राजस्थांनी सबदकोस


राजस्थानी साहित्य का परिचय

| कड़ी – 26 | मध्यकाल (वि.सं.1460-1900)
| धारावाहिक श्रंखला – प्रत्येक मंगल, शुक्र एवं रविवार को प्रेषित


अठारहवीं शताब्दी

नरहरिदास– ये रोहड़िया शाखा के चारण लक्खाजी के पुत्र थे। इनका जन्म संवत् 1600 के उत्तरार्द्ध में हुआ था। अठारहवीं शताब्दी के प्रारम्भिक काल के भक्त कवियों में इनका नाम उल्लेखनीय है। इनका ब्रज भाषा का लिखा “अवतार चरित्र” प्रसिद्ध ग्रंथ है। इसके अतिरिक्त इनकी राजस्थानी की मुक्तक रचनायें भी उपलब्ध हैं। “अमरसिंहजी रा दूहा” और अनेक फुटकर गीत इनकी काव्य-प्रतिभा का प्रमाण देने में पूर्ण समर्थ हैं। इनकी भाषा माधुर्यगुणयुक्त सरस एवं सरल है। इनका एक गीत देखिये–

कुतब गोस अबदाळ सूफी अनै कळंदर, पीरजादा मिळै सांझ परभात।
कांन “अवरंग” रा भरै इक राह कज, वरै नह पड़ै जसवंत छतै बात।।1
मोलवी कराड़ै अरज काजी मुला, पाड़जै देव हर दलां कर पेळ।
मेछवांछै जिकौ हिंद इकलीम मझ, खड़ौ राजा जिसूं वणै नह खेल।।2
अरथ कर नवा फुरकांण री आयतां, लियां कर साह रै कांन लागै।
कहै मख दूम जग हेक मजहब करौ। ………………………….।।

गोविन्दजी– ये रोहड़िया शाखा के चारण और मेवाड़ राज्य के निवासी थे। महाराणा जगतसिंह के समकालीन होने के कारण इनका रचनाकाल संवत् 1700 के आसपास ठहरता है। इनका स्वतंत्र ग्रंथ तो नहीं मिलता परन्तु वीर-रस से परिपूर्ण अनेक फुटकर गीत उपलब्ध हैं। गीतों में प्रयुक्त वीररस की उक्तियां सीधी हृदय को स्पर्श करती हैं। वर्णन में सजीवता है। सुन्दर शब्द-चयन के कारण भाषा-सौष्ठव देखते ही बनता है। महाराणा जगतसिंह के पराक्रम की प्रशंसा में लिखा एक गीत देखिये–

अवर देस देसां तणां लार कर एकठा, रैसिया मूगळां दीध राये।
हेक सिर नावियौ नहीं “सांगाहरै”, “जगै” पतसाह रै द्वार जाये।।1
झाड़ पाहाड़ मेवाड़ रा झाटके, जूंझ रूपी हुवौ खाग झाले।
मुगळ्ळां न गो दिल्लीस थांणा मिळण, हिंदवांणां तणौ छात हाले।।2
रांण रजपूत बट तणौ छळ राखियौ, साह सूं नांखियौ तोड़ सांधौ।
कमरबंध छोड़ कर जोड डंडवत करण, “करण” रै नांमियौ नहीं कांधौ।।3
“जगतसी” “अमरसी” “उदैसी” जेहवौ, छातपत केम कुळ राह छाडै।
रांण सीसोदियौ टेक झालै रहै, एक पतसाह सूं कंध आडै।।4

जयसोम– कवि जयसोम के निश्चित जन्मकाल का पता नहीं लगता, फिर भी सत्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ही इनका पैदा होना माना जाता है। ये तपागच्छीय जैन साधु विजयदेव के शिष्य जससोम के शिष्य थे। अपनी रचना के अन्त में उन्होंने गुरु-वन्दना करते हुए स्वयं लिखा है–

तप गछपति विजयदेव मुनीसर कवि जससोम गुणवरिआरे,
तास सीस जयसोम नमई…जे समरस गुण भरिआरे।

इन्होंने धर्म ग्रन्थ के 6 भागों की गद्य में टीकायें भी लिखी हैं जिनसे इनकी शास्त्रविज्ञता एवं विद्वत्ता का पता चलता है। इनका प्रसिद्ध ग्रंथ “बारह भावना वेलि”, जिसकी रचना संवत् 1703 में हुई थी, राजस्थानी साहित्य में अधिक ख्याति प्राप्त कर चुका है। रचनाकाल के सम्बन्ध में स्वयं कवि ने दृष्टि-कूट शैली में लिखा है–

भोजन नभ गुण (1703) वरस सुचि, सित तेरसकुंजवार,
भगत हेतु भावन भणी, जेसलमेर मझार।

कवि की शान्त रस की यह रचना साधारण बोलचाल की भाषा में ही लिखी गई है। कवि इसी भाषा के आधार पर अपनी बात जन-मानस में उतारना चाहता है। जैसलमेर में कृति का निर्माण होने के कारण स्थल-स्थल पर स्थानीय झलक दृष्टिगोचर होती है, फिर भी सरल राजस्थानी का रूप सर्वत्र हो रहा है। कवि का अलंकारों की ओर ध्यान तो नहीं रहा तथापि कहीं-कहीं शब्दालंकारों तथा अर्थालंकारों का प्रयोग हुआ है, उनसे कवि की सुन्दर भावाभिव्यक्ति का पता चलता है। रचना का एक उदाहरण देखिये–

सुभ मांनस मांनस करी, ध्यांन अम्रत रस रोळ।
नवदळ स्री नवकार पद, करि कमळासन कोळ।।
पातक पंक परवाळि नइ, करि संवरनि पाळि।
परमहंस पदवी भजै, छोड़ी सकळ जंजाळि।।

जगा खिड़िया– राजस्थानी साहित्य के मध्यकाल में प्राचीन परंपरागत चारण शैली में रचे गये ग्रंथों में “वचनिका राठौड़ रतनसिंघजी री, जगा खिड़िया री कही” प्रमुख है। इसके रचयिता जगाजी खिड़िया गोत्र के चारण थे। इनके विषय में बहुत कम विदित है। इन्होंने अपनी वचनिका में अपने जीवन-चरित्र तथा वंश-परम्परा आदि के सम्बन्ध में कोई विवरण नहीं दिया। निम्न पंक्तियों से केवल उनके नाम का पता चलता है–

जोड़ि भणै खिड़ियौ “जगौ”, रासौ रतन रसाळ।
सूरा पूरा सांभळौ, भड़ मोटा भूपाळ।।265

राजस्थानी के विशिष्ट ज्ञाता एवं काव्य-जिज्ञासु डॉ. तैस्सितोरी ने कवि के जीवन वृत्त को पाने का विशेष प्रयत्न किया। जगा के वंशजों से तो कोई उपयुक्त सामग्री न मिल सकी, फिर भी उन्होंने अपने अथक प्रयत्नों से कवि के बारे में बहुत कुछ जानकारी प्राप्त की।

जगाजी रतलाम के वीरवर रतनसिंह के दरबारी कवि थे। उक्त ग्रंथ में इन्हीं रतनसिंह का वर्णन बड़ी ओजस्वी भाषा में किया गया है। राजा रतनसिंह जोधपुर के राठौड़ राजा जसवंतसिंह की ओर से शाहजादा औरंगजेब के विरुद्ध लड़ कर वीरगति को प्राप्त हुये। यह घटना वि.सं. 1715 में हुई थी। कवि ने इसी घटना का उल्लेख अपनी वचनिका में किया है। कुछ विद्वानों के मतानुसार ये स्वयं घटनास्थल पर उपस्थित थे और उन्होंने रतनसिंह की वीरता का आंखों देखा हाल अपनी वचनिका में लिखा है। इस प्रकार इस ग्रंथ का रचनाकाल भी संवत् 1715 के आसपास ही माना जा सकता है।

वचनिका वीररस-प्रधान ग्रंथ है जिसमें गद्य एवं पद्य दोनों का ही प्रयोग हुआ है। भाषा की ओजस्विता से स्पष्ट है कि कवि ने अपनी रचना के लिए सोलहवीं शताब्दी से चली आ रही वीररसात्मक काव्य भाषा का ही अनुकरण किया है। ग्रंथ की भाषा पूर्ण प्रौढ़ है। किस रस में, किस प्रसंग में और कैसी परिस्थिति में भाषा का प्रयोग एवं किस प्रकार की वाक्य-रचना का प्रयोग किया जाय, इस बात का कवि को पूरा ज्ञान था। विषयानुकूल शब्द- चयन एवं प्रसंगानुकूल भावाभिव्यक्ति के कारण कृति बड़ी उत्कृष्ट हो गई है। भाषा पर कवि का पूर्ण अधिकार प्रतीत होता है। युद्ध के विकट प्रसंग का एक शब्द-चित्र देखिये–

भड़ां धड़ भंजि हुवै बि बि भग्ग, खड़क्खड़ ढ़ल्ल झड़ज्झड़ खग्ग।।
कड़क्कड़ वाजि धड़ां किरमाळ। बड़ब्बड़ भाजि पड़ंत बंगाळ।।
दड़ब्बड़ मुण्ड रड़ब्बड़ दीस, अड़ब्बड़ लेत चड़च्चड़ ईस।।
अंत्रां खग झाट निराट अळग्ग। पड़ै बि बि जंघ पड़ै झड़ि पग्ग।।

वचनिका में अनेक छंदों तथा गद्य-बंधों का प्रयोग किया गया है। त्रोटक, भुजंगी, गाथा, मौक्तिक-दांम, दूहा, बड़ा दूहा, कवित्त, चंद्रायणौ, हणूफाळ गाहा, चौसर और दुमेल आदि के प्रयोग से उन्होंने अपने पाण्डित्य का अच्छा प्रदर्शन किया है। कवि की उच्च काव्य-प्रतिभा के फलस्वरूप यह ग्रंथ कथा-प्रवाह की दृष्टि से, शब्द-चयन की दृष्टि से और रस-वर्णन की दृष्टि से उच्च कोटि की रचना हो गया है।

यह तो सत्य ही है कि चारण काव्य-परम्परा में वीररस का प्राधान्य रहता आया है, किन्तु उत्तम कवि प्रसंगवश समस्त रसों का वर्णन किया करते थे। जगा खिड़िया ने भी अपनी वचनिका में वीररस के साथ-साथ अन्य रसों का भी प्रयोग किया है।

तिण वार त्रिया रतनेस तणी, विधि साहस सोळ सिंगार वणी।
पग हाथ मलूक ज पंकजयं, गुणि छत्तिय गत्ति विन्है गजयं।
कटि सिंध नितंब जंघा कदळी, चित नित्त वित्त मराळ चली।
तन रंभह खंभ कनंक तिसी, ओपै सिरि नागेंद्र वेणि इसी।
वनिता मुख पूनिम चंद वणी, भ्रिंग भ्रूह चखां म्रिग रूप भणी।

जगा खिड़िया जहाँ वीर और श्रृंगार रस के अच्छे कवि थे वहाँ ये ईश्वर के भी परम भक्त थे। वीर-रस की रचना के साथ-साथ ईश्वर-भक्ति सम्बन्धी हृदयस्पर्शी कविता का सृजन भी इन्होंने अपनी लेखनी से किया है। भक्ति सम्बन्धी शांत-रस से ओतप्रोत उनके सभी छप्पय केवल गंभीर, भावयुक्त एवं चमत्कारपूर्ण ही नहीं अपितु उनकी आत्मानुभूति की अभिव्यक्ति करने में भी पूर्ण समर्थ हैं। भक्तिरस का एक छप्पय देखिये–

पत राखे द्रोपदी, प्रभू विरदां प्रतपाळै।
ब्रहम पत्त राहवी वेद च्यारे ही गावाळे।
पत राखे पंडवां, अंब कर मांझि उपाये।
गजपत पत राहवे, अनंत खगपत चढ़ आये।
करणां निधांन जगियौ कहै, बहनांमी वह बूझि इण।
कळजुग इसा मांहे किसन, राखे पत राधा रमण।।

धर्मवर्द्धन– कविवर धर्मवर्द्धन के जन्म-संवत् तथा माता-पिता के सम्बन्ध में कोई विवरण ज्ञात नहीं है परंतु इनकी लिखी “श्रेणिक चौपई” से इनका जन्म-संवत् 1700 निर्धारित होता है–

वयु लघु में उगणीस में वरसे, कीधी जोड कहावै।
आयौ सरस वचन को इण में, सो सद्गुरू सुपसाये री।।[1]

इस चौपई की रचना संवत् 1719 में चन्देरीपुर में हुई थी।[2] 19 वर्ष की अल्पायु में ही आपने काव्य की रचना कर कवित्व-शक्ति एवं कुशाग्र बुद्धि का परिचय दिया। अपने जीवन काल में आपने प्रचुर मात्रा में साहित्यिक रचनायें कीं जिनसे आपका राजस्थानी, हिन्दी-गुजराती मिश्रित लोकभाषा एवं संस्कृत भाषा पर पूर्णाधिकार स्पष्ट प्रकट होता है। आपकी लिखी हुई रचनाओं के आधार पर आपका रचनाकाल संवत् 1719 से संवत् 1773 ठहरता है। आपकी सभी रचनायें बड़ी उत्तम, प्रौढ़ एवं मनोहारिणी हैं। उनमें कई स्थलों पर आपके असाधारण पांडित्य, विलक्षण व्यक्तित्व एवं श्रेष्ठ प्रतिभा का परिचय मिलता है। इसी असाधारण व्यक्तित्व एवं काव्य- प्रतिभा के कारण अपने जीवनकाल में ही आपने बहुत अधिक ख्याति प्राप्त करली थी। बीकानेर के महाराजा अनूपसिंह, सुजाणसिंह; जैसलमेर के रावल अमरसिंह, जोधपुर नरेश जसवंतसिंह, वीर शिवाजी और राठौड़ दुर्गादास आदि से आपका काफी अच्छा परिचय था। संवत् 1740 में जिनचन्द्र सूरि ने आपको उपाध्याय के पद से सुशोभित किया। 80 वर्ष की दीर्घायु प्राप्त कर संवत् 1780-81 में आप परलोकगामी हुये। आपकी राजस्थानी रचना का उदाहरण देखिये–

शीत ऋतु वर्णन–
ठंड सबळी पड़े हाथ पग ठाठरे, बायरौ ऊपरां सबळ बाजै।
माल साहिब तिके मौज मांणे मही, भूखियइ लोक रा हाड भाजै।
किड़किड़ै दांतां री पांत सी सी करै, धूम मुख ऊखमा तणा धखिया।।
दरब सुं गरब सौ जांणि गुजें दरक, दरब हीण सबै लोक दुखिया।

सुस्त्री वर्णन–
सुकुळीणी सुंदरी मिठबोली मतिवंती।
चित चोखे अति चतुर जीह जीकार जयंती।
दातारणि दीपती पुण्य करती परकासू।
हस्तमुखी चित हरणि सेवि संतोखे सासू।
सुकुळीण सील राखे सुजस, गहै लाज निज गेह नी।
“धरमसी” जेण कीधौ धरम, तिण गुणवंत पांमी गेहिनी।।

[1] राजस्थान, भाद्रपद 1993, वर्ष 2, संख्या 2, राजस्थानी साहित्य और जैन कवि धर्मवर्द्धन : श्री अगरचन्द नाहटा, पृ. 3.
[2] "सतरसै उगणीसे वरखे चंदेरीपुर चावै।"

~~क्रमशः


नोट: पूर्व प्रेषित समस्त कड़ियाँ पढ़ने के लिए नीचे अनुक्रमणिका मे संबंधित विषय पर क्लिक करें। 

14 comments

  • मनोज मिश्रण, आपके द्वारा राजस्थानी शब्दकोश में किया गया प्रयास सफल हो और यह ऐतिहासिक कार्य आपके द्वारा समय पर संपन्न हो जाए और आप समय-समय पर साझा कर हमें भी अनुग्रहित करें।

  • जयश्रीकृष्ण सा

    ब्होत लूंठो अर सरावणजोग काम है सा

    लखदाद आपनैं

    राजेन्द्र स्वर्णकार
    बीकानेर
    📱9314682626

  • शबद कोष सितराम रो,रहसी आभै ओज।
    पण इन खेचळ कारणें, धिन धिन थने मनोज।

  • भोत ई महताऊ काम कर रैया हो आप । राजस्थान अर राजस्थानी रै गीरबैजोग इतिहास अर साहित्य सूं रूबरू हुय रैया हां ।
    आपनै अर पूरी टीम नै मोकळी बधाई अर सुभकामनावाँ ।

  • हिंगलाज दान लालस, भाटेलाई

    बहुत आदर जोग कार्य।मायङ भाषा री सेवा मे महताऊ डिजिटाइजेशन करण वाली आपरी पूरी टीम ने घणा रंग।

  • SHAMBHU DAN

    साहित तणी संभाल़ कर,
    सकव बढावै शान।
    महि पर करै मनोजसी,
    मीसण काम महान।।
    मायड़ भाषा रै मुदे,
    भुज अपणै लै भार।
    सबदकोश री सार लै,
    प्रगट करै प्रचार।।
    ✍️शंभूदान बारहठ कजोई
    मनोज सा आपनै घणा रंग अर लखदाद हुकम।आप समाज अर साहित्य रै वास्तै महनीय कारज कर रैया हो हुकम।

  • राजेन्द्र सिंह चारण

    मनोज मिश्रण साहब आप ओर आपकी टीम ने जो काम किया है, वो राजस्थानी साहित्य के। इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा ।
    सीताराम जी लालस के इस भगीरथ प्रयास को दुनिया के सामने लाना ही , उनको सच्ची श्रंद्धाजलि है।

    • आभार हुकम। आप सभी के साथ और माँ भगवती के आशीर्वाद से ही सब संभव हो रहा है हुकम।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *