राजस्थानी-भाषा की मान्यता का सवाल – डॉ. आईदान सिंह भाटी

जब भी किसी भाषा के सम्बन्ध में बात चलती है तो मुझे अनायास रबीन्द्रनाथ याद आते हैं। उन्होंने अपने बचपन के एक संस्मरण द्वारा मातृभाषा का महत्व समझाया है। विश्व के सारे चिंतक मातृभाषा में शिक्षा के महत्व को स्वीकारते हैं। भारत की सुप्रसिद्ध-चिंतक रमणिका गुप्ता ने ‘वड़ोदरा गुजरात’ में हुए ‘भाषा रिसर्च एण्ड पब्लिकेशन सेंटर’के एक सम्मेलन का हवाला देते हुए कहा है कि ‘हमारे देश में 1961 के गणना अभिलेख के आधर पर 1652 मातृभाषाएँ हैं और दुनियाभर में बोली जाने वाली लगभग आठ हजार भाषाओं में से लगभग नब्बे फीसद भाषाएँ 2050 तक विलुप्त होने के कगार पर होंगी। ’ आगे रमणिका जी कहतीं हैं कि ‘ इन भाषाओं के लुप्त होने का एक और बड़ा कारण है, आदिवासी क्षेत्रों में कुकुरमुत्तों की तरह अंग्रेजी माध्यम की स्कूलों का खुल जाना। इससे भी आदिवासी भाषाओं को क्षति पहुँच रही है। ’ मैंने यहाँ जानबूझ कर मातृभाषाओं का मुद्दा उठाया है ताकि जीवन में मातृभाषा का महत्व जाना जा सके। मैं या कोई भी समाजचेता राजस्थान की मातृभाषा हिंदी नहीं मानेगा। राजस्थानी भाषा के संबंध में जो पहली ऐतिहासिक भूल यह हुई कि पुरुषोत्तमदास टंडन, नेहरूजी आदि राजनेताओं के कहने में आकर राजस्थान के तत्कालीन राजनेताओं ने मातृभाषा की बलि चढ़ा दी। दक्षिण भारतीय लोगों के हिंदी विरोध की बातें बनाकर, हिन्दी का तात्कालिकरूप से समर्थन करने और बाद में राजस्थानी को मान्यता की बात कहकर राजस्थान-वासियों को जिस अंधगली में धकेल दिया गया, उसकी सजा हम आज भी भुगत रहे हैं।

मातृभाषाओं के मुद्दे पर मैं यहाँ प्रमुख भाषाविद श्री सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या का वक्तव्य उल्लेखित करना मुनासिब समझता हूँ, जिससे प्रांतीय भाषाओं और बोलियों का महत्व स्थापित होता है –‘प्रांतीय भाषाओं के पुनरुद्धार से हिन्दी का आंतरप्रदेशिक महत्व किसी तरह कम नहीं हो सकता। पच्छाहीं के लोगों ने बेशक हिंदी का थोड़ा बहुत फैलाव किया है और टूटी फूटी व्याकरण-भ्रष्ट हिंदी को अपनाकर पच्छाहींके आसपास के लोगों ने हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा बनाया है, लेकिन राष्ट्रभाषा या आंतरप्रदेशिक भाषा में और घरेलू बच्चों की शिक्षा की बोली या प्रांतीय कामकाज की बोली में बहुत पार्थक्य है। मातृभाषा के सिवाय किसी दूसरी भाषा में मनुष्य के हृदय के भावों का पूरा-पूरा प्रकाश नहीं हो सकता और जब तक मनुष्य साहित्य में अपना पूरा प्रकाश नहीं कर सकता, तबतक वह जो साहित्य बनाने की कोशिश करता है, उसमें बहुत सी व्यर्थता आ जाती है। श्री तुलसीदासजी और विद्यापति ने जो कुछ लिखा –अपनी मातृभाषा में ही लिखा, इसीलिए भारतीय-साहित्य के उद्यान में विद्यापति के पद और तुलसीदास का ‘रामचरितमानस’ हर तरह से सफल रचना होकर अधिक से अधिक लोकप्रिय हो सकी और जन-जन की जिव्हा पर आसानी से स्थान पा सकी।

भारत में इस वक्त 15 मुख्य भाषाएँ चालू है। प्रांतीय बोलियों की तो गिनती ही नहीं की जा सकती। इन मुख्य या साहित्यिक भाषाओं में 11 भाषाएँ उत्तर भारत की गिनी जाती है और 4 दक्षिण भारत की।

इनके अतिरिक्त ऐसी कुछ भाषाएँ भी है जो आज साहित्यिक महत्त्व की अधिकारिणी तो नहीं है, परन्तु प्राचीन समय में उनका साहित्य उच्च कोटि का था और उनकी संतानों के हृदय की सभी बातें उन्हीं भाषाओं में प्रकट होती थी।

राजस्थानी और मैथिली –और बोलियों के साथ इन दो भाषाओँ के निकेन्द्रीकरण की बात आज हिंदी संसार में लाई गई है। ‘हिन्दी प्रान्त’ में जो बोलियां सिर्फ घर में और सीमित प्रांत में काम में लाई जाती है, उन बोलियों के दो जबरदस्त और नामी वकील हिन्दी साहित्य क्षेत्र में पधारे हैं। उनमें से एक हैं श्री बनारसीदास चतुर्वेदी और दूसरे हैं श्री राहुलजी सांकृत्यायन।
भाषा तात्त्विकी दृष्टि से मेरी राय यह है कि जहां सचमुच व्याकरण का पार्थक्य दिखाई दे—जहां प्राचीन साहित्य रहने के कारण प्रांतीय बोली के लिए उसके बोलने वालों में अभिमान बोध हो और जहां प्रांतीय बोली बोलने वाले बच्चों और वय:प्राप्त लोगों को हिंदी अपनाने में दिक्कत हो, वहाँ ऐसी प्रान्तीय बोली की शिक्षा और प्रांतीय कामकाज में ला देने का सवाल आ सकता है।

जहां तक हम देखते हैं व्याकरण की दृष्टि से राजस्थानी—खड़ीबोली हिंदी से पार्थक्य रखती है। राजस्थानी जनता में अपने प्राचीन साहित्य के लिए एक नई चेतना भी दिखाई दे रही है। . . . . . . . राजस्थानी के प्राचीन साहित्य के बारे में कुछ बोलने की जरूरत नहीं। अगर तथाकथित ‘हिंदी’ साहित्य से राजस्थानी में लिखा हुआ साहित्य निकाल दिया जाय, तो प्राचीन हिंदी साहित्य का गौरव कितना ही घट जाएगा। चंदबरदाई के पहले के समय में और उसके बाद के समय में राजस्थानमें जितने कवि हो गये हैं, उन पर ज्यों-ज्यों प्रकाश डाला जाता है, त्यों-त्यों हमारा विस्मय और आनन्द बढ़ता जाता है। केवल राजस्थानी बोलने वालों ही को इसका गौरव नहीं है, लेकिन समस्त भारत को इसका गौरव है।

इस गौरव के वश यदि राजस्थानी लोग अपनी मातृभाषा का पुनरुद्धार और पुनःप्रतिष्ठा करना चाहते हैं, तो इसमें नाराज होने और बुरा मानने का कुछ नहीं है। भारत की प्रमुख 15 भाषाओँ में यदि राजस्थानी जैसी दो-चार भाषाएँ प्रतिष्ठित हो जाएं, तो इसमें आशंका और भय की कोई बात नहीं है। राजस्थानी लोग अपनी मूर्च्छित सी आत्मा को फिर सजग और सचेत करना चाहते हैं, इसमें समस्त भारत को लाभ पहुंचेगा, और राष्ट्रीय एकता की कोई भी हानि नहीं होगी। (श्री सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या—भारतीय भाषातत्त्व के आचार्य –कलकत्ता विश्वविद्यालय 11-2-1944)

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि श्री सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या का यह वक्तव्य आजादी से पहले का है। इस वक्तव्य से पहले फ्रेंच विद्वान ‘गार्सा द तासी’ अपने ग्रन्थ ‘इस्तार द ल लितरेत्यूर ए ऐं ऐंदूस्तानी’ और सर जार्ज ग्रियर्सन ‘लिंग्विस्टिक सर्वे आफ इंडिया’ में राजस्थानी का प्रमाणिक भाषा वैज्ञानिक विशलेषण कर चुके थे। राजस्थानी भाषा की जिन बोलियों का वितंडा बनाकर राजस्थानी को एक भाषा के रूप में खारिज किया जा रहा है वे बोलियाँ ही तो भाषाओं के प्राण होतीं है। सर जार्ज ग्रियर्सन के ‘लिंग्विस्टिक सर्वे आफ इंडिया’ में तो आज के मध्यप्रदेश की मालवी और हरियाणा की बांगरू तक राजस्थानी भाषा की बोलियाँ है। बोलियों से भाषाएँ समृद्ध होती है, यदि तेलुगु 36, कन्नड़ 32, मलयालम 14, कोंकणी 17, तमिल 22, नेपाली 06, गुजराती 27, पंजाबी 29, बंगाली 15, उड़िया 24, अंग्रेजी 57, और हिन्दी 43 बोलियों के होते हुए एक भाषा है तो 73 बोलियोंवाली राजस्थानी इन सबसे समृद्ध भाषा है।

भाषावैग्यानिकों में एक सुप्रसिद्ध नाम है –प्रोफेसर ज्यूल ब्लॉख। उनका ग्रन्थ ‘ल आँ दो एरिया’ में वे श्री सिलवेंलेवी ए. मेइए और श्री टर्नर जैसे भाषा-शास्त्रियों का आभार मानते कहते हैं की ‘ भाषा की प्रामाणिकता के लिए बोलने वालों की संख्या कोई महत्वपूर्ण इकाई नहीं है, यद्यपि यह रोचक तत्व हो सकता है। ’ वे आगे लिखते हैं—‘आधुनिक भाषाओं की रोचकता उनके संख्या सूचक महत्व से कहीं अधिक है। उसके सामने उन भाषाओंके जानने की यहाँ आवश्यकता नहीं है, जिनका प्राय:वर्णन किया जाता है, यद्यपि उनमें से कुछ की गणना संसार की बड़ी बड़ी भाषाओंमें की जाती है, व्यापक अर्थ में हिंदी का उसमें छठा स्थान है, फ़्रांसिसी के मुकाबले बंगाली सातवें स्थान पर आती है, बिहारी तेरहवें, मराठी उन्नीसवें पर, पंजाबी, राजस्थानी, उड़िया क्रमशः, बाइसवें, पच्चीसवें और अठाईसवें स्थान पर। (पृष्ठ-19-20) समझदार पाठक विचार करें भाषा-वैज्ञानिक राजस्थानी को संसार की बड़ी बड़ी भाषाओँ में गिना रहे हैं और लाल बुझक्कड़ राजस्थानी विरोधी आँख मूंदे प्रलाप कर रहे हैं—‘ राजस्थानी – कैसी ?’ ‘इसमें तो बोलियाँ हैं ?’ तुलसीदास जी ने ऐसे लोगों के लिए ही लिखा है –‘मूंदहुं आँख कतहु कछु नाहिं। ’

कौन सी बोली किस भाषा की है, अथवा एक भाषा की बोली किसी दूसरी भाषा से कैसे नजदीकी ग्रहण करती है, यह भी भाषा-वैज्ञानिक तथ्य है। भाषाओँ की सीमाओं और उनके अंत:संबंधों को लक्षित कर सर जार्ज ग्रियर्सन बहुत पहले कहते हैं—‘ भाषाओँ की सीमाएं कृत्रिम मिश्रण द्वारा छिप जाती है, परिवर्तन अधिकांशत: धीरे-धीरे होते हैं, जिसका तात्पर्य है, दो परस्पर भिन्न भाषाएँ अतिसूक्ष्म अंतरोंवाली भाषाओँ की श्रेणी में आ जाती है, तो इससे किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए विचारणीय है, क्या भोजपुरी अपने पूर्व या पश्चिम की सीमाओं से संबंधित है ? कच्छ की भाषा क्या सिन्धी है या गुजराती ? (प्रोफेसर ज्यूल ब्लॉख—भारतीय आर्य भाषा)

सर जार्ज ग्रियर्सन का यह उद्धरण मैंने इसलिए दिया है ताकि अजानकर लोग बोलियों के वितंडे को समझ सके। जो लोग राजस्थानी को केवल मारवाड़ी समझ रहे हैं, शायद वे ग्रियर्सन की बात से बोलियों का मर्म समझ जाएं। ग्रियर्सन कच्छी बोली पर सिन्धी के प्रभाव को परिलक्षित कर रहे हैं, जो कि आज गुजराती का महत्त्वपूर्ण अंग है। आज मेवाती पर भले ही ब्रज का असर हो, अथवा वागडी पर गुजराती का प्रभाव मिले पर सर जार्ज ग्रियर्सन के मतानुसार वे अपनी मूलभाषा राजस्थानी की ही बोलियाँ मानी जाएँगी।

श्री सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या ने जिस राजस्थानी और मैथिली को एक ही स्तर पर रखा था, वह मैथिली राजनीतिक प्रभाव से संविधान की आठवीं अनुसूची में पूर्ण भाषा का दर्जा पा चुकी है, कोंकणी भी मराठी से अलग होकर आठवीं अनुसूची में पूर्ण भाषा बन चुकी है, किन्तु बाहरी तत्वों के हस्तक्षेप और राजस्थानी राजनेताओं की निष्ठाहीनता के चलते राजस्थानी समाज मान्यता के लिए संघर्षरत है।

प्रत्येक भाषा की एक केन्द्रीय उप-भाषा अथवा बोली होती है जो संपर्क भाषा का रूप ग्रहण करती है। इस संपर्क भाषा के विकसित होने के अनेक कारण होते हैं। खड़ी बोली को भी जिस तरह अन्य बोलियों ने स्वीकारा है, निश्चित रूप से राजस्थानी में भी एक सम्पर्क भाषा विकसित होने की प्रक्रिया में है। राजस्थान में विश्वविद्यालयों में यह पढाई जा रही है, आकाशवाणी और स्वतंत्र न्यूज चैनलों पर समाचार जिस राजस्थानी में पढ़े जा रहे हैं, साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में जिस भाषा में लेखन हो रहा है, वही तो उसका सम्पर्क रूप है। हिंदी के अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त मनीषि प्रोफेसर नामवरसिंह ने अनेक मंचों से यह कहा है कि राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कर उसे पूर्ण भाषा की मान्यता मिलनी चाहिए। उन्होंने बाड़मेर में एक साक्षात्कार में यह भी खा था, कि यह राजस्थान के लोग तय करेंगे कि उनकी सम्पर्क भाषा कौन सी बोली होगी ? आजकल जो लोग मारवाड़ी को जो राजस्थानी कह रहे हैं वे प्रकारांतर से सम्पर्क-बोली की तरफ संकेत कर रहे हैं

ओमपुरोहित ‘कागद’ के शब्दों में कहूं तो –‘अपने बच्चों की जुबान काटकर, राष्ट्र के चरणों में रखी राजस्थानियों ने। ’ बोलियों और विभिन्नताओं की बात कहने वाले वे तत्व हैं, जो न तो भाषाविद हैं और न ही समाज-चिंतक। ये लोग समय समय पर अखबारों और मिडिया के चंद लोगों के माध्यम से राजस्थानी विरोध के स्वर रंगा-सियारों की तर्ज पर उछालते हैं, पर पब्लिक अभी भी इन्हें पह्चान नहीं पाई है। राजनेता उनकी चिल्लाहट और गीदड़ भभकियों में आ जाते हैं और बेतुके बयानों से राजस्थानी समाज को बरगलाते हैं। कुछ वर्षों पहले एक अखबार ने एक विमर्श चलाया, जिसमें राजस्थानी-विरोधियों को प्रमुखता दी गई। हाँ राजस्थानी समर्थकों के मतों को भी छापा गया। राजस्थानी-विरोधियों के मतों में ‘इस तरह तो हिंदी परिवार बिखर जाएगा’, अथवा ‘शांत प्रदेश कहीं जलने न लग जाय’ जैसे भावुक वक्तव्य दिए गए थे। और विमर्श बिना निष्कर्ष के समाप्त कर दिया गया। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि यह वह समय था जब राजस्थानी की मान्यता की बात केंद्र में शीर्ष पर थी। इस प्रकार विरोध के इस हौए से मान्यता की बात टल गई।

राजस्थान राज्य अभिलेखागार के रिकार्ड से इन तथ्यों की पुष्टि होती है कि रजवाड़ों के समय राजकाज, शिक्षा, हुंडी, पट्टे-परवाने और अन्य कार्य राजस्थानी भाषा में ही होते थे। रजवाड़ों का यह स्थान भाषा के ही कारण राजस्थान कहलाया। सिन्धी, नेपाली आदि भाषाओँ को मान्यता में राज्यों का पचड़ा नहीं था, लेकिन राजस्थानी के लिए राज्य विधानसभा से मान्यता का प्रस्ताव पास करना जरूरी हो गया। राजनेता इसे टरकाते रहे। जब डॉ॰ सोनाराम बिश्नोई राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी बीकानेर के अध्यक्ष थे, तब 2002 के अकादमी के वार्षिकोत्सव में तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत ने, गाँधीवादी मूल्यों में आस्था रखने के कारण श्री नेमीचंद जी जैन ‘भावुक’ और डॉ॰ सोनाराम बिश्नोई से कहा कि ‘आप राजस्थानी भाषा की मान्यता की बात करते हो, पर क्या अकादमी ने राजस्थानी भाषा में गांधीजी की आत्मकथा का अनुवाद करवाया है ? आगे बोलते हुए उन्होंने कहा कि लगभग संसार की सारी भाषाओं में गांधीजी की आत्मकथा का अनुवाद हो चुका है। यदि अकादमी इस काम को कर दे तो मैं राजस्थानी भाषा की मान्यता का संकल्प राजस्थान विधानसभा से पारित करवा दूंगा। ’ श्री नेमीचंद जी जैन ‘भावुक’ और डॉ॰ सोनाराम बिश्नोई ने इस बात को गम्भीरता से लिया और भावुक साहब ने गांधीजी की आत्मकथा की प्रति डॉ॰ सोनाराम बिश्नोई को तत्काल उपलब्ध करवा दी। यह महज एक सयोग था कि डॉ॰ सोनाराम बिश्नोई और मेरे मित्र दलपत परिहार के अनुरोध पर वह काम मैंने एक निश्चित समय सीमा में किया और उसका लोकार्पण जोधपुर के गाँधी – भवन में गाँधी-जयन्ती पर 2002 में खुद मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत ने किया। अपने मुख्यमंत्री रहने के उस काल में राजस्थान विधानसभा के अंतिम-सत्र के अंतिम दिन मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत ने शिक्षा-मंत्री श्री बुलाकीदास कल्ला से राजस्थानी भाषा की मान्यता का संकल्प रखवाकर राजस्थान विधानसभा से ध्वनि-मत से पारित करवाया। (यह भी एक संयोग था कि मुझे इस अनुवाद पर साहित्य अकादेमी नई दिल्ली का 2006 में अनुवाद पुरस्कार मिला। ) मान्यता की गेंद अब दिल्ली के पाले में है। तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत और शिक्षा-मंत्री श्री बुलाकीदास कल्ला ने तो अपनी मातृभाषा का ऋण चुका दिया। अब मान्यता की बात विकास-पुरुषों के पाले में है। एक राष्ट्र, एक भाषा, एक धर्म की बात कहने वालों को मातृभाषाओं की महकती विविध रूपा फुलवारी कितनी भायेगी, यह तो भविष्य ही बताएगा।

राजस्थानी की मान्यता का प्रश्न आधी सदी से साहित्यकार उठा रहे हैं, पर अब उससे युवा वर्ग और जनता जुड़ने लगी थी, कि अचानक बाजारू दलाल लोग बीच में आ टपके हैं जो सर्वाधिक चिंता का विषय है। समर्पित लोग जिन्होंने राजस्थानी की मान्यता की आवाज बुलन्द की थी, वे आज अपने को उपेक्षित अनुभव कर रहे हैं। युवा बाजारू दलालों की चाल-बाजियों को समझ नहीं पा रहे हैं। मूल्य-विहीनता के इस दौर में मान्यता का प्रश्न ‘नक्कारखाने में तूती’ बन कर रह गया है। राजनीतिक इच्छा-शक्ति का अभाव और आंचलिक मुद्दों में उलझे राजनेताओं से सार्थकता और मूल्यवान पहल की उम्मीद करना अपने आप को धोखा देना है। राजस्थानी संस्थानों से जुड़े बिकाऊ लोगों का चरित्र नितांत व्यक्तिवादी और स्वार्थी सिद्ध हो चुका है। शिक्षाविद ‘कागला’ से ‘क्रो’ को महत्वपूर्ण सिद्ध करने में लगे हैं, उनकी दृष्टि में चकाचौंध बाजार है, वैश्विक-सपने हैं, बाजारू टुकड़ों पर पलने वाली राजनीति भूमि-पुत्र का दर्द नहीं जानती, वह मातृभाषा की पीड़ा क्या पहचान पायेगी ?

~~डॉ. आईदान सिंह भाटी 

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