राजस्थांनी सबदकोस


राजस्थानी साहित्य का परिचय

| कड़ी – 8 | आदिकाल (वि.सं.800-1460)
| धारावाहिक श्रंखला – प्रत्येक मंगल, शुक्र एवं रविवार को प्रेषित


चौदहवीं शताब्दी के पश्चात् पन्द्रहवीं शताब्दी के मध्य तक की उल्लेखनीय रचनायें निम्नलिखित हैं। ग्रन्थों की नामावली के पश्चात् भाषा के उदाहरणस्वरूप कुछ पद उद्धृत किए जा रहे हैं।-

  • राजेश्वर सूरि कृत प्रबन्ध कोश, नेमिनाथ फागु, वि.सं. 1405.
  • कवि हलराज कृत स्थूलिभद्र फाग, वि.सं. 1409.
  • मुनि शालिभद्र सूरि कृत पांच पांडव रास, वि.सं. 1410.
  • मुनि विनयप्रभसूरि कृत गौतमस्वामी रास, वि.सं. 1412.
  • जैन मुनि ज्ञानकलश रचित जिनोदय सूरि पट्टाभिषेक रास, वि.सं. 1415.
  • श्रावक विद्धणु रचित ज्ञानपंचमी चौपई, वि.सं. 1423.
  • मेरुनंदण गणि कृत जिनोदयसूरि गच्छनायक विवाहलु, वि.सं. 1432.
  • देवप्रभ गणि कृत कुमारपाल रास। कवि चंपा कृत देवसुन्दर रास, वि.सं. 1445.
  • साधु हंस कृत शालिभद्र रास, वि.सं. 1455.

1.
वंकुडियालीय भुंहडियहं, भरि भुवणु भमाडइ।
लाडी लोयण लह कुडलइ सुर सग्गह पाडइ।।

किरि सिसि बिंब कपोल, कन्नहिंडोल फुरंता।
नासा वंसा गरुड चंचु दाड़िम फल दंता।।

अहर पवाल तिरेह कंठुराजलसर रूडउ।
जाणु वीणु रणरणइं, जाणु कोइल टहकडलउ।।

~~नेमिनाथ फागु

2.
जिम सहकारिहिं कोयल टहकउ,
जिम कुसुमह वनि परिमल बहकउ,

जिन चंदनि सोगंध विधि,
जिम गंगाजलु लहरिहिं लहकइ,

जिम कणयाचलु तेजिहिं झलकइ,
तिम गोयम सोभाग निधि।।

~~गौतम स्वामी रास

3.
इक्कु जगि जुग पवरु अवरु निय दिक्ख गुरु
थुणिसुं हउं तेण निय मइ बलेण।

सुरभि किरि कंचणं दुद्धु सक्कर घणं
संखु किरि भरीउ गंगा जलेण।।

अत्थि गूजरधरा” सुंदरी सुंदरे,
उरवरे रयण हारोवमाणं।

लच्छि केलिहरं नयरु “पल्हणपुरं”,
सुरपुरं जेम सिद्धामिहांण।।

~~जिनोदय सूरी गच्छनायक वीवाहलु

आदि काल की इस अंतिम अवधि में जैन ग्रंथों के साथ-साथ कुछ उल्लेखनीय जैनेतर रचनाओं का भी निर्माण हुआ है। प्रामाणिक रचनाओं के रूप में प्राप्त होने के कारण आदिकाल के साहित्य में इन जैनेतर रचनाओं का अपना विशेष महत्त्व है। इन रचनाओं में सर्वप्रथम “बारूजी सौदा” के फुटकर गीतों का उल्लेख मिलता है। ये उदयपुर के महाराणा हम्मीर के समकालीन थे। इस दृष्टि से इनका रचनाकाल संवत् 1408 से 1421 के बीच माना जा सकता है। वैसे इनका लिखा हुआ कोई ग्रंथ स्वतंत्र रूप में तो नहीं मिलता लेकिन कुछ फुटकर गीत यत्र-तत्र मिल जाते हैं जो उस काल की साहित्यिक विधाओं को समझने में सहायक होते हैं। उदाहरणस्वरूप उनका लिखा एक गीत यहां उद्धृत किया जाता है–

ऐळा चितौड़ा सहै घर आसी, हूँ थारा दोखियां हरूं।
जणणी इसौ कहूँ नह जायौ, कहवै देवी धीज करूं।।1

रावळ बापा जसौ रायगुर, रीझ खीझ सुरपंत री रूंस।
दस सहंसां जेहो नह दूजौ, सकती करैं गळा रा सूंस।।2

मन साचै भाखै महमाया, रसणा सहती बात रसाळ।
सरज्यौ लै अड़सी सुत सरखो, पकड़े लाऊं नाग पयाळ।।3

आलम कलम नवै खंड एळा, कैलपुरारि मींढ किसौ।
देवी कहै सुण्यौ नह दूजौ, अवर ठिकांणै भूप इसौ।।4

प्राचीन राजस्थानी साहित्य, भाग 6[1] में असाइत नामक एक कवि का और उल्लेख किया गया है। इन्होंने वि. संवत् 1427 में “हंसाउली” काव्य की रचना की। “हंसाउली” मुख्यतः एक प्रेम-काव्य है जो चार खण्डों में विभक्त है तथा 440 कड़ियों में लिखा हुआ है। सम्पूर्ण काव्य चौपाइयों में रचा गया है किन्तु बीच-बीच में दोहों का भी प्रयोग किया गया है। इस ग्रन्थ के निर्माण के पूर्व ही एक जैन कवि विनयभद्र “हंसवच्छ” काव्य चौपाइयों में लिख चुका था। उसमें भी इसी प्रेम-कथा का वर्णन है। कवि असाइत ने उसी प्रेम-गाथा को अपने “हंसाउली” में नवीन रूप में प्रस्तुत किया। इनकी कविता पर जैन कवियों की शैली व परम्परा की पूर्ण छाप दृष्टिगोचर होती है। “हंसाउली” की भाषा निम्न उद्धरण से देखी जा सकती है–

विवध फूल फल निव नैवेद्य, वीणा वस गाइ गुण भेद।
सोइ जि परवरी पंचसि नारि, दीठी कुंयरि मंत्रि मढि बारि।।
यथु देवी तब बुद्धि निधांन, हाकि मुनि केसर प्रधांन।
नरहत्या ति किधी धणी मुझ मढ़ि मर हेसि पापिणी।।
हंसाउली सबद जव सुणी, जांण्यु देवि कुपी मुझ भणी।
कर जोडीनि ऊभी रहि गत, पूरब भव वीतक कहि।।

श्रीधर व्यास द्वारा रचित “रणमल छन्द” नामक रचना भी इस काल की एक प्रामाणिक रचना मानी जा चुकी है। उक्त कवि के सम्बन्ध में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है, फिर भी इनकी रचना ऐतिहासिक दृष्टि से पूर्ण प्रामाणिक है। “रणमल छंद” सत्तर छंद का एक वीर काव्य है जिसमें पाटण के तत्कालीन सूबेदार मुजफ्फरशाह और ईडर के वीर राठौड़ नरेश रणमल्ल के युद्ध का सजीव चित्रण है। इस युद्ध का समय अनेक विद्वानों ने ई. सन् 1397 माना है। इसके सम्बन्ध में इतिहासज्ञों का भिन्न-भिन्न मत है, फिर भी गुजरात के प्रसिद्ध विद्वान के. ह. ध्रुव ने सन् 1397 को ही स्वीकार किया है।[2] इस दृष्टि से इस ग्रन्थ का रचनाकाल वि.सं. 1454 के आसपास ही ठहरता है। इसकी भाषा के उदाहरण हेतु एक पद नीचे प्रस्तुत किया जाता है–

गोरी दल गाहवि दिट्ठ दहुद्दिसि गढ़ि मढ़ि गिरिगह्वरि गडियं।
हणहणि हवकन्तउ हुं हुं हय हय हुंकारवि हयमरि चडियं।।
धडहडतउ धडि कमधज्ज धरातळि धसि धगडायण धूंसधरइ।
ईडरवइ पंडर वेस सरिसु रणि रांमायण रणमल्ल करइ।।

इसी समय कवि जाखौ मणिहार भी हो चुके हैं जिन्होंने लगभग 1453 में बोलचाल की राजस्थानी में “हरिचंद पुराण” नामक धार्मिक ग्रन्थ की रचना की। उपर्युक्त सम्पूर्ण विवेचन के आधार पर यह स्पष्ट है कि आदिकालीन राजस्थानी साहित्य हमारे समक्ष मुख्यतः दो रूप में आता है–जैनेतर साहित्य एवं जैन साहित्य। इस काल की प्राप्त सभी रचनाओं में जैनेतर साहित्य की अपेक्षा जैन साहित्य अधिक मात्रा में उपलब्ध है और वह पूर्ण प्रामाणिक भी है। इस प्रारंभिक साहित्य के कई ग्रन्थों की प्रामाणिकता को लेकर भिन्न-भिन्न साहित्य-विशेषज्ञों तथा इतिहासकारों ने यद्यपि अपनी मतभिन्नता प्रकट की है, फिर भी इन रचनाओं को उन्होंने प्रामाणिक रूप से आदिकालीन रचनायें ही स्वीकार किया है। दोनों ही प्रकार की रचनाओं के उल्लेख के समान यथास्थान पर दिये गए पदों के उदाहरण तत्कालीन राजस्थानी भाषा पर प्रकाश ही नहीं डालते परन्तु भाषा के निजी अस्तित्व का प्रमाण भी प्रस्तुत करते हैं। निष्पक्ष दृष्टिकोण से यह तो मानना ही होगा कि इस काल की रचनाएं हमारी अमूल्य निधि रही हैं। हिन्दी व राजस्थानी इसी विधि के द्वारा ही अपनी मां अपभ्रंश से सम्बन्ध स्थापित करती हैं। इन रचनाओं में वास्तव में हम प्राचीनता के दर्शन करते हैं, चाहे वे पूर्ण न होकर आंशिक ही हों। ये रचनाएं उस मिली-जुली अवस्था की प्रतिनिधि हैं जब राजस्थानी अपभ्रंश से पृथक् स्वतंत्र सत्ता ग्रहण करने का प्रयत्न कर रही थी। इस दृष्टि से इन रचनाओं का महत्त्व और भी अधिक बढ़ जाता है।

आदिकालीन राजस्थानी साहित्य के वर्णन के समय अनेक विद्वानों का प्रायः यही मत उल्लिखित मिलता है कि यह साहित्य वीररस-प्रधान है। हिन्दी साहित्य के इतिहास के लेखकों ने तो राजस्थानी की इन्हीं प्रारम्भिक रचनाओं के नाम उल्लेख कर उसे वीरगाथा-काल नाम भी दे दिया है, जब कि राजस्थानी साहित्य में पन्द्रहवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक वीररस का कोई ग्रंथ उपलब्ध भी नहीं होता। परन्तु वास्तव में ऐसी बात नहीं है। विद्वानों का यह मत पूर्ण भ्रमात्मक ही प्रतीत होता है। इस काल की उल्लेखित रचनाओं में एक भी स्वतंत्र रचना ऐसी नहीं है जिसे हम वीररस-प्रधान कह सकते हैं। प्राप्त रचनायें मुख्यतः प्रेम-काव्य होने के कारण श्रृंगारिक हैं। अन्य या तो धार्मिक ग्रन्थ होने के कारण उपदेशात्मक हैं या फिर वस्तु-वर्णन-प्रधान। यह सत्य तो अवश्य है कि इस काल में राजनैतिक स्थिति संघर्षपूर्ण थी। राजपूत शासक युद्ध के लिए सदैव ही तत्पर रहते थे। अनेक राजपूत वीरों ने युद्ध के मैदान में अपने अद्भुत शौर्य का परिचय भी दिया परन्तु उनकी वीर-प्रशंसा तथा युद्ध-वर्णन का तत्कालीन कोई ग्रन्थ नहीं मिलता। अतः इस सम्बन्ध में तत्कालीन लिपिनिष्ठ रचनाओं के अभाव में इस समय के साहित्य को वीररस-प्रधान बताना असंगत ही है। हो सकता है, उस समय वीर-चरित-नायकों की वीर-प्रशंसा में श्रुतिनिष्ठ साहित्य प्रचलित हो।

डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अपने “हिन्दी साहित्य का आदिकाल” में आचार्य शुक्ल के हिन्दी के आदिकाल को वीरगाथा काल बताने के मत का खण्डन करते हुए बताया कि शुक्लजी द्वारा जिन 12 ग्रंथों के आधार पर इस काल को वीर गाथा काल नाम दिया गया है उनमें से कई रचनायें तो बाद की निकलती हैं और कुछेक के सम्बन्ध में यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि उनका मूल रूप क्या था।[3] खुमाण रासौ बहुत पीछे की रचना निकलती है तो पृथ्वीराज रासौ के मूल रूप का पता नहीं चलता, बीसलदे रासौ कोई वीर रस-प्रधान रचना नहीं है। अतः उन्होंने भी मिश्रबंधुओं द्वारा दिये गये नाम–आदिकाल के ही पक्ष में अपना मत दिया है।

[1] उदयपुर साहित्य संस्थान।
[2] प्राचीन गुर्जर काव्य--के. ह. ध्रुव, प्रस्तावना, पृष्ठ 3.
[3] हिन्दी साहित्य का आदिकाल--डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी, प्रथम व्याख्यान, पृ. 11

साहित्य-विशेषज्ञ एवं विद्वद्जन आदिकालीन रचनाओं के सम्बन्ध में निरन्तर रूप से अनुसन्धान एवं साहित्य शोध-कार्य करते आ रहे हैं। इसी के परिणामस्वरूप राजस्थानी के प्राचीनतम साहित्य का दिग्दर्शन सम्भव हो सका है। प्राचीन राजस्थानी की अनेक रचनायें आज भी अज्ञानता के अंधकार में लुप्त हैं। जन- साधारण की अशिक्षा के कारण और प्राचीन साहित्य के महत्त्व की अनभिज्ञता के कारण कई प्राचीन मौलिक ग्रन्थ व ग्रन्थों की प्रतियां सुदूर गांवों में विनाश को प्राप्त हो रही हैं। इसके अतिरिक्त प्राप्त रचनाओं में से भी कुछेक काल-प्रमाण के अभाव में विवादग्रस्त पड़ी हुई हैं। ऐसी स्थिति में अप्राप्त रचनाओं की खोज एवं प्राप्त साहित्य के सम्बन्ध में शोधकार्य अत्यन्त आवश्यक रूप से अपेक्षित है। इस प्रकार का कार्य न केवल साहित्य की अभिवृद्धि ही करेगा अपितु उसकी प्रामाणिकता को और अधिक पुष्टि प्रदान करता हुआ हमारी अपनी प्राचीन संस्कृति की सुरक्षा करने में भी सहयोगी सिद्ध होगा।
~~क्रमशः


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6 comments

  • हिंगलाज दान लालस, भाटेलाई

    बहुत आदर जोग कार्य।मायङ भाषा री सेवा मे महताऊ डिजिटाइजेशन करण वाली आपरी पूरी टीम ने घणा रंग।

  • SHAMBHU DAN

    साहित तणी संभाल़ कर,
    सकव बढावै शान।
    महि पर करै मनोजसी,
    मीसण काम महान।।
    मायड़ भाषा रै मुदे,
    भुज अपणै लै भार।
    सबदकोश री सार लै,
    प्रगट करै प्रचार।।
    ✍️शंभूदान बारहठ कजोई
    मनोज सा आपनै घणा रंग अर लखदाद हुकम।आप समाज अर साहित्य रै वास्तै महनीय कारज कर रैया हो हुकम।

  • राजेन्द्र सिंह चारण

    मनोज मिश्रण साहब आप ओर आपकी टीम ने जो काम किया है, वो राजस्थानी साहित्य के। इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा ।
    सीताराम जी लालस के इस भगीरथ प्रयास को दुनिया के सामने लाना ही , उनको सच्ची श्रंद्धाजलि है।

    • आभार हुकम। आप सभी के साथ और माँ भगवती के आशीर्वाद से ही सब संभव हो रहा है हुकम।

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