस दृष्टि से 111 की संख्या शुभ संख्या मानी जाती है। शून्य का शाब्दिक अर्थ भी कुछ नहीं होता है। सामान्य-जन इस अर्थ को पसंद नहीं करता अतः शून्य को बोलचाल में शून्य न कह कर “शुभ” कहते हैं। शून्य को अशुभ कब से माना गया एवं क्यों माना गया, इस सम्बन्ध में क्रमबद्ध विवेचना हमें उपलब्ध नहीं है, तथापि सम्भवतया शून्य का अर्थ रिक्त एवं कुछ नहीं के कारण ही अशुभ माना गया है। जन-साधारण की यह इच्छा होती है कि उसका घर भरा रहे, वह स्वयं, उसका खेत आदि सब हरे-भरे रहें, ऐसी अवस्था में शून्य को वह शुभ रूप में किस प्रकार से स्वीकार कर सकता था?

गणना में अपेक्षाकृत कमजोर व्यक्ति ऋणात्मक संख्यावाचक विशेषणों का प्रयोग करते हैं। इसके लिए फारसी भाषा का कम शब्द ही राजस्थानी में प्रचलित हो गया है। यथा– एक कम सौ। तीन कम चार बीसी।

निश्चित भाव प्रकट करने के लिए गणनात्मक संख्यावाचक शब्दों में प्रत्यय लगा कर उन्हें निश्चित बना देते हैं। इस प्रकार प्रत्यय ही के समान निश्चयात्मक अर्थ देता है, यथा–

चारूं, च्यारूं = चारों ही
दोनूं, दोन्यूं = दोनों ही
सातूं = सातों ही

दहाई के बाद की संख्याओं के साथ के स्थान पर सीधे ही का भी प्रयोग मिलता है, यथा–

1. बारूं= बारह ही बारै ही = बारह ही
2. अठारूं ही= अठारह ही अठारै ही = अठारह ही

दो एवं तीन की संख्याओं के साथ केवल नूं ही लगता है– दोनूं, तीनूं

इन्हीं संख्याओं को आं प्रत्यय के प्रयोग से कई बार अनिश्चयात्मक भी बना दिया जाता है, यथा–

पचासां, हजारां, सैंकड़ां, लाखां।

दो संख्यावाचक शब्दों के योग से भी अनिश्चय व्यक्त किया जाता है– बीस-तीस, बारै-तेरै, हजार- बारै सौ आदि।

प्रस्तुत कोश में संख्यावाचक गणनाओं के समस्त रूपों को देना संभव नहीं था, अतः किसी संख्या के केवल निम्नलिखित रूप देना ही संभव हो सका–

बत्तीस– तीस एवं दो के योग के बराबर
बत्तीसमौं– जो क्रम में इकत्तीस के बाद पड़ता हो
बत्तीसेक– बत्तीस के लगभग
बत्तीसौ– बत्तीस का वर्ष।

अन्य रूप व्याकरण के अनुसार स्वयमेव निर्मित हो जाते हैं जिनका उल्लेख करना उचित न होगा।

विशेषण की तुलनात्मक श्रेणियों में आधुनिक राजस्थानी में सूं का प्रयोग अधिक होता है, जिसका उल्लेख यथास्थान हम ऊपर कर चुके हैं। तमवन्त विशेषण (Superlative) का भाव विशेषण पद के पूर्व सब सूं, सब में अथवा सब सूं बढ़ कर इत्यादि अपादान अथवा अधिकरण परसर्ग युक्त पद जोड़ कर प्रकट किया जाता है, यथा–

1. रामसब सूं छोटौ टाबर है ।
2. वोसब में हुसियार है।
3. खेलण में तौसब सूं बढ़ कर है।

इनके अतिरिक्त समानता एवं सादृश्य का भाव प्रकट करने के लिए संज्ञा अथवा सर्वनाम पदों के साथ सरीखौ, जेड़ौ, सा आदि पद जोड़ दिये जाते हैं। इनमें भी रूप-विकार होते हैं–

1. इरैसरीखौ आदमी
2. सीता सरीखी लुगाइयां

सरीखा शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के सदृक्ष शब्द से मानी जाती है। राजस्थानी में इस शब्द के कई रूप-भेदों का प्रयोग हुआ है। इन सभी रूप-भेदों को कोश में स्थान दिया गया है।

अतिशय एवं आधिक्य के लिए विशेषण पद के साथ सा का प्रयोग होता है, यथा–

बोत सा छोरा आज छुट्टी माथै हैं।

इसके अतिरिक्त सार्वनामिक विशेषणों का उल्लेख सर्वनामों के साथ किया जा चुका है। गणनात्मक संख्यावाचक समस्त विशेषणों के अविकारी रूपों की व्युत्पत्ति कोश में शब्द के साथ ही प्रस्तुत कर दी गई है।

[1]कुछ विद्वानों ने इसकी उत्पत्ति सं.–सार्द्ध+द्वय से मानी है।
[2]स्व. पं. नित्यानंदजीशास्त्री इनकी उत्पत्ति सं.–अर्द्धाञ्चा से मानते हैं जिसका अर्थ है–अर्द्ध को लिये हुए।

क्रिया–

प्राचीन भारतीय आर्य भाषा काल के आरंभ में धातु-प्रक्रिया अत्यन्त जटिल थी एवं कालान्तर में इसमें सरलता की ओर अग्रसर होने की प्रवृत्ति परिलक्षित होती रही। विभिन्न गणों की धातुओं के रूपों में समानता आने का कारण सरलीकरण की इसी प्रवृत्ति का फल था। इसका प्रभाव यह हुआ कि गण-विभाग धीरे- धीरे घटता गया और अपभ्रंश काल तक समाप्त ही हो गया। इसके अनन्तर प्रायः सभी धातुओं के रूप भ्वादिगण के समान निर्मित होने लगे। कालान्तर में आत्मनेपद-परस्मैपद के भेद को दूर करने के साथ ही द्विवचन भी समाप्त हो गया।[1] कालों एवं प्रकारों के विभिन्न रूपों की संख्या भी घट गई। प्राचीन काल की अपेक्षा नवीन अपभ्रंश काल तक इस प्रकार धातु प्रक्रिया बहुत सरल हो गई, क्योंकि भाषा के नौसिखियों के लिये उस जटिलतर प्रवृत्ति का निर्वाह करना सहज रूप में बोधगम्य न था।

मध्य-भारतीय भाषा काल में तिङयन्त रूपों के स्थान पर कृदन्त रूपों का व्यवहार अधिक प्रचलित हो चुका था। सरलता के गुण के कारण इनका प्रचार शीघ्रता से हुआ। धातु रूपों को सीमित कर दिया गया और इन्हीं सीमित धातु रूपों से ही सभी कालों एवं प्रकारों का अर्थ द्योतन कराने के लिये नये-नये उपाय काम में लाये जाने लगे।

धीरे-धीरे भाषा अपने स्वाभाविक विकास की ओर निरन्तर बढ़ने लगी। प्राचीन जटिलता तो मध्य-भारतीय भाषाकाल में ही समाप्त हो चुकी थी। संयुक्त क्रियाओं का प्रचलन तीव्र गति से होने लगा। आधुनिक भाषाओं के लिये डॉ. सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या ने क्रियाओं को मोटे तौर से दो रूपों में वर्गीकृत किया है। राजस्थानी की क्रियाओं को भी इन दो रूपों की दृष्टि से देखा जा सकता है, यथा–

(1) सिद्ध धातुएँ (Primary Roots) मूल रूप से सुरक्षित धातुयें जिनके अन्तर्गत निम्नलिखित रूप माने जा सकते हैं–

खा(णौ) = [ सं. खाद्, प्रा. खाअ ]
गूंथ(णौ) = [ सं. ग्रंथ, पा. गुम्फ्, प्रा. गुन्थ् ]
जांण(णौ) = [ सं. ज्ञा, प्रा. जाण, जाणेइ ]

(2) साधित धातुएँ (Secondary Roots) — वे धातुएँ जो मूल रूप में सुरक्षित नहीं हैं एवं किसी प्रत्यय के संयोग से जिनका निर्माण हुआ है, यथा–

घिसवाणौ, घिसाणौ = [ सं. घृष् धातु के साथ वा या प्रेरणार्थक प्रत्यय के संयोग से ] ।
लिखवाणौ, लिखाणौ = [ सं. लिख धातु के साथ वा या प्रेरणार्थक प्रत्यय के संयोग से ] आदि।

डॉ. उदयनारायण तिवारी ने उपरोक्त भेदों को निम्नलिखित शीर्षकों में विभक्त किया है[2]

1. सिद्ध धातुएँ–

(i) संस्कृत से आई हुई तद्भव सिद्ध धातुएँ–

(क) साधारण धातुएँ (ख) उपसर्गयुक्त धातुएँ।

(ii) संस्कृत णिजन्त से आई हुई सिद्ध धातुएँ।

(iii) संस्कृत से पुनः व्यवहृत तत्सम एवं अर्धतत्सम सिद्ध धातुएँ।

(iv) संदिग्ध व्युत्पत्ति वाली देशी धातुएँ।

2. साधित धातुएँ–

(i) आकारांत णिजन्त (प्रेरणार्थक)

(ii) नाम धातु–

(क) तद्भव–

(i) प्राचीन (उत्तराधिकार सूत्र में प्राप्त)

(ii) नवीन।

(ख) तत्सम।

(ग) विदेशी।

(iii) मिश्रित अथवा संयुक्त एवं प्रत्यययुक्त (तद्भव)

(iv) ध्वन्यात्मक अथवा अनुकार ध्वनिज धातुएँ।

(v) संदिग्ध व्युत्पत्ति की धातुएँ।

[1]हिन्दी भाषा का उद्गम और विकास,डॉ. उदयनारायण तिवारी, पृष्ठ 477.
[2]हिन्दी भाषा का उद्गम और विकास–डॉ. उदयनारायण तिवारी,पृष्ठ 478-479.

उपरोक्त वर्गीकरण उन्होंने हिन्दी भाषा के उद्गम और विकास की विवेचना (पृष्ठ 478-479) के अंतर्गत किया है, किन्तु क्रिया-पदों की दृष्टि से यह वर्गीकरण राजस्थानी में भी इसी प्रकार लागू हो सकता है। निम्नलिखित उदाहरणों से यह बात अच्छी तरह स्पष्ट हो जायगी–

1. सिद्ध धातुएँ–

(i) संस्कृत से आई हुई तद्भव सिद्ध धातुएँ।

 (क) साधारण धातुएँ–
  कर(णौ)
 [ सं. कृ ]
 मांज(णौ)
 [ सं. मृज, अप. मज्ज ]
 टूट(णौ)
 [ सं. त्रुट्, अप. टुट्टू ]
 (ख) उपसर्गयुक्त धातुएँ–
 उजड़णौ
 [ सं. उत्+जट्, प्रा. उज्जाडेइ ]
 उतरणौ
 [ सं. उत् तृ, प्रा. उत्तरइ ]

कुछ धातुओं के आने के साथ ही नयी भाषा में उनका अर्थ भी बदल जाता है। संस्कृत के तत्सम् रूप के कर्मवाच्य रूप नयी भाषाओं में कई बार कर्तृवाच्य रूप हो जाता है, यथा–

सं. तप्यते = तपाया जाता है–कर्मवाच्य
अप. तप्पइ = स्वयं को तपाता है– कर्तृवाच्य
रा. तपै = तपता है– कर्तृवाच्य

उपरोक्त राजस्थानी शब्द तपै संस्कृत के तप्यते से ही निःसृत हुआ है, परन्तु अर्थ में परिवर्तन होकर वह कर्मवाच्य से कर्तृवाच्य हो गया।

(ii) संस्कृत णिजन्त से आई हुई सिद्ध धातुएँ संस्कृत की कुछ णिजन्त धातुओं में अंतर्निहित प्रेरणार्थक भाव लुप्त होकर केवल साधारण सकर्मक भाव रह गया है एवं प्रेरणार्थक भावस्वरूप कुछ नये स्वरूप निर्मित हो गये हैं, यथा–

राजस्थान में मरणौ अकर्मक है, जिसका सकर्मक रूप मारणौ है। मारणौ सकर्मक रूप की उत्पत्ति संस्कृत के णिजन्त मारयति से हुई है। संस्कृत के इस णिजन्त धातु में प्रेरणार्थक रूप निहित है, किन्तु राजस्थानी में मारणौ केवल सकर्मक रूप है तथा उसका प्रेरणार्थक रूप राजस्थानी में मरावणौ होगा। इस प्रकार के कई उदाहरण दिये जा सकते हैं, यथा–

उखाड़(णौ)– सं. उत्खाट्यति ;
बाळ(णौ)– सं. ज्वालयति,
तपा(णौ)–
सं. तापयति,
हार(णौ)–
सं. हारयति आदि।

(iii) संस्कृत से पुनः व्यवहृत तत्सम् तथा अर्द्ध तत्सम् धातुएँ–संस्कृत भाषा के पश्चात् जब लोक भाषाओं ने साहित्यिक स्थान ग्रहण करना आरंभ किया, तब वे संस्कृत से पूर्ण रूप से प्रभावित थीं। बहुत से संस्कृत शब्दों को उसी तत्सम रूप में नयी भाषाओं में प्रयोग किया जाने लगा, परन्तु निरन्तर परिवर्तित परिस्थितियों में उत्पन्न, बाद में आने वाली लोक भाषाओं में इन्हीं रूपों का अर्द्धतत्सम् रूपों में परिवर्तन कर लिया गया। इनका प्रभाव क्रियापदों पर पड़ना आवश्यक था। अतः इन बदलते हुए अर्द्ध तत्सम् रूपों के क्रिया पद भी नये-नये प्रयुक्त होने लगे, यथा–

(i) अरप ( सं. अर्प ) अरपणौ, अरपण करणौ
(ii) गरज ( सं. गर्ज ) गरजणौ, गरजण करणौ
(iii) रच ( सं. रच् ) रचणौ, रचना करणी

इनके साथ ही कुछ अन्य ऐसी धातुयें भी आधुनिक राजस्थानी में प्रयुक्त होती हैं जिनके तत्सम् रूप संस्कृत से आये प्रतीत नहीं होते। संभव है ये क्षेत्र विशेष की ही उपज हों एवं कालान्तर में साहित्य में इनका प्रयोग होने लग गया हो, यथा–

टोक(णौ), ठोक(णौ), डपट(णौ), लड़(णौ) इत्यादि।

2. साधित धातुएँ–

(i) आकारांत णिजन्त (प्रेरणार्थक)–ऊपर संस्कृत णिजन्त से आई हुई सिद्ध धातुओं के सिलसिले में हम यह उल्लेख कर चुके हैं कि संस्कृत की कुछ णिजन्त धातुओं में अंतर्निहित प्रेरणार्थक भाव लुप्त होकर केवल सकर्मक भाव रह गया है। राजस्थानी में इस भाव की पूर्ति वा प्रत्यय केप्रयोग से की जाती है, यथा–

 अकर्मक 
 सकर्मक 
 प्रेरणार्थक
 मरणौ
 मारणौ
 मरवाणौ
 चढ़णौ
 चाढ़णौ
 चढ़वाणौ

इस नये प्रेरणार्थक रूप में परिवर्तन के समय एकाक्षरीय (Monosyllabic) दीर्घ स्वरयुक्त धातुओं का दीर्घ स्वर पलट कर ह्रस्व हो जाता है, यथा–

1. घूमणौ–घुमवाणौ
2. चालणौ–चलवाणौ
3. पीणौ,पीवणौ–पिलवाणौ, पिवाड़णौ
4. सूणौ–सुलवाणौ,सुवाड़णौ

किन्तु ओ, औ दीर्घस्वर युक्त धातुओं में परिवर्तन नहीं होता, वे अपने मूल रूप में ही रहती हैं–

1. दौड़णौ,दौड़वाणौ
2. कोरणौ,कोरवाणौ, कोराड़णौ, कोरवावणौ

प्रायः में परिवर्तन हो जाता है, तथापि कहीं-कहीं वही रूप प्रचलित रहता है, यथा–

देखणौ– देखवाणौ, दिखवाणौ
चेडणौ, चेढणौ– चेढवाणौ, चिढवाणौ

(ii) नाम धातु– नाम धातु बनाने की प्रथा अत्यन्त प्राचीन है। संज्ञापद अथवा क्रियामूलक विशेषण को क्रियापद के लिए धातु रूप में प्रयुक्त करने पर नाम धातु कहते हैं। मुख्यतया ये चार रूपों में मिलते हैं। प्रथम वे जिन्हें उत्तराधिकार सूत्र में प्राप्त कर लिया गया है, यथा–

सं. पिष्ट, प्रा. पिट्टइ, रा. पीटणौ

इनके अतिरिक्त राजस्थानी में णौ प्रत्यय लगा कर बहुत सी नयी नाम धातुओं का निर्माण कर लिया है, यथा–

सं. दुःख, अप. दुक्ख, रा. दूखणौ
सं. मूत्र, प्रा. मुत्त, रा. मूतणौ

प्राचीन पश्चिमी राजस्थानी में अव प्रत्यय का प्रयोग होता था। तैस्सितोरी ने भी इसका उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा है कि ये नामधातु या तो सीधे संज्ञा या विशेषण के साथ क्रिया जोड़ने से बनते हैं अथवा प्रेरणार्थक प्रत्यय अव ( आव कभी नहीं) जोड़ने से। ये दोनों तरीके प्राकृत और अपभ्रंश में भी प्रचलित थे। डॉ. तैस्सितोरी ने इस सम्बन्ध में कुछ उदाहरण भी दिये हैं[1]

(i) संज्ञा या विशेषण से सीधे बनी नामबोधक क्रियाएँ–

आणंदिउ < आणंद < सं. आनन्द
जन्म्यउ < सं. जन्मन्
जीतइ, जीपइ < भूतकृदन्त जीत < अप. जित्त- < सं. जित।

(ii) संज्ञा या विशेषण में अव प्रत्यय जोड़ कर बनी हुई नामबोधक क्रियाएँ–

भोगवइ < सं. भोग
साचवइ < अप. सच्चवइ < सं. सत्यापयति
गोपावइ < सं. गोपयति

विदेशी संपर्क के साथ राजस्थानी में कई विदेशी शब्दों का प्रवेश हो गया है। विदेशियों के सम्पर्क से जब हम कोई नई विद्या, कला, खेल, फ़ैशन आदि सीखते हैं तब उस सम्बंध के विदेशी शब्द अनायास ही हमारी भाषा में प्रवेश पा जाते हैं। प्रायः कोई भी जीवित भाषा यथासंभव इन नये शब्दों को अपने ध्वनि-नियमों के साँचे में ढाल लेती है। राजस्थानी में भी अनेक विदेशी संज्ञा तथा विशेषण शब्दों के साथ जोड़ कर नाम धातुओं का निर्माण कर लिया गया है, यथा– (i) फा. शर्म रा. सरमा(णौ)

जहाँ राजस्थानी ने अनेक विदेशी शब्दों को अपने ध्वनि-नियम में ढाल लिया है वहाँ कई शब्दों एवं नामधातुओं को ज्यों का त्यों अपने भीतर उतार लिया है। ऐसा प्रायः संस्कृत भाषा के सम्बन्ध में ही हुआ है, क्योंकि राजस्थानी मूल रूप में संस्कृत से सम्बन्धित ही मानी गई है, यद्यपि मध्यकाल में वह कितनी ही सीढ़ियाँ पार कर चुकी है, यथा–

 संस्कृत
 राजस्थानी
 भज्
 भज(णौ)
 आकुल
 अकुळा(णौ)
 आलाप
 आलाप(णौ)

(iii) मिश्रित अथवा संयुक्त एवं प्रत्यययुक्त (तद्भव)–इनको हम दो रूपों में विभक्त कर सकते हैं– (i) मिश्रित एवं संयुक्त, तथा (ii) प्रत्यययुक्त।

पहली श्रेणी में वे संयुक्त विशेष धातुयें आती हैं जो धातुओं से पूर्व कृदन्त, क्रिया जातविशेष्य अथवा संज्ञा पद जोड़ कर बन जाते हैं, यथा– जावण देणौ, बांट लेणौ, चढ़ बैठणौ आदि। प्रस्तुत कोश में इन संयुक्त धातुओं के क्रियात्मक रूप ही दिए गए हैं, यथा– जावणौ, बांटणौ, चढ़णौ आदि। दूसरी श्रेणी में वे क्रियायें हैं जो राजस्थानी प्रत्यय के संयोग से बनी हैं। एक दो प्रत्ययों के उदाहरण से इन प्रत्यययुक्त क्रियाओं का रूप स्पष्ट हो जायगा, यथा–

(1) प्रत्यययुक्त–

छिटकणौ [ सं. सृज, रा. छिड़ + + णौ ]
चूकणौ [ सं. च्युत, रा. चू + + णौ ]
अटकणौ [ सं. अट्ट, रा. अट + + णौ ]

(2) प्रत्यययुक्त–

थापड़णौ [ सं. स्थाप + + णौ ]
वधाड़णौ — [ सं. वृधु, रा. + णौ ]
पछाड़णौ [ सं. पश्चात् +प्रा. पच्छा + ड़, रा. पछाड़ + णौ ]

(iv) ध्वन्यात्मक अथवा अनुकार ध्वनिज धातुएँ–इस प्रकार की ध्वन्यात्मक या अनुकरणात्मक धातुएँ प्रायः सभी आर्य भाषाओं में मिलती हैं। अनुकरणात्मक शब्दों पर अलग से प्रकरण लिखा जा सकता है। प्रायः हर ध्वनि अपना एक विशेष प्रकार का अनुकरणात्मक शब्द उत्पन्न करती है और राजस्थानी भाषा अपना प्रसिद्ध णौ लगा कर उन्हें क्रिया रूप दे देती है। प्राचीन भाषाओं (यथा संस्कृत आदि) में इनके अनुकरणात्मक रूप अत्यन्त अल्प मात्रा में मिलते हैं, अतः संस्कृत के वैय्याकरणों ने इस प्रकार की धातुओं को देशी के अंतर्गत ही मान लिया है, फिर भी झंकार, गुञ्जन आदि शब्द संस्कृत में मिलते हैं। राजस्थानी में इस प्रकार की ध्वन्यात्मक अथवा अनुकार ध्वनित धातुयें कई रूपों में पाई जाती हैं, यथा– धमकणौ, झणझणाणौ, थरथरणौ, खटखटाणौ आदि।

(v) संदिग्ध व्युपत्ति वाली धातुएँ–राजस्थानी में कुछ इस प्रकार की धातुएँ मिलती हैं जिनकी व्युत्पत्ति बड़ी ही संदिग्ध है। वे न तो मूल रूप में संस्कृत से सम्बन्धित जान पड़ती हैं और न वे साधित धातुयें ही मानी जा सकती हैं। उनके प्राचीन रूपों को भी तत्कालीन वैय्याकरणों द्वारा देशी नाम दिया गया है। आज के युग में जबकि भाषा- विज्ञान बहुत उन्नति कर चुका है, इस प्रकार की धातुओं का सम्बन्ध खोजना अत्यन्त आवश्यक है। श्री उदयनारायण तिवारी ने अपनी हिन्दी भाषा का उद्गम और विकास में इस सम्बन्ध में कूद(णौ) धातु का उदाहरण दिया है।[2] उन्होंने लिखा है कि यद्यपि संस्कृत कोशों में एक धातु कूद्र् भी है और उससे कूद(णौ) का सम्बन्ध स्पष्ट है परन्तु कूद्र् धातु संस्कृत में बहुत बाद में अपनाई गई जान पड़ती है और बहुत संभव है कि तत्कालीन कथ्य भाषा (प्राकृत) से संस्कृत ने इसको ग्रहण किया हो। तमिळ भाषा में कूद्र् की सरूप एवं समानार्थक धातु मिलती है। इससे क्या यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि यह धातु प्राचीन भारतीय आर्य-भाषा में तमिळ से ली गई? श्री तिवाड़ी का यह तर्क उचित भी हो सकता है एवं संस्कृत के कुछ विद्वान इससे मतभेद भी रख सकते हैं, तथापि मोटे रूप में इतना तो अवश्य मानना पड़ेगा कि कतिपय धातुओं के तत्सम रूपों के सम्बन्ध में संदेह अवश्य है एवं प्रामाणिक रूप से उन्हें किसी अन्य प्राचीन आर्य भाषा से सम्बनिधत नहीं किया जा सकता। इस दृष्टि से निम्नलिखित धातुओं की गणना इस सम्बन्ध में की जा सकती है–

टहुक(णौ), झौंक(णौ), चौंक(णौ) आदि।

धातुओं का यह प्रकरण पूर्ण होने से पहले कुछ क्रिया विशेष्यपदों (Verbal Nouns) की जानकारी कर लेनी भी आवश्यक है। प्राचीन आर्य भाषा संस्कृत में यह आवश्यक समझा जाता था कि शब्दों के रूप चलाते समय उनके मूल रूप धातुओं में विभक्ति प्रत्ययों का संयोग किया जाय। कालान्तर में ध्वन्यात्मक परिवर्तन होते रहने के कारण कर्ता के एकवचन में प्रायः शब्द के मूल रूप ही रह गये। प्रायः सभी दूसरी भाषाओं में यह परिवर्तन मिलता है। राजस्थानी में ऐसे रूपों का अभाव नहीं है। इस प्रकार के शब्द प्रायः कर्ता या कर्मकारक में अकेले या समानार्थक धातु पदों के संयोग से प्रयुक्त किये जाते हैं। इनका प्रयोग संयुक्त क्रियाओं की रचनाओं में होता है। ऐसे शब्दों के कुछ उदाहरण निम्नलिखित रूप से उल्लेखनीय हैं–

1. संपादक काट-छांट करनै कविता अखबार में छापी।
2. दो चार आदमियां रीधर-पकड़ होवतां सभा रा लोग भाग छूटा।
3. छोटा-छोटा छोरां नै पुलिस वाळां डांट-डपट करनै छोड़ देवै।

अकर्मक एवं सकर्मक रूप–

ऐसा माना गया है कि सिद्ध धातुओं के रूप प्रायः अकर्मक होते हैं। उनके द्वारा साधित धातुयें सकर्मक रूप धारण कर लेती हैं। किन्तु कई साधित धातुओं के भी अकर्मक रूप मिलते हैं, यथा–

बैठ(णौ) नाच(णौ) खेल(णौ) (कूदणौ) आदि।

अकर्मक क्रियाओं को सकर्मक रूप देने के लिये उनमें जोड़ दिया जाता है, यथा–

 अकर्मक रूप
 सकर्मक रूप
 कटणौ
 काटणौ
 मरणौ
 मारणौ

सकर्मक क्रिया में जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, कर्म निहित रहता है अतः अन्य भाषाओं के समान राजस्थानी में भी इनके बाद परसर्ग नै[3] नहीं आता, किन्तु यह केवल अप्राणीवाचक संज्ञा शब्दों के विषय में ही लागू होता है, यथा– गेंद फेंकौ, कपड़ा धोवौ, रोटी खावौ आदि, जहाँ प्राणीवाचक संज्ञा पदों का व्यवहार होता है वहाँ सामान्यतया नै परसर्ग का प्रयोग पाया जाता है, यथा–

उण घोड़ा नै देखौ।
रांम नै मारौ, आदि।

[1]पुरानी राजस्थानी–मू.ले.–एल.पी. तैस्सितोरी; अनु. नामवरसिंह, पारा 142.
[2]देखोपारा 374.
[3]इसने,नै परसर्ग की उत्पत्ति आदि के विषय में इसी प्रस्तावना के संज्ञा प्रकरण में कारकों की विवेचना करते समय प्रकाश डाला जा चुका है। देखिये पृष्ठ 36, 37.

किन्तु जैसा कि पहले लिखा जा चुका है, जोश, क्रोध, गर्वोक्ति, उद्देश्य-विधेय, निश्चयात्मक भावों में नै लगाना आवश्यक है, चाहे सम्बन्धित शब्द प्राणीवाचक हो अथवा अप्राणीवाचक।

इस परसर्ग नै का प्रयोग वास्तव में बड़ा महत्त्वपूर्ण है। कर्म की इस विभक्ति का लोप होने से उसका निश्चय करना कठिन हो जाता है तथा भूतकालिक कृदंतीय रूप भी उसे प्रकट करने में असमर्थ रहता है।

राजस्थानी में अकर्मक से सकर्मक रूप बनाने में विभिन्न प्रत्ययों का प्रयोग होता है, यथा–

1. आव प्रत्यय से–
 अकर्मक 
 सकर्मक
 मिळणौ
 मिळावणौ
 जागणौ
 जगावणौ
2. आड़ प्रत्यय से–
अकर्मक 
सकर्मक
नाचणौ
नचाड़णौ
जीवणौ
जीवाड़णौ
खेलणौ
खेलाड़णौ
3. धातु केउपांत्य स्वर में परिवर्तन–
अकर्मक 
सकर्मक
चढ़णौ
चाढ़णौ
उतरणौ
उतारणौ
बळणौ
बाळणौ
4. धातु बदल कर–
अकर्मक 
सकर्मक
टूटणौ
तोड़णौ
जाणौ
भेजणौ
5. बिना परिवर्तन के–
अकर्मक 
सकर्मक
खड़णौ =मरना
खड़णौ =हाँकना
गमणौ =खोना, गायब होना (नाश होना)
गमणौ =नाश करना, व्यतीत करना
6. अपवादस्वरूप कुछ अन्य रूप–
अकर्मक 
सकर्मक
दहणौ
दाहवणौ
जागणौ
जागवणौ

साधारणतः सभी धातुओं के रूप समान रूप से समान आधार पर निष्पन्न होते हैं, किन्तु कुछ धातुएँ ऐसी हैं जिनके भूतकालिक कृदन्त तथा उससे बनने वाले कालों के रूप कुछ भिन्न होते हैं। यद्यपि भिन्नता कोई विशेष नहीं है, केवल धातु का रूप कुछ परिवर्तित अवस्था में होता है। मुख्य-मुख्य धातुयें ये हैं–

हो(णौ) हुणौ हुवौ, हुइ, होई, हौ
कर(णौ) कियौ, की, कीदौ, कीधौ, कीन्हौ, कीनौ
दे(णौ) दियौ, दीदौ, दीधौ, दीन्हौ, दीनौ
ले(णौ) लियौ, लीदौ, लीधौ, लीन्हौ, लीनौ
पी(णौ) पीयौ, पीदौ, पीधौ, पीनौ

लिंग, वचन, पुरुष, प्रकार, वाच्य कालादि का प्रभाव धातुओं पर पड़ता है। प्राचीन आर्य भाषा संस्कृत में भी कृदन्त रूपों में लिंग भेद मिलता है, यथा–

स गतः = वह गया
सा गताः = वह गयी

राजस्थानी में भी यही प्रणाली पाई जाती है जो संभवतया संस्कृत के प्रभाव के कारण है। अतः यहाँ भी धातु रूपों में लिंग भेद होता है, यथा–

वो गयौ = वह गया
वा गई = वह गयी

परम्परा रूप में संस्कृत से प्राप्त आज्ञात्मक रूप भी (Imperative) राजस्थानी में मिलते हैं। प्राचीन ग्रन्थों में इनका उल्लेख विभिन्न प्रकार से हुआ है। राजस्थानी में इनके ये रूप इस प्रकार हैं–

उत्तम पुरुष
आधुनिक राजस्थानी
प्राचीन राजस्थानी
एक वचन–
चालूं, करूं
बोलज्युं, चलउ
बहु वचन–
चालां, करां
बोलज्यां, चलउं

प्रायः इस प्रयोग में रूप उकारान्त होते हैं। प्राचीन राजस्थानी पर अपभ्रंश के प्रभाव के कारण कई रूपों में अपभ्रंश एवं पुरानी राजस्थानी में अत्यधिक भेद नहीं हैं।

मध्यम पुरुष[1]
आधुनिक राजस्थानी
प्राचीन राजस्थानी
एक वचन–
चल, कर, मर, चाल
आणज्यौ, करौ, चालि, चालौ
बहु वचन–
चालौ, करौ, मरौ, चलौ
आणज्यां, करां
अन्य पुरुष
आधुनिक राजस्थानी
प्राचीन राजस्थानी
एक वचन–
चालियौ, करै, लिखावै,
करावै, पेखीजै
पुरज्यौ यछै, आवइ, हुवइ, भंमइ, सुणै,
मांडइ, रहियौ, बोलिजइ
बहु वचन–
चालिया

राजस्थानी में क्रिया प्रयोगों की कुछ विशेषताएँ–

आदरसूचक[2] प्रयोग राजस्थानी में प्रायः बहुवचन में ही किये जाते हैं, यथा– आप अरोगिया, वे सिधाया । अन्य भाषाओं की अपेक्षा राजस्थानी में आदरसूचक एवं मांगलिक प्रयोग के सम्बन्ध में कुछ विशेषताएँ हैं। आधुनिक हिन्दी में प्राकृत एवं अपभ्रंश के प्रयोग किज्जइ, दिज्जइ आदि रूपों का परिवर्तित रूप कीजिए, दीजिए आदि है। प्राचीन राजस्थानी में भी अपभ्रंश के प्रभावस्वरूप किज्जइ, दिज्जइ आदि रूपों का प्रयोग हुआ है। आधुनिक राजस्थानी में प्रायः मुख्य-मुख्य क्रियाओं के आदरसूचक रूप कुछ विशेष प्रकार के निर्मित हो गये हैं।

निम्नलिखित उदाहरणों से यह बात स्पष्ट हो जायगी[3]

तू खाव = तुम खाओ
थे जीमौ = तुम खाओ
आप अरोगौ = आप खाइये।

उपरोक्त तीन पदों का आधार समान धातु नहीं है। खाणो संस्कृत के खादन से बना है, जीमणौ संस्कृत जेमन से तथा अरोगणौ क्षेत्रीय मेवाड़ी उपज है। अरोगणौ क्षेत्रीय उपज होने पर भी कालांतर में समस्त राजस्थान में व्यवहृत होेने लगा। तीनों का समान अर्थ है तथापि आदरसूचक शब्दों के प्रयोग की दृष्टि से इन तीनों के प्रयोगों में अंतर है। खाणौ साधारण अर्थ में; जीमणौ अपेक्षाकृत शिष्ट अर्थ में एवं अरोगणौ आदरसूचक अर्थ में प्रयुक्त होता है। इसी प्रकार का एक और प्रयोग दृष्टव्य है–

वो जावै = वह जाता है।
वे पधारै = वे जाते हैं या वे आते हैं।
आप सिधावै = आप जाते हैं।

जाणौ– [ सं. यान ] , पधारणौ [ सं. पद्धारण ] , सिधाणौ [ सं. साधय ]

पधारणौ शब्द की उत्पत्ति पद्धारण शब्द से मानी गई है। यह द्विअर्थक शब्द है। दोनों ही अर्थ परस्पर विरोधी हैं।

राजस्थानी में पधारणौ शुभागमन एवं आदरसहित विदा दोनों अर्थों में प्रयुक्त होता है।

अमांगलिक भाव के कारण प्रायः कई बार विरोधी अर्थ में क्रियाओं का प्रयोग होता है। इसके मूल में प्रायः यह भाव निहित है कि अशुभ सोचने, अशुभ कहने या अशुभ देखने से संभवतया अशुभ घटित हो जाता है। अतः वे क्रियायें जिनमें किसी प्रकार का अशुभ भाव अंतर्निहित होता है, नहीं बोली जाती है। एक उदाहरण से यह बात स्पष्ट हो जायगी–पड़ौस में आटा मांगने एक स्त्री पड़ौसिन के यहाँ गई। पड़ौसिन के यहाँ भी आटा न था, अतः उसने कहा– म्हारै तौ आटौ वधै । राजस्थानी में वधै शब्द अधिक है के अर्थ में प्रयुक्त होता है। पड़ौसिन ने यह नहीं कहा–कि हमारे यहाँ आटा नहीं है। ” नहीं है” अर्थ अशुभ है। भगवान सब कुछ देता है। भरा-पूरा घर है, अतः “नहीं है” न कह कर, “अधिक है” के अर्थ वाले शब्द का पड़ौसिन प्रयोग करती है। उसी प्रकार आडौ ढकणौ के स्थान पर आडौ मंगळ करणौ कहा जाता है। इस प्रकार के कई उदाहरण दिए जाते हैं। कोश में इस प्रकार के शब्दों का वास्तविक अर्थ ही दिया गया है। वधै या वधणौ का अर्थ कोश में ” बढ़ना” या ” अधिक होना” ही होगा। “कम होना” अर्थ वहाँ नहीं मिलेगा। वास्तव में ” कम है” के अशुभ अर्थ से बचने के लिए ही तो उसके विरोधी अर्थ का प्रयोग किया जाता है।[4]

कर्तृवाचक संज्ञा–

(i) कर्तृवाचक संज्ञा एवं विशेषता–राजस्थानी में समस्त क्रियाओं से कर्तृवाचक संज्ञा[5] बनती है। क्रिया के धातु में अणहार के संयोग से यह रूप बनता है, यथा–

 क्रिया 
 कर्तृवाचक संज्ञा 
 करणौ = करना
 करणहार = करने वाला व्यक्ति
 मरणौ = मरना
 मरणहार = मरने वाला व्यक्ति
 पाळणौ = पालन करना
 पाळणहार = पालन करने वाला

इस प्रकार के प्रयोग ब्रज, अवधी आदि भाषाओं में भी प्रचलित हैं। तुलसी ने अपने मानस में इनका प्रयोग किया है।[6] इनका स्त्री लिंग रूप हारी होता है। रूप भेद से इसका हारि एवं हारी दोनों रूपों में प्रयोग होता हैं। अपभ्रंश में भी इस प्रकार के प्रयोगों का प्रचलन था, यथा– पाळकहार का लोप होने से यही राजस्थानी में पाळणहार हो गया।

तैस्सितोरी ने पुरानी राजस्थानी के सम्बन्ध में श्रुति का भी इस सम्बन्ध में उल्लेख किया है।[7] उन्होंने अणावाळौ और अवावाळौ का उदाहरण दिया है। प्रथम की उत्पत्ति अणउँ एवं द्वितीय की अवउँ क्रियार्थक संज्ञा से मानी है।

विशेषण के रूप में इयौ प्रत्यय से प्रायः सभी क्रियाओं के रूप बनते हैं–

क्रिया 
कर्तृवाचक विशेषण
करणौ =करना
करणियौ =करने वाला
मरणौ =मरना
मरणियौ =मरने वाला
पाळणौ =पालन करना
पाळणियौ =पालने वाला

इस प्रकार के प्रयोग केवल राजस्थानी में ही पाये जाते हैं। अन्य भाषाओं में ऐसे उदाहरण नहीं मिलते। प्रस्तुत कोश में समस्त क्रियाओं के इस प्रकार के रूप नहीं दिये गये हैं। सबके रूप देकर व्यर्थ में कोश के पृष्ठ बढ़ाने का कोई अर्थ न था, अतः मुख्य-मुख्य प्रचलित क्रियाओं के ये रूप सम्बन्धित क्रिया के साथ ही दे दिये गये हैं। जिन क्रियाओं के साथ ये रूप नहीं दिये गये हैं, पाठक स्वयं ऐसे रूपों का निर्माण कर सकते हैं।

[1]राजस्थानी के मध्यम पुरुष के कई रूप संस्कृत के मध्यम पुरुषों के धातुओं के समान हीहोते हैं, यथा– पढ़, जा, लिख आदि।
[2]प्रायः पश्चिमी राजस्थानी में आदरसूचकसंज्ञा शब्दों के अगाड़ी जी नहीं लगाया जाता है वहां पर संबंधित क्रिया प्रयोग बहुवचन का रूप देकर आदरसूचक भाव व्यक्त किया जाता है–ज्यूं राव चूंडौ बूढ़ा हुआ। राव जोधौ बायाजी री जात पधारिया। देखो परम्परा–ऐतिहासिक बातां, पृ. 18, 35.
[3]निम्न रूपों के अतिरिक्त सम्माननीय पुरुषों के लिए क्रिया के प्रेरणार्थक रूपोंका प्रयोग किया जाता है, यथा–आप अरोगावै, आप पोढ़ावै।
[4]अप्रिय कोप्रिय रूप देने की प्रवृत्ति का ही यह रूप है जिसे Euphemism कहते हैं।
[5]व्याकरण में इन्हें कर्तृवाचक संज्ञा ही कहा गया है तथापि इनका प्रयोग विशेषण रूप में ही होता है अतः प्रस्तुत कोश में इनको विशेषण ही माना गया है।
[6]उ.– नाथ संभु धनु भंजनिहारा, होइहि केउ एक दास तुम्हारा।–बालकांड, 270/1–रामचरितमानस
[7]पुरानी राजस्थानी, पारा 135.

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