राजस्थांनी सबदकोस


राजस्थानी साहित्य का परिचय

| कड़ी – 29 | मध्यकाल (वि.सं.1460-1900)
| धारावाहिक श्रंखला – प्रत्येक मंगल, शुक्र एवं रविवार को प्रेषित


कीर्तिसुन्दर– जैन विद्वानों ने स्व-रचनाओं के अतिरिक्त अनेक संग्रहों का भी निर्माण कर साहित्य की सतत् सेवा की है। इन संग्रहों में “कथा संग्रह” आदि ग्रंथ मिलते हैं। ऐसे ही एक कथा संग्रह “वाग्विलास” का निर्माण करने वाले जैन मुनि कीर्तिसुन्दर थे। कीर्तिसुन्दर राजस्थान के प्रसिद्ध कविवर महोपाध्याय के शिष्य थे। “वाग्विलास” में कथा सम्बन्धी कुछ संस्कृत श्लोकों के साथ राजस्थानी गद्य-पद्य में अनेक सुन्दर कथा प्रसंग दिये हुये हैं। इसके अतिरिक्त कवि के निम्न ग्रंथ भी प्राप्त हैं–

1. माकड़रास, 2. अभय कुमारादि, 3. ज्ञान छत्तीसी, 4. कौतुक पच्चीसी, 5. साधुरास, 6. चौबोली चौपाई, 7. अवंति सुकुमार चौढ़ाळिया आदि। “वाग्विलास” ग्रंथ के अन्त में उसका निर्माणकाल आदि नहीं दिया हुआ है। परन्तु अन्य ग्रंथों को देखने से उसका रचनाकाल संवत् 1750 से 1765 के मध्य ठहरता है। विनोदपूर्ण रचना “मांकड़रासौ” का उदाहरण देखिये–

बोलंता मांहौ मैं बजरैं,
निन्नांमौ हिव आयौ नजरै।

सौड़ मांहै आवैं सळवळतौ,
वळै पलक में पूठा वळतौ।।

नेठ पकड़तां हाथै नावै,
जोतां हीज कठै ही जावै।

फेरंता कर केइक फिसिया,
घर में केइक कुसळे घुसिया।।

बाहर घालि वळै केइ वळिया,
“मांकण” हिवै घण हिज मिळिया।

पीवैं लोही केइक पूठै,
ऊंघांणौ सो भड़की ऊठैं।।

द्वारकादास– ये दधवाड़िया गोत्र के चारण और भक्ति रस के प्रसिद्ध ग्रंथ “रांमरासौ” के रचयिता प्रसिद्ध कवि माधौदास दधवाड़िया के पुत्र थे। ये अपने समय के जोधपुर नरेश अजीतसिंहजी के कृपापात्र थे और उनकी फौज में मुसाहिब के पद पर आसीन थे। इस समय उनकी प्रतिष्ठा बहुत थी। पिता की भांति इनमें भी काव्य-शक्ति प्रस्फुटित हुई और आगे चल कर डिंगल में सुन्दर रचनायें कर राजस्थानी के श्रेष्ठ कवियों में स्थान प्राप्त किया। इन्होंने महाराजा अजीतसिंहजी के जीवनकाल में ही संवत् 1772 में “महाराजा अजीतसिंह री दवावैत” नामक ग्रन्थ की रचना की जिसमें महाराजा के शौर्य, पराक्रम और वैभव का विशिष्ट वर्णन है। इसकी समाप्ति पर रचनाकाल के सम्बन्ध में स्वयं कवि ने लिखा है–

दवावैत द्वादस हुआ, तीन कवित दोय गाह।
सतरे संवत् बहोतरे, कवि द्वारे कहियाह।।

इसी ग्रंथ पर प्रसन्न होकर अजीतसिंहजी ने इन्हें जयतारण परगने का बासनी गांव प्रदान किया। इनकी भाषा सरल एवं आकर्षक है। सर्वत्र प्रसाद गुण ही छाया हुआ है। भाषा का उदाहरण यहाँ देखिये–

इनके खेहां के डंबर, उनके बद्दल के आडंबर।
इनके नोबत के टंकारे, उनके गाज घनघोरे।
इनके भालों का भाव, उनके बीज के सळाव।
इनके पंचरंगे वांने, उनके इंद्रधनक तांने।
इनके हस्तियां के हलके, उनके एरावत तुलके।
इनके खेत स्वेत दंत, उनके जेही बुक पंत।

उपरोक्त ग्रन्थ के अतिरिक्त कवि के अनेक फुटकर गीत भी पाये जाते हैं। गीतों की रचना साधारण है। भाषा बोलचाल की सरल भाषा है। महाराजा अभयसिंह के सम्बन्ध में कहा हुआ एक गीत देखिये–

सोहे सांमळी घड़ सुघड़ सहेली,
वांछंती वर समर वहेली।

चौरंग सील्है फाड़ कुच चौळी,
वाजंद्रे “अभमाल” विरोळी।।1

सार सिंगार छतीसूं सज्जै,
औप टौप पगूं घट आंब्रजै।

विचित्र घड़ा इण वैर विलूंधै,
रिण कण-कण कीधी रस रूळूधै।।2

नेवर पाखर रोळ नचंती,
संग “सिर विलंद” तणै सोभंती।

रोळी “अजण” तणै रंग रमणी,
गहु खोसाड़ गई गय गमणी।।3

ओप टोप गूंघट तोड़ावै,
माड हाड भागा मचकावै।
“गजन” हरा आगै रण गहली,
चतुरंगण हा हा कर चल्ली।।4

लड़खड़ती पड़ती लालरती,
मेल मांण सिर “संबर” मरती।

गी “अभमल” अगै पड़ गळियां,
मरमट मूंक मरद्दां मिळियां।।5

जैत जुअर बडौ जुध जीपै,
दळ गुजरात अमल धर दीपै।

गूड मलार राग सुर गवणी,
पेस करी “द्वारै” पालवणी।।6

हमीरदान रतनू– मध्यकालीन राजस्थानी साहित्य में अपनी विशिष्ट एवं महत्त्वपूर्ण रचनाओं के कारण हमीरदान रतनू का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। ये रतनू शाखा के चारण थे और जोधपुर राज्यान्तर्गत घड़ोई ग्राम के निवासी थे। बचपन से ही ये कच्छभुज में रहते थे। ये कच्छभुज के महाराव श्री देशलजी प्रथम (सं. 1774 से सं. 1808) के महाराज कुमार लखपतजी के कृपापात्र थे। अपनी रचना में कवि ने अपना स्वयं का परिचय देते हुए अपने आश्रयदाता के सम्बन्ध में भी लिखा है–

मुरधर देस सिवाना नगर मध्य
उतन घड़ोई प्रसिद्ध अमीर।

चारण “रतनू” कवियण चावौ,
हरि रौ चाकर नांम “हमीर”।।

जाड़ेचा सूरज राव जळवट,
भुज भूपत लखपत कुळ भांण।

त्रिय ग्रंथ कीध अजाची तिण रै,
जोतिखि पिंगळ नांम स्रब जांण।।

इनके प्रसिद्ध डिंगल कोश “हमीर नांममाळा” की रचना संवत् 1774 में हुई थी अतः इनके काव्य-सृजन का काल भी इसी के आसपास माना जाना चाहिए। इनके रचे लगभग 175 ग्रंथ बताये जाते हैं जिनमें निम्नलिखित ग्रन्थ मुख्य हैं–

1. लखपत पिंगळ, 2. पिंगळ प्रकास, 3. हमीर नांममाळा, 4. जदवंस वंसावळि, 5. देसळजी री वचनिका, 6. जोतिस जड़ाव, 7. ब्रह्माण्ड पुरांण, 8. भागवत दर्पण, 9. चाणक्य नीति, 10. भरतरी सतक, 11. महाभारत रौ अनुवाद छोटौ व बड़ौ।

ये राजस्थानी के उच्च कोटि के विद्वान और श्रेष्ठ कवि थे। खेद है कि राजस्थानी साहित्य के इतिहास सम्बन्धी अब तक के प्रकाशित ग्रन्थों में इनको समुचित स्थान प्रदान नहीं किया गया। इनके ग्रंथों में “लखपत पिंगळ” तथा “पिंगळ प्रकास” दोनों ही छंद-शास्त्र के सुन्दर ग्रंथ हैं। “लखपत पिंगळ” कवि का सबसे अधिक प्रसिद्ध ग्रंथ है जिसका निर्माण संवत् 1796 में हुआ था।-

संवत सत्तर छिनुऔ, पणा तस वरस पटंतर।
तिथि उतम सातिम्म, वार उतिम गुरू वासर।
माह मास व्रतमांन, अरक बैठौ उत्तराइणि।
सुकळ पख्य रिति सिसिर महा सुभ जोग सिरोमणि।
विसतार गाह मात्रा वरण सुजि पसाउ सर सतिरौ।
कहियौ “हमीर” चित चोज करि पिंगळ गुण लखपति रौ।।

ग्रन्थ की भाषा सरल और प्रवाहयुक्त है। कवि ने इसमें छंदों एवं गाहों के लक्षण देकर सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत किये हैं। वस्तुतः यह छंदों का श्रेष्ठ ग्रन्थ है। छंद शास्त्र का ही इनका दूसरा ग्रंथ “पिंगळ प्रकास” है जो “लखपत पिंगळ” से पहिले समाप्त कर लिया गया था। ग्रंथ के अन्त में कवि ने इसका रचनाकाल दिया है–

संवत सतरह अड़सठै, माह सीत रित मास।
जिहड़ौ जोड़ै जांणीयौ, एहड़ौ कीऔ अभ्यास।
सुणतां पुणतां सीखतां, अधक होइ आणंद।
कहीयौ ग्रंथ हमीर कवि, गुण ग्राहग गोविंद।

“अचळदास खीची री वचनिका” व “रतनसिंघ री वचनिका” की भांति हमीरजी ने भी अपने आश्रयदाता की प्रशंसा में “देसलजी री वचनिका” की रचना की। यह पूर्ववर्ती वचनिकाओं की भांति गद्यबद्ध रचना न होकर डिंगल पद्य में ही है। ऐतिहासिक काव्य होने के कारण इसका भी अधिक महत्त्व है। इसमें संवत् 1785 की होलिका के समय सरबुलन्द व कच्छ के महाराव देशल के बीच घोर युद्ध हुआ जिसमें देशल ने विजय प्राप्त की, इसी का ओजस्वी भाषा में सुन्दर वर्णन है। भाषा का प्रवाह देखते ही बनता है। निम्न उदाहरण में शब्द-चयन का चमत्कार देखिये–

भळाभळ कूंत खिंवे अदभूत,
धौळै दिन वेढ़ करै अविधूत।

हुए असुरांण घणां खळ हांण,
सांमी दस नांम रचै घमसांण।।

लथोबथ लोह झपेट लपेट,
खसै दळ मूंगळ आखळ खेट।

नागा करिवा वर खाग निनाग,
कटै धड़बेहड़ पग्ग करग्ग।।

कड़ाकड़ जूट विछूट कटक्क,
तड़ातड़ि त्रूट मिआं मसतक्क।

धमंचक चोट अणीं पड़ि धार,
तड़फ्फड़ मीर फड़फ्फड़ तार।।

ग्रंथों के अतिरिक्त कवि के अनेक फुटकर गीत भी उपलब्ध हैं जिनकी भाषा बड़ी सरस एवं चलती हुई है।

वीरभांण– अठारहवीं शताब्दी में राजस्थानी की श्रेष्ठ रचनाएँ प्रदान करने वालों में कवि वीरभांण का नाम भी अग्रगण्य है। ये भी जोधपुर राज्य के घड़ोई ग्राम के रहने वाले रतनू शाखा के चारण थे और हमीर रतनू के ही समसामयिक थे।[1] इन्होंने डिंगल के ख्याति प्राप्त प्रसिद्ध ग्रंथ “राजरूपक” की रचना कर साहित्य की ही अमूल्य सेवा नहीं की अपितु इतिहास को भी एक अमूल्य देन दी है। ग्रन्थ में तिथि अनुसार अनेक ऐतिहासिक घटनाओं पर विशद वर्णन होने के कारण इसका ऐतिहासिक महत्त्व भी बहुत अधिक है। इस ग्रंथ में जोधपुर के महाराजा अभयसिंह और गुजरात के सूबेदार सर बुलन्दखां के बीच अहमदाबाद पर हुए युद्ध (सं. 1787) का वर्णन है। इस युद्ध में कवि वीरभांण स्वयं महाराजा अभयसिंह के साथ थे अतः उन्होंने अपने इस ग्रन्थ में अहमदाबाद के युद्ध का अपनी आंखों देखा वर्णन किया है। इस ग्रंथ से उस समय की राजनैतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों पर अच्छा प्रकाश पड़ता है। अहमदाबाद के युद्ध के अतिरिक्त कवि ने उक्त ग्रन्थ में महाराजा जसवंतसिंह और महाराजा अजीतसिंह की जीवन घटनाओं के ठीक-ठीक संवत् और स्थान-स्थान पर काम आने वाले वीरों व सामंतों के नाम भी दिए हैं। इसके अनुसार यह स्पष्ट है कि कवि घटनाओं के समय उनके साथ उपस्थित अवश्य ही रहा होगा। डॉ. मोतीलाल ने इनका जन्म संवत् 1745 बताया है[2] जो इस तथ्य से उचित प्रतीत नहीं होता। इनका जन्म अवश्य ही महाराजा जसवंतसिंह के अन्तिम काल के निकट ही हुआ समीचीन जान पड़ता है।

ग्रंथ की भाषा सरल होते हुए भी पूर्ण साहित्यिक डिंगल है। पूरा ग्रंथ 46 प्रकाशों में विभक्त है। निम्न पंक्तियों में कवि की भाषा देखिये–

परम अंस रवि वंस, अवर दुरवंस अभायौ।
हंस वंस अवतंस, पुंस परताप सवायौ।
तेज पुंज आजांनबाहु, मुख कंज सकोमळ।
मंजु कांम समरूप अंज गज बंध महाबळ।
अणकोट कोट ऊथापणौ, आयां थापण ओटरां।
पेखियौ सांम चढ़ती प्रभा, सांमंतां नवकोटरां।।

[1] राजस्थानी भाषा और साहित्य, डॉ. मोतीलाल मेनारिया, पृष्ठ 178.
[2] राजस्थानी भाषा और साहित्य, डॉ. मोतीलाल मेनारिया, पृष्ठ 178.

~~क्रमशः


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14 comments

  • मनोज मिश्रण, आपके द्वारा राजस्थानी शब्दकोश में किया गया प्रयास सफल हो और यह ऐतिहासिक कार्य आपके द्वारा समय पर संपन्न हो जाए और आप समय-समय पर साझा कर हमें भी अनुग्रहित करें।

  • जयश्रीकृष्ण सा

    ब्होत लूंठो अर सरावणजोग काम है सा

    लखदाद आपनैं

    राजेन्द्र स्वर्णकार
    बीकानेर
    📱9314682626

  • शबद कोष सितराम रो,रहसी आभै ओज।
    पण इन खेचळ कारणें, धिन धिन थने मनोज।

  • भोत ई महताऊ काम कर रैया हो आप । राजस्थान अर राजस्थानी रै गीरबैजोग इतिहास अर साहित्य सूं रूबरू हुय रैया हां ।
    आपनै अर पूरी टीम नै मोकळी बधाई अर सुभकामनावाँ ।

  • हिंगलाज दान लालस, भाटेलाई

    बहुत आदर जोग कार्य।मायङ भाषा री सेवा मे महताऊ डिजिटाइजेशन करण वाली आपरी पूरी टीम ने घणा रंग।

  • SHAMBHU DAN

    साहित तणी संभाल़ कर,
    सकव बढावै शान।
    महि पर करै मनोजसी,
    मीसण काम महान।।
    मायड़ भाषा रै मुदे,
    भुज अपणै लै भार।
    सबदकोश री सार लै,
    प्रगट करै प्रचार।।
    ✍️शंभूदान बारहठ कजोई
    मनोज सा आपनै घणा रंग अर लखदाद हुकम।आप समाज अर साहित्य रै वास्तै महनीय कारज कर रैया हो हुकम।

  • राजेन्द्र सिंह चारण

    मनोज मिश्रण साहब आप ओर आपकी टीम ने जो काम किया है, वो राजस्थानी साहित्य के। इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा ।
    सीताराम जी लालस के इस भगीरथ प्रयास को दुनिया के सामने लाना ही , उनको सच्ची श्रंद्धाजलि है।

    • आभार हुकम। आप सभी के साथ और माँ भगवती के आशीर्वाद से ही सब संभव हो रहा है हुकम।

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